वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५५
अब आचार्य सुवर्णनाभ द्वारा कथित आसनों को बताते हैं ॥ २३ ॥
उभावप्यूरू ऊर्ध्वादिति तद् भुग्नकम् ॥ २४ ॥
भुग्नक—यदि स्त्री अपनी दोनों जाँघों को ऊपर उठा दे, तो इसे भुग्नक आसन
कहते हैं ॥ २४ ॥
चरणावूर्ध्वं नायकोऽस्या धारयेदिति जृम्भितकम् ॥ २५ ॥
जृम्भितक—जब नायक, नायिका के दोनों पैरों को कन्धे पर धारण कर लेता है तो उसे
जृम्भितक आसन कहते हैं ॥ २५ ॥
तत्कुञ्चितावुपीडितकम् ॥ २६ ॥
उत्पीडितक—यदि पुरुष स्त्री के पैरों को सिकोड़कर वक्ष पर धारण करे, तो इसे
उत्पीडितक आसन कहते हैं ॥ २६ ॥
तदेकस्मिन् प्रसारितेऽर्धपीडितकम् ॥ २७ ॥
अर्धपीडितक—यदि उत्पीडित आसन से समागम करते समय स्त्री एक पैर को सीधा
फैला दे, तो यह अर्धपीडितक करण कहलाता है ॥ २७ ॥
नायकस्यांस एको द्वितीयकः प्रसारित इति पुनः पुनर्व्यत्यासेन वेणुदा-
रितकम् ॥ २८ ॥
वेणुदारितक—जब स्त्री अदल-बदल कर अपना एक पैर पुरुष के कन्धे पर रखे, दूसरा
सीधा फैलाये तो यह वेणुदारितक करण कहलाता है ॥ २८ ॥
एकः शिरस उपरि गच्छेद् द्वितीयः प्रसारित इति शूलाचितकमाभ्यासि-
कम् ॥ २९ ॥
शूलाचितक—जब स्त्री एक पैर को पुरुष के सिर पर रखकर और दूसरे को फैलाकर
समागम करती है, तो यह शूलाचितक करण कहलाता है। यह करण भी अभ्यास से ही सिद्ध
होता है ॥ २९ ॥
संकुचितौ स्वस्तिदेशे निदध्यादिति कार्कटकम् ॥ ३० ॥
कार्कटक—जब पुरुष लेटी हुई स्त्री के पैरों को घुटनो से मोड़कर और अपने
नाभिस्थल पर लगाकर समागम करता है, तो इसे केकड़े के समान होने से कार्कटक आसन
कहते हैं ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वावूरू व्यत्यस्येदिति पीडितकम् ॥ ३१ ॥
पीडितक—यदि समागमकाल में स्त्री अपनी दाहिनी जाँघ को बायीं ओर ले जाये और
बाँयीं जाँघ को दाहिनी ओर, तो इसे पीड़ितक आसन कहते हैं ॥ ३१ ॥
जङ्घाव्यत्यासेन पद्मासनवत् ॥ ३२ ॥
पद्मासन—चित लेटी हुई स्त्री जब अपने बाँयें पैर को दाहिनी जाँघ की जड़ में और
दाहिने पैर को बाँयीं जाँघ की जड़ में रख ले, तो इसे पद्मासन कहा जाता है ॥ ३२ ॥
पृष्ठं परिष्वजमानायाः पराङ्मुखेण परावृत्तकमाभ्यासिकम् ॥ ३३ ॥
परावृत्तक—मुख के बल लेटी स्त्री के साथ पुरुष पीठ की ओर से समागम कर, तो इसे
५६ वात्स्यायन-कामसूत्र
परावृत्तक आसन कहते हैं। यह आभ्यासिक अर्थात् अभ्यास से सिद्ध होने वाला आसन
है॥ ३३॥
जले च संविष्टोपविष्टस्थितात्मकाँश्चात्रयोगानुपलक्षयेत्। तथा सुकरत्वादिति
सुवर्णनाभः॥ ३४॥
जलसंभोग— जल में भी खड़े होकर, बैठकर और लेटकर नानाविध आसनों से जैसे
समागम कर सके, करे। यह स्थल की अपेक्षा सरल भी है और मनोरंजक भी—ऐसा आचार्य
सुवर्णनाभ का मत है॥ ३४॥
वार्तं तु तत्। शिष्टैरपस्मृतत्वादिति वात्स्यायनः॥ ३५॥
जलसंभोग का निषेध—जल में समागम असार (अनुचित) है, क्योंकि शिष्ट व्यक्तियों
ने इसकी निन्दा की है—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है॥ ३५॥
अथ चित्ररतानि॥ ३६॥
चित्ररत-प्रकरण : अब चित्ररत समागम की अद्भुत विधियों को कहते हैं॥ ३६॥
ऊर्ध्वस्थितयोर्यूनोः परस्परापाश्रययोः कुड्यस्तम्भापाश्रितयोर्वा स्थित-
रतम्॥ ३७॥
पहले स्थितरत (खड़े होकर समागम) का विधान बताते हैं—जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे
के सहारे या दीवार अथवा स्तम्भ (खम्बा) के सहारे खड़े होकर समागम करते हैं, तो उसे
स्थितरत कहते हैं॥ ३७॥
कुड्यापाश्रितस्य कण्ठावसक्तबाहुपाशायास्तद्धस्तपञ्जरोपविष्टाया ऊरु-
पाशेन जघनमभिवेष्टयन्त्या कुड्ये चरणक्रमेण बलन्त्या अवलम्बितकं रतम्॥ ३८॥
अवलम्बितक—जब पुरुष दीवार के सहारे खड़ा हो, उसके कण्ठ में बाहुपाश डाले हुए
स्त्री उसके मिले हुए दोनों हाथों (हस्तपंजर) पर बैठी हुई हो, और अपनी जाँघों से पुरुष की
जाँघों को लपेटकर, दीवार पर पैर लगाकर, झूला झूलती हुई-सी समागम कर रही हो, तो वह
अवलम्बितक आसन कहलाता है॥ ३८॥
भूमौ वा चतुष्पदवदास्थिताया वृषलीलयावस्कन्दनं धेनुकम्॥ ३९॥
धेनुक—स्त्री हाथों और पैरों को भूमि पर टिकाकर पशु (गाय) के समान खड़ी हो जाये
और पुरुष साँड़ के समान उसके साथ समागम करे, तो यह धेनुक आसन होता है॥ ३९॥
तत्र पृष्ठमुरःकर्माणि लभते॥ ४०॥
धेनुक आसन में वक्ष पर सम्पन्न किये जाने वाले कार्य पीठ पर सम्पन्न किये जाते
हैं॥ ४०॥
एतेनैव योगेन शौनमैणेयं छागलं गर्दभाक्रान्तं मार्जारललितकं व्याघ्राव-
स्कन्दनं गजोपमर्दितं वराहघृष्टकं तुरगाधिरूढकमिति यत्र यत्र विशेषो योगोऽपूर्व-
स्तत्तदुपलक्षयेत्॥ ४१॥
अन्य पशुलीलाएँ—इसी प्रकार कुत्ता, हिरण, बकरा, गधा, बिलाव, व्याघ्र, हाथी, सूअर
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५७
और घोड़े का समागम समझना चाहिये, और इनके समागम में जो विशेषताएँ दिखें, उनका
अनुकरण करना चाहिये ॥ ४१ ॥
मिश्रीकृतसद्भावाभ्यां द्वाभ्यां सह सङ्घाटकं रतम् ॥ ४२ ॥
सङ्घाटकरत—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी दो स्त्रियों के साथ एक पुरुष
का समागम करना सङ्घाटकरत कहलाता है ॥ ४२ ॥
बह्वीभिश्च सह गोयूथिकम् ॥ ४३ ॥
गोयूथिक—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी अनेक स्त्रियों के साथ एक
पुरुष का समागम करना गोयूथिक नामक चित्ररत कहलाता है ॥ ४३ ॥
वारिक्रीडितकं छागलमैणेयमिति तत्कर्मानुकृतियोगात् ॥ ४४ ॥
वारिक्रीड़ितक, छागल और ऐणेय—जिस प्रकार हाथी अनेक हथिनियों के साथ
क्रीड़ा करता है, उसी प्रकार एक पुरुष जब अनेक स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करे, तो उसे
वारिक्रीड़ितक कहते हैं। बकरा, हिरण आदि की मैथुन-क्रीड़ाओं का अनुकरण करने से
गोयूथिक करण अनेक प्रकार से प्रयुक्त हो सकता है ॥ ४४ ॥
ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च बाह्लीके बहवो युवानोऽन्तःपुरसधर्माण
एकैकस्याः परिग्रहभूताः ॥ ४५ ॥
अनेक पुरुषों के साथ समागम वाले देश—ग्रामनारी (असम का पूर्वी भाग) स्त्रीराज्य
और बाह्लीक (बलख) देश में अन्तःपुरवासिनी स्त्रियाँ अपने भवनों में अनेक संरक्षित युवकों
को रखती हैं ॥ ४५ ॥
तेषामेकैकशो युगपच्च यथासात्म्यं यथायोगं च रञ्जयेयुः ॥ ४६ ॥
