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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

आत्मकथ्य
परम्परा से माना जाता है कि प्रजापति ब्रह्मा ने मानवजीवन को नियमित और
व्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से, त्रिवर्ग के साधनभूत, एक लाख अध्यायों वाले एक शास्त्र का
प्रवचन किया था। इस सुविशाल संविधान के सहारे से मनु ने 'मनुस्मृति' की रचना की,
बृहस्पति ने बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र की रचना की और महादेव के अनुचर नंदी या नन्दिकेश्वर
ने कामविषयक अंश को पृथक् कर कामसूत्र की रचना की। इन तीनों आचार्यों ने वस्तुतः
उस संविधान का पृथक्करण किया जिससे उनकी रचनाएँ भिन्न नामों से प्रचलित हुईं।
नन्दिकेश्वर के कामसूत्र में एक सहस्र अध्याय थे। उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने
पाँच सौ अध्यायों में उसका संक्षेप किया। इसके पश्चात् पांचालनिवासी आचार्य बाभ्रव्य ने
इस शास्त्र को साधारण, साम्प्रयोगिक, कन्यासम्प्रयुक्तक, भार्याधिकारिक, पारदारिक,
वैशिक और औपनिषदिक—इन सात अधिकरणों में विभक्त कर, एक सौ पचास अध्यायों
में उसका संक्षेप किया।
नन्दिकेश्वर से लेकर बाभ्रव्य तक कामशास्त्र एक अखण्ड परम्परा के रूप में
विकसित हुआ, किन्तु बाभ्रव्य द्वारा अधिकरणों में विभक्त कर देने और अधिकरणविशेष
की अधिक माँग होने पर परवर्ती आचार्यों ने एक एक अधिकरण को लेकर स्वतन्त्र
चिन्तन-मनन प्रारम्भ किया और उन पर स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना होने लगी।
पटना की वेश्याओं के अनुरोध पर आचार्य दत्तक ने वैशिक भाग का स्वतन्त्र
सम्पादन किया। तदनन्तर चारायण ने साधारण को, आचार्य सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक को,
आचार्य घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक को, आचार्य गोनर्दीय ने भार्याधिकारिक को,
आचार्य गोणिकापुत्र ने पारदारिक को और आचार्य कुचुमार ने औपनिषदिक को बाभ्रव्य के
शास्त्र से पृथक् कर उसका स्वतन्त्र विकास एवं सम्पादन किया। इन खण्डग्रन्थों में अलग
अलग वर्गों की रुचि होना स्वाभाविक थी। उदाहरणार्थ, वेश्याओं को वैशिक से ही प्रयोजन
था, तो नवविवाहित दम्पति साम्प्रयोगिक में विशेष रुचि लेते थे। उच्छृंखल और निर्मर्याद
पुरुषों के लिए पारदारिक ही सर्वस्व था, तो मंगेतर कन्यासम्प्रयुक्तक को ही महत्त्व देते थे।
इस प्रकार बाभ्रव्य का शास्त्र अत्यधिक विशाल होने के कारण उपादेय नहीं था और अन्य
खण्डग्रन्थों में विषय का सांगोपांग विवेचन उपलब्ध नहीं था, अतः महर्षि वात्स्यायन ने
समाज की आवश्यकता को ध्यान में रखकर संक्षिप्त एवं पूर्ण शास्त्र की रचना का प्रयास
किया। इसे उन्होंने स्वयं ही स्वीकार किया है : 'सर्वमर्थमल्पेन ग्रन्थेन कामसूत्रमिदं
प्रणीतम्।' (१.१.१४)
'कामसूत्र' : विषयवस्तु
इस 'कामसूत्र' की रचना अधिकरणों में हुई है। प्रत्येक अधिकरण अनेक अध्यायों

६ वात्स्यायन-कामसूत्र
में विभक्त हुआ है और प्रत्येक अध्याय में एक या अनेक प्रकरण संगृहीत किये गये हैं। इस
प्रकार सम्पूर्ण 'कामसूत्र' में ७ अधिकरण, ३६ अध्याय, ६४ प्रकरण और १२५० सूत्र या
श्लोक हैं। 'कामसूत्र' मूलतः सूत्रों में रचा गया था, किन्तु वात्स्यायन ने कुछ श्लोकों की
रचना भी की है और कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत भी किये हैं।
प्रथम अधिकरण का नाम साधारण है जो पाँच अध्यायों में विभक्त है, और एक
एक अध्याय में एक एक प्रकरण ही लिया गया है। यह अधिकरण कामशास्त्र की पीठिका
या प्रारम्भिका ही है। इसमें कामशास्त्र की परम्परा, त्रिवर्गप्रतिपत्ति, चौंसठ कलाएँ,
नागरकवृत्त और नायक-नायिका भेद आदि विषय संगृहीत किये गये हैं।
द्वितीय अधिकरण में सम्प्रयोग विषय बनाया गया है। इस अधिकरण में दस
अध्याय और सत्रह प्रकरण हैं। सम्प्रयोग का अर्थ है सम्भोग या समागम। इसमें आलिंगन,
चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, संवेशन, प्रहणन, सीत्कार आदि की विवेचना करते हुए सफल
एवं सानन्द सम्भोग की समुचित व्याख्या की गयी है। शास्त्रकार के मतानुसार सफल एवं
सानन्द सम्भोग ही दाम्पत्य जीवन की सफलता का रहस्य है।
तृतीय अधिकरण 'कन्यासम्प्रयुक्तक' है। इस अधिकरण में पाँच अध्याय और
प्रकरण हैं। विवाह के लिए कैसी कन्या का चयन किया जाये? चयनित कन्या को किस
प्रकार अनुरक्त कर विवाह-बन्धन में बाँधा जाये? विवाहित पत्नी में किस प्रकार विश्वास
उत्पन्न कर दाम्पत्य जीवन प्रारम्भ किया जाये? — इन प्रश्नों का सुन्दर विश्लेषण इस
अधिकरण में किया गया है। इस अधिकरण में उन कन्याओं और पुरुषों का भी मार्गदर्शन
किया गया है जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है।
चतुर्थ अधिकरण 'भार्याधिकारिक' है। इसमें दो अध्याय और आठ प्रकरण हैं।
विवाहसूत्र में बँधकर कन्या या नवविवाहिता पत्नी भार्या कहलाती है। यह एकचारिणी और
सपत्नी—दो प्रकार की हो सकती है। इसमें पति का पत्नी के प्रति और पत्नी का पति एवं
सपत्नी के प्रति समुचित व्यवहार दिखाया गया है।
पञ्चम अधिकरण 'पारदारिक' है। इससें छह अध्याय और दस प्रकरण हैं। इस
अधिकरण में परस्त्री और परपुरुष के प्रेमसम्बन्धों की गहन विवेचना की गयी है। शास्त्रकार
का मत है कि इस अधिकरण का प्रयोजन विट लोगों से अपनी स्त्रियों की रक्षा करना है,
किसी शीलसम्पन्न स्त्री को पतित बनाना नहीं।
षष्ठ अधिकरण 'वैशिक' है। इसमें छह अध्याय और बारह प्रकरण हैं। इसमें
वेश्याओं के चरित्र, अर्थप्राप्ति के उपाय, विरक्त नायक को मिलाने के उपाय, लाभविशेष
आदि की चर्चा है। महर्षि वात्स्यायन ने अधिकरण के प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया है
कि इसमें कथित योगों के प्रयोग का अधिकार वेश्या को है, वैशिक नायक को नहीं।
वस्तुतः यह अधिकरण वेश्याओं का मार्गदर्शन करने के लिए ही लिखा गया है, किन्तु

आत्मकथ्य ७
आनुषंगिक रूप से यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि वेश्यावृत्ति भयंकर दुर्व्यसन है जिससे
अर्थ और शरीर, दोनों की हानि होती है। वास्तव में इस अधिकरण में एक अध्याय वैशिक
नायक के दिग्दर्शन के लिए भी होना चाहिए था, क्योंकि वैशिक नायक समाज का अंग है।
सप्तम एवं अन्तिम अधिकरण 'औपनिषदिक' है। इसमें दो अध्याय और छह
प्रकरण हैं। वस्तुतः यह 'कामसूत्र' का अंग न होकर, उसका परिशिष्ट मात्र है। इसके प्रारम्भ
में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि पूर्वकथित रीति से नायिका या सफल सम्भोग प्राप्त न
हो, तभी इस अधिकरण में बताये गये योगों का प्रयोग करना चाहिये।
इसमें रूपलावण्य को बढ़ाने के उपाय, वशीकरण और बाजीकरण के योग, नष्टराग
को पुनरुज्जीवित करने के उपाय, कृत्रिम साधन आदि के उपयोगों को बताया गया है, किन्तु
अन्त में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि अपवित्र एवं निन्दित योगों का प्रयोग नहीं करना
चाहिये।
'कामसूत्र' का रचनाकार :
परम्परा से प्रसिद्ध है कि मगधसम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री महामति चाणक्य ने
कौटिल्य नाम से 'अर्थशास्त्र', चाणक्य नाम से 'नीतिशास्त्र' और वात्स्यायन नाम से
'कामसूत्र' तथा न्यायभाष्य की रचना की। 'अर्थशास्त्र' के रचयिता कौटल्य चन्द्रगुप्त के
महामन्त्री चाणक्य ही हैं—यह 'अर्थशास्त्र' के निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
"येन शस्त्रं च शास्त्रं च नन्दराजगता च भूः।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम्॥"
कामन्दकीय नीतिसार के निम्न श्लोकों से स्पष्ट है कि नीतिशास्त्र के रचयिता भी
अर्थशास्त्रकार से अभिन्न हैं—
"यस्याभिचारवज्रेण वज्रज्वलनतेजसः।
पपात मूलतः श्रीमान् सुपर्वानन्दपर्वतः॥
एकाकी मन्त्रशक्त्या यः शक्तः शक्तिधरोपमः।
आजहार नृचन्द्राय चन्द्रगुप्ताय मेदिनीम्॥
नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्रे महोदधेः।
य उद्धधे नमस्तस्यै विष्णुगुप्ताय वेधसे"॥
स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य और नीतिशास्त्र के रचयिता चाणक्य
परस्पर अभिन्न हैं, और मगध साम्राज्य के महामन्त्री चाणक्य ही हैं।
'अर्थशास्त्र' और 'कामसूत्र' की रचनाशैली में अत्यधिक साम्य है और कहना न
होगा कि कामसूत्रकार ने 'अर्थशास्त्र' की रचनापद्धति का पर्याप्त अनुकरण किया है। इस
साम्य को कई रूपों में देखा जा सकता है :

