सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

८ वात्स्यायन-कामसूत्र
(१) दोनों ही ग्रन्थ अधिकरण, अध्याय और प्रकरणों में विभक्त हैं। (२) दोनों ही
ग्रन्थों में अपने मत की पुष्टि के लिए आनुवंश्य श्लोक—प्राचीन प्रचलित श्लोक—उद्धृत
किये गये हैं। (३) दोनों ही ग्रन्थों में परिशिष्ट रूप में औपनिषदिक प्रकरण रखा गया है
जिसमें कथित अभद्र एवं निन्द्य योगों को आपद्धृ के रूप में ही अपनाने का निर्देश दिया
गया है और (४) दोनों ही ग्रन्थों में प्राचीन आचार्यों के मतों का दिग्दर्शन कराते हुए 'इति
कौटिल्यः' या 'इति वात्स्यायनः' कहकर स्वमत की स्थापना की गयी है।
किन्तु इसी आधार पर अर्थशास्त्रकार और कामसूत्रकार को अभिन्न मान लेना उचित
नहीं है। वस्तुतः 'कामसूत्र' 'अर्थशास्त्र' की अपेक्षा परवर्ती ग्रन्थ है और उसमें शैली का
अनुकरण भले ही किया गया हो, लेकिन कई मौलिक अन्तर भी हैं। उदाहरणार्थ,
अर्थशास्त्रकार सर्वत्र निर्मम दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे 'इति कौटिल्यः' ही नहीं लिखते,
बल्कि, 'नेति कौटिल्यः' कहकर अपनी असहमति भी प्रकट कर देते हैं। अपनी व्यवस्था
के प्रति असन्तोष या उसका उल्लंघन उन्हें स्वीकार्य नहीं है, जबकि वात्स्यायन उदार और
लचीला दृष्टिकोण अपनाते हैं। वे 'इति वात्स्यायनः' तो लिखते हैं, किन्तु 'नेति वात्स्यायनः'
लिखने का साहस नहीं बटोर पाते। वे अनेक पूर्व मान्यताओं का उल्लेखमात्र करके छोड़ देते
हैं, न उसका समर्थन करते हैं और न विरोध ही। अनेक अभद्र एवं अशिष्ट देशगत प्रवृत्तियों
को उस देश में ही स्वीकार्य मान लेते हैं। वस्तुतः उनमें अर्थशास्त्रकार-सदृश निर्मम एवं दृढ़
निषेध या विरोध का स्वर नहीं मिलता। दोनों ग्रन्थों की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति में
भी भिन्नता है, आचार-विचार और मान्यताएँ भी किञ्चित् परिवर्तित हैं, दोनों के नागरक भी
कुछ विभिन्नता रखते हैं।
सारतः कौटिल्य और वात्स्यायन को अभिन्न मानना तर्कसंगत नहीं है। वस्तुतः
वात्स्यायन परवर्ती हैं और उन ने कौटल्य की रचनाशैली का अनुकरण नहीं किया है।
विद्वानों का मत है कि कामसूत्रकार वात्स्यायन और न्यायभाष्यकर्ता वात्स्यायन एक
ही हैं !
वात्स्यायन का स्थितिकाल : कुछ विद्वानों ने उन्हें ईस्वी प्रथम शताब्दी का माना
है तो कुछ तीसरी और चौथी शताब्दी का स्वीकार करते हैं। 'नाट्यशास्त्र' में 'कामसूत्र' का
शब्दशः उल्लेख और कालिदास के नाटकों पर इसका प्रभाव देखकर वात्स्यायन को इन से
पूर्ववर्ती ईस्वी शताब्दी का ही मानना उचित होगा, परवर्ती नहीं।
काल और नामविषयक विवादों पर अभी गहन अनुसन्धान की आवश्यकता है।
'कामसूत्र' का प्रयोजन :
महर्षि वात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में धर्म, अर्थ और काम—तीनों की समन्वित
व्याख्या की है। उनका स्पष्ट मत है कि धर्म संसार का नियामक है, इसलिये उसे प्रथम स्थान
देना चाहिये। धर्म के अविरुद्ध ही अर्थार्जन करना चाहिये और जब अर्थार्जन करने लगे तो