यदि एक स्त्री के साथ अनेक पुरुष समागम करना चाहें, तो एक एक कर, एक साथ,
जैसा वह स्त्री चाहे और जैसा अवसर हो, तदनुकूल ही उसे प्रसन्न करें ॥ ४६ ॥
एको धारयेदेनामन्यो निषेवेत। अन्यो जघनं मुखमन्यो मध्यमन्य इति वारं
वारेण व्यतिकरेण चानुतिष्ठेयुः ॥ ४७ ॥
अनेक पुरुषों का एक साथ समागम—एक युवक उस स्त्री को गोद में लेकर बैठे,
दूसरा युवक उसका मुख-चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि करे, तीसरा शिश्नप्रवेश कराये, और
चौथा कुचमर्दन आदि करे—इस प्रकार बारी-बारी से सभी पुरुष अपना कार्य और स्थान बदलते
चले जायें ॥ ४७ ॥
एतया गोष्ठीपरिग्रहा वेश्या राजयोषापरिग्रहाश्च व्याख्यातः ॥ ४८ ॥
इससे ही गोष्ठी में परिगृहीत वेश्या और रानियों के परिग्रह (रखैल पुरुषों) को भी कह
दिया गया है, अर्थात् गोष्ठी में अनेक पुरुष वेश्या के साथ और राजरानियाँ अपने पुरुष-रखैलों
के साथ, इसी प्रकार समागम करें ॥ ४८ ॥
अधोरतं पायावपि दाक्षिणात्यानाम्। इति चित्ररतानि ॥ ४९ ॥
दाक्षिणात्यों में गुदामैथुन भी प्रचलित है। (यह अधम मैथुन है, फलतः त्याज्य ही है)
इस प्रकार चित्ररत पूर्ण हुए ॥ ४९ ॥
५८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्तकानि पुरुषायिते वक्ष्यामः ॥ ५० ॥
समागम करने की रीति पुरुषायित (विपरीत रति) प्रकरण में कहेंगे ॥ ५० ॥
पशूनां मृगजातीनां पतङ्गानां च विभ्रमैः ।
तैस्तैरुपायैश्चित्तज्ञो रतियोगान्विवर्धयेत् ॥ ५१ ॥
चित्रवर्धन—चित्त को जानने वाला पुरुष पशुओं, मृगों और पक्षियों के कण्ठस्वर और
शारीरिक चेष्टाओं के जो जो प्रत्यक्ष उपाय दीखें, उनका प्रयोग समागम में करके उसके आकर्षण
और प्रेम को बढ़ाये ॥ ५१ ॥
तत्सात्म्याद्देशसात्म्याच्च तैस्तैर्भावैः प्रयोजितैः ।
स्त्रीणां स्नेहश्च रागश्च बहुमानश्च जायते ॥ ५२ ॥
चित्रों के वर्धन का फल—जो उपक्रियाएँ स्त्री की प्रकृति के अनुकूल हों, जो उस देश
में प्रचलित हों, उन्हीं के अनुरूप पशु-पक्षियों के कण्ठस्वर और शारीरिक चेष्टाओं का अनुकरण
करने वाले पुरुष पर स्त्रियाँ अत्यधिक अनुराग और स्नेह रखती हैं और उन्हें ही बहुमान
देती हैं ॥ ५२ ॥
संवेशनप्रकार एवं चित्ररतप्रकरण नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
●
सप्तम अध्याय
प्रहणन-सीत्कारप्रकरण
कलहरूपं सुरतमाचक्षते; विवादात्मकत्वाद्वामशीलत्वाच्च कामस्य ॥ १ ॥
काम की वामता—सुरत कलहरूप है, क्योंकि काम स्वभाव से ही विवादात्मक और
परतिकूल प्रकृति वाला है ॥ १ ॥
तस्मात् प्रहणनस्थानमङ्गम्। स्कन्धौ शिरः स्तनान्तरं पृष्ठं जघनं पार्श्व इति
स्थानानि ॥ २ ॥
प्रहणन के स्थान—अतएव प्रहणन सुरत का अङ्ग है, फलतः उसके स्थानों का उल्लेख
करते हैं। कन्धे, सिर, स्तनों के मध्य का स्थान, पीठ, जाँघें और पार्श्व—ये प्रहणन के स्थान हैं,
अर्थात् पुरुष को समागमकाल में स्त्री के इन स्थानों पर प्रहार करना चाहिये ॥ २ ॥
तच्चतुर्विधम्-अपहस्तकं प्रसृतकं मुष्टिः समतलकमिति ॥ ३ ॥
प्रहणन चार प्रकार का होता है—१. अपहस्तक (फैली हुई अङ्गुलियों वाली हथेली की
पीठ), २. प्रसृतक (हाथ की अँगलियों को सिकोड़कर, सर्प के फन के समान आकार),
३. मुष्टि (मुक्का या घूँसा) और ४. समतलक (हाथ को बराबर करके हथेली से प्रहार) ॥ ३ ॥
तदुद्भवं च सीत्कृतम्। तस्यार्त्तिरूपत्वात्। तदनेकविधम् ॥ ४ ॥
सीत्कार की सम्बद्धता—प्रहणन से ही सीत्कार उत्पन्न होता है, फलतः उसका कष्टरूप
होना स्वाभाविक ही है। यह सीत्कार कई प्रकार का होता है ॥ ४ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५९
विरुतानि चाष्टौ ॥ ५ ॥
विरुत के आठ रूप—प्रहारजन्य पीड़ाके कारण मुख से आठ प्रकार की ध्वनि
(चिल्लाहट) निकलती है ॥ ५ ॥
हिङ्कारस्तनितकूजितरुदितसूत्कृतदूत्कृतफूत्कृतानि ॥ ६ ॥
हिंकार, स्तनित, कूजित, रुदित, नदित, सूत्कृत, दूत्कृत और फूत्कृत—ये सात प्रकार के
अव्यक्त अक्षर हैं ॥ ६ ॥
अम्बार्थाः शब्दा वारणार्था मोक्षणार्थाश्चालमर्थास्ते ते चार्थयोगात् ॥ ७ ॥
अन्य शब्द—'अरी मैया', 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'हाय, मर
गयी' इत्यादि शब्द भी पीड़ा द्योतित करते हैं ॥ ७ ॥
पारावतपरभृतहारीतशुकमधुकरदात्यूहहंसकारण्डवलावकविरुतानि
सीत्कृत-भूयिष्ठानि विकल्पशः प्रयुञ्जीत ॥ ८ ॥
पक्षियों की ध्वनि—कबूतर, कोयल, हारीत (हरियल), तोता, भ्रमर, चातक, हंस,
कारण्डव (जलकुक्कुट) और लवा (बटेर) आदि पक्षियों के शब्द रूप अनेक सीत्कारों का
विकल्प से प्रयोग करे ॥ ८ ॥
उत्सङ्गोपविष्टायाः पृष्ठे मुष्टिना प्रहारः ॥ ९ ॥
मुष्टिप्रहार—गोद में बैठी हुई स्त्री की पीठ में मुक्का मारना चाहिये ॥ ९ ॥
तत्र सासूयाया इव स्तनितरुदितकूजितानि प्रतीघातश्च स्यात् ॥ १० ॥
नायिका के कार्य—मुक्का लगते ही नायिका असहनशील के समान स्तनित, कूजित
और रुदित करती हुई बदले में नायक पर प्रतिघात करे ॥ १० ॥
युक्तयन्त्रायाः स्तनान्तरेऽपहस्तकेन प्रहरेत् ॥ ११ ॥
अपहस्तक प्रहार—चित लेटकर समागम कराती हुई स्त्री के स्तनों के मध्य में हथेली के
पिछले भाग से प्रहार करना चाहिये ॥ ११ ॥
मन्दोपक्रमं वर्धमानरागमा परिसमाप्तेः ॥ १२ ॥
प्रारम्भ में हल्के हाथ से प्रहार करे और राग के बढ़ने के साथ प्रहारों में भी तेजी लानी
चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र हिङ्कारादीनामनियमेनाभ्यासेन विकल्पेन च तत्कालमेव प्रयोगः ॥ १३ ॥
सीत्कारों का उचित समय—हिंकार आदि सीत्कारों का अनियम से, अभ्यास से और
विकल्प से तत्काल ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १३ ॥
शिरसि किञ्चिदाकुञ्चिताङ्गुलिना करेण विवदन्त्याः फूत्कृत्य प्रहणनं
तत्प्रसृतकम् ॥ १४ ॥
प्रसृतक-प्रहार—विवाद करती हुई स्त्री के सिर में हाथ की अङ्गुलियों को सिकोड़-
कर (हाथ को सर्प के फन के समान फैलाकर) फूत्कार करके प्रहार करना प्रसृतक
कहलाता है ॥ १४ ॥
काम० ६ तत्रान्तर्मुखेन कूजितं फूत्कृतं च ॥ १५ ॥
६० वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका के कार्य—प्रसृतक का प्रयोग करने पर स्त्री को अन्तर्मुख से कूजित और
फूत्कार करना चाहिये ॥ १५ ॥
रतान्ते च श्वसितरुदिते ॥ १६ ॥