८ वात्स्यायन-कामसूत्र
(१) दोनों ही ग्रन्थ अधिकरण, अध्याय और प्रकरणों में विभक्त हैं। (२) दोनों ही
ग्रन्थों में अपने मत की पुष्टि के लिए आनुवंश्य श्लोक—प्राचीन प्रचलित श्लोक—उद्धृत
किये गये हैं। (३) दोनों ही ग्रन्थों में परिशिष्ट रूप में औपनिषदिक प्रकरण रखा गया है
जिसमें कथित अभद्र एवं निन्द्य योगों को आपद्धृ के रूप में ही अपनाने का निर्देश दिया
गया है और (४) दोनों ही ग्रन्थों में प्राचीन आचार्यों के मतों का दिग्दर्शन कराते हुए 'इति
कौटिल्यः' या 'इति वात्स्यायनः' कहकर स्वमत की स्थापना की गयी है।
किन्तु इसी आधार पर अर्थशास्त्रकार और कामसूत्रकार को अभिन्न मान लेना उचित
नहीं है। वस्तुतः 'कामसूत्र' 'अर्थशास्त्र' की अपेक्षा परवर्ती ग्रन्थ है और उसमें शैली का
अनुकरण भले ही किया गया हो, लेकिन कई मौलिक अन्तर भी हैं। उदाहरणार्थ,
अर्थशास्त्रकार सर्वत्र निर्मम दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे 'इति कौटिल्यः' ही नहीं लिखते,
बल्कि, 'नेति कौटिल्यः' कहकर अपनी असहमति भी प्रकट कर देते हैं। अपनी व्यवस्था
के प्रति असन्तोष या उसका उल्लंघन उन्हें स्वीकार्य नहीं है, जबकि वात्स्यायन उदार और
लचीला दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे 'इति वात्स्यायनः' तो लिखते हैं, किन्तु 'नेति वात्स्यायनः'
लिखने का साहस नहीं बटोर पाते। वे अनेक पूर्व मान्यताओं का उल्लेखमात्र करके छोड़ देते
हैं, न उसका समर्थन करते हैं और न विरोध ही। अनेक अभद्र एवं अशिष्ट देशगत प्रवृत्तियों
को उस देश में ही स्वीकार्य मान लेते हैं। वस्तुतः उनमें अर्थशास्त्रकार-सदृश निर्मम एवं दृढ़
निषेध या विरोध का स्वर नहीं मिलता। दोनों ग्रन्थों की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति में
भी भिन्नता है, आचार-विचार और मान्यताएँ भी किञ्चित् परिवर्तित हैं, दोनों के नागरक भी
कुछ विभिन्नता रखते हैं।
सारतः कौटिल्य और वात्स्यायन को अभिन्न मानना तर्कसंगत नहीं है। वस्तुतः
वात्स्यायन परवर्ती हैं और उन ने कौटल्य की रचनाशैली का अनुकरण नहीं किया है।
विद्वानों का मत है कि कामसूत्रकार वात्स्यायन और न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन एक
ही हैं !
वात्स्यायन का स्थितिकाल : कुछ विद्वानों ने उन्हें ईस्वी प्रथम शताब्दी का माना
है तो कुछ तीसरी और चौथी शताब्दी का स्वीकार करते हैं। 'नाट्यशास्त्र' में 'कामसूत्र' का
शब्दशः उल्लेख और कालिदास के नाटकों पर इसका प्रभाव देखकर वात्स्यायन को इन से
पूर्ववर्ती ईस्वी शताब्दी का ही मानना उचित होगा, परवर्ती नहीं।
काल और नामविषयक विवादों पर अभी गहन अनुसन्धान की आवश्यकता है।
'कामसूत्र' का प्रयोजन :
महर्षि वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में धर्म, अर्थ और काम—तीनों की समन्वित
व्याख्या की है। उनका स्पष्ट मत है कि धर्म संसार का नियामक है, इसलिये उसे प्रथम स्थान
देना चाहिये। धर्म के अविरुद्ध ही अर्थार्जन करना चाहिये और जब अर्थार्जन करने लगे तो

आत्मकथ्य ९
धर्माविरुद्ध काम का सेवन करना चाहिये। जब ये तीनों ही पुरुषार्थ हैं, तो इनमें पौर्वापर्य की
भावना क्यों? यही भारतीय संस्कृति की उच्चता, उदात्तता और पावनता है कि वह धर्म के
विरुद्ध अर्थार्जन या कामसेवन की अनुमति नहीं देती। यद्यपि 'कामसूत्र' मुख्यतः कामतत्त्व
का ही प्रतिपादन करता है, लेकिन धर्म को प्रतिबन्ध के रूप में स्वीकारता है और उसके
विरुद्ध जाने—उच्छृंखल आचरण या निर्मर्याद कार्य करने—की अनुमति नहीं देता।
महर्षि वात्स्यायन सम्भोग का वास्तविक आनन्द स्त्री और पुरुष के सफल एवं
सानन्द मिलने में स्वीकारते हैं जिससे दोनों में परस्पर स्नेह एवं श्रद्धा का विकास हो।
रतिसुख सम्भोग का तात्कालिक उद्देश्य अवश्य है, लेकिन उसका दूरगामी प्रयोजन
जीवनसहचर के प्रति उच्च एवं उदात्त भाव, सात्त्विक भावों का विकास और सन्तानोत्पत्ति
ही है। सफल एवं सानन्द सम्भोग से ही स्त्री-पुरुष में परस्पर अन्तरङ्गता एवं आत्मीयता का
विकास होता है, नैतिकता उत्पन्न होती है जो पारस्परिक कलह, सम्बन्ध-विच्छेद, प्रच्छन्न
सम्बन्ध, अवैध सन्तति, वेश्यावृत्ति, परनारीगमन, अप्राकृतिक व्यभिचार आदि असंख्य
दोषों से गृहस्थ को बचाती है और उसकी गृहस्थी को स्वर्गोपम बनाती है।
वस्तुतः 'कामसूत्र' में महर्षि वात्स्यायन का उद्देश्य स्त्री एवं पुरुष की अनर्गल एवं
उच्छृङ्खल पाशविक प्रवृत्तियों को नियन्त्रित कर उनमें उच्चता, उदात्तता एवं पवित्रता की
भावना उत्पन्न करना एवं उन्हें सभ्य एवं संस्कृत नागरिक बनकर गृहस्थजीवन को सुखी एवं
सानन्द बनाते हुए विश्वकल्याण का मार्ग प्रशस्त करना ही है।
आदान-प्रदान :
महर्षि वात्स्यायन ने ग्रन्थ के अन्त में (७।२।५२।५६) स्पष्ट कर दिया है कि
उन्होंने पूर्ववर्ती शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन और उनके प्रयोगों का परीक्षण करके ही संक्षेप
में इस शास्त्र का निर्माण किया है। इस सन्दर्भ में उन्होंने आचार्य बाभ्रव्य का विशेष रूप से
उल्लेख किया गया है। ग्रन्थ के आन्तरिक परीक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने आचार्य
बाभ्रव्य और श्वेतकेतु के अखण्ड ग्रन्थों का ही नहीं, सुवर्णनाभ, चारायण, गोनर्दीय,
गोणिकापुत्र आदि आचार्यों के खण्डग्रन्थों का भी सम्यक् अध्ययन किया है और अनेक
स्थलों पर उनके मतों को उद्धृत किया है। आज ये पूर्ववर्ती ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते, जबकि
महर्षि वात्स्यायन का ग्रन्थ संसारभर में प्रख्यात है। इसका एक प्रमुख कारण कदाचित् यह
भी है कि महर्षि वात्स्यायन के संक्षिप्त एवं सारपूर्ण विश्लेषण के समक्ष ये पूर्ववर्ती ग्रन्थ
महत्त्वहीन हो गये हों।
महर्षि वात्स्यायन ने जहाँ पूर्ववर्ती ग्रंथों को महत्त्वहीन बना दिया, वहीं परवर्ती
परम्परा को भी प्रेरित एवं प्रभावित किया है। परवर्ती ग्रन्थों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
कोक्कोक रचित 'रतिरहस्य' जो 'कामसूत्र' के साम्प्रयोगिक, पारदारिक, भार्याधिकारिक
और औपनिषदिक—इन चार अधिकरणों को उपजीव्य बनाकर लिखा गया है। कोक्कोक ने
न केवल उपजीव्य में वात्स्यायन का सश्रद्ध स्मरण किया है, बल्कि उनके लिये प्रायः मुनि

