वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मकथ्य ९
धर्माविरुद्ध काम का सेवन करना चाहिये। जब ये तीनों ही पुरुषार्थ हैं, तो इनमें पौर्वापर्य की
भावना क्यों? यही भारतीय संस्कृति की उच्चता, उदात्तता और पावनता है कि वह धर्म के
विरुद्ध अर्थार्जन या कामसेवन की अनुमति नहीं देती। यद्यपि 'कामसूत्र' मुख्यतः कामतत्त्व
का ही प्रतिपादन करता है, लेकिन धर्म को प्रतिबन्ध के रूप में स्वीकारता है और उसके
विरुद्ध जाने—उच्छृंखल आचरण या निर्मर्याद कार्य करने—की अनुमति नहीं देता।
महर्षि वात्स्यायन सम्भोग का वास्तविक आनन्द स्त्री और पुरुष के सफल एवं
सानन्द मिलने में स्वीकारते हैं जिससे दोनों में परस्पर स्नेह एवं श्रद्धा का विकास हो।
रतिसुख सम्भोग का तात्कालिक उद्देश्य अवश्य है, लेकिन उसका दूरगामी प्रयोजन
जीवनसहचर के प्रति उच्च एवं उदात्त भाव, सात्त्विक भावों का विकास और सन्तानोत्पत्ति
ही है। सफल एवं सानन्द सम्भोग से ही स्त्री-पुरुष में परस्पर अन्तरङ्गता एवं आत्मीयता का
विकास होता है, नैतिकता उत्पन्न होती है जो पारस्परिक कलह, सम्बन्ध-विच्छेद, प्रच्छन्न
सम्बन्ध, अवैध सन्तति, वेश्यावृत्ति, परनारीगमन, अप्राकृतिक व्यभिचार आदि असंख्य
दोषों से गृहस्थ को बचाती है और उसकी गृहस्थी को स्वर्गोपम बनाती है।
वस्तुतः 'कामसूत्र' में महर्षि वात्स्यायन का उद्देश्य स्त्री एवं पुरुष की अनर्गल एवं
उच्छृङ्खल पाशविक प्रवृत्तियों को नियन्त्रित कर उनमें उच्चता, उदात्तता एवं पवित्रता की
भावना उत्पन्न करना एवं उन्हें सभ्य एवं संस्कृत नागरिक बनकर गृहस्थजीवन को सुखी एवं
सानन्द बनाते हुए विश्वकल्याण का मार्ग प्रशस्त करना ही है।
आदान-प्रदान :
महर्षि वात्स्यायन ने ग्रन्थ के अन्त में (७।२।५२।५६) स्पष्ट कर दिया है कि
उन्होंने पूर्ववर्ती शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन और उनके प्रयोगों का परीक्षण करके ही संक्षेप
में इस शास्त्र का निर्माण किया है। इस सन्दर्भ में उन्होंने आचार्य बाभ्रव्य का विशेष रूप से
उल्लेख किया गया है। ग्रन्थ के आन्तरिक परीक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने आचार्य
बाभ्रव्य और श्वेतकेतु के अखण्ड ग्रन्थों का ही नहीं, सुवर्णनाभ, चारायण, गोनर्दीय,
गोणिकापुत्र आदि आचार्यों के खण्डग्रन्थों का भी सम्यक् अध्ययन किया है और अनेक
स्थलों पर उनके मतों को उद्धृत किया है। आज ये पूर्ववर्ती ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते, जबकि
महर्षि वात्स्यायन का ग्रन्थ संसारभर में प्रख्यात है। इसका एक प्रमुख कारण कदाचित् यह
भी है कि महर्षि वात्स्यायन के संक्षिप्त एवं सारपूर्ण विश्लेषण के समक्ष ये पूर्ववर्ती ग्रन्थ
महत्त्वहीन हो गये हों।
महर्षि वात्स्यायन ने जहाँ पूर्ववर्ती ग्रंथों को महत्त्वहीन बना दिया, वहीं परवर्ती
परम्परा को भी प्रेरित एवं प्रभावित किया है। परवर्ती ग्रन्थों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
कोक्कोक रचित 'रतिरहस्य' जो 'कामसूत्र' के साम्प्रयोगिक, पारदारिक, भार्याधिकारिक
और औपनिषदिक—इन चार अधिकरणों को उपजीव्य बनाकर लिखा गया है। कोक्कोक ने
न केवल उपजीव्य में वात्स्यायन का सश्रद्ध स्मरण किया है, बल्कि उनके लिये प्रायः मुनि