श्वसित और रुदित का समय—समागम के अन्त में श्वास बढ़ जाने को श्वसित और
रोने को रुदित (रोदन) कहते हैं ॥ १६ ॥
वेणोरिव स्फुटतः शब्दानुकरणं दूत्कृतम् ॥ १७ ॥
दूत्कृत—समागम करते समय बाँस की गाँठ फूटने जैसी चट-चट की ध्वनि होती है,
उसे दूत्कृत कहते हैं ॥ १७ ॥
अप्सु बदरस्येव निपततः ( शब्दानुकरणं ) फूत्कृतम् ॥ १८ ॥
फूत्कृत ( फूत्कार )—बेर के पानी में गिरते समय जो डुब्ब जैसी ध्वनि होती है,
समागम काल में होने वाली ऐसी ध्वनि को 'फूत्कृत' या 'फूत्कार' कहते हैं ॥ १८ ॥
सर्वत्र चुम्बनादिष्वपक्रान्तायाः ससीत्कृतं तेनैव प्रत्युत्तरम् ॥ १९ ॥
इनके उत्तर—जिस प्रकार चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत के उत्तर में स्त्री को भी उन्हीं
का प्रयोग करना चाहिये, उसी प्रकार पुरुष के प्रहणन पर स्त्री ने जैसे सीत्कार किये हों, स्त्री के
प्रहार करने पर पुरुष को भी वैसे ही सीत्कार करने चाहिये ॥ १९ ॥
रागवशात् प्रहणनाभ्यासे वारणमोक्षणालमर्थानां शब्दानाम्म्बार्थानां च
रतान्तश्वसितरुदितस्तनितमिश्रीकृतप्रयोगा विरुतानां च। रागावसानकाले जघन-
पार्श्वयोस्ताडनमित्यतित्वरया चापरिसमाप्तेः ॥ २० ॥
समतलक और परवर्ती कार्य—जब राग की अधिकता के कारण पुरुष बार-बार प्रहार
करे, तो स्त्री 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'अरी मैया' आदि शब्दों का
प्रयोग खिन्नता, श्वसित, रुदित और स्तनित के साथ करे, और विभिन्न पक्षियों की ध्वनि का
मिश्रित प्रयोग करे। स्खलनकाल निकट जानकर शीघ्रता से जघन और पार्श्वों में समतलक (हाथ
से वार) करना चाहिये—यह स्खलन से पूर्व ही होता है ॥ २० ॥
तत्र लावकहंसविकूजितं त्वरयैव। इति स्तननप्रहणनयोगाः ॥ २१ ॥
इसके सीत्कार—समतलक-प्रहार करने पर हंस और लवा (बटेर) आदि पक्षियों की
बोली का अनुकरण करना चाहिये। इस प्रकार स्तनन—प्रहणन सम्बन्धी प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ २१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
पारुष्यं रभसत्वं च पौरुषं तेज उच्यते।
अशक्तिरार्तिर्व्यावृत्तिर्बलत्वं च योषितः ॥ २२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक मिलते हैं—कठोरता, धृष्टता और साहस पुरुष के
सहज धर्म हैं और असमर्थता, पीड़ित होना, निराकरण करना और सुकुमारता स्त्री के; फलतः
पुरुष का स्वभाव प्रहणन के अनुकूल है और स्त्री का सीत्कार के ॥ २२ ॥
रागात् प्रयोगसात्म्याच्च व्यत्ययोऽपि क्वचिद् भवेत्।
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६१
न चिरं तस्य चैवान्ते प्रकृतेरेव योजनम् ॥ २३ ॥
स्त्री-पुरुष के ये धर्म सार्वत्रिक नहीं हैं। राग के चरम सीमा पर पहुँचने पर या देश, काल
और प्रकृति की अनुकूलता से उसकी विपरीतता भी देखी जाती है, अर्थात् इन स्थितियों में स्त्री
अपने सहज धर्म—सुकुमारता और सलज्जता—को छोड़कर और पुरुष-जैसा कठोर बनकर,
अपहस्तक आदि का वार कर सकती है, लेकिन यह विपरीतता अधिक समय तक नहीं चलती,
और अन्त में दोनों प्रकृतिस्थ हो जाते हैं ॥ २३ ॥
कीलामुरसि कर्तरीं शिरसि विद्धां कपोलयोः संदंशिकां स्तनयोः पार्श्वयोश्चेति
पूर्वैः सह प्रहणनमष्टविधमिति दाक्षिणात्यानाम्। तद्युवतीनामुरसि कीलानि च
तत्कृतानि दृश्यन्ते। देशसात्म्यमेतत् ॥ २४ ॥
दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहण—छाती में कीला, सिर में कर्तरी, कपोलों में विद्धा और
स्तनों एवं बगलों में संदंशिका—ये चार तथा पूर्वोक्त चार—अपहस्तक, प्रसृतक, मुष्टि और
समतलक—कुल आठ प्रकार के प्रहण दक्षिण देशवासियों में प्रचलित हैं। वहाँ की युवतियों
के वक्षःस्थल पर कीला और उसके कार्य देखे जाते हैं। यह देशाचारमात्र है, अतएव जहाँ
प्रचलित है, वहाँ के निवासियों के ही अनुकूल पड़ता है, सबके लिये नहीं ॥ २४ ॥
कष्टमनार्यवृत्तमनादृतमिति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
ये कष्टप्रद प्रहण आर्यवृत्त नहीं हैं, अतएव इसका आचरण नहीं करना चाहिये—ऐसा
महर्षि वात्सायन का मत है ॥ २५ ॥
तथान्यदपि देशसात्म्यात् प्रयुक्तमन्यत्र न प्रयुञ्जीत ॥ २६ ॥
घातक प्रहणों का सर्वथा निषेध—ऐसे प्रहण जिनमें विकलांगता या मृत्यु की
आशङ्का हो, देशाचारवश भी नहीं किये जाने चाहिये ॥ २७ ॥
रतियोगे हि कीलया गणिकां चित्रसेनां चोलराजो जघान ॥ २८ ॥
घातक प्रहारों के दुष्परिणाम—चोलराज ने समागमकाल में कीला से सुकुमार
नायिका चित्रसेना को मार डाला था ॥ २८ ॥
कर्तर्या कुन्तलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीम् ॥ २९ ॥
कुन्तलनरेश शतकर्ण के पुत्र शातवाहन (सातवाहन या शालिवाहन) ने कर्तरी के घातक
प्रयोग से महादेवी मलयवती को मार डाला था ॥ २९ ॥
नरदेवः कुपाणिर्विद्धया दुष्प्रयुक्तया नटीं काणां चकार ॥ ३० ॥
पाण्ड्य देश के सेनापति नरदेव ने अपने कठोर हाथ से विद्धा का प्रयोग कर चित्रलेखा
नामक नर्तकी को काणी बना दिया था ॥ ३० ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
नास्त्यत्र गणना काचिन्न च शास्त्रपरिग्रहः ।
प्रवृत्ते रतिसंयोगे राग एवात्र कारणम् ॥ ३१ ॥
घातक प्रहारों का कारण : कामातिरेक—जब पुरुष कामान्ध होकर समागम में प्रवृत्त
होता है, तब वह न तो परवर्ती दुष्परिणामों की चिन्ता करता है और न शास्त्र के बन्धनों का
६२ वात्स्यायन-कामसूत्र
विचार करता है। अतएव दुष्परिणामों का एकमात्र कारण उसका राग (कामातिरेक) ही
है॥ ३१॥
स्वप्नेष्वपि न दृश्यन्ते ते भावास्ते च विभ्रमाः।
सुरतव्यवहारेषु ये स्युस्तत्क्षणकल्पिताः ॥ ३२ ॥
समागमकाल में मनुष्य के मन और मस्तिष्क में जो जो भाव और विभ्रम उत्पन्न होते हैं,
वे न तो स्वप्न में सोचे जा सकते हैं और न शास्त्र में ही कहे गये होते हैं॥ ३२॥
यथा हि पञ्चमीं धारामास्थाय तुरगः पथि।
स्थाणुं श्वभ्रं दरीं वापि वेगान्धो न समीक्षते ॥
एवं सुरतसम्मर्दे रागान्धौ कामिनावपि।
चण्डवेगौ प्रवर्तेते समीक्षेते न चात्ययम् ॥ ३३ ॥
कामान्धता पर एक दृष्टान्त—जिस प्रकार पाँचवी धारागति (जव) में दौड़ता हुआ
वेगान्ध अश्व मार्ग के स्तम्भ, गर्त (गड्ढे), खन्दक आदि को नहीं देख पाता, और विनाश को प्राप्त
