वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायकविचार, अगम्या स्त्रियाँ, अगम्याओं की विवेचना, बाभ्रव्य का मत, सहायकस्नेहमित्र,
गुणी मित्र, जाति मित्र, दौत्यकर्म के योग्य व्यक्ति, दूत के गुण।
२. साम्प्रयोगिक द्वितीय अधिकरण
प्रथम अध्याय २७-३४
रतावस्थापनप्रकरण—प्रमाण से सुरत की व्यवस्था, समरत, विषमरत, नीचरत से
उच्चरत की श्रेष्ठता, भाव से सुरत की व्यवस्था, काल से सुरत की व्यवस्था, स्त्रियों के स्खलन
(क्षरण) पर विवाद, श्वेतकेतु का मत; समागम का कारण—खाजनिवारण, पूर्वपक्ष की शङ्का,
श्वेतकेतु के मत पर शङ्का, श्वेतकेतु का समाधान, श्वेतकेतु का उत्तर, श्वेतकेतु के मत का
सारसंग्रह, बाभ्रव्य का मत, पुरुषवत् स्खलन मानने वालों की शङ्का और समाधान, बाभ्रव्य के
मत पर शङ्का, बाभ्रव्य का समाधान, बाभ्रव्य का सारसंक्षेप, वात्स्यायन का मत; स्त्री-पुरुष के
सुख की अभिन्नता, सुखानुभूति की अभिन्नता की स्थापना, विभिन्न स्वार्थों के साधकों को समान
सुखानुभूति कैसे ?, वात्स्यायन का समाधान, समान सुख-सिद्धान्त का सार, नौ-नौ रतों को ही
मान्यता, रति और रत के पर्याय, संकीर्णरत को समरत बनाने के उपाय, भावकालान्तरसंक्रान्ति,
विशेष विस्तार का कारण।
प्रीतिविशेषप्रकरण—प्रीति के भेद, आभ्यासिकी प्रीति, आभिमानिकी प्रीति,
सम्प्रत्ययात्मिका प्रीति, विषयात्मिका प्रीति, प्रीतियों का उपयोग।
द्वितीय अध्याय ३४-३९
आलिङ्गनादिविचारप्रकरण—चतुःषष्टिविचार, चतुःषष्टि का अर्थ, ऋग्वेद का
वर्गविभाजन, दशत्यी, 'कामसूत्र' और 'ऋग्वेद' में विभाजनसाम्य, चतुःषष्टि का स्वरूप,
वात्स्यायन का खण्डन, असमागतों के आलिङ्गन, स्पृष्टक, विद्धक, स्पृष्टक और विद्धक का
उपयोग, उद्घृष्टक, पीड़ितक, उद्घृष्टक और पीड़ितक का प्रयोग, सुरतकालीन आलिङ्गन,
लतावेष्टित, वृक्षाधिरूढक, तिलतण्डुलक, क्षीरजलक, तिलतण्डुलक और क्षीरजलक का
प्रयोगकाल, सुवर्णनाभकथित आलिङ्गनप्रकार, ऊरूपगूहन, जघनोपगूहन, स्तनालिङ्गन,
ललाटिका, संवाहन आलिङ्गनप्रकार नहीं, आलिङ्गन का महत्त्व, अशास्त्रीय योग, अशास्त्रीय
योगों के उपयोग का कारण।
तृतीय अध्याय ३९-४३
चुम्बनविकल्पप्रकरण—क्रम, वात्स्यायन का मत, चुम्बन के स्थान, लाटवासियों
की रीति, स्थानों पर वात्स्यायन की व्यवस्था, मुखचुम्बन, कन्या के चुम्बन, स्फुरितक,
घट्टितक, कन्या का स्वरूप और उसके चुम्बन, शेष नायिकाओं के चुम्बन, आकृष्ट चुम्बन,
चुम्बनद्यूत, चुम्बनद्यूत का लक्षण, द्यूतकलह, कपटद्यूत, नखक्षतादि की कलह, उत्तरओष्ठ
चुम्बन, दोनों ओष्ठों के चुम्बन की विधि, अन्तर्मुखचुम्बन, मुखदन्तयुद्ध, शेषाङ्गचुम्बन,
स्वाभिप्राय चुम्बन—रागदीपन, चलितक, प्रातिबोधिक, इसकी विधि, छायाचुम्बन,
अंगुलिचुम्बन, संवाहिका की प्रेमाभिव्यक्ति, अभियोगों की सामान्यविधि।