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सर्वकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( २८ )
प्राणायाम
प्राण की पूरक, कुम्भक और रेचक अवस्थाएँ स्वाभाविक रूप से बिना प्रयत्न के
निरन्तर गतिशील रहती हैं । हृदय स्थित कमलकोश में प्राण का उदय होता है । नासिका
मार्ग से बाहर निकल कर यह बारह अंगुल चलकर अन्त में आकाश में विलीन हो जाता है ।
यह बाह्य आकाश योगशास्त्र में बाह्य द्वादशान्त के नाम से प्रसिद्ध है । प्राण की इस
स्वाभाविक गति को रेचक कहते हैं । बाह्य द्वादशान्त में अपान का उदय होता है और नासिका
मार्ग से ही चलकर यह हृदय स्थित कमलकोश में विलीन हो जाता है । अपान की यह
स्वाभाविक आन्तर गति पूरक कही जाती है। प्राण द्वादशान्त में और अपान हृदय में क्षण मात्र
के लिये विलीन हो जाता है । यही प्राण की कुंभक अवस्था है । बाहर और भीतर दोनों
स्थलों में निष्पन्न होने से इसके बाह्य और आन्तर ये दो भेद होते हैं । इस तरह से प्राणशक्ति
की ये चार क्रियाएँ बिना प्रयत्न के निरन्तर गतिशील हैं । अर्थात् प्राण और अपान की यह
चतुर्विध गति पुरुष के प्रयत्न के बिना निरन्तर स्वाभाविक रूप से चलती रहती है । पुरुष जब
अपने विशेष प्रयत्न से मध्यदशा के विकास के लिये क्रमशः अथवा एकाएक इसकी गति को
रोकता है, इस पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहता है, तो प्राण और अपान की गति
की यह अवरोध प्रक्रिया योगशास्त्र में प्राणायाम के नाम से जानी जाती है । २५, ६६ और
८८ वें श्लोक की व्याख्या में प्राणायाम के सम्बन्ध में विस्तार से विचार किया गया है ।
सहज योग में प्राणायाम के इस आयास साध्य अभ्यास की आवश्यकता नहीं रहती ।
वहाँ तो श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया के माध्यम से निरन्तर चल रहे प्राण के आयाम (विस्तार)
का केवल सूक्ष्म निरीक्षण किया जाता है । जैसा कि २५वें श्लोक की व्याख्या में बताया
गया है ।
क्षोभ
मन की चंचलता को क्षोभ कहते हैं । ७३वें श्लोक में मन की किसी भी आह्लादात्मक
स्थिति में धारणा के अभ्यास की विधि बताई गई है । शर्त यह है कि यह आह्लादात्मक
स्थिति क्षोभ से न पैदा हुई हो । शिवोपाध्याय (पृ० ६३) ने क्षोभ दशा का विस्तार से वर्णन
किया है । इस स्थिति को हेय माना गया है । स्पन्दकारिका में कहा गया है कि क्षोभ दशा
का विराम हो जाने पर ही परम पद की प्राप्ति होती है । काम, क्रोध आदि से उत्पन्न होने
वाले सभी आवेग क्षोभ कहलाते हैं । इनके शान्त होने पर ही निर्विकल्प स्वात्मस्वरूप प्रका-
शित होता है । क्षोभ की उत्पत्ति विकल्प दशा में ही होती है । विकल्प व्यापार के शोधन के
प्रसंग में प्रशस्तिभूतिपाद ने कहा है कि इस संसार में अपनी सुन्दर, लुभावनी आकृति के
कारण मन को आह्लादित कर देने वाले जो भी पदार्थ दिखाई पड़ते हैं, उन सब में मेरा
अपना ही स्वरूप तो प्रकाशित हो रहा है, वह सब मैं ही तो हूँ, इस तरह से अपनी स्थिति
को पुष्ट करना ही सज्जनों का पुनीत कर्तव्य है । सभी पदार्थों में इस तरह से स्वात्मस्वरूप
की भावना से मन का क्षोभ (चंचलता) शान्त हो जाता है ।