वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका १५
३. कन्यासम्प्रयुक्तक तृतीय अधिकरण
प्रथम अध्याय ७९-८३
वरणसंविधानप्रकरण—वरण का कारण, गृहस्थाश्रम की उत्कृष्टता और सपत्नी की
प्रशंसा, विवाहयोग्य कन्याएँ, वर का चयन, घोटकमुख का मत, मित्रसम्बन्धियों के
प्रयत्नविषयक कार्य, मित्रों के प्रयत्न, दैवज्ञों के प्रयत्नविषयक कार्य, दोनों पक्षों के कार्य,
मेलापक, दुर्योग, निमित्त और शकुन, सामुद्रिक लक्षण—वर के लिए, कन्या के लिये,
विवाहमुहूर्त, घोटकमुख का मत, अवरणीय कन्याएँ, धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण, व्यावहारिक
दृष्टिकोण, कन्यापक्ष की तैयारी, वरपक्ष का स्वागत-सत्कार, कन्या दिखाने की रीति, विशेष
बातें, विवाहभेद, विविध विवाहों का स्वरूप।
सम्बन्धनिश्चयप्रकरण—सम्बन्धभेद—उच्च सम्बन्ध, हीन सम्बन्ध, समान सम्बन्ध,
उच्च और हीन सम्बन्धों में उच्च श्रेष्ठ।
द्वितीय अध्याय ८३-८९
कन्याविस्रम्भणप्रकरण—दस दिन के कृत्य, धर्मशास्त्र की मर्यादा, विस्रम्भण के
उपाय, कोमल उपचारों का कारण, वात्स्यायन का मत, कोमल उपचार, इसका कारण,
यथासम्भव प्रयास, सर्वप्रथम आलिङ्गन, प्रथम उपक्रम, अन्धकार और प्रकाश, मुख से
ताम्बूलदान, प्रथम चुम्बन, वार्तारस, बोलने को विवश करने के उपाय, घोटकमुख का मत,
नवपरिणीता के उत्तर देने की रीति, प्रेमजिज्ञासा का स्वरूप, पूर्वपरिचिता के साथ वार्तालाप,
प्रिय के पास ताम्बूल आदि रखना, कुचस्पर्श, परवर्ती क्रियाएँ क्रियाएँ, आतंकित करने की
रीति, द्वितीय और तृतीय रात्रि, हस्तयोजन के उपाय, हस्तयोजनविधि, नीवीविस्रंसन, अन्य
कार्य, धर्मशास्त्र का दृष्टिकोण, साहित्य में कन्याविस्रम्भण, प्रकरण का उपसंहार, ध्यातव्य तथ्य,
विश्वस्त बनाने का फल, लज्जाशील की उपेक्षा अनुचित, बिना विश्वास जगाये समागम उचित
नहीं।
तृतीय अध्याय ८९-९४
बालोपक्रमणप्रकरण—गान्धर्वादि विवाह करने के कारण, कन्या न मिलने के
कारण, कन्याप्राप्ति के उपाय, दक्षिण भारत में कन्या को अनुरक्त करने की रीति, मातुलकन्या
की ग्राह्यता, आचार्य घोटकमुख का मत, बालक के प्रयास, युवक के प्रयास, सखी का कार्य,
नायक के कार्य, उपहारदान और प्रेमदर्शन, उपहारदान का प्रयोजन, कौतुकप्रदर्शन, रतिकौशल
का प्रकटीकरण, नायक का वेश और कार्य, भव्य वेशभूषा का कारण।
इङ्गिताकारसूचनप्रकरण—देखने की रीति, बोलनेकी रीति, भावप्रेरित चेष्टाएँ,
नायक के सहचरों और अनुचरों के साथ व्यवहार, नायक से सम्पर्क की वाञ्छा, उपसंहार।
चतुर्थ अध्याय ९५-१०१
एकपुरुषाभियोगप्रकरण—उपायों के भेद—बाह्य उपाय, साधिकार करग्रहण,