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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ८५
मन का परिष्कार कर देने पर वह परिष्कृत मन काष्ठ (लकड़ी), कुड्य (भित्ति) आदि सभी
पदार्थों में शिवता को ही देखने लगता है ॥७३॥
[ धारणा-५१ ]
¹अनागतायां निद्रायां १प्रणष्टे बाह्यगोचरे ।
२सावस्था मनसा गम्या परा देवी प्रकाशते ॥७४॥
निद्रायामनागतायामपि जागरदशायां चित्तवृत्तौ तमसा आच्छन्नायां सत्यां
बाह्यगोचरे बाह्ये विषयपञ्चके प्रणष्टे विनष्टदर्शने या अवस्था निरावरणा मध्येऽस्ति,
सा मनसा गम्या स्वसंविदवष्टम्भस्वीकार्या, तथा सति सैवावस्था परादेवीत्वेन प्रका-
शते भाति ॥७४॥
अभी ठीक तरह से नींद नहीं लगी है, व्यक्ति जब जगा हुआ ही है, किन्तु नींद
आने वाली है, उस स्थिति में उसकी चित्त की वृत्ति तमोगुण से आच्छन्न होने लगती है ।
तब बाहरी विषय उसकी आँखों (सभी ज्ञानेन्द्रियों) के सामने रहते हुए भी उसको दिखाई
नहीं पड़ते । यह जाग्रत् अवस्था और स्वप्नावस्था के बीच की स्थिति है । इस अवस्था में
बाह्य विषयों के रहते हुए भी उनका भान नहीं होता । साधक को अपनी संवित्ति (चेतना)
में इसी स्थिति को लाने का अभ्यास करना चाहिये, जब कि बाह्य विषय उसके सामने रहते
हुए भी न रहने के समान हो जाय । इससे साधक का मन निर्विकल्प हो जाता है, बाह्य
विकल्पों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, वह उनको देखता हुआ भी नहीं देखता । उक्त
दोनों (निद्रा और जाग्रत्) अवस्थाओं के बीच की इस स्थिति को परावस्था कहा जाता है ।
इस परावस्था में साधक का परा देवीमय स्वरूप भासित होने लगता है । इस स्थिति का
वर्णन ²योगवासिष्ठ में भी किया गया है—
निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते ।
तं भावं भावयन् साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥
यहाँ केवल शब्दों का ही अन्तर है । अर्थ दोनों श्लोकों का एक ही है । विज्ञानभैरव
के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत कर क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) में तथा महेश्वरानन्द ने
परिमल (पृ० १८७) में परा देवी के स्वरूप का भली-भाँति विश्लेषण किया है ॥७४॥
[ धारणा-५२ ]
³तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शबलीकृते ।
दृष्टिं३निवेश्या तत्रैव स्वात्मरूपं प्रकाशते ॥७५॥
१. विनष्टे-स्प०, म० । २. या०-म० । ३. ०ष्टि निवेश्य-ने० ।

  1. स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और महार्थ० परि० (पृ० १८७) में उद्धृत है ।
  2. शिवोपाध्याय ने इस श्लोक को वासिष्ठ दर्शन का बताया है । योगवासिष्ठ में यह उप-
    लब्ध नहीं है ।
  3. नेत्रतन्त्र (भा० १, पृ० २००) की उद्योत टीका में यह उद्धृत है ।