वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ वात्स्यायन-कामसूत्र
के कार्य, अपहस्तकप्रहार, सीत्कारों का उचित समय, प्रहस्तकप्रहार, नायिका के कार्य, श्वसित
और रुदित का समय, दूत्कृत, फूत्कृत, इसके उत्तर, समतलक और परवर्ती कार्य, इसके
सीत्कार, दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहणन, वात्स्यायन की व्यवस्था, घातक प्रहणनों का सर्वथा
निषेध, घातक प्रहारों के दुष्परिणाम, घातक प्रहारों का कारण-कामातिरेक, कामान्धता पर एक
दृष्टान्त।
अष्टम अध्याय ६२-६७
पुरुषायितप्रकरण-पुरुषायित (विपरीत रति) का स्वरूप, विपरीत रति के कारण,
विपरीत रति : प्रथमरीति, द्वितीय रीति, बाह्य विपरीत रति ।
पुरुषोपसृप्तप्रकरण-पुरुषोपसृप्त का अर्थ और स्वरूप, पुरुषोपसृप्त के भेद, आभ्यन्तर
पुरुषोपसृप्त, राग की विभिन्न अवस्थाएँ, प्रज्वलित हुए भाव का लक्षण, करिकर का प्रयोग,
उपसृप्तों के प्रकार-उपसृप्तक, मंथन, हुल, अवमर्दन, पीड़ितक, निर्घात, वराहघात, वृषाघात,
चटकविलसित, सम्पुट, प्रयोग की रीति, पुरुषायित में पुरुषोपसृप्त की अधिकता, संदंश,
भ्रमरक, नायक का कार्य, प्रेङ्खोलितक, विश्रामविधि, पुरुष के ऊपर आने का समय, प्रकरण का
उपसंहार।
नवम अध्याय ६७-७३
औपरिष्टकप्रकरण-नपुंसक के भेद, स्त्रीरूपधारी नपुंसक (हिजड़ी), औपरिष्टक का फल,
चरित, पुरुषरूपधारी नपुंसक (हिजड़ा), औपरिष्टक के भेद, बाह्य औपरिष्टक-अन्तः संदंश,
चुम्बितक, परिमृष्टक, आम्रचूषितक, संगर, औपरिष्टक के सीत्कार और प्रहणन, नपुंसक के
अतिरिक्त औपरिष्टक के विषय, आचार्यों का अभिमत, वात्स्यायन की व्यवस्था, देशाचार के
रूप में प्रवृत्ति, स्त्रियों की अपवित्रता, वात्स्यायन की व्यवस्था, कुछ विशिष्ट औपरिष्टक, शास्त्र
की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता, विवेचन की सार्थकता, प्रयोक्ता के विचारणीय
विषय।
दशम अध्याय ७३-७९
रतारम्भावसानिकप्रकरण-सुरत के प्रारम्भ के कृत्य, कामोद्दीपन, सुरत के समापन
के कार्य, सुरतारम्भ और सुरतान्त पर आनुवंश्य श्लोक, प्रीतिवर्धक योग ।
रतविशेषप्रकरण-रागवत (सहजराग), इसके कार्य, आहार्यराग, प्रवृत्ति की रीति,
कृत्रिमराग, प्रवृत्ति की रीति, व्यवहित राग, तीनों समान के ही विषय, पोटारत, पोटारत में
उपचार अनावश्यक, खलरत, अनियन्त्रितरत।
प्रणयकलहप्रकरण-कलह के कारण, असहिष्णुता के कार्य, नायक के कार्य, मान
की विधि, अधिकरण का उपसंहार।