वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका की दाहिनी ओर बैठे। उसके केशपाश को सहलाये, उसके वस्त्रों पर हाथ फेरे,
बाद में उसके (नीवी नाड़े) पर हाथ लगाये। अनुरागवर्धन हेतु बायें हाथ से स्निग्ध-सौम्य
आलिङ्गन करे॥ २ ॥
पूर्वप्रकरणसंबद्धैः परिहासानुरागैर्वचोभिरनुवृत्तिः। गूढाश्लीलानां च वस्तूनां
समस्या परिभाषणम्॥ ३॥
हास-परिहास और अनुराग-कथाओं से सम्बद्ध पुरातन बातों को कहे, और फिर वैसा ही
प्रेमालाप प्रारम्भ कर दे। गूढ़ और अश्लील बातों को संक्षेप में कहे॥ ३॥
सनृत्तमनृत्तं वा गीतं वादित्रम्। कलासु सङ्कथाः। पुनः पानेनोपच्छन्दनम्॥ ४॥
नृत्य के साथ या नृत्य के बिना गाना-बजाना हो, ललित कलाओं पर चर्चा हो, और फिर
मद्यपान कर उसे प्रोत्साहित करना चाहिये॥ ४॥
जातानुरागायां कुसुमानुलेपनताम्बूलदानेन च शेषजनविसृष्टिः। विजने च
यथोक्तैरालिङ्गनादिभिरेनामुद्धर्षयेत्। ततो नीवीविश्लेषणादि यथोक्तमुपक्रमेत्।
इत्ययं रतारम्भः॥ ५॥
नायिका में अनुराग उत्पन्न हो जाने पर पुष्पमाला, सुगन्धित द्रव्य (इत्र) और ताम्बूल
देकर शेष व्यक्तियों—मित्रों एवं सेवकों—को विदा कर दे, और निर्जन रतिकक्ष में पूर्वोक्त
आलिङ्गन, चुम्बन आदि करता हुआ, उसे कामोत्तेजित करे, तदुपरान्त नीवीबन्धन को खोले—
यह सुरत से पूर्व की विधि है॥ ५॥
रतावसानिकं रागमतिबाह्यासंस्तुतयोरिव सव्रीडयोः परस्परमपश्यतोः
पृथक्पृथगाचारभूमिगमनम्। प्रतिनिवृत्य चाव्रीडायमानयोरुचितदेशोपविष्टयो-
स्ताम्बूलग्रहणमच्छीकृतं चन्दनमन्यद्वानुलेपनं तस्या गात्रे स्वयमेव निवेशयेत्॥ ६॥
२. सुरत के समापन के कार्य—समागम कर चुकने के बाद, रतिसुख का अनुभव
करके, दोनों अपरिचितों के समान पृथक्-पृथक् संकुचित होते हुए, एक-दूसरे को न देखते हुए
शौचालयों को जायें, और वहाँ मूत्रत्याग और गुह्याङ्गों की शुद्धि करें। वहाँ से लौटकर,
लज्जाभाव को त्यागकर, शय्या के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर बैठकर दोनों ताम्बूल का
सेवन करें। चन्दन या किसी अन्य वस्तु का अनुलेपन एक दूसरे के शरीर पर लगायें॥ ६॥
सव्येन बाहुना चैनां परिरभ्य चषकहस्तः सान्त्वयन् पाययेत्। जलानुपानं वा
खण्डखाद्यकमन्यद्वा प्रकृतिसात्म्ययुक्तमुभावप्युपयुञ्जीयाताम्॥ ७॥
और फिर दाहिने हाथ में मद्य लेकर, बायें हाथ से नायिका का आलिङ्गन करे, और उसे
सान्त्वना देकर पिलाये अथवा खाँड़ से निर्मित जलपान या प्रकृति के अनुरूप जो भी उचित हो,
उसका दोनों जलपान करें॥ ७॥
अच्छरसकयूषमम्लयवागूं भृष्टमांसोपदंशानि पानकानि चूतफलानि शुष्क-
मांसं मातुलुङ्गचुक्रकाणि सशर्कराणि च यथादेशसात्म्यं च। तत्र मधुरमिदं मृदु
विशदमिति च विदश्य विदश्य तत्तदुपाहरेत्॥ ८॥
अच्छ, रसक, यूष, अम्ल यवागू, वे पेय पदार्थ जिनके साथ भुना हुआ मांस खाया जाता