१० वात्स्यायन-कामसूत्र
या मुनीन्द्र शब्द का प्रयोग किया है और उनके मत को मुनिमत या मुनिगिरा भी कहा है।
परवर्ती आचार्यों ने ‘रतिरहस्य’ के मार्ग का ही अवलम्बन किया है और बौद्धभिक्षुक
श्रीपद्मश्री रचित ‘नागरसर्वस्व’ कल्याणमल्ल कृत ‘अनङ्गरङ्ग’, ज्योतिरीश्वर कृत ‘पञ्चसायक’
आदि ग्रन्थों में प्रायः ये ही विषय लिखे गये हैं।
कहने का आशय यह है कि ‘कामसूत्र’ ऐसा असाधारण ग्रन्थ है जो अपनी गुरुता
एवं गम्भीरता से न केवल पूर्ववर्ती ग्रन्थों को आभाविहीन कर देता है, अपितु परवर्ती ग्रन्थों
को भी गौरवान्वित नहीं होने देता। यह सहस्रों वर्षों से आज तक सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत
मानवजाति के हृदय पर अधिकार किये हुए हैं।
हमने इस कामसूत्र का, जयमङ्गला संस्कृत टीका के साथ, विस्तृत हिन्दी अनुवाद
भी किया है। आवश्यकता पड़ने पर, पाठकगण उसका उपयोग भी कर सकते हैं।
कृष्णदास अकादमी के नियामक श्रीकमलेशकुमारजी गुप्त और चौखम्बा संस्कृत
सीरीज आफिस के संचालक श्रद्धेय श्री ब्रजमोहनदास जी गुप्त ने विशेष रुचि लेकर इस ग्रन्थ
को अल्पावधि में प्रकाशित कर जनताजनार्दन तक पहुँचाया है, अतएव वे आभार के पात्र
हैं। मैं उनकी नित्य नवीन उन्नति की कामना करता हूँ।
विनीत—
रामानन्द शर्मा
रीडर हिन्दी विभाग
हिन्दू कालेज, मुरादाबाद-२४४ ००१

कामसूत्र की
विषयानुक्रमणिका
पृष्ठाङ्क
१. साधारण नाम प्रथममधिकरण
प्रथम अध्याय १-५
शास्त्रसंग्रह प्रकरण—मंगलाचरण, कामशास्त्र की प्राचीनता और प्रामाणिकता,
कामशास्त्र की परम्परा, 'कामसूत्र' की रचना का उद्देश्य, 'कामसूत्र' की विषयवस्तु।
द्वितीय अध्याय ५-१०
त्रिवर्गप्रतिपत्तिप्रकरण—कालविभाग, विद्यार्जनकाल में ब्रह्मचर्य आवश्यक, धर्म का
स्वरूप और उसका उपाय, अर्थ का स्वरूप और उसका उपाय, काम का स्वरूप और उसका
उपाय, मोक्ष का स्वरूप, कामशास्त्र की आवश्यकता, कामशास्त्र का प्रयोजन, त्रिवर्ग के
आचरण की आवश्यकता पर शङ्का, त्रिवर्ग सेवन का फल।
तृतीय अध्याय १०-१६
विद्यासमुद्देश प्रकरण—'कामसूत्र' का अध्ययनकाल, विद्याएँ, स्त्रियों के लिये
कामशास्त्रीय शिक्षा, स्त्रियों के लिये कामशास्त्रानुशीलन की रीति, कन्या के विश्वस्त आचार्य,
कामशास्त्र की अङ्गभूत चौंसटकलाएँ, कलाओं की संख्या और स्वरूप, कलाओं का वर्गीकरण,
कलाज्ञान का फल, पुरुषों को कलाज्ञान का लाभ।
चतुर्थ अध्याय १६-२२
नागरकवृत्तप्रकरण—प्रकरणसम्बध, नागरक का वास, गृहसज्जा, शैय्या, शृंगार-
प्रसाधन, वीणा, आलेख्य, वृक्षवाटिका, दीर्घिका और क्रीडापर्वत, हिंडोला, क्रीडापक्षी,
दिनचर्या, प्रातः अभ्युत्थान, दन्तधावन, शरीर-संस्कार, स्नान, केशकर्तन, मालिश, केशतैल,
भोजनकाल, भोजनानन्तर व्यापार, रात्रिचर्या, अभिसारप्रसंग, परिचरण, नैमित्तिक कृत्य,
घटानिबन्धन, मदनोत्सव, गोष्ठीसमवाय, समापानक, उद्यानविहार, समस्याक्रीड़ा, यक्षरात्रि,
कौमुदीजागर, सुवसन्तक, एकचर्या, उपनागरकवृत्त, विट, विदूषक, कुट्टनी, ग्रामवासी नागरक,
गोष्ठी में भाषाप्रयोग, त्याज्यगोष्ठी, प्रशस्तगोष्ठी।
पञ्चम अध्याय २२-२७
नायकसहायदूतकर्मविमर्शप्रकरण—नायिका का अन्तर्भाव, अनुलोम-प्रतिलोम,
पुनर्भू, नायिकाविचार, विधवा, परिव्राजिका, वेश्यापुत्री, कुलीन युवती, नायिकाविमर्श,

१२ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायकविचार, अगम्या स्त्रियाँ, अगम्याओं की विवेचना, बाभ्रव्य का मत, सहायकस्नेहमित्र,
गुणी मित्र, जाति मित्र, दौत्यकर्म के योग्य व्यक्ति, दूत के गुण।
२. साम्प्रयोगिक द्वितीय अधिकरण
प्रथम अध्याय २७-३४
रतावस्थापनप्रकरण—प्रमाण से सुरत की व्यवस्था, समरत, विषमरत, नीचरत से
उच्चरत की श्रेष्ठता, भाव से सुरत की व्यवस्था, काल से सुरत की व्यवस्था, स्त्रियों के स्खलन
(क्षरण) पर विवाद, श्वेतकेतु का मत; समागम का कारण—खाजनिवारण, पूर्वपक्ष की शङ्का,
श्वेतकेतु के मत पर शङ्का, श्वेतकेतु का समाधान, श्वेतकेतु का उत्तर, श्वेतकेतु के मत का
सारसंग्रह, बाभ्रव्य का मत, पुरुषवत् स्खलन मानने वालों की शङ्का और समाधान, बाभ्रव्य के
मत पर शङ्का, बाभ्रव्य का समाधान, बाभ्रव्य का सारसंक्षेप, वात्स्यायन का मत; स्त्री-पुरुष के
सुख की अभिन्नता, सुखानुभूति की अभिन्नता की स्थापना, विभिन्न स्वार्थों के साधकों को समान
सुखानुभूति कैसे ?, वात्स्यायन का समाधान, समान सुख-सिद्धान्त का सार, नौ-नौ रतों को ही
मान्यता, रति और रत के पर्याय, संकीर्णरत को समरत बनाने के उपाय, भावकालान्तरसंक्रान्ति,
विशेष विस्तार का कारण।
प्रीतिविशेषप्रकरण—प्रीति के भेद, आभ्यासिकी प्रीति, आभिमानिकी प्रीति,
सम्प्रत्ययात्मिका प्रीति, विषयात्मिका प्रीति, प्रीतियों का उपयोग।
द्वितीय अध्याय ३४-३९
आलिङ्गनादिविचारप्रकरण—चतुःषष्टिविचार, चतुःषष्टि का अर्थ, ऋग्वेद का
वर्गविभाजन, दशत्यी, 'कामसूत्र' और 'ऋग्वेद' में विभाजनसाम्य, चतुःषष्टि का स्वरूप,
वात्स्यायन का खण्डन, असमागतों के आलिङ्गन, स्पृष्टक, विद्धक, स्पृष्टक और विद्धक का
उपयोग, उद्घृष्टक, पीड़ितक, उद्घृष्टक और पीड़ितक का प्रयोग, सुरतकालीन आलिङ्गन,
लतावेष्टित, वृक्षाधिरूढक, तिलतण्डुलक, क्षीरजलक, तिलतण्डुलक और क्षीरजलक का
प्रयोगकाल, सुवर्णनाभकथित आलिङ्गनप्रकार, ऊरूपगूहन, जघनोपगूहन, स्तनालिङ्गन,
ललाटिका, संवाहन आलिङ्गनप्रकार नहीं, आलिङ्गन का महत्त्व, अशास्त्रीय योग, अशास्त्रीय
योगों के उपयोग का कारण।
तृतीय अध्याय ३९-४३
चुम्बनविकल्पप्रकरण—क्रम, वात्स्यायन का मत, चुम्बन के स्थान, लाटवासियों
की रीति, स्थानों पर वात्स्यायन की व्यवस्था, मुखचुम्बन, कन्या के चुम्बन, स्फुरितक,
घट्टितक, कन्या का स्वरूप और उसके चुम्बन, शेष नायिकाओं के चुम्बन, आकृष्ट चुम्बन,
चुम्बनद्यूत, चुम्बनद्यूत का लक्षण, द्यूतकलह, कपटद्यूत, नखक्षतादि की कलह, उत्तरओष्ठ
चुम्बन, दोनों ओष्ठों के चुम्बन की विधि, अन्तर्मुखचुम्बन, मुखदन्तयुद्ध, शेषाङ्गचुम्बन,
स्वाभिप्राय चुम्बन—रागदीपन, चलितक, प्रातिबोधिक, इसकी विधि, छायाचुम्बन,
अंगुलिचुम्बन, संवाहिका की प्रेमाभिव्यक्ति, अभियोगों की सामान्यविधि।