होता है; इसी प्रकार कामान्ध स्त्री-पुरुष चण्डवेग से सम्भोग करते हुए सुरतसम्मर्दों (नखक्षत,
दन्तक्षत, कुचमर्दन, प्रहणन आदि) के दुष्परिणामों को नहीं सोच पाते, और विनाश (अङ्गभङ्ग
या मृत्यु) को प्राप्त होते हैं॥ ३३॥
तस्मान्मृदुत्वं चण्डत्वं युवत्या बलमेव च।
आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा तथा युञ्जीत शास्त्रवित् ॥ ३४ ॥
अतएव कामतत्त्वविद् को स्त्री की सुकुमारता एवं सहनशक्ति और काम की प्रचण्डता को
विचार कर तथा अपनी शारीरिक शक्ति का अनुमान करके ही समागम में प्रवृत्त होना
चाहिये ॥ ३४ ॥
न सर्वदा न सर्वासु प्रयोगाः सांप्रयोगिकाः ।
स्थाने देशे च काले च योग एषां विधीयते ॥ ३५ ॥
समागमकाल में जो प्रयोग अब तक बताये गये हैं, उनका प्रयोग न सदा होता है और न
सभी स्त्रियों पर; अपितु स्थान एवं देशकाल के अनुरूप ही इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ३५॥
प्रहणनप्रयोग एवं सीत्कार वर्णन नामक सप्तम अध्याय सम्पन्न ॥
●
अष्टम अध्याय
पुरुषायितप्रकरण
नायकस्य सन्तताभ्यासात् परिश्रममुपलभ्य रागस्य चानुपशमम्, अनुमता तेन
तमधोऽवपात्य पुरुषायितेन साहाय्यं दद्यात् ॥ १ ॥
विपरीत रति के कारण—निरन्तर मैथुन करते हुए जब पुरुष शिथिल हो जाये, किन्तु
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६३
रमणेच्छा शान्त न हो, तो पुरुष की अनुमति से स्त्री उसके ऊपर आकर, विपरीत रति द्वारा, उसे
मैथुन में सहायता प्रदान करे॥ १॥
स्वाभिप्रायाद्वा विकल्पयोजनार्थिनी ॥ २ ॥
अथवा अपनी रमणेच्छा को सरलता और शीघ्रता से शान्त करने के लिये भी स्त्री विपरीत
रति कर सकती है ॥ २ ॥
नायककुतूहलाद्वा ॥ ३ ॥
प्रिय के विनोद एवं कुतूहल के लिये भी स्त्री विपरीत रति कर सकती है ॥ ३ ॥
तत्र युक्तयन्त्रेणैवेतरेणोत्थाप्यमाना तमधः पातयेत्। एवं च रतमविच्छिन्नरसं
तथा प्रवृत्तमेव स्यात्। इत्येकोऽयं मार्गः ॥ ४ ॥
विपरीत रति : प्रथम रीति—समागम करते हुए पुरुष यन्त्र किये हुए ही स्त्री को
बाहुपाश में भरकर ऊपर ले आये और स्त्री भी उसे नीचे करके स्वयं समागम करने लगे। ऐसा
करने से समागम के सुख में कोई अन्तर नहीं आता, अर्थात् उसका नैरन्तर्य बना रहता है—यह
विपरीत रति की प्रथम रीति है ॥ ४ ॥
पुनरारम्भेणादित एवोपक्रमेत्। इति द्वितीयः ॥ ५ ॥
द्वितीय रीति—यदि समागम को पुनः आरम्भ किया जाये, तो स्त्री प्रारम्भ से ही विपरीत
रति करे। यह विपरीत रति की दूसरी रीति है ॥ ५ ॥
सा प्रकीर्यमाणकेशकुसुमा श्वासविच्छिन्नहासिनी वक्त्रसंसर्गार्थं स्तनाभ्यामुरः
पीडयन्ती पुनः-पुनः शिरो नामयन्ती याश्चेष्टाः पूर्वमसौ दर्शितवांस्ता एव
प्रतिकुर्वीत। पातिता प्रतिपातयामीति हसन्ती तर्जयन्ती प्रतिघ्नती ब्रूयात्। पुनश्च
व्रीडां दर्शयेत्। श्रमं विरामाभीप्सां च। पुरुषोपसृमैरेवोपसर्पेत्॥ ६ ॥
बाह्य विपरीतरति—जब स्त्री विपरीत रति करती है, तो उसके केशपाश के बिखर जाने
से उनमें गूँथे हुए फूल बिखर जाते हैं, हँसने पर भी उसकी साँस फूलती है और उसकी हँसी
बाधित हो जाती है, पति के मुख का चुम्बन करने के लिए अपना मुख झुकाती हुई स्तनों से
उसके वक्षःस्थल को बार बार दबाती है, जो जो चेष्टाएँ (चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि) पुरुष
ने समागम के समय की थीं, उन सभी को वह करती है; इतना ही नहीं, हँसती है और पुरुष को
डराती है तथा विजेता की भाँति बोलती है—'पहले तुमने मुझे गिराकर समागम किया था। अब
मैं तुम्हें गिराकर समागम करूँगी।' रमणेच्छा शान्त हो जाने पर लज्जा, थकान दिखाये। तदुपरान्त
पुरुष के समान ही उपसर्पण करे, अर्थात् पुरुष जिस प्रकार स्त्री पर प्रेम प्रकट करता है, उसी
प्रकार स्त्री भी पुरुष पर प्रेम प्रकट करे ॥ ६ ॥
तानि च वक्ष्यामः ॥ ७ ॥
अब पुरुषों के उन उपसर्पणों को कहते हैं जिन्हें स्त्री पुरुषायित (विपरीत रति) में प्रयोग
करती है ॥ ७ ॥
पुरुषः शयनस्थाया योषितस्तद्वचनव्याक्षिप्तचित्ताया इव नीर्वी विश्लेषयेत्।
तत्र विवदमानां कपोलचुम्बनेन पर्याकुलयेत् ॥ ८ ॥
वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्त के भेद—शय्या पर बैठी हुई स्त्री को बातों में लगाकर पुरुष उसका नाड़ा
खोल दे। यदि स्त्री ना करे, तो उसके कपोलों का चुम्बन करता हुआ, उसे समागम के लिये
व्याकुल बना दे जिससे वह ना ही न कर सके ॥ ८ ॥
स्थिरलिङ्गश्च तत्र तत्रैनां परिस्पृशेत् ॥ ९ ॥
यदि पुरुष का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो स्त्री को कामोद्रिक्त करने के लिये उसके
कामाङ्गों (स्तन, काँख आदि) को धीरे धीरे सहलाये ॥ ९ ॥
प्रथमसङ्गता चेत्संहतोर्वोरन्तरे घट्टनम् ॥ १० ॥
यदि स्त्री का प्रथम समागम हो, और उसने दोनों जाँघें दृढ़तापूर्वक मिला रखी हों, तो
पुरुष को उसकी जाँघों को सहलाते हुए अलग अलग करना चाहिये ॥ १० ॥
कन्यायाश्च ॥ ११ ॥
यदि अक्षतयोनि से समागम करना हो, तो भी इसी प्रकार व्यवहार करना
चाहिये ॥ ११ ॥
तथा स्तनयोः संहतयोर्हस्तयोः कक्षयोरंसयोर्ग्रीवायामिति च ॥ १२ ॥
इसी प्रकार हाथों से ढँके हुए स्त्री के स्तनों, काँखों, कन्धों और ग्रीवा में भी हाथ चलाना
चाहिये ॥ १२ ॥
स्वैरिण्यां यथासात्म्यं यथायोगं च। अलके चुम्बनार्थमेनां निर्दयमवलम्बेत
हनुदेशे चाङ्गुलिसम्पुटेन ॥ १३ ॥
स्वैरिणी (व्यभिचारिणी) स्त्रियों में तो जैसा उसके अनुकूल पड़े और जैसा सम्भव हो,
वैसा ही आचरण करे। मुखचुम्बन के लिये उसके केशपाश को निर्दयतापूर्वक पकड़े और
उसकी ठोड़ी को अङ्गुलियों के मध्य ले ले ॥ १३ ॥
तत्रेतरस्या व्रीडा निमीलनं च। प्रथमसमागमे कन्यायाश्च ॥ १४॥
जो भी स्त्री पुरुष से प्रथम बार मिलती है, वह लज्जावश आँखें बन्द कर लेती है। प्रथम
समागम में अक्षतयोनि कन्या की भी यही स्थिति होती है ॥ १४॥
रतिसंयोगे चैनां कथमनुरञ्जयत इति प्रवृत्त्या परीक्षेत ॥ १५ ॥
आभ्यन्तर पुरुषोपसृप्त कहते हैं—समागम में स्त्री को कैसे अनुरक्त किया जा सकता
है, यह अनुमान बाह्य पुरुषोपसृप्त में उसकी चेष्टाएँ देखकर ही कर लेना चाहिये ॥ १५ ॥
युक्तयन्त्रेणोपसृप्यमाणा यतो दृष्टिमावर्तयेत्तत एवैनां पीडयेत्। एतद्रहस्यं
