सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 94

६८ वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्र स्त्रीरूपिणी स्त्रिया वेषमालापं लीलां भावं मृदुत्वं भीरुत्वं
मुग्धतामसहिष्णुतां व्रीडां चानुकुर्वीत ॥ २ ॥
स्त्रीरूपधारी नपुंसक—इनमें जो स्त्रीरूपधारी नपुंसक (हिजड़ी) है, उसे स्त्रियों की
वेषभूषा, बोलचाल, लीला, भाव, मृदुता, भीरुता, मुग्धता, असहिष्णुता और सलज्जता का
अनुकरण करना चाहिये ॥ २ ॥
तस्या वदने जघनकर्म। तदौपरिष्टकमाचक्षते ॥ ३ ॥
नपुंसक के मुख में जो मैथुनकर्म किया जाता है, उसे ही औपरिष्टक कहते हैं ॥ ३ ॥
सा ततो रतिमाभिमानिकीं वृत्तिं च लिप्सेत् ॥ ४ ॥
औपरिष्टक का फल—ऐसी हिजड़ी आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि उपक्रियाओं
से आभिमानिकी (सङ्कल्पमात्र से होने वाली) रति का सुख प्राप्त करें, और औपरिष्टक कर्म द्वारा
अपनी जीविका भी चलाये, अर्थात् आलिङ्गन आदि उसकी सुखानुभूति के साधन हैं और
औपरिष्टक कर्म जीविका का साधन है ॥ ४ ॥
वेश्यावच्चरितं प्रकाशयेत्। इति स्त्रीरूपिणी ॥ ५ ॥
चरित—इसे वेश्या के समान ही आचरण करना चाहिये। स्त्रीरूपधारी नपुंसक
(हिजड़ी) का प्रसङ्ग पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
पुरुषरूपिणी तु प्रच्छन्नकामा पुरुषं लिप्समाना संवाहकभावमुपजीवेत् ॥ ६ ॥
पुरुषरूपधारी नपुंसक—पुरुषरूपधारी (हिजड़ा) पुरुष जैसी आकृति होने के कारण
अपनी कामनाओं को छिपाये रखता है, किन्तु रति के लिये चाहता पुरुष को ही है, अतएव उसे
मर्दन और संवाहन (मालिश और हाथ-पैर दबाना) का कार्य करना चाहिये ॥ ६ ॥
संवाहने परिष्वजमानेव गात्रैरूरू नायकस्य मृद्नीयात् ॥ ७ ॥
संवाहन कर्म में अपने शरीर से लगाते हुए ही नायक की जाँघें दबानी चाहिये ॥ ७ ॥
प्रसृतपरिचया चोरुमूलं सजघनमिति संस्पृशेत् ॥ ८ ॥
धीरे धीरे जब परिचय बढ़ जाये, तो नायक की जाँघों और उसकी सन्धियों को भी दबाना
और मसलना चाहिये ॥ ८ ॥
तत्र स्थिरलिङ्गतामुपलभ्य चास्य पाणिमन्थेन परिघट्टयेत्। चापलमस्य
कुत्सयन्तीव हसेत् ॥ ९ ॥
इस प्रकार मर्दन और संवाहन से यदि नायक का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो उसे
हस्तक्रिया द्वारा इधर उधर करे और उसकी चपलता का उपालम्भ देता (निन्दा करता) हुआ
हँसे ॥ ९ ॥
कृतलक्षणेनाप्युपलब्धवैकृतेनापि न चोद्यत इति चेत् स्वयमुपक्रमेत् ॥ १० ॥
जिसे इस प्रकार कामोद्रिक्त कर दिया गया है, और जो नपुंसक (हिजड़ा) के विषय में
यह जान गया है कि यह मुखमैथुन कराता है, यदि तब भी वह शिश्न को मुख में लेने की बात
न कहे, तो नपुंसक को स्वयं ही अग्रसर होना चाहिये, अर्थात् उसका शिश्न मुख में लेकर
औपरिष्टक कर्म प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १० ॥