विषयानुक्रमणिका १३
चतुर्थ अध्याय ४३-४७
नखरदनजातिप्रकरण—नखक्षत का स्वरूप, समय और स्नान, नखक्षतों के नाम,
नखक्षतों के स्थान, सुवर्णनाभ का मत, नखों का आश्रय और स्वरूप, नखों के प्रमाण,
गौड़वासियों के नख, दक्षिणात्यों के नख, महाराष्ट्रवासियों के नख, आच्छुरितक, अवस्थानुरूप,
अर्धचन्द्र और उसका स्नान, मण्डल, मण्डल के प्रयोग का स्थान, लेखा, व्याघ्रनख, मयूरपदक,
शशप्लुतक, उत्पलपत्रक, स्मरणीयक, भेद और कौशल की अनन्तता, वात्स्यायन का मत,
चौर्यरति में क्षतनिषेध, चिह्नों की प्रशंसा।
पञ्चम अध्याय ४७-५२
दशनच्छेद्यविधिप्रकरण—दन्तक्षत के प्रकरण, दाँतों के गुण, दाँतों के दोष, दन्तक्षत
के भेद, गूढ़क, उच्छूनक, गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु का स्थान, उच्छूनक और प्रवालमणि का
स्थान, प्रवालमणि, मणिमाला, बिन्दु, बिन्दुमाला, मणिमाला और बिन्दुमाला का स्थान, बिन्दु
का स्थान, खण्डाभ्रक, वराहचर्वितक, खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक का प्रयोग, साहित्य में
दन्तक्षत, सांक्रान्तिक आभियोगिक।
देशोपचारप्रकरण—मध्यदेश, बाहीक और अवन्ति, मालव और आभीर, सिन्ध और
पंजाब, अपरान्तक, स्त्रीराज्य और कोशल, आन्ध्र, महाराष्ट्र, मगध, द्रविड़, वनवासी देश, गौड़,
देशसात्म्य से प्रकृतिसाम्य की महत्ता, देशाचार की व्यापकता, कामोत्तेजक और विचित्र,
प्रणयकलह और रागवर्धन, एकान्त की चेष्टाएँ, प्रकाश की चेष्टाएँ।
षष्ठ अध्याय ५२-५८
संवेशनप्रकारप्रकरण—उच्च और उच्चतर रत में मृगी, नीच और नीचतर रत में
हस्तिनी, समरत की व्यवस्था, वडवा के लिये तदनुरूप व्यवस्था, शिश्नग्रहण की विधि,
अपद्रव्य का प्रयोग, मृगी के आसन, उत्फुल्लक, विजृम्भितक, इन्द्राणिक, नीच और नीचतर रत
की व्यवस्था, नीच और नीचतर रत के आसन, सम्पुटक, शयनविधि, पीड़ितक, वेष्टितक,
वाडवक, आचार्य सुवर्णनाभ द्वारा कथित आसन, भुग्नक, जृम्भितक, उत्पीड़ितक,
अर्धपीड़ितक, वेणुदारितक, शूलाचितक, कार्कटिक, पीड़ितक, पद्मासन, परावृत्तक,
जलसम्भोग
चित्ररतप्रकरण—स्थिररत, अवलम्बितक, धेनुक, अन्य पशुलीलाएँ, संघातकरत,
गोयूथिक, गोयूथिक, वारिक्रीड़ितक, छागल और ऐणेय, अनेक पुरुषों के साथ समागम वाले
देश, समागम रीति, अनेक पुरुषों का एक के साथ समागम, गुदामैथुन, चित्रवर्धन, चित्रों के
वर्धन का फल।
सप्तम अध्याय ५८-६२
प्रहणनसीत्कारप्रकरण—काम की वामता, प्रहणन के स्थान, चतुर्विध प्रहणन,
सीत्कार की सम्बद्धता, विरुत के आठ रूप, अन्य शब्द, पक्षियों की ध्वनि, मुष्टिप्रहार, नायिका

१४ वात्स्यायन-कामसूत्र
के कार्य, अपहस्तकप्रहार, सीत्कारों का उचित समय, प्रहस्तकप्रहार, नायिका के कार्य, श्वसित
और रुदित का समय, दूत्कृत, फूत्कृत, इसके उत्तर, समतलक और परवर्ती कार्य, इसके
सीत्कार, दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहणन, वात्स्यायन की व्यवस्था, घातक प्रहणनों का सर्वथा
निषेध, घातक प्रहारों के दुष्परिणाम, घातक प्रहारों का कारण-कामातिरेक, कामान्धता पर एक
दृष्टान्त।
अष्टम अध्याय ६२-६७
पुरुषायितप्रकरण-पुरुषायित (विपरीत रति) का स्वरूप, विपरीत रति के कारण,
विपरीत रति : प्रथमरीति, द्वितीय रीति, बाह्य विपरीत रति ।
पुरुषोपसृप्तप्रकरण-पुरुषोपसृप्त का अर्थ और स्वरूप, पुरुषोपसृप्त के भेद, आभ्यन्तर
पुरुषोपसृप्त, राग की विभिन्न अवस्थाएँ, प्रज्वलित हुए भाव का लक्षण, करिकर का प्रयोग,
उपसृप्तों के प्रकार-उपसृप्तक, मंथन, हुल, अवमर्दन, पीड़ितक, निर्घात, वराहघात, वृषाघात,
चटकविलसित, सम्पुट, प्रयोग की रीति, पुरुषायित में पुरुषोपसृप्त की अधिकता, संदंश,
भ्रमरक, नायक का कार्य, प्रेङ्खोलितक, विश्रामविधि, पुरुष के ऊपर आने का समय, प्रकरण का
उपसंहार।
नवम अध्याय ६७-७३
औपरिष्टकप्रकरण-नपुंसक के भेद, स्त्रीरूपधारी नपुंसक (हिजड़ी), औपरिष्टक का फल,
चरित, पुरुषरूपधारी नपुंसक (हिजड़ा), औपरिष्टक के भेद, बाह्य औपरिष्टक-अन्तः संदंश,
चुम्बितक, परिमृष्टक, आम्रचूषितक, संगर, औपरिष्टक के सीत्कार और प्रहणन, नपुंसक के
अतिरिक्त औपरिष्टक के विषय, आचार्यों का अभिमत, वात्स्यायन की व्यवस्था, देशाचार के
रूप में प्रवृत्ति, स्त्रियों की अपवित्रता, वात्स्यायन की व्यवस्था, कुछ विशिष्ट औपरिष्टक, शास्त्र
की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता, विवेचन की सार्थकता, प्रयोक्ता के विचारणीय
विषय।
दशम अध्याय ७३-७९
रतारम्भावसानिकप्रकरण-सुरत के प्रारम्भ के कृत्य, कामोद्दीपन, सुरत के समापन
के कार्य, सुरतारम्भ और सुरतान्त पर आनुवंश्य श्लोक, प्रीतिवर्धक योग ।
रतविशेषप्रकरण-रागवत (सहजराग), इसके कार्य, आहार्यराग, प्रवृत्ति की रीति,
कृत्रिमराग, प्रवृत्ति की रीति, व्यवहित राग, तीनों समान के ही विषय, पोटारत, पोटारत में
उपचार अनावश्यक, खलरत, अनियन्त्रितरत।
प्रणयकलहप्रकरण-कलह के कारण, असहिष्णुता के कार्य, नायक के कार्य, मान
की विधि, अधिकरण का उपसंहार।

