वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्मकथ्य ७
आनुषंगिक रूप से यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि वेश्यावृत्ति भयंकर दुर्व्यसन है जिससे
अर्थ और शरीर, दोनों की हानि होती है। वास्तव में इस अधिकरण में एक अध्याय वैशिक
नायक के दिग्दर्शन के लिए भी होना चाहिए था, क्योंकि वैशिक नायक समाज का अंग है।
सप्तम एवं अन्तिम अधिकरण 'औपनिषदिक' है। इसमें दो अध्याय और छह
प्रकरण हैं। वस्तुतः यह 'कामसूत्र' का अंग न होकर, उसका परिशिष्ट मात्र है। इसके प्रारम्भ
में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि पूर्वकथित रीति से नायिका या सफल सम्भोग प्राप्त न
हो, तभी इस अधिकरण में बताये गये योगों का प्रयोग करना चाहिये।
इसमें रूपलावण्य को बढ़ाने के उपाय, वशीकरण और बाजीकरण के योग, नष्टराग
को पुनरुज्जीवित करने के उपाय, कृत्रिम साधन आदि के उपयोगों को बताया गया है, किन्तु
अन्त में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि अपवित्र एवं निन्दित योगों का प्रयोग नहीं करना
चाहिये।
'कामसूत्र' का रचनाकार :
परम्परा से प्रसिद्ध है कि मगधसम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री महामति चाणक्य ने
कौटिल्य नाम से 'अर्थशास्त्र', चाणक्य नाम से 'नीतिशास्त्र' और वात्स्यायन नाम से
'कामसूत्र' तथा न्यायभाष्य की रचना की। 'अर्थशास्त्र' के रचयिता कौटल्य चन्द्रगुप्त के
महामन्त्री चाणक्य ही हैं—यह 'अर्थशास्त्र' के निम्न श्लोक से स्पष्ट है—
"येन शस्त्रं च शास्त्रं च नन्दराजगता च भूः।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम्॥"
कामन्दकीय नीतिसार के निम्न श्लोकों से स्पष्ट है कि नीतिशास्त्र के रचयिता भी
अर्थशास्त्रकार से अभिन्न हैं—
"यस्याभिचारवज्रेण वज्रज्वलनतेजसः।
पपात मूलतः श्रीमान् सुपर्वानन्दपर्वतः॥
एकाकी मन्त्रशक्त्या यः शक्तः शक्तिधरोपमः।
आजहार नृचन्द्राय चन्द्रगुप्ताय मेदिनीम्॥
नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्रे महोदधेः।
य उद्धधे नमस्तस्यै विष्णुगुप्ताय वेधसे"॥
स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य और नीतिशास्त्र के रचयिता चाणक्य
परस्पर अभिन्न हैं, और मगध साम्राज्य के महामन्त्री चाणक्य ही हैं।
'अर्थशास्त्र' और 'कामसूत्र' की रचनाशैली में अत्यधिक साम्य है और कहना न
होगा कि कामसूत्रकार ने 'अर्थशास्त्र' की रचनापद्धति का पर्याप्त अनुकरण किया है। इस
साम्य को कई रूपों में देखा जा सकता है :