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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 248 में से

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पृष्ठ 97

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ७१
तस्माद्यास्त्वौपरिष्टकमाचरन्ति न ताभिः सह संसृज्यन्ते प्राच्याः ॥ २८ ॥
देशाचार के रूप में प्रवृत्ति—इसी कारण प्राच्य देशवासी उन वेश्याओं (कुलटा आदि
भी) के साथ समागम नहीं करते, जो मुखमैथुन कराती हैं ॥ २८ ॥
वेश्याभिरेव न संसृज्यन्ते आहिच्छत्रिकाः संसृष्टा अपि मुखकर्म तासां
परिहरन्ति ॥ २९ ॥
अहिच्छत्र देशवासी वेश्यागमन ही नहीं करते, और यदि कोई करता भी है, तो वह वेश्या
के मुख का चुम्बन नहीं करता ॥ २९ ॥
निरपेक्षाः साकेताः संसृज्यन्ते ॥ ३० ॥
अवध (साकेत) वासी पवित्रता, अपवित्रता का ध्यान रखे बिना स्वच्छन्द वेश्यागमन
करते हैं ॥ ३० ॥
न तु स्वयमौपरिष्टकमाचरन्ति नागरकाः ॥ ३१ ॥
पाटलिपुत्र (पटना) के निवासी स्वेच्छा से मुखमैथुन नहीं करते ॥ ३१ ॥
सर्वमविशङ्कया प्रयोजयन्ति सौरसेनाः ॥ ३२ ॥
सूरसेन (कौशाम्बी के दक्षिण तट) के निवासी समागम, मुखमैथुन और मुखचुम्बन—
सभी काम निःशङ्क भाव से करते हैं ॥ ३२ ॥
एवं ह्याहुः—को हि योषितां शीलं शौचमाचारं चरित्रं प्रत्ययं वचनं वा
श्रद्धातुमर्हति! निसर्गादेव हि मलिनदृष्टयो भवन्त्येता न परित्याज्याः। तस्मादासां
स्मृतित एव शौचमन्वेष्टव्यम्। एवं ह्याहुः—
'वत्सः प्रस्त्रवणे मेध्यः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ।
शकुनिः फलपाते तु स्त्रीमुखं रतिसङ्गमे॥' इति ॥ ३३ ॥
स्त्रियों की अपवित्रता—इसी कारण कहा गया है कि ऐसा कौन है जो स्त्रियों के शील,
शौच (पवित्रता), आचार, चरित्र, विश्वास और वचन पर श्रद्धा करेगा, क्योंकि ये स्वभाव से ही
मलिन बुद्धि वाली होती हैं, तथापि ये त्याज्य (छोड़ने योग्य) नहीं हैं। अतएव इनकी पवित्रता
लोक और शास्त्र के अतिरिक्त खोजनी चाहिये! स्मृतिकारों ने कहा है—
'दूध निकालते समय बछड़े का मुख पवित्र होता है, मृगों को पकड़ते समय कुत्ते का मुख
पवित्र होता है, फल गिराते समय पक्षी का मुख पवित्र होता है और समागमकाल में स्त्री का
मुख पवित्र होता है।' इस प्रकार समागमकाल में स्त्री का मुख पवित्र माना जाता है ॥ ३३ ॥
शिष्टविप्रतिपत्तेः स्मृतिवाक्यस्य च सावकाशत्वाद्देशस्थितेरात्मनश्च वृत्तिप्रत्य-
यानुरूपं प्रवर्तेत—इति वात्स्यायनः ॥ ३४ ॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—शिष्टजन स्त्रियों के मुखचुम्बन के विरुद्ध हैं और स्मृतिवाक्य
समागमकाल में मुखचुम्बन की अनुमति देते हैं। अतएव जहाँ जैसा देशाचार ही और जैसी
अपनी प्रवृत्ति और आस्था हो, उसके अनुरूप ही व्यवहार करना चाहिये—यह महर्षि
वात्स्यायन का मत है ॥ ३४ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—