विषयानुक्रमणिका १५
३. कन्यासम्प्रयुक्तक तृतीय अधिकरण
प्रथम अध्याय ७९-८३
वरणसंविधानप्रकरण—वरण का कारण, गृहस्थाश्रम की उत्कृष्टता और सपत्नी की
प्रशंसा, विवाहयोग्य कन्याएँ, वर का चयन, घोटकमुख का मत, मित्रसम्बन्धियों के
प्रयत्नविषयक कार्य, मित्रों के प्रयत्न, दैवज्ञों के प्रयत्नविषयक कार्य, दोनों पक्षों के कार्य,
मेलापक, दुर्योग, निमित्त और शकुन, सामुद्रिक लक्षण—वर के लिए, कन्या के लिये,
विवाहमुहूर्त, घोटकमुख का मत, अवरणीय कन्याएँ, धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण, व्यावहारिक
दृष्टिकोण, कन्यापक्ष की तैयारी, वरपक्ष का स्वागत-सत्कार, कन्या दिखाने की रीति, विशेष
बातें, विवाहभेद, विविध विवाहों का स्वरूप।
सम्बन्धनिश्चयप्रकरण—सम्बन्धभेद—उच्च सम्बन्ध, हीन सम्बन्ध, समान सम्बन्ध,
उच्च और हीन सम्बन्धों में उच्च श्रेष्ठ।
द्वितीय अध्याय ८३-८९
कन्याविस्रम्भणप्रकरण—दस दिन के कृत्य, धर्मशास्त्र की मर्यादा, विस्रम्भण के
उपाय, कोमल उपचारों का कारण, वात्स्यायन का मत, कोमल उपचार, इसका कारण,
यथासम्भव प्रयास, सर्वप्रथम आलिङ्गन, प्रथम उपक्रम, अन्धकार और प्रकाश, मुख से
ताम्बूलदान, प्रथम चुम्बन, वार्तारस, बोलने को विवश करने के उपाय, घोटकमुख का मत,
नवपरिणीता के उत्तर देने की रीति, प्रेमजिज्ञासा का स्वरूप, पूर्वपरिचिता के साथ वार्तालाप,
प्रिय के पास ताम्बूल आदि रखना, कुचस्पर्श, परवर्ती क्रियाएँ क्रियाएँ, आतंकित करने की
रीति, द्वितीय और तृतीय रात्रि, हस्तयोजन के उपाय, हस्तयोजनविधि, नीवीविस्रंसन, अन्य
कार्य, धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण, साहित्य में कन्याविस्रम्भण, प्रकरण का उपसंहार, ध्यातव्य तथ्य,
विश्वस्त बनाने का फल, लज्जाशील की उपेक्षा अनुचित, बिना विश्वास जगाये समागम उचित
नहीं।
तृतीय अध्याय ८९-९४
बालोपक्रमणप्रकरण—गान्धर्वादि विवाह करने के कारण, कन्या न मिलने के
कारण, कन्याप्राप्ति के उपाय, दक्षिण भारत में कन्या को अनुरक्त करने की रीति, मातुलकन्या
की ग्राह्यता, आचार्य घोटकमुख का मत, बालक के प्रयास, युवक के प्रयास, सखी का कार्य,
नायक के कार्य, उपहारदान और प्रेमदर्शन, उपहारदान का प्रयोजन, कौतुकप्रदर्शन, रतिकौशल
का प्रकटीकरण, नायक का वेश और कार्य, भव्य वेशभूषा का कारण।
इङ्गिताकारसूचनप्रकरण—देखने की रीति, बोलनेकी रीति, भावप्रेरित चेष्टाएँ,
नायक के सहचरों और अनुचरों के साथ व्यवहार, नायक से सम्पर्क की वाञ्छा, उपसंहार।
चतुर्थ अध्याय ९५-१०१
एकपुरुषाभियोगप्रकरण—उपायों के भेद—बाह्य उपाय, साधिकार करग्रहण,

१६ वात्स्यायन-कामसूत्र
मिथुनदर्शन, जलक्रीड़ा में अभिप्रायज्ञापन, नवपत्रिका में अभिप्रायज्ञापन, दुःखनिवेदन,
स्वप्नकथन, बहाने से अङ्गस्पर्श, चरणपीड़न, अंगुलिस्पर्श, आन्तरिक एवं बाह्य उपाय,
अभिज्ञान, प्रेमपूर्ण छेड़छाड़, भावनिवेदन, वाणी से कहने की रीति, आभ्यन्तर उपाय, गृह
आमन्त्रण, उपचारों का प्रयोग, इस प्रपञ्च का उद्देश्य, आचार्य घोटकमुख का मत, समागमकाल,
वात्स्यायन की व्यवस्था।
प्रयोज्योपावर्तनप्रकरण—विवाह न हो पाने के कारण, धर्मशास्त्र द्वारा कन्या को
स्वयं विवाह करने की अनुमति, समान पति चुनने के उपाय, वर में दर्शनीय गुण, माता का
कर्तव्य, बाह्य उपचार, सम्भोग के लिये पहल घातक, नायक के प्रयासों को स्वीकृति, आभ्यन्तर
उपचार, महत्त्वपूर्ण परामर्श।
एकप्रतिपत्तिप्रकरण—सुखों का आश्रय, अनुकूल और वश्य, अर्थलिप्सा, विशेष
महत्त्वपूर्ण, एकनिष्ठ ही वरणीय, धनवान् की पत्नी बनने में दोष, नीच, वृद्ध एवं प्रवासी
वरणीय नहीं, बलात्कारी, कपटी और जुआरी अवरणीय, अवरणीयों में अनुरागशील ही उत्तम।
पञ्चम अध्याय १०१-१०५
विवाहयोगप्रकरण—कन्यासिद्धि की विधि, निसृष्टार्था दूती के कार्य, अन्य
प्रतिद्वन्द्वियों में दोषदर्शन, अभिभावकों की भर्त्सना, स्वयंवरण के उदाहरण, नायक की प्रशंसा,
विधिवत् विवाह आवश्यक, गुप्त रूप से दूषित कर विवाह, इससे गान्धर्व ही उत्तम, मध्यस्थों के
माध्यम से गुप्त विवाह, माता की सहमति से गुप्त विवाह, भाई की सहमति से गुप्त विवाह, पैशाच
विवाह, एकाकी को दूषित कर प्राप्त करना, राक्षस विवाह, उत्कृष्टता का विचार, गान्धर्व विवाह
की श्रेष्ठता।
४. भार्याधिकारिक चतुर्थ अधिकरण
प्रथम अध्याय १०६-११२
एकचारिणीवृत्तप्रकरण—सामंजस्य आवश्यक, घर की स्वच्छता और पूजाकार्य,
पंच महायज्ञ, आचार्य गोनर्दीय का मत, गुरुजन का सम्मान, गृहवाटिका की व्यवस्था, त्याज्य
स्त्रियाँ, भोजन की व्यवस्था, पति का स्वागत, पादप्रक्षालन, अलंकृत दिखे, पति के मान-
सम्मान का ध्यान, बहिर्गमन के लिये अनुमति, उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये अनुमति,
सोना और जागना, पाकशाला, पति के अपराध करने पर भी अकलुषित रहना, जादू-टोनों से
दूर, आचार्य गोनर्दीय का मत, वर्जित कृत्य, शरीरसंस्कार और शृंगार, समागम का वेश,
गोष्ठीविहार का वेश, व्रतोपवास, समयानुसार क्रय, उपयोगी सामग्री का संग्रह, गोपनीयता को
अक्षुण्ण रखना, समानता वाली स्त्रियों का अतिक्रमण, आय के अनुरूप ही व्यय, व्यवस्था-
विषयक निर्देश, वात्स्यायन द्वारा गृहिणियों के कार्य का सारसंक्षेप, पुरातन वस्त्रों का उपयोग,
पेय की व्यवस्था, पति के मित्रों से व्यवहार, सास-श्वसुर से व्यवहार, परिजनों के साथ
व्यवहार।

विषयानुक्रमणिका १७
प्रवासचर्याप्रकरण—सात्त्विक जीवनयापन, गुरुजनों के समीप शयन, अनधिक
व्यय, अत्यावश्यक होने पर ही बहिर्गमन, उपवास एवं अर्थव्यवस्था, प्रोषितपतिका के रूप में
ही दर्शन, उपसंहार।
द्वितीय अध्याय ११२-१२०
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण—द्वितीय विवाह का कारण, परम्परा और मर्यादा, विदग्ध भार्या
का कर्तव्य, ज्येष्ठा का दायित्व, पतिविषयक प्रमाद पर उपेक्षा, वैशिष्ट्यप्रदर्शन, सन्तति, परिजन
और पुरजनों से प्रेम, कई सपत्नियों में द्वितीय से संसर्ग, कलह की योजना, पतिप्रिया की
निकृष्टतासिद्धि, कलहकारिणी को आश्वासन, कलहवर्धन, शान्ति-प्रयास।
कनिष्ठावृत्तप्रकरण—सब कुछ बता दे, रहस्योद्घाटन न करे, सन्तान पर प्राण
न्यौछावर, ऐकान्तिक उपचार, सपत्नी की अनिन्दा, पति से सम्मान, सम्मान का अकथन,
सम्मानकथन में दोष, आचार्य गोनर्दीय का मत, निःसन्तान पर अनुकम्पा।
पुनर्भूवृत्तप्रकरण—अक्षतयोनि पुनर्भू का लक्षण, पुनर्भू के गृहत्याग की रीति,
आचार्य गोनर्दीय का मत, आचार्य वात्स्यायन की व्यवस्था, उत्तम पुनर्भू की इच्छा, मध्यम और
अधम पुनर्भू की इच्छा, प्रीतिदाय, प्रेमोपहारों के अतिरिक्त सभी सम्पदा पर नायक का
अधिकार, स्वामिनीवत् रहे, धर्मपत्नी से व्यवहार, परिजनों एवं मित्रों से व्यवहार, कलह के
स्थान पर उपालम्भमात्र।
दुर्भगावृत्तप्रकरण—वैदग्ध्य आवश्यक, सन्तति का लालन-पालन, धार्मिक कृत्यों में
पुरश्चारिणी, परिजनों से विनम्र एवं शालीन व्यवहार, आभ्यन्तर व्यवहार, प्रेम की पुनः प्राप्ति का
प्रयास, उपालम्भ और विपरीतता से दूर, अनुकूल बनाने के साधन, दुर्भगता के कारणों पर
विचार।
आन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण—राजा का आचरण, मिलन की व्यवस्था, सम्भोग के लिये
निवेदन व्यवस्था, उत्सवों में सम्मान, आवागमन नियन्त्रित।
बहुपत्नीकप्रकरण—सामान्य व्यवहार, रतिक्रीड़ा का अन्यत्र उल्लेख नहीं, कलह का
अवसर न दे, तदनुरूप व्यवहार, अनुकूल वृत्ति से प्रसादन, अधिकरण के अनुष्ठान का फल।
५. पारदारिक पञ्चम अधिकरण
प्रथम अध्याय १२०-१२६
स्त्री-पुरुष शीलावस्थापनप्रकरण—प्रकरणशुद्धि का स्मरण, परकीयागमन से पूर्व
विचारणीय बातें, प्रमुखतम कारण, कामदशाएँ, कामदशाओं का क्रमशः वर्णन, स्त्रीस्वभाव की
विशेषता, हटने की प्रवृत्ति, प्रयत्न से सिद्धि, पुरुषस्वभाव, विचारशील की प्राप्ति असम्भव,
पुरुषस्वभाव की विचित्रता, सुलभ की अवमानना और दुर्लभ की आकांक्षा।
व्यावृत्तिकारणप्रकरण—पतिविषयक प्रेम, सन्तति की अपेक्षा, प्रौढावस्था का
काम० २