युवतीनामिति सुवर्णनाभः ॥ १६ ॥
चेष्टा से पहचान—यन्त्रयोग होने पर मदनमन्दिर के जिस जिस ओर शिश्नसंचालन से
स्त्री आनन्दविह्वल होकर दृष्टि घुमाने लगे, उसी-उसी ओर लक्ष्य करके पुरुष को प्रहार करना
चाहिये। नारीजीवन का यह गहन रहस्य है—ऐसा आचार्य सुवर्णनाभ का मत है ॥ १६ ॥
गात्राणां स्रंसनं नेत्रनिमीलनं व्रीडानाशः समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां
भावलक्षणम् ॥ १७ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६५
राग की विभिन्न अवस्थाएँ— जिसके साथ शिश्नसञ्चालन हो रहा है, उसके भाव की
तीन अवस्थाएँ होती हैं—प्राप्त, प्रत्यासन्न और प्रज्वलित। इन तीनों का लक्षण कहते हैं—शरीर
का शिथिल होना, नेत्रों का बन्द कर लेना, लज्जा का नाश और मदनमन्दिर को शिश्न से सटाये
रखना—ये स्त्रियों के भाव-प्राप्ति के लक्षण हैं ॥ १७॥
हस्तौ विधुनोति स्विद्यति दशन्युत्थातुं न ददाति पादेनाहन्ति रतावसाने च
पुरुषातिवर्तिनी ॥ १८ ॥
प्रज्वलित हुए (भभकते हुए) भाव का लक्षण—समागम के अन्त में स्त्री हाथों को
कँपाती हैं, पसीने से भींग जाती हैं, पुरुष को दाँतों से काटती है, पुरुष को समागम से विरत नहीं
होने देती, अर्थात् उठने नहीं देती, उसे लातें लगाती और पुरुष का भी अतिक्रमण कर जाती है
अर्थात् ये लक्षण इस बात के सूचक हैं कि स्त्री का काम अभी शान्त नहीं हुआ है, और वह
प्रज्वलित (भभक रहा) है ॥ १८ ॥
तस्याः प्राग्यन्त्रयोगात् करेण संबाधं गज इव क्षोभयेत्। आ मृदुभावात्। ततो
यन्त्रयोजनम् ॥ १९॥
करिकर का प्रयोग—स्त्री को शीघ्र स्खलित करने के लिए, समागम से पूर्व उसके
मदनमन्दिर को हाथ से हाथी के सूँड़ के समान क्षोभित करे और जब वह रससिक्त हो जाये तभी
शिश्नप्रवेश कराये ॥ १९॥
उपसृप्तकं मन्थनं हुलोऽवमर्दनं पीडितकं निर्घातो वराहघातो वृषाघातश्चटक-
विलसितं सम्पुट इति पुरुषोपसृप्तानि ॥ २० ॥
उपसृप्तों के प्रकार—उपसृप्तक, मन्थन, हुल, अवमर्दन, पीड़ितक, निर्घात, वराहघात,
वृषाघात, चटकविलसित और सम्पुट—ये दश पुरुषोपसृप्त हैं ॥ २० ॥
न्याय्यमृजुसम्मिश्रणमुपसृप्तकम् ॥ २१ ॥
उपसृप्तक—शिश्न को सीधी रीति से मदनमन्दिर से मिलाना उपसृप्तक है। सुकुमार और
अहानिकर होने से यही रीति शिष्टजनसम्मत (न्याय्य) है ॥ २१ ॥
हस्तेन लिङ्गं सर्वतो भ्रामयेदिति मन्थनम् ॥ २२ ॥
मन्थन—पुरुष शिश्न को हाथ से पकड़कर मदनमन्दिर में चारों ओर घुमावे, तो इसे
मन्थन कहते हैं ॥ २२ ॥
नीचीकृत्य जघनमुपरिष्टाद् घट्टयेदिति हुलः ॥ २३ ॥
हुल—स्त्री की जाँघों को नीचा करके मदनमन्दिर के अन्दर शिश्न को झटके से डालना
'हुल' कहलाता है ॥ २३ ॥
तदेव विपरीतं सरभसमवमर्दनम् ॥ २४ ॥
अवमर्दन—स्त्री की जाँघों को ऊँचा करके (नितम्बों के नीचे तकिया लगाकर)
मदनमन्दिर के अन्दर वेगपूर्वक शिश्न-प्रवेश को अवमर्दन कहते हैं ॥ २४ ॥
लिङ्गेन समाहत्य पीडयाँश्चिरमवतिष्ठेतेति पीडितकम् ॥ २५ ॥
६६ वात्स्यायन-कामसूत्र
पीडितक—शिश्न से भली प्रकार प्रहार करता हुआ देर तक स्त्री को दबाये रहे, तो इसे
पीड़ितक कहते हैं ॥ २५ ॥
सुदूरमुत्कृष्य वेगेन स्वजघनमवपातयेदिति निर्घातः ॥ २६ ॥
निर्घात—प्रविष्ट कराये हुए शिश्न को पूरा बाहर निकालकर स्त्री की जाँघों पर अपनी
जाँघों को बलपूर्वक गिराना निर्घात कहलाता है ॥ २६ ॥
एकत एव भूयिष्ठमवलिखेदिति वराहघातः ॥ २७ ॥
वराहघात—मदनमन्दिर में एक ओर ही शिश्नप्रहार करने को 'वराहघात'
कहते हैं ॥ २७ ॥
स एवोभयतः पर्यायेण वृषाघातः ॥ २८ ॥
वृषाघात—जब मदनमन्दिर के दोनों पार्श्वों में क्रम से प्रहार किया जाये, तो उसे वृषाघात
कहते हैं ॥ २८ ॥
सकृन्मिश्रितमनिष्क्रमय्य द्वित्रिश्चतुरिति घट्टयेदिति चटकविलसितम् ॥ २९ ॥
चटकविलसित—प्रविष्ट शिश्न को बाहर न निकालकर, नरगौरैया (चिड़े) के समान
दो तीन-चार बार प्रहार करने को चटकविलसित कहते हैं ॥ २९ ॥
रागावसानिकं व्याख्यातं करणं सम्पुटमिति ॥ ३० ॥
सम्पुट—स्खलन के समय सम्पुट होता है। इस करण को पहले ही कहा जा
चुका है ॥ ३० ॥
तेषां स्त्रीसात्म्याद् विकल्पेन प्रयोगः ॥ ३१ ॥
प्रयोग की रीति—इन पुरुषोपसृतों का स्त्री की प्रकृति और प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर,
विकल्प से, प्रयोग करना चाहिये ॥ ३१ ॥
पुरुषायिते तु सन्दंशो भ्रमरकः प्रेङ्खोलितमित्यधिकानि ॥ ३२ ॥
पुरुषायित (विपरीत रति) में संदंश, भ्रमरक और प्रेङ्खोलित— ये तीन उपसृत
अधिक हैं ॥ ३२ ॥
वाडवेन लिङ्गमवगृह्य निष्कर्षन्त्याः पीडयन्त्या वा चिरावस्थानं
सन्दंशः ॥ ३३ ॥
सन्दंश—स्त्री, पुरुष के शिश्न को मदनमन्दिर में डालकर घोड़ी के समान देर तक भीतर
खींचती या दबाती रहे तो उसे संदंश कहते हैं ॥ ३३ ॥
युक्तयन्त्रा चक्रवद् भ्रमेदिति भ्रमरक आभ्यासिकः ॥ ३४ ॥
भ्रमरक—यन्त्रयोग किये हुए स्त्री चाक की तरह घूमे, यह भ्रमरक कहलाता है। यह
अभ्यास से ही हो सकता है ॥ ३४ ॥
तत्रेतरः स्वजघनमुत्क्षिपेत् ॥ ३५ ॥
नायक का कार्य—भ्रमरक उपसृत में नायक को अपनी जाँघें ऊपर उठा लेनी
चाहिये ॥ ३५ ॥
जघनमेव दोलायमानं सर्वतो भ्रामयेदिति प्रेङ्खोलिखितकम् ॥ ३६ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६७
प्रेङ्खोलिखितक—झूले के समान हिलती हुई जांघों को चारों ओर घुमाना
'प्रेङ्खोलिखितक' कहलाता है।
युक्तयन्त्रैव ललाटे ललाटं निधाय विश्राम्येत ॥ ३७ ॥
विश्रामविधि—थक जाने पर स्त्री यन्त्रयोग किये हुए ही पुरुष के मस्तक पर अपना
मस्तक रखकर विश्राम कर ले ॥ ३७ ॥
विश्रान्तायां च पुरुषस्य पुनरावर्तनम् । इति पुरुषायितानि ॥ ३८ ॥
पुरुष के ऊपर आने का समय—यदि स्त्री की तृप्ति न हुई हो, तो थक जाने पर स्त्री
नीचे आ जाये और पुरुष ऊपर आकर समागम करे। विपरीत रति का प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका:—
प्रच्छादितस्वभावापि गूढाकारापि कामिनी।
विवृणोत्येव भावं स्वं रागादुपरिवर्तिनी ॥ ३९ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक हैं—जो कामिनी शील और सङ्कोच के कारण अपने
भावों को छिपाये रखती है, वह भी कामातुरा होकर विपरीत रति में अपने वास्तविक स्वरूप को
प्रकट कर देती है ॥ ३९ ॥
यथाशीला भवेन्नारी यथा च रतिलालसा।
