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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१६ : विज्ञानभैरव
तत्त्वतो च नवात्माऽसौ शब्दराशिर्न भैरवः ।
न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ॥११॥
नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः¹ ।
न चक्रक्रमसंभिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ॥१२॥
तत्त्वतो यथार्थतः, असौ भैरवो न नवात्मा न वा तत्त्वस्वरूपः, न वा वामा-
दिनवशक्तित्वरूपः। न शब्दराशिवमियः। न चासौ त्रिशिरोभैरवः। न च शक्तित्रयात्मकः
नरशक्तिशिवात्मा, इच्छाज्ञानक्रियाशक्तित्रयात्मा वा। न वा नादबिन्दुमियः शिवशक्ति-
स्वरूपः, नादः शक्तिः, बिन्दुश्च शिव इति। न वा अर्धचन्द्रनिरोधिकादिस्वरूपः। न
च चक्रक्रमसंभिन्नः षट्चक्रादिभेदगः, तकारादिक्षकारान्तवर्णचक्रस्वरूपो वा। न वा
कुण्डलिन्यादिशक्तिस्वरूपभाक् । वस्तुतस्तु स्वात्मभैरव एव परमार्थतोऽकथ्योऽपि यां
काञ्चित् कल्पनामाश्रित्य उपदिदिक्षाविषयीकृतः सन् प्रश्नतनवात्मशब्दराश्याद्यष्टक-
स्वरूपो भवतीति भावः ॥११-१२॥
वास्तव में यह भैरव न तो नवात्मा, नव तत्त्वस्वरूप या वामादि नव शक्तिरूप है,
न शब्दराशित्वरूप है, न त्रिशिरोभैरव है, न नर-शक्ति-शिवात्मक या इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक
शक्तित्रयस्वरूप ही है। यह न तो शिव-शक्तिस्वरूप, अर्थात् नाद¹ (शक्ति) और बिन्दु (शिव)
के रूप में शब्द और अर्थ स्वरूप है, अथवा ज्ञान और क्रिया स्वरूप है और न प्रणव (ॐकार)
की अर्धचन्द्र, निरोधिका आदि कलाएं ही उसका स्वरूप हैं। यह न तो षट्चक्रों का भेदन
करके ही जाना जाता है, अथवा अकारादि क्षकारान्त वर्णचक्र में विद्यमान अहंत्वरूप ही है
और न कुण्डलिनी आदि शक्ति के स्वरूप को धारण करने वाला है। परीक्षा करने पर ऊपर
बताये गये नवात्म प्रभृति सभी स्वरूप उस बोधभैरव का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते, क्योंकि
वह स्वात्मस्वरूप भैरव तो वस्तुतः अकथ्य है, अवर्णनीय है। उसको समझाने के लिये किसी
न किसी कल्पना का सहारा लेना पड़ेगा। ऊपर वर्णित सभी स्वरूप इस तरह की कल्पनाओं
के सहारे ही खड़े हैं। जैसा कि भट्ट उत्पल ने अपनी प्रत्यभिज्ञाकारिका में बताया है—
स्वातन्त्र्यामुक्तमात्मानं स्वातन्त्र्यादद्वयात्मनः ।
प्रभुरीशादिसंकल्पनैर्मयि व्यवहारयेत् ॥ (१।५।१६)
इसका अभिप्राय यह है कि स्वातन्त्र्य अर्थात् अनन्यमुखप्रेक्षित्त्व (किसी भी कार्य को
करते समय किसी भी तरह की सहायता के लिए किसी का भी मुंह न ताकना) आत्मा का
सहज स्वभाव माना जाता है। अद्वयस्वभाव बोधभैरव अपने स्वातन्त्र्य के कारण अपने इस
स्वभाव का परित्याग किये बिना ही मैं ईश्वर (भगवान्) या नित्य, विभु, स्वतन्त्र जीवात्मा
१. ०धकः-ख०।

  1. शिव और शक्ति के अर्थ में नाद और बिन्दु शब्दों के प्रयोग के विषय में उपोद्घात में
    सूक्ष्म विचार किया गया है।