१८ वात्स्यायन-कामसूत्र
ध्यान, शोकाकुलता, विरह की असमर्थता, अवज्ञा की शंका, अवश्यता का अनुमान,
अनिश्चितता की सम्भावना, रहस्योद्घाटन का भय, मित्रों का यथोक्तकारी, निरर्थक उपायों की
आशंका, तेजस्विता का भय, प्रचण्ड काम की शंका, कलानिष्णात से संकोच, पुरातन मैत्रीभाव,
नायक की विवेकहीनता, निन्द्य की आशंका, अपने दोषों पर दृष्टि, बहिष्कार का भय, परपुरुष
की वृद्धता, पति द्वारा परीक्षा की शंका, धर्म की मर्यादा का ध्यान, प्रतिकार के उपाय, दोषदर्शन
का उपाय, बहुमानजन्य कारणों का उपाय, परिभवजन्य कारणों का उपाय, भयनिवारण।
स्त्रीसिद्धपुरुषप्रकरण—स्त्रियों को सिद्ध कर लेने वाले पुरुष का कथन।
अयत्नसाध्ययोषित्प्रकरण—बिना विशेष यत्न के सिद्ध होने वाली स्त्रियाँ,
अभिभावकों का दायित्व, उपसंहार।
द्वितीय अध्याय १२७-१३४
परिचयकारणप्रकरण—सामान्य मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, दर्शन भेद,
परिचय : बाह्य कारण, आभ्यन्तर परिचय, पारिवारिक सदस्यों के साथ मेल-मिलाप, नायक के
कार्य, प्रणयसंकेत, भाषासंकेत, अंगसंकेत, पुष्पमालासंकेत, ताम्बूलसंकेत, वस्त्रसंकेत,
पोटलीसंकेत।
अभियोगप्रकरण—नायक के कार्य, आन्तरिक अभियोग, अभियोग हेतु अनुपयुक्त
स्थल, गृहस्वामिनी की अनुकूलता अनिवार्य, अनुपयुक्त घर, अनुपयुक्त स्त्रियाँ।
भावपरीक्षाप्रकरण—सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक, प्रगल्भा दूती द्वारा साध्य,
दुविधाग्रस्त, बलात् ग्राह्य, अतिपरिचय से साध्य, चित्त की चंचलता, मर्मज्ञ दूती से साध्य,
उपेक्षणीया, विशेष बात, अंगस्पर्श से साध्य, अधिक अभियोग चाहने वाली की पहचान, सुरत
आलिङ्गन, प्रगल्भा, अनुरागिणी, मर्मज्ञ दूती द्वारा साध्य, सम्यक् परीक्षा आवश्यक, उपसंहार।
चतुर्थ अध्याय १३५-१४२
दूतीकर्मप्रकरण—दूती के सामान्य कार्य, पति से विद्वेष कराना, दोषकथन में
ध्यातव्य बातें, आचार्य गोणिकापुत्र का मत, नायक के प्रति अनुकूलन, कथनपद्धति, दूसरे दिन
के कार्य, भावभंगिमाओं की परीक्षा, भावबोधक व्यापार, अनुकूलित आकार का फल, दूतीकर्म
पर मतवैभिन्न्य : श्वेतकेतु का मत, बाभ्रवीय, आचार्य गोणिकापुत्र का मत, आचार्य वात्स्यायन
की व्यवस्था; वस्तुप्रेषण, मिलन का अवसर, मिलन स्थल के विषय में गोणिकापुत्र का मत,
आचार्य वात्स्यायन का मत; दूतीभेद, निसृष्टार्था दूती, इसका विषय, परिमितार्था दूती, इसका
विषय, पत्रहारी दूती, इसका विषय, स्वयं दूती (प्रथम), स्वयंदूती का मिलन स्थल, स्वयंदूती
(द्वितीय), स्वयंदूती, मूढ़दूती, इसका प्रत्युत्तर, भार्यादूती, मूकदूती, बातदूती, तीन प्रकार की
दूतियों की व्याख्या, दूतीकर्म : सारसंक्षेप।
पञ्चम अध्याय १४३-१४८
ईश्वरकामितप्रकरण—परगृह में प्रवेश न करने के कारण, सूर्य के दृष्टान्त से पुष्टि,

विषयानुक्रमणिका १९
दृष्टान्त का फलितार्थ, अपरिहार्यता पर उपाय, क्षुद्र व्यक्तियों के उपाय, सम्प्रयोग के अवसर,
गौशाला का अधिकारी, सूत का प्रभारी, नगराध्यक्ष (कोतवाल), पण्याध्यक्ष (बाजार का
अधिकारी), मुख्य अधिकारियों का उपाय, राजदूती का प्रयास, राजा के प्रेम का प्रकटीकरण,
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्तव्य, सद्भावप्रदर्शन, रानी द्वारा सहयोग, कलाकौशल
के बहाने बुलाना, पीड़ित और स्वार्थियों के पत्नियों को बुलाने की रीति, रक्षिता बनाने की रीति,
परगृहप्रवेश में दोष, कोट्टराज और जयसेन का उदाहरण, सार्वजनिक प्रयोग, आन्ध्र की प्रथा,
वत्सगुल्म की प्रथा, विदर्भ की प्रथा, अपरान्त की प्रथा, सौराष्ट्र की प्रथा, अन्य योग, राजा के
लिए प्रशस्त मार्ग।
षष्ठ अध्याय १४८-१५४
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण—अन्तःपुर की लीलाएँ, प्रयोगविधि, प्राच्यों के उपचार,
विना पत्नी वाले पुरुष की कामशक्ति का उपाय, नागरिकों का प्रवेश, सुरक्षाप्रबन्ध के अभाव में
प्रवेश न करें, वात्स्यायन का परामर्श, ध्यातव्य बातें, स्वेच्छा से प्रवेश की विधि, परिचारिका से
कृत्रिम प्रेम, गुप्तचरों से सावधान, गतिविधियाँ, चित्र का प्रयोग, पुटापुट योग, जनसाधारण का
अन्तःपुर में प्रवेश और निष्क्रमण, अन्तःपुर की स्त्रियों को परपुरुषगमन में मिलाने की रीति,
रानियों के भोग-विलास : अपरान्त देश की प्रवृत्ति, आभीर की प्रवृत्ति, वत्सगुल्म की प्रवृत्ति,
विदर्भ की प्रवृत्ति, स्त्रीराज की प्रवृत्ति, गौड़ देश की प्रवृत्ति, सिन्ध देश की प्रवृत्ति, हैमवतों की
प्रवृत्ति, अङ्ग-वङ्ग और कलिंग, प्राच्यों की प्रवृत्ति।
दाररक्षितप्रकरण—स्त्रियों की रक्षा का उपाय, कामशास्त्र का परामर्श, आचार्य
गोणिकापुत्र का मत, वात्स्यायन की व्यवस्था, परीक्षण द्वारा रक्षण सम्भव, बाभ्रवीय मत,
वात्स्यायन का मत, विनाश के कारण, उपसंहार।
६. वैशिक षष्ठ अधिकरण
प्रथम अध्याय १५४-१५९
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरण—वैशिक अधिकरण की प्रयोक्त्री, वेश्या
का प्रयोजन—काम और रतिसुख, स्वाभाविक और कृत्रिम प्रवृत्ति, कृत्रिम राग को स्वाभाविक
दिखाना, इसका कारण, प्रेम के समय निर्लोभता दिखाये, उपाय से ही धनप्राप्ति, रहन-सहन,
वेश्याजनों के सहायक, धन के लिये मिलने योग्य पुरुष, गुण के लिये मिलने योग्य पुरुष,
नायकोचित गुण, नायिका के गुण, दोनों का सामान्य गुण, नायक-नायिका के दोष, अगम्य
नायक, मिलने के कारण, वात्स्यायन की व्यवस्था।
गम्योपावर्तनप्रकरण—भावजिज्ञासा, प्रेमसूत्र जोड़ने के उपाय, आगत का स्वागत,
गोष्ठी में सम्मान, प्रेम की दृढ़ता हेतु उपाय, स्वयं दर्शन, उपसंहार, आदान-प्रदान।
द्वितीय अध्याय १५९-१६६
कान्तावृत्तप्रकरण—आचार्य वात्स्यायन का परामर्श, कान्तानुवृत्त, माँ के संरक्षण में