तस्या एव विचेष्टाभिस्तत्सर्वमुपलक्षयेत् ॥ ४० ॥
जिस स्त्री का जैसा शील और जैसी रतिलालसा—कामवासना—हो, विपरीत रति की
चेष्टाओं से पति को वह सब जान लेना चाहिये, जिससे बाद में तदनुकूल व्यवहार किया जा
सके ॥ ४० ॥
न त्वेवतौं न प्रसूतां न मृगीं न च गर्भिणीम्।
न चातिव्यायतां नारीं योजयेत् पुरुषायिते ॥ ४१ ॥
विपरीत रति के अनुपयुक्त पात्र—रजस्वला, प्रसूता, मृगी, गर्भवती और मोटी स्त्री को
विपरीत रति में नियुक्त नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥
पुरुषायितप्रकरण नामक अष्टम अध्याय सम्पन्न ॥
नवम अध्याय
औपरिष्टकप्रकरण
द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणी च ॥ १ ॥
नपुंसक के भेद—नपुंसक दो प्रकार के होते हैं—एक स्त्रीरूपधारी, और दूसरा
पुरुषरूपधारी ॥ १ ॥
६८ वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्र स्त्रीरूपिणी स्त्रिया वेषमालापं लीलां भावं मृदुत्वं भीरुत्वं
मुग्धतामसहिष्णुतां व्रीडां चानुकुर्वीत ॥ २ ॥
स्त्रीरूपधारी नपुंसक—इनमें जो स्त्रीरूपधारी नपुंसक (हिजड़ी) है, उसे स्त्रियों की
वेषभूषा, बोलचाल, लीला, भाव, मृदुता, भीरुता, मुग्धता, असहिष्णुता और सलज्जता का
अनुकरण करना चाहिये ॥ २ ॥
तस्या वदने जघनकर्म। तदौपरिष्टकमाचक्षते ॥ ३ ॥
नपुंसक के मुख में जो मैथुनकर्म किया जाता है, उसे ही औपरिष्टक कहते हैं ॥ ३ ॥
सा ततो रतिमाभिमानिकीं वृत्तिं च लिप्सेत् ॥ ४ ॥
औपरिष्टक का फल—ऐसी हिजड़ी आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि उपक्रियाओं
से आभिमानिकी (सङ्कल्पमात्र से होने वाली) रति का सुख प्राप्त करें, और औपरिष्टक कर्म द्वारा
अपनी जीविका भी चलाये, अर्थात् आलिङ्गन आदि उसकी सुखानुभूति के साधन हैं और
औपरिष्टक कर्म जीविका का साधन है ॥ ४ ॥
वेश्यावच्चरितं प्रकाशयेत्। इति स्त्रीरूपिणी ॥ ५ ॥
चरित—इसे वेश्या के समान ही आचरण करना चाहिये। स्त्रीरूपधारी नपुंसक
(हिजड़ी) का प्रसङ्ग पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
पुरुषरूपिणी तु प्रच्छन्नकामा पुरुषं लिप्समाना संवाहकभावमुपजीवेत् ॥ ६ ॥
पुरुषरूपधारी नपुंसक—पुरुषरूपधारी (हिजड़ा) पुरुष जैसी आकृति होने के कारण
अपनी कामनाओं को छिपाये रखता है, किन्तु रति के लिये चाहता पुरुष को ही है, अतएव उसे
मर्दन और संवाहन (मालिश और हाथ-पैर दबाना) का कार्य करना चाहिये ॥ ६ ॥
संवाहने परिष्वजमानेव गात्रैरूरू नायकस्य मृद्नीयात् ॥ ७ ॥
संवाहन कर्म में अपने शरीर से लगाते हुए ही नायक की जाँघें दबानी चाहिये ॥ ७ ॥
प्रसृतपरिचया चोरुमूलं सजघनमिति संस्पृशेत् ॥ ८ ॥
धीरे धीरे जब परिचय बढ़ जाये, तो नायक की जाँघों और उसकी सन्धियों को भी दबाना
और मसलना चाहिये ॥ ८ ॥
तत्र स्थिरलिङ्गतामुपलभ्य चास्य पाणिमन्थेन परिघट्टयेत्। चापलमस्य
कुत्सयन्तीव हसेत् ॥ ९ ॥
इस प्रकार मर्दन और संवाहन से यदि नायक का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो उसे
हस्तक्रिया द्वारा इधर उधर करे और उसकी चपलता का उपालम्भ देता (निन्दा करता) हुआ
हँसे ॥ ९ ॥
कृतलक्षणेनाप्युपलब्धवैकृतेनापि न चोद्यत इति चेत् स्वयमुपक्रमेत् ॥ १० ॥
जिसे इस प्रकार कामोद्रिक्त कर दिया गया है, और जो नपुंसक (हिजड़ा) के विषय में
यह जान गया है कि यह मुखमैथुन कराता है, यदि तब भी वह शिश्न को मुख में लेने की बात
न कहे, तो नपुंसक को स्वयं ही अग्रसर होना चाहिये, अर्थात् उसका शिश्न मुख में लेकर
औपरिष्टक कर्म प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १० ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६९
पुरुषेण च चोद्यमाना विवदेत्। कृच्छ्रेण चाभ्युपगच्छेत्॥ ११॥
यदि नायक पहले ही नपुंसक से मुखमैथुन के लिए कहे, तो नपुंसक को उससे विवाद
करना चाहिये और बहुत कठिनाई से मुखमैथुन कराये॥ ११॥
तत्र कर्माष्टविधं समुच्चयप्रयोज्यम्॥ १२॥
औपरिष्टक के भेद—क्रिया के भेद से औपरिष्टक के भी कई भेद हो जाते हैं। उन्हें
बताते हैं—यह औपरिष्टक कर्म आठ प्रकार का है। इनका क्रमशः प्रयोग करना चाहिये॥ १२॥
निमितं पार्श्वतोदष्टं बहिःसंदंशोऽन्तःसंदंशश्चुम्बितकं परिमृष्टकमाग्रचूषितकं
सङ्गर इति॥ १३॥
निमित, पार्श्वतोदष्ट, बहिसन्दंश, अन्तःसन्दंश, चुम्बितक, परिमृष्टक, चूषितक और
सङ्गर—औपरिष्टक की ये आठ क्रियाएँ हैं॥ १३॥
तेष्वेकैकमभ्युपगम्य विरामाभीप्सां दर्शयेत्॥ १४॥
नपुंसक इन आठ क्रियाओं में से क्रमशः एक एक को करता हुआ निवृत्त होने की इच्छा
करे, जिससे नायक चकित होकर अनुनय विनय करे॥ १४॥
इतरश्च पूर्वस्मिन्नभ्युपगते तदुत्तरमेवापरं निर्दिशेत्। तस्मिन्नपि सिद्धे
तदुत्तरमिति॥ १५॥
नायक को चाहिये कि एक क्रिया के पूर्ण होने पर दूसरी को करने के लिये कहे, और
उसके पूर्ण होने पर तीसरी को करने के लिए कहे॥ १५॥
करावलम्बितमोष्ठयोरुपरि विन्यस्तमपविध्य मुखं विधुनुयात्। तन्निमि-
तम्॥ १६॥
निमित—ओष्ठों को गोल-गोल बनाकर, हाथ में लिये हुए शिश्न को उस पर रख ले,
और मुख हिलाये—इसे निमित कहते हैं॥ १६॥
हस्तेनाग्रमवच्छाद्य पार्श्वतो निर्दशनमोष्ठाभ्यामवपीड्य भवत्वेतावदिति
सान्त्वयेत्। तत्पार्श्वतोदष्टम्॥ १७॥
पार्श्वतोदष्ट—शिश्न के अग्रभाग को हाथ से ढककर, पार्श्व में दाँत न लगाकर, केवल
ओष्ठों से दबाकर यह कह दे कि अब इतना ही करना है, तो उसे पार्श्वतोदष्ट कहते हैं॥ १७॥
भूयश्चोदिता सम्मीलितौष्ठी तस्याग्रं निष्पीड्य कर्षयन्तीव चुम्बेत्। इति
बहिःसंदंशः॥ १८॥
बहिःसन्दंश—यदि नायक फिर भी करने का आग्रह करे, तो उसके शिश्न के अग्रभाग
को मुख में लेकर, दोनों ओष्ठों से दबाकर खींचता हुआ सा चूमे—इसे बहिःसन्दंश कहते
हैं॥ १८॥
तस्मिन्नेवाभ्यर्थनया किञ्चिदधिकं प्रवेशयेत्। सापि चाग्रमोष्ठाभ्यां निष्पीड्य
निष्ठीवेत्। इत्यन्तःसंदंशः॥ १९॥
अन्तःसन्दंश—नायक के पुनः आग्रह करने पर शिश्न का कुछ अधिक भाग मुख में ले
७० वात्स्यायन-कामसूत्र
ले, और उसके अग्रभाग को ओष्ठों से कुछ दबाकर उगल दे—यह 'अन्तःसंदंश' कहलाता
है॥ १९॥
करावलम्बितस्यौष्ठवद् ग्रहणं चुम्बितकम्॥ २०॥
चुम्बितक—हाथ में लिये हुए शिश्न को अधरपान के समान, ओष्ठों से चूमना चुम्बितक
कहलाता है॥ २०॥
