सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

विषयानुक्रमणिका १७
प्रवासचर्याप्रकरण—सात्त्विक जीवनयापन, गुरुजनों के समीप शयन, अनधिक
व्यय, अत्यावश्यक होने पर ही बहिर्गमन, उपवास एवं अर्थव्यवस्था, प्रोषितपतिका के रूप में
ही दर्शन, उपसंहार।
द्वितीय अध्याय ११२-१२०
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण—द्वितीय विवाह का कारण, परम्परा और मर्यादा, विदग्ध भार्या
का कर्तव्य, ज्येष्ठा का दायित्व, पतिविषयक प्रमाद पर उपेक्षा, वैशिष्ट्यप्रदर्शन, सन्तति, परिजन
और पुरजनों से प्रेम, कई सपत्नियों में द्वितीय से संसर्ग, कलह की योजना, पतिप्रिया की
निकृष्टतासिद्धि, कलहकारिणी को आश्वासन, कलहवर्धन, शान्ति-प्रयास।
कनिष्ठावृत्तप्रकरण—सब कुछ बता दे, रहस्योद्घाटन न करे, सन्तान पर प्राण
न्यौछावर, ऐकान्तिक उपचार, सपत्नी की अनिन्दा, पति से सम्मान, सम्मान का अकथन,
सम्मानकथन में दोष, आचार्य गोनर्दीय का मत, निःसन्तान पर अनुकम्पा।
पुनर्भूवृत्तप्रकरण—अक्षतयोनि पुनर्भू का लक्षण, पुनर्भू के गृहत्याग की रीति,
आचार्य गोनर्दीय का मत, आचार्य वात्स्यायन की व्यवस्था, उत्तम पुनर्भू की इच्छा, मध्यम और
अधम पुनर्भू की इच्छा, प्रीतिदाय, प्रेमोपहारों के अतिरिक्त सभी सम्पदा पर नायक का
अधिकार, स्वामिनीवत् रहे, धर्मपत्नी से व्यवहार, परिजनों एवं मित्रों से व्यवहार, कलह के
स्थान पर उपालम्भमात्र।
दुर्भगावृत्तप्रकरण—वैदग्ध्य आवश्यक, सन्तति का लालन-पालन, धार्मिक कृत्यों में
पुरश्चारिणी, परिजनों से विनम्र एवं शालीन व्यवहार, आभ्यन्तर व्यवहार, प्रेम की पुनः प्राप्ति का
प्रयास, उपालम्भ और विपरीतता से दूर, अनुकूल बनाने के साधन, दुर्भगता के कारणों पर
विचार।
आन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण—राजा का आचरण, मिलन की व्यवस्था, सम्भोग के लिये
निवेदन व्यवस्था, उत्सवों में सम्मान, आवागमन नियन्त्रित।
बहुपत्नीकप्रकरण—सामान्य व्यवहार, रतिक्रीड़ा का अन्यत्र उल्लेख नहीं, कलह का
अवसर न दे, तदनुरूप व्यवहार, अनुकूल वृत्ति से प्रसादन, अधिकरण के अनुष्ठान का फल।
५. पारदारिक पञ्चम अधिकरण
प्रथम अध्याय १२०-१२६
स्त्री-पुरुष शीलावस्थापनप्रकरण—प्रकरणशुद्धि का स्मरण, परकीयागमन से पूर्व
विचारणीय बातें, प्रमुखतम कारण, कामदशाएँ, कामदशाओं का क्रमशः वर्णन, स्त्रीस्वभाव की
विशेषता, हटने की प्रवृत्ति, प्रयत्न से सिद्धि, पुरुषस्वभाव, विचारशील की प्राप्ति असम्भव,
पुरुषस्वभाव की विचित्रता, सुलभ की अवमानना और दुर्लभ की आकांक्षा।
व्यावृत्तिकारणप्रकरण—पतिविषयक प्रेम, सन्तति की अपेक्षा, प्रौढावस्था का
काम० २