वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 248 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ वात्स्यायन-कामसूत्र
ध्यान, शोकाकुलता, विरह की असमर्थता, अवज्ञा की शंका, अवश्यता का अनुमान,
अनिश्चितता की सम्भावना, रहस्योद्घाटन का भय, मित्रों का यथोक्तकारी, निरर्थक उपायों की
आशंका, तेजस्विता का भय, प्रचण्ड काम की शंका, कलानिष्णात से संकोच, पुरातन मैत्रीभाव,
नायक की विवेकहीनता, निन्द्य की आशंका, अपने दोषों पर दृष्टि, बहिष्कार का भय, परपुरुष
की वृद्धता, पति द्वारा परीक्षा की शंका, धर्म की मर्यादा का ध्यान, प्रतिकार के उपाय, दोषदर्शन
का उपाय, बहुमानजन्य कारणों का उपाय, परिभवजन्य कारणों का उपाय, भयनिवारण।
स्त्रीसिद्धपुरुषप्रकरण—स्त्रियों को सिद्ध कर लेने वाले पुरुष का कथन।
अयत्नसाध्ययोषित्प्रकरण—बिना विशेष यत्न के सिद्ध होने वाली स्त्रियाँ,
अभिभावकों का दायित्व, उपसंहार।
द्वितीय अध्याय १२७-१३४
परिचयकारणप्रकरण—सामान्य मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, दर्शन भेद,
परिचय : बाह्य कारण, आभ्यन्तर परिचय, पारिवारिक सदस्यों के साथ मेल-मिलाप, नायक के
कार्य, प्रणयसंकेत, भाषासंकेत, अंगसंकेत, पुष्पमालासंकेत, ताम्बूलसंकेत, वस्त्रसंकेत,
पोटलीसंकेत।
अभियोगप्रकरण—नायक के कार्य, आन्तरिक अभियोग, अभियोग हेतु अनुपयुक्त
स्थल, गृहस्वामिनी की अनुकूलता अनिवार्य, अनुपयुक्त घर, अनुपयुक्त स्त्रियाँ।
भावपरीक्षाप्रकरण—सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक, प्रगल्भा दूती द्वारा साध्य,
दुविधाग्रस्त, बलात् ग्राह्य, अतिपरिचय से साध्य, चित्त की चंचलता, मर्मज्ञ दूती से साध्य,
उपेक्षणीया, विशेष बात, अंगस्पर्श से साध्य, अधिक अभियोग चाहने वाली की पहचान, सुरत
आलिङ्गन, प्रगल्भा, अनुरागिणी, मर्मज्ञ दूती द्वारा साध्य, सम्यक् परीक्षा आवश्यक, उपसंहार।
चतुर्थ अध्याय १३५-१४२
दूतीकर्मप्रकरण—दूती के सामान्य कार्य, पति से विद्वेष कराना, दोषकथन में
ध्यातव्य बातें, आचार्य गोणिकापुत्र का मत, नायक के प्रति अनुकूलन, कथनपद्धति, दूसरे दिन
के कार्य, भावभंगिमाओं की परीक्षा, भावबोधक व्यापार, अनुकूलित आकार का फल, दूतीकर्म
पर मतवैभिन्न्य : श्वेतकेतु का मत, बाभ्रवीय, आचार्य गोणिकापुत्र का मत, आचार्य वात्स्यायन
की व्यवस्था; वस्तुप्रेषण, मिलन का अवसर, मिलन स्थल के विषय में गोणिकापुत्र का मत,
आचार्य वात्स्यायन का मत; दूतीभेद, निसृष्टार्था दूती, इसका विषय, परिमितार्था दूती, इसका
विषय, पत्रहारी दूती, इसका विषय, स्वयं दूती (प्रथम), स्वयंदूती का मिलन स्थल, स्वयंदूती
(द्वितीय), स्वयंदूती, मूढ़दूती, इसका प्रत्युत्तर, भार्यादूती, मूकदूती, बातदूती, तीन प्रकार की
दूतियों की व्याख्या, दूतीकर्म : सारसंक्षेप।
पञ्चम अध्याय १४३-१४८
ईश्वरकामितप्रकरण—परगृह में प्रवेश न करने के कारण, सूर्य के दृष्टान्त से पुष्टि,