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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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६ वात्स्यायन-कामसूत्र
में विभक्त हुआ है और प्रत्येक अध्याय में एक या अनेक प्रकरण संगृहीत किये गये हैं। इस
प्रकार सम्पूर्ण 'कामसूत्र' में ७ अधिकरण, ३६ अध्याय, ६४ प्रकरण और १२५० सूत्र या
श्लोक हैं। 'कामसूत्र' मूलतः सूत्रों में रचा गया था, किन्तु वात्स्यायन ने कुछ श्लोकों की
रचना भी की है और कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत भी किये हैं।
प्रथम अधिकरण का नाम साधारण है जो पाँच अध्यायों में विभक्त है, और एक
एक अध्याय में एक एक प्रकरण ही लिया गया है। यह अधिकरण कामशास्त्र की पीठिका
या प्रारम्भिका ही है। इसमें कामशास्त्र की परम्परा, त्रिवर्गप्रतिपत्ति, चौंसठ कलाएँ,
नागरकवृत्त और नायक-नायिका भेद आदि विषय संगृहीत किये गये हैं।
द्वितीय अधिकरण में सम्प्रयोग विषय बनाया गया है। इस अधिकरण में दस
अध्याय और सत्रह प्रकरण हैं। सम्प्रयोग का अर्थ है सम्भोग या समागम। इसमें आलिंगन,
चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, संवेशन, प्रहणन, सीत्कार आदि की विवेचना करते हुए सफल
एवं सानन्द सम्भोग की समुचित व्याख्या की गयी है। शास्त्रकार के मतानुसार सफल एवं
सानन्द सम्भोग ही दाम्पत्य जीवन की सफलता का रहस्य है।
तृतीय अधिकरण 'कन्यासम्प्रयुक्तक' है। इस अधिकरण में पाँच अध्याय और
प्रकरण हैं। विवाह के लिए कैसी कन्या का चयन किया जाये? चयनित कन्या को किस
प्रकार अनुरक्त कर विवाह-बन्धन में बाँधा जाये? विवाहित पत्नी में किस प्रकार विश्वास
उत्पन्न कर दाम्पत्य जीवन प्रारम्भ किया जाये? — इन प्रश्नों का सुन्दर विश्लेषण इस
अधिकरण में किया गया है। इस अधिकरण में उन कन्याओं और पुरुषों का भी मार्गदर्शन
किया गया है जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है।
चतुर्थ अधिकरण 'भार्याधिकारिक' है। इसमें दो अध्याय और आठ प्रकरण हैं।
विवाहसूत्र में बँधकर कन्या या नवविवाहिता पत्नी भार्या कहलाती है। यह एकचारिणी और
सपत्नी—दो प्रकार की हो सकती है। इसमें पति का पत्नी के प्रति और पत्नी का पति एवं
सपत्नी के प्रति समुचित व्यवहार दिखाया गया है।
पञ्चम अधिकरण 'पारदारिक' है। इससें छह अध्याय और दस प्रकरण हैं। इस
अधिकरण में परस्त्री और परपुरुष के प्रेमसम्बन्धों की गहन विवेचना की गयी है। शास्त्रकार
का मत है कि इस अधिकरण का प्रयोजन विट लोगों से अपनी स्त्रियों की रक्षा करना है,
किसी शीलसम्पन्न स्त्री को पतित बनाना नहीं।
षष्ठ अधिकरण 'वैशिक' है। इसमें छह अध्याय और बारह प्रकरण हैं। इसमें
वेश्याओं के चरित्र, अर्थप्राप्ति के उपाय, विरक्त नायक को मिलाने के उपाय, लाभविशेष
आदि की चर्चा है। महर्षि वात्स्यायन ने अधिकरण के प्रारम्भ में ही यह स्पष्ट कर दिया है
कि इसमें कथित योगों के प्रयोग का अधिकार वेश्या को है, वैशिक नायक को नहीं।
वस्तुतः यह अधिकरण वेश्याओं का मार्गदर्शन करने के लिए ही लिखा गया है, किन्तु