तत्कृत्वा जिह्वाग्रेण सर्वतो घट्टनमग्रे च व्यधनमिति परिमृष्टकम्॥ २१॥
परिमृष्टक—चुम्बितक की क्रिया करके, शिश्न पर जिह्वा को रगड़ना और शिश्न के
छिद्र पर जिह्वा के अग्रभाग को बार बार मारना या दबाना परिमृष्टक कहलाता है॥ २१॥
तथाभूतमेव रागवशादर्धप्रविष्टं निर्दयमवपीड्यावपीड्य मुञ्चेत्। इत्याप्र-
चूषितकम्॥ २२॥
आम्रचूषितक—यदि राग बढ़ जाने के कारण नायक शिश्न को यों ही नपुंसक के मुख
में आधा डाल दे, और वह ओष्ठों से बार बार दबाकर छोड़ दे, तो यह आप्रचूषितक कहलाता
है॥ २२॥
पुरुषाभिप्रायादेव गिरेत् पीडयेच्चापरिसमाप्तेः। इति सङ्गरः॥ २३॥
सङ्गर—नायक की इच्छानुसार शिश्न को मुख में लेकर स्खलनपर्यन्त दबाने को सङ्गर
कहते हैं॥ २३॥
यथार्थं चात्र स्तननप्रहणनयोः प्रयोगः। इत्यौपरिष्टकम्॥ २४॥
औपरिष्टक के सीत्कार और प्रहणन—औपरिष्टक की क्रियाओं में नपुंसक को राग के
अनुरूप ही सीत्कार और प्रहणन का प्रयोग भी करना चाहिये। औपरिष्टक का विधान पूर्ण
हुआ॥ २४॥
कुलटाः स्वैरिण्यः परिचारिकाः संवाहिकाश्चाप्येतत् प्रयोजयन्ति॥ २५॥
नपुंसक के अतिरिक्त औपरिष्टक के विषय—कुलटा, स्वैरिणी (व्यभिचारिणी),
परिचारिका और संवाहिका स्त्रियाँ भी औपरिष्टक कर्म कराती हैं॥ २५॥
तदेतत्तु न कार्यम्; समयविरोधादसभ्यत्वाच्च। पुनरपि ह्यासां वदनसंसर्गे
स्वयमेवार्तिं प्रपद्येत। इत्याचार्याः॥ २६॥
आचार्यों का अभिमत—इस औपरिष्टक कर्म को कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि
शास्त्र भी इसका निषेध करता है और यह कर्म शिष्टजन-सम्मत भी नहीं है। कुलटा आदि
नायिकाओं के साथ मुखमैथुन कर, पुनः रागवश मुखचुम्बन करने पर स्वयं भी दुःख होता है—
ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है॥ २६॥
वेश्याकामिनोऽयमदोषः। अन्यतोऽपि परिहार्यः स्यात्। इति
वात्स्यायनः॥ २७॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—वेश्यागामियों के लिये यह दोषपूर्ण नहीं है, इसके अतिरिक्त
जो अन्य दोष कहे गये हैं, उनका भी परिहार सम्भव है—यह महर्षि वात्स्यायन का मत
है॥ २७॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७१
तस्माद्यास्त्वौपरिष्टकमाचरन्ति न ताभिः सह संसृज्यन्ते प्राच्याः ॥ २८ ॥
देशाचार के रूप में प्रवृत्ति—इसी कारण प्राच्य देशवासी उन वेश्याओं (कुलटा आदि
भी) के साथ समागम नहीं करते, जो मुखमैथुन कराती हैं ॥ २८ ॥
वेश्याभिरेव न संसृज्यन्ते आहिच्छत्रिकाः संसृष्टा अपि मुखकर्म तासां
परिहरन्ति ॥ २९ ॥
अहिच्छत्र देशवासी वेश्यागमन ही नहीं करते, और यदि कोई करता भी है, तो वह वेश्या
के मुख का चुम्बन नहीं करता ॥ २९ ॥
निरपेक्षाः साकेताः संसृज्यन्ते ॥ ३० ॥
अवध (साकेत) वासी पवित्रता, अपवित्रता का ध्यान रखे बिना स्वच्छन्द वेश्यागमन
करते हैं ॥ ३० ॥
न तु स्वयमौपरिष्टकमाचरन्ति नागरकाः ॥ ३१ ॥
पाटलिपुत्र (पटना) के निवासी स्वेच्छा से मुखमैथुन नहीं करते ॥ ३१ ॥
सर्वमविशङ्कया प्रयोजयन्ति सौरसेनाः ॥ ३२ ॥
सूरसेन (कौशाम्बी के दक्षिण तट) के निवासी समागम, मुखमैथुन और मुखचुम्बन—
सभी काम निःशङ्क भाव से करते हैं ॥ ३२ ॥
एवं ह्याहुः—को हि योषितां शीलं शौचमाचारं चरित्रं प्रत्ययं वचनं वा
श्रद्धातुमर्हति! निसर्गादेव हि मलिनदृष्टयो भवन्त्येता न परित्याज्याः। तस्मादासां
स्मृतित एव शौचमन्वेष्टव्यम्। एवं ह्याहुः—
'वत्सः प्रस्त्रवणे मेध्यः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ।
शकुनिः फलपाते तु स्त्रीमुखं रतिसङ्गमे॥' इति ॥ ३३ ॥
स्त्रियों की अपवित्रता—इसी कारण कहा गया है कि ऐसा कौन है जो स्त्रियों के शील,
शौच (पवित्रता), आचार, चरित्र, विश्वास और वचन पर श्रद्धा करेगा, क्योंकि ये स्वभाव से ही
मलिन बुद्धि वाली होती हैं, तथापि ये त्याज्य (छोड़ने योग्य) नहीं हैं। अतएव इनकी पवित्रता
लोक और शास्त्र के अतिरिक्त खोजनी चाहिये! स्मृतिकारों ने कहा है—
'दूध निकालते समय बछड़े का मुख पवित्र होता है, मृगों को पकड़ते समय कुत्ते का मुख
पवित्र होता है, फल गिराते समय पक्षी का मुख पवित्र होता है और समागमकाल में स्त्री का
मुख पवित्र होता है।' इस प्रकार समागमकाल में स्त्री का मुख पवित्र माना जाता है ॥ ३३ ॥
शिष्टविप्रतिपत्तेः स्मृतिवाक्यस्य च सावकाशत्वाद्देशस्थितेरात्मनश्च वृत्तिप्रत्य-
यानुरूपं प्रवर्तेत—इति वात्स्यायनः ॥ ३४ ॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—शिष्टजन स्त्रियों के मुखचुम्बन के विरुद्ध हैं और स्मृतिवाक्य
समागमकाल में मुखचुम्बन की अनुमति देते हैं। अतएव जहाँ जैसा देशाचार ही और जैसी
अपनी प्रवृत्ति और आस्था हो, उसके अनुरूप ही व्यवहार करना चाहिये—यह महर्षि
वात्स्यायन का मत है ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रमृष्टकुण्डलाश्रापि युवानः परिचारकाः ।
केषाञ्चिदेव कुर्वन्ति नराणामौपरिष्टकम् ॥ ३५ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
विशिष्ट औपरिष्टक—कानों में कुण्डल धारणकर और साज-सज्जा से रहने वाले कुछ
युवक और परिचारक भी औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३५ ॥
तथा नागरकाः केचिदन्योन्यस्य हितैषिणः ।
कुर्वन्ति रूढविश्वासाः परस्परपरिग्रहम् ॥ ३६ ॥
इसी प्रकार कुछ कामुक नागरक भी परस्पर हितैषी एवं विश्वस्त सहचर बनकर एक-
दूसरे के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३६ ॥
पुरुषाश्च तथा स्त्रीसु कर्मैतत्किल कुर्वते ।
व्यासस्तस्य च विज्ञेयो मुखचुम्बनवद्विधिः ॥ ३७ ॥
कोई-कोई पुरुष भी स्त्री के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं। स्त्री के साथ पुरुष की
औपरिष्टक की विधि तो यही हो सकती है कि पुरुष मुख से स्त्री की योनि का चुम्बन
करे ॥ ३७ ॥
परिवर्तितदेहौ तु स्त्रीपुंसौ यत् परस्परम् ।
युगपत् सम्प्रयुज्येते स कामः काकिलः स्मृतः ॥ ३८ ॥
स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में मुख करके लेट जायें, और स्त्री, पुरुष
के शिश्न का मुख से चुम्बन करे और पुरुष उसके मदनमन्दिर का। एक साथ सम्पन्न होने वाले
इस औपरिष्टक को काकिल कहते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् गुणर्बतस्त्यक्त्वा चतुराँस्त्यागिनो नरान् ।
