वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका १३
चतुर्थ अध्याय ४३-४७
नखरदनजातिप्रकरण—नखक्षत का स्वरूप, समय और स्नान, नखक्षतों के नाम,
नखक्षतों के स्थान, सुवर्णनाभ का मत, नखों का आश्रय और स्वरूप, नखों के प्रमाण,
गौड़वासियों के नख, दक्षिणात्यों के नख, महाराष्ट्रवासियों के नख, आच्छुरितक, अवस्थानुरूप,
अर्धचन्द्र और उसका स्नान, मण्डल, मण्डल के प्रयोग का स्थान, लेखा, व्याघ्रनख, मयूरपदक,
शशप्लुतक, उत्पलपत्रक, स्मरणीयक, भेद और कौशल की अनन्तता, वात्स्यायन का मत,
चौर्यरति में क्षतनिषेध, चिह्नों की प्रशंसा।
पञ्चम अध्याय ४७-५२
दशनच्छेद्यविधिप्रकरण—दन्तक्षत के प्रकरण, दाँतों के गुण, दाँतों के दोष, दन्तक्षत
के भेद, गूढ़क, उच्छूनक, गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु का स्थान, उच्छूनक और प्रवालमणि का
स्थान, प्रवालमणि, मणिमाला, बिन्दु, बिन्दुमाला, मणिमाला और बिन्दुमाला का स्थान, बिन्दु
का स्थान, खण्डाभ्रक, वराहचर्वितक, खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक का प्रयोग, साहित्य में
दन्तक्षत, सांक्रान्तिक आभियोगिक।
देशोपचारप्रकरण—मध्यदेश, बाहीक और अवन्ति, मालव और आभीर, सिन्ध और
पंजाब, अपरान्तक, स्त्रीराज्य और कोशल, आन्ध्र, महाराष्ट्र, मगध, द्रविड़, वनवासी देश, गौड़,
देशसात्म्य से प्रकृतिसाम्य की महत्ता, देशाचार की व्यापकता, कामोत्तेजक और विचित्र,
प्रणयकलह और रागवर्धन, एकान्त की चेष्टाएँ, प्रकाश की चेष्टाएँ।
षष्ठ अध्याय ५२-५८
संवेशनप्रकारप्रकरण—उच्च और उच्चतर रत में मृगी, नीच और नीचतर रत में
हस्तिनी, समरत की व्यवस्था, वडवा के लिये तदनुरूप व्यवस्था, शिश्नग्रहण की विधि,
अपद्रव्य का प्रयोग, मृगी के आसन, उत्फुल्लक, विजृम्भितक, इन्द्राणिक, नीच और नीचतर रत
की व्यवस्था, नीच और नीचतर रत के आसन, सम्पुटक, शयनविधि, पीड़ितक, वेष्टितक,
वाडवक, आचार्य सुवर्णनाभ द्वारा कथित आसन, भुग्नक, जृम्भितक, उत्पीड़ितक,
अर्धपीड़ितक, वेणुदारितक, शूलाचितक, कार्कटिक, पीड़ितक, पद्मासन, परावृत्तक,
जलसम्भोग
चित्ररतप्रकरण—स्थिररत, अवलम्बितक, धेनुक, अन्य पशुलीलाएँ, संघातकरत,
गोयूथिक, गोयूथिक, वारिक्रीड़ितक, छागल और ऐणेय, अनेक पुरुषों के साथ समागम वाले
देश, समागम रीति, अनेक पुरुषों का एक के साथ समागम, गुदामैथुन, चित्रवर्धन, चित्रों के
वर्धन का फल।
सप्तम अध्याय ५८-६२
प्रहणनसीत्कारप्रकरण—काम की वामता, प्रहणन के स्थान, चतुर्विध प्रहणन,
सीत्कार की सम्बद्धता, विरुत के आठ रूप, अन्य शब्द, पक्षियों की ध्वनि, मुष्टिप्रहार, नायिका