२० वात्स्यायन-कामसूत्र
कार्य, माँ के कार्य, बेटी का शिष्टाप्रदर्शन, माँ का आज्ञापालन, व्याधि का बहाना, बहाने का
फल, इसकी विधि, मिलनविषयक बातें, मनोरथकथन, दोषों को छिपाना, शयनविधि, देखने
की रीति, व्यवहार की रीति, बोलने की रीति, सहानुभूति के अवसर, नायक के साथ सहजीवन
को प्राथमिकता, जीवन सार्थक मानना, देवपूजा (कृतज्ञताप्रदर्शन), भोजन और अलङ्कार की
रीति, नायक से सन्तान की इच्छा, आवश्यक बातें, प्रतिकूल ऋतु में भी अभिसार, जन्मान्तर
सम्बन्धों की कामना, वशीकरण की शङ्का, माँ से विवाद, माँ को भयभीत करना, रहस्योद्घाटन
का प्रयास, धन के विषय में विवाद नहीं, सभी कार्यों में माता की सहमति, नायक के आने के
बाद के कृत्य, काकबलि, साथ ही मरना, आसक्त की पहचान, उपजीव्य का उल्लेख, वेश्या-
नायकों को शिक्षा।
तृतीय अध्याय १६६-१७१
अर्थागमोपायप्रकरण—कामशास्त्र के आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत,
धनप्राप्ति के उपाय, वैशिक के धन की प्रशंसा, लूट का बहाना, अग्निकाण्ड या विनाश का
बहाना, स्वागत-सत्कार का खर्च, ऋण, प्रेमोपहार की विवशता, आवश्यक खर्चों में कटौती,
वैद्य और राजपुरुषों पर उपकार, मित्रों की सहायता, प्रिय वस्तु की बिक्री का बहाना, विशिष्ट
बर्तनों की माँग, नायक के प्रति कृतज्ञताज्ञापन, त्यागशीलता का दिखावा, बच्चों के समान
हठपूर्वक माँगना।
विरक्तप्रतिपत्तिप्रकरण—विरक्त के लक्षण, विरक्त पुरुष के कार्य, वेश्या के कार्य ।
निष्कासनक्रमप्रकरण—अकिञ्चन का निष्कासन, निष्कासन के प्रकट उपाय, सम्भोगकालीन
व्यवहार, बातें करने की रीति, अन्तिम उपाय, बाभ्रव्य का वैशिक, आचार्य दत्तक ने इतना ही
क्यों कहा ?।
चतुर्थ अध्याय १७१-१७६
विशीर्णप्रतिसन्धानप्रकरण—मिलने का कारण, विशीर्ण के विविध रूप — प्रथमः
दोनों ओर से स्वयं हटने वाला, द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया, तृतीय यहाँ से
स्वयं निकाल वहाँ से निकाला गया, चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा, पंचम : यहाँ से
निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा, षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा, प्रथम—न
मिलाने योग्य नायक, द्वितीय—अधिक लाभ पर स्वीकार्य, निर्धन या दुष्ट का संसर्ग योग्य नहीं,
तृतीय—अधिक धन पर स्वीकार्य, चतुर्थ—विचारणीय, संसर्ग योग पक्ष, असंसर्ग योग्य पक्ष,
पंचम—विचारणीय, संसर्गयोग्य पक्ष, असंसर्गयोग्य पक्ष, षष्ठ—नायक का विचार, इसके
कारण, पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान, पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता, आचार्य वात्स्यायन का
मत, पूर्वसंसृष्ट (वियुक्त) के भेद, पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख, प्रतिसंधान के कारण—
वियुक्तगत कारण, वर्तमानगत कारण, नायक को परामर्श, नायिका को परामर्श, समर्थ और
अनुरक्त को प्राथमिकता, वियुक्त को मिलाते समय ध्यातव्य बातें।

विषयानुक्रमणिका २१
पञ्चम अध्याय १७७-१८२
लाभविशेषप्रकरण—अपरिग्रह का कारण, एक रात की फीस, दूत भेजने की रीति,
अधिक लाभ की रीति, एक साथ आने वालों से अधिक लाभ, आचार्य वात्स्यायन का मत,
फीस का स्वरूप, समानता में प्राथमिकता, रागी से त्यागी की श्रेष्ठता, उपायों द्वारा रागी की
त्यागशीलता भी सम्भव, आचार्य वात्स्यायन का मत, निर्धन से धनवान् और त्यागशील से
कार्यसाधक श्रेष्ठ, आचार्य वात्स्यायन का मत, आवश्यकतानुसार विशिष्ट, कृतज्ञ और त्यागी,
त्यागी की न्यूनता, त्यागियों का स्वभाव, कृतज्ञ, रागी, त्यागी, कृतज्ञ : तीनों में विशेष,
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता, आचार्य वात्स्यायन का मत, मित्रों से अनुनय-विनय,
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण, आचार्य वात्स्यायन का मत, व्यवस्थाविषयक विचार, सिद्धान्त
का स्पष्टीकरण, उत्तम गणिका के लाभ, रूपाजीवा के लाभ, कुम्भदासी के लाभ, लाभ पर
आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, लाभ न लेने के स्थान, तत्काल लाभ के स्थान,
भविष्य में अल्प लाभ के स्थान, लाभ के स्थान, अग्राह्य पुरुष, ग्राह्य पुरुष, अर्थप्रयोजन वाले
नायक।
षष्ठ अध्याय १८२-१८९
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण—अनर्थ की उत्पत्ति के कारण, इनके
दुष्परिणाम, उपाय का समुचित समय, अर्थत्रिवर्ग, अनर्थ-त्रिवर्ग, अनुबन्धस्वरूप, शुद्ध संशय,
संकीर्ण संशय, उभयतोयोग, समन्ततोयोग, दोनों त्रिवर्ग, अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अर्थ, अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अनर्थ, अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अर्थ और काम की सम्बन्ध योजना,
शुद्धसंशय : अर्थसंशय, धर्मसंशय, कामसंशय, अनर्थसंशय, अधर्मसंशय, द्वेषसंशय, संकीर्ण
संशय, विरुद्ध संकीर्ण—अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता, धर्म और अधर्म की संकीर्णता, काम
और द्वेष की संकीर्णता, अविरुद्ध संकीर्ण—श्वेतकेतु के उभयतोयोग—उभयतः अर्थ योग,
उभयतः अनर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, बाभ्रवीयों के उभयतो योग,
उभयतः अर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, उभयतः संकीर्ण योग, विवेचन
का प्रयोजन, अवशिष्टों के शुद्ध, संकीर्ण और संश्लिष्ट, उभयतो योगों का समष्टिविचार,
समन्ततोयोग—गोष्ठीपरिग्रह, समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य, स्पर्धा का कारण, लाभनिर्देश,
वेश्याभेद, उपसंहार, महर्षि से मतभेद, वेश्या का स्वरूप, वैशिक को परामर्श।
७. औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय १८९-१९६
सुभगंकरणादिप्रकरण—सुभगंकरण योग, सौन्दर्यवर्धक योग, सुभगंकर काजल,
सुभगंकर तैल, सुभगंकर माला, सुभगंकर चटनी, सुभगंकर लेप, सुभगंकर यन्त्रधारण,
परिचारिका का सौभाग्यवर्धन, वेश्यापुत्री के विवाह की रीति, वेश्यापुत्री का कर्तव्य, रसिकों
का दर्शन, पाणिग्रहण, विना धन मिले भी प्रदर्शन, धन वसूलने की रीति, प्राच्य देशों की

१. साधारण अधिकरण (त्रिवर्ग प्रतिपत्ति, ६४ कलाएँ, नागरक-वृत्त व सखी-दूत विचार)

