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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 248 में से

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पृष्ठ 20

१६ वात्स्यायन-कामसूत्र
मिथुनदर्शन, जलक्रीड़ा में अभिप्रायज्ञापन, नवपत्रिका में अभिप्रायज्ञापन, दुःखनिवेदन,
स्वप्नकथन, बहाने से अङ्गस्पर्श, चरणपीड़न, अंगुलिस्पर्श, आन्तरिक एवं बाह्य उपाय,
अभिज्ञान, प्रेमपूर्ण छेड़छाड़, भावनिवेदन, वाणी से कहने की रीति, आभ्यन्तर उपाय, गृह
आमन्त्रण, उपचारों का प्रयोग, इस प्रपञ्च का उद्देश्य, आचार्य घोटकमुख का मत, समागमकाल,
वात्स्यायन की व्यवस्था।
प्रयोज्योपावर्तनप्रकरण—विवाह न हो पाने के कारण, धर्मशास्त्र द्वारा कन्या को
स्वयं विवाह करने की अनुमति, समान पति चुनने के उपाय, वर में दर्शनीय गुण, माता का
कर्तव्य, बाह्य उपचार, सम्भोग के लिये पहल घातक, नायक के प्रयासों को स्वीकृति, आभ्यन्तर
उपचार, महत्त्वपूर्ण परामर्श।
एकप्रतिपत्तिप्रकरण—सुखों का आश्रय, अनुकूल और वश्य, अर्थलिप्सा, विशेष
महत्त्वपूर्ण, एकनिष्ठ ही वरणीय, धनवान् की पत्नी बनने में दोष, नीच, वृद्ध एवं प्रवासी
वरणीय नहीं, बलात्कारी, कपटी और जुआरी अवरणीय, अवरणीयों में अनुरागशील ही उत्तम।
पञ्चम अध्याय १०१-१०५
विवाहयोगप्रकरण—कन्यासिद्धि की विधि, निसृष्टार्था दूती के कार्य, अन्य
प्रतिद्वन्द्वियों में दोषदर्शन, अभिभावकों की भर्त्सना, स्वयंवरण के उदाहरण, नायक की प्रशंसा,
विधिवत् विवाह आवश्यक, गुप्त रूप से दूषित कर विवाह, इससे गान्धर्व ही उत्तम, मध्यस्थों के
माध्यम से गुप्त विवाह, माता की सहमति से गुप्त विवाह, भाई की सहमति से गुप्त विवाह, पैशाच
विवाह, एकाकी को दूषित कर प्राप्त करना, राक्षस विवाह, उत्कृष्टता का विचार, गान्धर्व विवाह
की श्रेष्ठता।
४. भार्याधिकारिक चतुर्थ अधिकरण
प्रथम अध्याय १०६-११२
एकचारिणीवृत्तप्रकरण—सामंजस्य आवश्यक, घर की स्वच्छता और पूजाकार्य,
पंच महायज्ञ, आचार्य गोनर्दीय का मत, गुरुजन का सम्मान, गृहवाटिका की व्यवस्था, त्याज्य
स्त्रियाँ, भोजन की व्यवस्था, पति का स्वागत, पादप्रक्षालन, अलंकृत दिखे, पति के मान-
सम्मान का ध्यान, बहिर्गमन के लिये अनुमति, उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये अनुमति,
सोना और जागना, पाकशाला, पति के अपराध करने पर भी अकलुषित रहना, जादू-टोनों से
दूर, आचार्य गोनर्दीय का मत, वर्जित कृत्य, शरीरसंस्कार और शृंगार, समागम का वेश,
गोष्ठीविहार का वेश, व्रतोपवास, समयानुसार क्रय, उपयोगी सामग्री का संग्रह, गोपनीयता को
अक्षुण्ण रखना, समानता वाली स्त्रियों का अतिक्रमण, आय के अनुरूप ही व्यय, व्यवस्था-
विषयक निर्देश, वात्स्यायन द्वारा गृहिणियों के कार्य का सारसंक्षेप, पुरातन वस्त्रों का उपयोग,
पेय की व्यवस्था, पति के मित्रों से व्यवहार, सास-श्वसुर से व्यवहार, परिजनों के साथ
व्यवहार।