वेश्याः खलेषु रज्यन्ते दासहस्तिपकादिषु ॥ ३९ ॥
इसी कारण वेश्याएँ गुणवान् चतुर और त्यागी पुरुषों को छोड़कर दास, महावत आदि
खल पुरुषों में अधिक अनुरक्त होती हैं ॥ ३९ ॥
न त्वेतद् ब्राह्मणो विद्वान्मन्त्री वा राजधूर्धरः ।
गृहीतप्रत्ययो वापि कारयेदौपरिष्टकम् ॥ ४० ॥
इस औपरिष्टक कर्म को विद्वान् ब्राह्मण या राज्यकार्य के निर्वाहक मन्त्री (राजम-त्री)
अथवा लोक में सम्मान्य व्यक्ति को कदापि नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् ।
शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगाँस्त्वेकदेशिकान् ॥ ४१ ॥
शास्त्र की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता—'इस बात को शास्त्र कहता
है'—यही प्रयोगों का कारण नहीं होना चाहिये; क्योंकि शास्त्र का विषय तो व्यापक हुआ करता
है, उसमें शुभ अशुभ सभी विषय वर्णित होते हैं, लेकिन प्रयोग सीमित और एकदेशीय ही हुआ
करते हैं ॥ ४१ ॥
रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७३
कीर्तिता इति तत्किं स्याद् भक्षणीयं विचक्षणैः ॥ ४२ ॥
आयुर्वेद में कुत्ते के मांस को सरस और वीर्यवर्धक बताया गया है, किन्तु क्या इससे
विचारशील व्यक्ति को कुत्ते का मांस खा लेना चाहिये ! ॥ ४२ ॥
सन्त्येव पुरुषाः केचित् सन्ति देशास्तथाविधाः ।
सन्ति कालाश्च येष्वेते योगा न स्युर्निरर्थकाः ॥ ४३ ॥
विवेचन की सार्थकता—कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं, कुछ ऐसे भी देश होते हैं, और
कुछ ऐसा समय भी होता है जिनके लिये ये लोग निरर्थक नहीं, बल्कि उपयोगी हो हैं ॥ ४३ ॥
तस्माद्देशं च कालं च प्रयोगं शास्त्रमेव च ।
आत्मानं चापि संप्रेक्ष्य योगान्युञ्जीत वा न वा ॥ ४४ ॥
प्रयोक्ता के विचारणीय विषय—अतएव देश, काल, व्यवहार, शास्त्र और अपने को
देखकर जो विधि एवं योग शिष्ट एवं ग्राह्य हों, उन्हें ही प्रयोग करें अर्थात् जो विधि एवं प्रयोग
अशिष्ट एवं अग्राह्य हैं, उन्हें त्याग दे ॥ ४४ ॥
अर्थस्यास्य रहस्यत्वाच्चलत्वान्मनसस्तथा ।
कः कदा किं कुतः कुर्यादिति को ज्ञातुमर्हति ॥ ४५ ॥
यह औपरिष्टक कर्म नितान्त एकान्त में किया जाता है, और गुप्त ही रखा जाता है। मन
अत्यन्त चंचल है। अतएव कौन व्यक्ति, किस कारण से, कब, क्या कर डाले—इसे कौन जान
सकता है ! ॥ ४५ ॥
औपरिष्टक प्रकरण नामक नवम अध्याय सम्पन्न ॥
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दशम अध्याय
रतारम्भावसानिकप्रकरण
नागरकः सह मित्रजनेनं परिचारकैश्च कृतपुष्पोपहारे सञ्चारितसुरभिधूपे
रत्यावासे प्रसाधिते वासगृहे कृतस्नानप्रसाधनां युक्त्यापीतां स्त्रियं सान्त्वनैः पुनः
पानेन चोपक्रमेत् ॥ १ ॥
१. सुरत के प्रारम्भ के कृत्य—नागरक अपने पीठमर्द, विट एवं विदूषक आदि मित्रों
और सेवकों द्वारा पुष्पमालाओं से सज्जित एवं सुगन्धित धूप से धूपित रतिकक्ष में स्त्री के साथ
बैठे, जो स्नान एवं शृङ्गार किये हुए हो, वस्त्राभूषणों से सज्जित हो, और हल्का मद्यपान भी
किये हो। नागरक पहले स्त्री से कुशलक्षेम पूछे, और फिर विनयपूर्वक उससे मद्यपान के लिये
कहे ॥ १ ॥
दक्षिणतश्चास्या उपवेशनम्। केशहस्ते वस्त्रान्ते नीव्यामित्यवलम्बनम्। रत्यर्थं
सव्येन बाहुनानुद्धतः परिष्वङ्गः ॥ २ ॥
७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका की दाहिनी ओर बैठे। उसके केशपाश को सहलाये, उसके वस्त्रों पर हाथ फेरे,
बाद में उसके (नीवी नाड़े) पर हाथ लगाये। अनुरागवर्धन हेतु बायें हाथ से स्निग्ध-सौम्य
आलिङ्गन करे॥ २ ॥
पूर्वप्रकरणसंबद्धैः परिहासानुरागैर्वचोभिरनुवृत्तिः। गूढाश्लीलानां च वस्तूनां
समस्या परिभाषणम्॥ ३॥
हास-परिहास और अनुराग-कथाओं से सम्बद्ध पुरातन बातों को कहे, और फिर वैसा ही
प्रेमालाप प्रारम्भ कर दे। गूढ़ और अश्लील बातों को संक्षेप में कहे॥ ३॥
सनृत्तमनृत्तं वा गीतं वादित्रम्। कलासु सङ्कथाः। पुनः पानेनोपच्छन्दनम्॥ ४॥
नृत्य के साथ या नृत्य के बिना गाना-बजाना हो, ललित कलाओं पर चर्चा हो, और फिर
मद्यपान कर उसे प्रोत्साहित करना चाहिये॥ ४॥
जातानुरागायां कुसुमानुलेपनताम्बूलदानेन च शेषजनविसृष्टिः। विजने च
यथोक्तैरालिङ्गनादिभिरेनामुद्धर्षयेत्। ततो नीवीविश्लेषणादि यथोक्तमुपक्रमेत्।
इत्ययं रतारम्भः॥ ५॥
नायिका में अनुराग उत्पन्न हो जाने पर पुष्पमाला, सुगन्धित द्रव्य (इत्र) और ताम्बूल
देकर शेष व्यक्तियों—मित्रों एवं सेवकों—को विदा कर दे, और निर्जन रतिकक्ष में पूर्वोक्त
आलिङ्गन, चुम्बन आदि करता हुआ, उसे कामोत्तेजित करे, तदुपरान्त नीवीबन्धन को खोले—
यह सुरत से पूर्व की विधि है॥ ५॥
रतावसानिकं रागमतिबाह्यासंस्तुतयोरिव सव्रीडयोः परस्परमपश्यतोः
पृथक्पृथगाचारभूमिगमनम्। प्रतिनिवृत्य चाव्रीडायमानयोरुचितदेशोपविष्टयो-
स्ताम्बूलग्रहणमच्छीकृतं चन्दनमन्यद्वानुलेपनं तस्या गात्रे स्वयमेव निवेशयेत्॥ ६॥
२. सुरत के समापन के कार्य—समागम कर चुकने के बाद, रतिसुख का अनुभव
करके, दोनों अपरिचितों के समान पृथक्-पृथक् संकुचित होते हुए, एक-दूसरे को न देखते हुए
शौचालयों को जायें, और वहाँ मूत्रत्याग और गुह्याङ्गों की शुद्धि करें। वहाँ से लौटकर,
लज्जाभाव को त्यागकर, शय्या के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर बैठकर दोनों ताम्बूल का
सेवन करें। चन्दन या किसी अन्य वस्तु का अनुलेपन एक दूसरे के शरीर पर लगायें॥ ६॥
सव्येन बाहुना चैनां परिरभ्य चषकहस्तः सान्त्वयन् पाययेत्। जलानुपानं वा
खण्डखाद्यकमन्यद्वा प्रकृतिसात्म्ययुक्तमुभावप्युपयुञ्जीयाताम्॥ ७॥
और फिर दाहिने हाथ में मद्य लेकर, बायें हाथ से नायिका का आलिङ्गन करे, और उसे
सान्त्वना देकर पिलाये अथवा खाँड़ से निर्मित जलपान या प्रकृति के अनुरूप जो भी उचित हो,
उसका दोनों जलपान करें॥ ७॥
अच्छरसकयूषमम्लयवागूं भृष्टमांसोपदंशानि पानकानि चूतफलानि शुष्क-
मांसं मातुलुङ्गचुक्रकाणि सशर्कराणि च यथादेशसात्म्यं च। तत्र मधुरमिदं मृदु
विशदमिति च विदश्य विदश्य तत्तदुपाहरेत्॥ ८॥
अच्छ, रसक, यूष, अम्ल यवागू, वे पेय पदार्थ जिनके साथ भुना हुआ मांस खाया जाता