सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

( ३९ )
कम स्थान मिला है। भारतीय वाङ्मय की एक शाखा आगमशास्त्र या तन्त्रशास्त्र ने एक ही
जन्म में भोग और मोक्ष, अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त कराने की बात की है, किन्तु
इसमें भी व्यक्तिगत भावना ही प्रधान रही है। कहा जा सकता है कि भारतीय दर्शन और
आध्यात्मिकता में वैयक्तिक उन्नति का तो चूड़ान्त उत्कर्ष है, किन्तु साथ ही सामूहिक उन्नति
का पक्ष अत्यन्त दुर्बल है। इसी तरह से इसमें ऐहलौकिक दृष्टि की अपेक्षा पारलौकिक दृष्टि
का प्राबल्य हो गया है। साधारण भारतीय की यह दृढ़ धारणा है कि संसार अवनति की
ओर तेजी से बढ़ रहा है, इसको रोका नहीं जा सकता। कर्मवाद और भाग्यवाद उसको इसी
ओर ढकेलते हैं। उसका सारा पुरुषार्थ कलिकाल की अर्गला से अवरुद्ध है।
इसके विपरीत “स्वात्मैव देवता प्रोक्ता ललिता विश्वविग्रहा” सरीखे आगमिक एवं
तान्त्रिक दर्शन के प्रतिपादक वाक्यों के सहारे अपने में विश्वाहन्ता¹ का विकास कर अरविन्द
जैसे महायोगी इसी धरती पर दिव्य मानवता के अवतार की बात करते हैं और महामनीषी
श्रद्धेयचरण श्रीगोपीनाथ कविराज अखण्ड महायोग के माध्यम से इस स्थिति को लाना चाहते
है। पुरुषार्थ की महत्ता के प्रतिष्ठापक योगवासिष्ठ सरीखे और विश्वाहन्ता का उपदेश देने
वाले विरूपाक्षपंचाशिका, विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र के ग्रन्थ उनके इस कार्य में
सहायक हैं।
आधुनिक विश्व स्वत्व के संकोच के कारण दुःखी है। यह स्वत्व धर्म, राष्ट्र, राज्य,
भाषा, जाति, कुटुम्ब-कबीले आदि के नाना विभ्रमों में पड़ कर बँटा हुआ है। अखण्ड संस्कृति
के माध्यम से इन विभ्रमों को तोड़ पाने के उपरान्त ही अखण्ड स्वत्व का बोध हो सकता
है। सहिष्णुता और समन्वय भारतीय इतिहास की विशेषता रही है। यह प्रक्रिया अब भी
निरन्तर क्रियाशील है। त्याग और तपस्या के उच्च आदर्शों से अनुप्राणित साधु-सन्तों की
परम्परा परस्पर के स्थूल भेदों को मिटाने में निरन्तर सचेष्ट रही है। आधुनिक विश्व के
वर्तमान धर्मों और विभिन्न वादों के विरोधी दृष्टिकोणों में सहिष्णुतापूर्वक समन्वय स्थापित
कर अखण्ड संस्कृति के निर्माण का पथ प्रशस्त किया जा सकता है, जिससे कि विश्व-समष्टि
में इस अखण्ड संस्कृति के आविर्भाव से स्वत्व का संकोच दूर हो और “वसुधैव कुटुम्बकम्”
की उदात्त भावना का विकास हो। जहाँ प्रत्येक वस्तु के अभेद के प्रतिष्ठित होने पर भी
अपने स्वरूप के नष्ट होने का कोई प्रसंग नहीं है, वहाँ विश्व के किसी वाद, धर्म अथवा
संस्कृति के स्वत्व के लोप का भय क्यों उपस्थित होगा ?
अद्वैतवादी आगमिकों की मान्यता है कि नट अपने मन से राम-कृष्ण, रावण-कंस
प्रभृति की भूमिका में प्रविष्ट होकर नाना प्रकार के सुख-दुःखों की अनुभूति स्वयं तटस्थ
भाव से करता हुआ भी जैसे दर्शकों में साधारणीकरण प्रक्रिया के आधार पर सचमुच की सी
अनुभूति पैदा करा देता है, उसी तरह से ईश्वर भी तटस्थ भाव से लीला करता है। लीला
१. धारणा संख्या ६५ और ७९ के विवरण के प्रसंग में इस शब्द की व्याख्या की गई है।
९८,१०३, १०७-१०८ श्लोक में भी यही विषय प्रतिपादित है।