विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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१२४ : विज्ञानभैरव
इस अवस्था को योगशास्त्र में छः समाधियों का अभ्यास पूरा हो जाने पर प्राप्त
सप्तम समाधि कहते हैं, जो कि बिना ही प्रयत्न के (ईश्वर या गुरु की कृपा से अथवा स्वतः
उत्पन्न प्रातिभ ज्ञान से) अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने में समर्थ होने के कारण 'नित्य
समाधि' के नाम से प्रसिद्ध है। शिवोपाध्याय के द्वारा उद्धृत 1 वाक्यसुधा नामक ग्रन्थ में इन
समाधियों के लक्षण बताये गये हैं। चित्त जब अखण्ड आत्मा में, अद्वयस्वरूप ब्रह्म में स्थिर
हो जाता है, तो उसे 'समाधि' कहते हैं। इस समाधि का अभ्यास बाह्य और आन्तर विषयों
को आलम्बन बना कर दो स्थानों में किया जा सकता है—भीतर और बाहर । आन्तर विषयों
को आलम्बन बना कर हृदय प्रदेश में अभ्यस्त समाधि सविकल्पक और निर्विकल्पक के भेद
से दो तरह की होती है। इनमें से सविकल्पक समाधि के भी दो भेद होते हैं—दृश्यसंपृक्त और
शब्दसंपृक्त । इनमें से दृश्यसंपृक्त समाधि का स्वरूप इस तरह से बताया गया है—
कामाद्याश्चित्तसादृश्यात् तत्साक्षित्वेन चेतनाम् ।
ध्यायेद् दृश्यानुविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२४॥
अर्थात् काम, क्रोध आदि चित्त के धर्म हैं, क्योंकि इनमें परस्पर समानता है। अतः इनके
साक्षी के रूप में अपनी चेतना को स्थिर करना चाहिये। यह दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधि
कहलाती है। इसको स्थूल सविकल्पक समाधि कहते हैं। सूक्ष्म सविकल्पक समाधि का स्वरूप
वहीं इस तरह से वर्णित है—
असङ्गः सच्चिदानन्दः स्वप्रभो द्वैतवर्जितः ।
अस्मीति शब्दविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥२५॥
अर्थात् मैं असंग, सच्चिदानन्द स्वरूप, स्वयंप्रकाश, अद्वय तत्त्व हूँ, इस भान (ज्ञान) में चित्त
को अवस्थित करने का नाम सविकल्पक शब्दसंपृक्त समाधि है। इस तरह प्रयत्नपूर्वक अभ्यास
करने से उक्त दो समाधि दशाओं की प्राप्ति हो जाने पर अपने आप होने वाली तीसरी
निर्विकल्पक समाधि का स्वरूप यह बताया गया है—
स्वानुभूतिरसावेशाद् दृश्यशब्दावुपेक्ष्य तु ।
निर्विकल्पः समाधिः स्यान्नि1वातस्थलदीपवत् ॥२६॥
अर्थात् स्वात्मस्वरूप के अनुभव का आनन्द मिलने पर दृश्य और शब्द की उपेक्षा कर साधक
जब अपने चित्त को पवन रहित स्थान में रखे दीपक की तरह स्थिर कर लेता है, तो यह
निर्विकल्पक समाधि कही जाती है। इस तरह सविकल्पक के दो भेदों के साथ इस निर्विकल्पक
१. °र्वातस्थित°–वा० ।
- शंकराचार्य विरचित ग्रन्थों में वाक्यसुधा की भी गणना की जाती है। अन्य टीकाकार
इसको विद्यारण्य की कृति मानते हैं। इसके २२-२३ श्लोकों में समाधि का लक्षण और
उसके भेद बताये गये हैं। जैसे कि—"उपेक्ष्य नामरूपे द्वे सच्चिदानन्दवस्तुनि । समाधिं
सर्वदा कुर्याद् हृदये चाथवा बहिः ।। सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि । दृश्य-
शब्दानुवेधेन सविकल्पः पुनर्द्विधा ।।" इनका अर्थ ऊपर टीका में कर दिया गया है।