विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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पंचम और उन्मना में षष्ठ शून्य की स्थिति मानी गई है। ये सभी शून्य सामय (सहेतुक)
माने गये हैं। इनका परित्याग कर सप्तम शून्य में लीन होने का साधक को प्रयत्न करना
चाहिये। यह सप्तम शून्य परम सूक्ष्म है, सभी अवस्थाओं से अतीत है। वस्तुतः यह चिदा-
नन्दघन परमशिव तत्त्व शून्य नहीं है, तो भी इसको शून्य कह दिया जाता है। शून्य
अभावात्मक होता है। इस शिवतत्त्व को शून्य इसलिये कहा जाता है कि यहाँ आकर सभी
जागतिक पदार्थों का क्षय (अभाव) हो जाता है। इस तरह से अभावात्मक शून्यों की संख्या
छः ही है। यह सप्तम शून्य अभावात्मक नहीं है। अतः इसके कारण अभावात्मक शून्यों की
संख्या में वृद्धि न होने से शास्त्रों में छः ही शून्य माने गये हैं। वस्तुतः शिवतत्त्व महासत्ता-
त्मक, प्रकाशात्मक, परम शान्त कोई स्वरूप है। पूर्वोक्त सभी शून्यों में यह व्याप्त है, अर्थात्
यही एक तत्त्व उपाधि के भेद से सभी शून्यों में वर्तमान है।
इस प्रकार हमने यहाँ विज्ञानभैरव में वर्णित धारणाओं के सभी प्रमुख विषयों का
संक्षेप में स्पष्टीकरण किया है। हमने प्रारम्भ में ही बताया है कि यह एक योगशास्त्र का
ग्रन्थ है। अब हम इस विषय पर विचार करते हैं कि यह योगशास्त्र क्या है ?
योगशास्त्र क्या है ?
आस्तिक-नास्तिक, वैदिक-अवैदिक, सभी भारतीय दर्शनों में अपने अन्तिम लक्ष्य तक
पहुँचने में योगशास्त्र की सहायक भूमिका स्वीकार की गई है। प्रत्येक दर्शन में परम तत्त्व
के निरूपण के साथ-साथ उस स्थिति तक पहुँचने के लिये शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक
मानी गई है। शरीर और विशेष कर मन की शुद्धि यौगिक प्रक्रिया के आधार पर ही की
जा सकती है। अतः अनिवार्य रूप से प्रत्येक दर्शन में योग का निरूपण पाया जाता है।
प्रत्येक दर्शन की विशेष यौगिक प्रक्रिया भी हो सकती है, किन्तु कुछ सामान्य नियम सर्वत्र
एक स्वर से मान्य हैं, जिनका कि पातंजल योगसूत्र में विस्तार से प्रतिपादन किया गया है।
इस प्रकार योगशास्त्र को हम सर्वसामान्य अथवा आज की भाषा में धर्म-निरपेक्ष शास्त्र कह
सकते हैं, जिसमें कि बिना किसी धार्मिक या लिंग-जाति आदि के भेद-भाव के मानव मात्र
के शारीरिक परिष्कार के साथ-साथ मन के भी परिष्कार का मार्ग दिखाया गया है।
आज कल योग शब्द को पातंजल योग दर्शन तक ही सीमित कर दिया गया है,
किन्तु वास्तव में बात ऐसी नहीं है। भारतवर्ष में विविध योग-सम्प्रदाय समय-समय पर
प्रचलित हुए हैं। उनमें से कुछ अब भी प्रचलित हैं और अनेक नामशेष हो गये हैं। मोहेंजो-
दड़ो और हड़प्पा की खुदाई में सिन्धु-सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें प्राचीन भारतीय
योगपद्धति के अनेक चिह्न मिलते हैं। श्वेत से लेकर लकुलीश पर्यन्त २८ पाशुपत योगाचार्यों
की और इनमें से प्रत्येक के चार-चार शिष्यों, अर्थात् ११२ योगियों की नामावली अनेक
पुराणों में उपलब्ध है। पालि त्रिपिटक में, विशेषतः परवर्ती काल के विशुद्धिमग्गो और
अभिधम्मत्थसंगहो जैसे ग्रन्थों में विशिष्ट यौगिक पद्धति के दर्शन होते हैं। तान्त्रिक षडंग
योग का शैव, वैष्णव और बौद्ध तन्त्रों में प्रायः समान रूप से वर्णन मिलता है। मत्स्येन्द्रनाथ