२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
वेश्याओं की रीति, एक वर्ष तक पत्नीव्रत का निर्वाह, निमन्त्रण पर उपस्थिति आवश्यक,
अभिनेत्री कन्याओं के विवाह की रीति, वैशिष्ट्यकथन।
वशीकरणप्रकरण—वशीकरण लेप, वशीकरण चूर्ण, वशीकरण स्नान, शिश्नलेप,
वांछित कन्या से विवाह की रीति, देवकान्त अनुलेप, गन्धर्वकान्त अनुलेप, नागकान्त अनुलेप,
पुण्य अञ्जन।
वृष्ययोग (वाजीकरण) प्रकरण—वाजीकरण का आशय, उच्चटा और मुलहटी,
मेढ़ा और बकरे का अण्डकोश, विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच, चिरौंजी, मुहार और श्वेत
विदारी, क्षीरकाकोली, सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ, उड़द की दाल की खीर, विदारीकन्द और
क्रौंच की पूड़ियाँ, गौरैया के अण्डों से भावित खीर, उक्त रीति से भावित तिलों की खीर,
मुलहठी आदि का षडंग अमृतं, शतावरी और गोखरू, शतावरी, गोखरू और श्रीपर्णी, गोखरू
और जौ, उपसंहार, अग्राह्य योग, ग्राह्य योग।
द्वितीय अध्याय १९६-२०३
नष्टरागप्रत्यानयनप्रकरण—समागम के प्रयोजन, चण्डवेग का प्रसादन, नष्टराग की
वापसी का उपाय, अपद्रव्यों का प्रयोग, बाभ्रवीय मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, चूड़क,
एकचूड़क, कंचुक या जालक, छेदनकर्म, छेदनविधि, शोधन, छिद्रवर्धन, व्रणशोधन, अपद्रव्यों
का रूप।
वर्धनयोगप्रकरण—वर्धन योग।
चित्रयोगप्रकरण—कन्यामोहन, रागनाशन विधि, योनिसंकोचन, योनिविस्तार, बाल
सफेद करना, बाल काले करना, होंठ सफेद करना, होंठ लाल करना, मोहक वंशी, पागल
बनाना, अच्छा करना, अदृश्य करना, पानी को दूध के समान सफेद करना, लोहे को ताँबे के
समान करना, लकड़ियों का सर्प दिखाना, यश और आयुर्वर्धक दूध, ब्राह्मणों का आशीर्वाद
सदैव हितकर, उपसंहार, शास्त्र का उद्देश्य रागोद्दीपन नहीं, अशिष्टसम्मत योग प्रयोज्य नहीं,
शास्त्रीय ग्रन्थ, निर्माण की अवस्था और प्रयोजन, कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता, सिद्धि के लिये
रागात्मकता का अभाव आवश्यक॥
साम्प्रयोगिक आसनों के कतिपय चित्र २०५-२१८

॥ श्रीः ॥
वात्स्यायन-कामसूत्र
१.
साधारण नामक प्रथम अधिकरण
प्रथम अध्याय
शास्त्रसंग्रह
धर्मार्थकामेभ्यो नमः ॥ १ ॥
मङ्गलाचरण—धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार है ॥ १ ॥
शास्त्रे प्रकृतत्वात् ॥ २ ॥
(क्योंकि) इस शास्त्र में मूलतः धर्म, अर्थ और काम का ही उपदेश किया गया है,
अतएव उन्हें ही नमस्कार किया गया ॥ २ ॥
तत्समयावबोधकेभ्यश्चाचार्येभ्यः ॥ ३ ॥
और जिन आचार्यों ने धर्म, अर्थ और कामशास्त्र के तत्त्व को समझाने के लिये तद्विषयक
ग्रन्थ लिखे हैं, उन्हें भी नमस्कार है ॥ ३ ॥
तत्सम्बन्धात् ॥ ४ ॥ इति ॥
त्रिवर्ग से सम्बद्ध ग्रन्थों की रचना करने वाले आचार्यों को नमस्कार करने का कारण यह
है कि उन के ग्रन्थों से संग्रह कर इस 'कामसूत्र' की रचना कर रहे हैं, अतएव उपजीव्य ग्रन्थों
के रचयिताओं के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन भी आवश्यक है ॥ ४ ॥
प्रजापतिर्हि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थितिनिबन्धनं त्रिवर्गस्य साधनमध्यायानां
शतसहस्रेणाग्रे प्रोवाच ॥ ५ ॥
कामशास्त्र की प्राचीनता—प्रजापति ने प्रजाओं की सृष्टि कर त्रिवर्ग के साधनभूत
शास्त्र का, जो उनकी स्थिति का कारण या व्यवस्थित जीवन का संविधान है, एक लाख
अध्यायों में प्रवचन किया था ॥ ५ ॥
तस्यैकदेशिकं मनुः स्वायम्भुवो धर्माधिकारिकं पृथक् चकार ॥ ६ ॥
प्रजापति ब्रह्मा द्वारा रचित उस शास्त्र के धर्मशास्त्रविषयक अंश को स्वयंभू के पुत्र मनु ने
पृथक् कर लिया ॥ ६ ॥
बृहस्पतिरर्थाधिकारिकम् ॥ ७ ॥
बृहस्पति ने अर्थशास्त्रविषयक अंश को पृथक् किया ॥ ७ ॥
महादेवानुचरश्च नन्दी सहस्रेणाध्यायानां पृथक् कामसूत्रं प्रोवाच ॥ ८ ॥
कामशास्त्र की परम्परा—महादेव के अनुचर नन्दी ने प्रजापति ब्रह्मा के उस शास्त्र से

२ वात्स्यायन-कामसूत्र
एक सहस्र अध्याय वाले कामसूत्र को पृथक् कर कहा, अर्थात् एक सहस्र अध्यायों में उसका
स्वतन्त्र एवं विशद विवेचन किया ॥ ८ ॥
तदेव तु पञ्चभिरध्यायशतैरुद्दालकिः श्वेतकेतुः सञ्चिक्षेप ॥ ९ ॥
महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने नन्दिकेश्वर के उस कामसूत्र को पाँच सौ अध्यायों में
संक्षिप्त करके निरूपित किया ॥ ९ ॥
तदेव तु पुनरर्ध्यर्धेनाध्यायशतेन साधारण-साम्प्रयोगिक-कन्यासम्प्रयुक्तक-
भार्याधिकारिक-पारदारिक-वैशिक-औपनिषदिकैः सप्तभिरधिकरणैर्बाभ्रव्यः
पाञ्चालः सञ्चिक्षेप ॥ १० ॥
इसके पश्चात् पांचाल देश के निवासी बभ्रु के पुत्र बाभ्रव्य ने श्वेतकेतु के पाँच सौ अध्याय
वाले कामसूत्र को साधारण, साम्प्रयोगिक, कन्यासम्प्रयुक्तक, भार्याधिकारिक, पारदारिक,
वैशिक और औपनिषदिक—इन सात अधिकरणों में विभक्त कर, एक सौ पचास अध्यायों में
संक्षिप्त किया ॥ १० ॥
तस्य षष्ठं वैशिकमधिकरणं पाटलिपुत्रिकाणां गणिकानां नियोगाद् दत्तकः
पृथक् चकार ॥ ११ ॥
पटना की वेश्याओं के अनुरोध पर, आचार्य दत्तक ने बाभ्रव्य द्वारा संक्षिप्त किये गये
कामशास्त्र के षष्ठ भाग—वैशिक अधिकरण को पृथक् किया (अर्थात् उसका स्वतन्त्र विवेचन
किया) ॥ ११ ॥
तत्प्रसङ्गात् चारायणः साधारणमधिकरणं पृथक् प्रोवाच। सुवर्णनाभः
साम्प्रयोगिकम्। घोटकमुखः कन्यासम्प्रयुक्तकम्। गोनर्दीयो भार्याधिकारिकम्।
गोणिकापुत्रः पारदारिकम्। कुचुमार औपनिषदिकमिति ॥ १२ ॥
(जिस प्रकार बाभ्रव्य के संक्षिप्त कामशास्त्र से आचार्य दत्तक ने वैशिक अधिकरण का
स्वतन्त्र विवेचन किया, उसी प्रकार) विशेष प्रयोजनवश चारायण ने साधारण अधिकरण,
सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक अधिकरण, घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण, गोनर्द देश के
निवासी गोनर्दीय ने भार्याधिकारिक अधिकरण, गोणिकापुत्र ने पारदारिक अधिकरण और
कुचुमार ने औपनिषदिक अधिकरण का स्वतन्त्र विवेचन किया ॥ १२ ॥
एवं बहुभिराचार्यैस्तच्छास्त्रं खण्डशः प्रणीतमुत्सन्नकल्पमभूत् ॥ १३ ॥
कामशास्त्र बनाने का प्रयोजन—इस प्रकार बाभ्रव्यरचित वह शास्त्र विभिन्न आचार्यों
द्वारा विभिन्न खण्डों में पृथक् पृथक् लिखे जाने के कारण बिखर-सा गया ॥ १३ ॥
तत्र दत्तकादिभिः प्रणीतानां शास्त्रावयवानामेकदेशत्वात् महदिति च
बाभ्रवीयस्य दुरध्येयत्वात् संक्षिप्य सर्वमर्थमल्पेन ग्रन्थेन कामसूत्रमिदं
प्रणीतम् ॥ १४ ॥
क्योंकि दत्तक आदि आचार्यों ने पृथक्-पृथक् अधिकरणों को लेकर अपने ग्रन्थों की
रचना की थी, फलतः वे समस्त शास्त्र के अंशमात्र थे और आचार्य बाभ्रव्य का शास्त्र
साङ्गोपाङ्ग, किन्तु विशाल होने के कारण दुरध्येय (जिसका कठिनता से अध्ययन किया जा