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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 248 में से

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पृष्ठ 96

७० वात्स्यायन-कामसूत्र
ले, और उसके अग्रभाग को ओष्ठों से कुछ दबाकर उगल दे—यह 'अन्तःसंदंश' कहलाता
है॥ १९॥
करावलम्बितस्यौष्ठवद् ग्रहणं चुम्बितकम्॥ २०॥
चुम्बितक—हाथ में लिये हुए शिश्न को अधरपान के समान, ओष्ठों से चूमना चुम्बितक
कहलाता है॥ २०॥
तत्कृत्वा जिह्वाग्रेण सर्वतो घट्टनमग्रे च व्यधनमिति परिमृष्टकम्॥ २१॥
परिमृष्टक—चुम्बितक की क्रिया करके, शिश्न पर जिह्वा को रगड़ना और शिश्न के
छिद्र पर जिह्वा के अग्रभाग को बार बार मारना या दबाना परिमृष्टक कहलाता है॥ २१॥
तथाभूतमेव रागवशादर्धप्रविष्टं निर्दयमवपीड्यावपीड्य मुञ्चेत्। इत्याप्र-
चूषितकम्॥ २२॥
आम्रचूषितक—यदि राग बढ़ जाने के कारण नायक शिश्न को यों ही नपुंसक के मुख
में आधा डाल दे, और वह ओष्ठों से बार बार दबाकर छोड़ दे, तो यह आप्रचूषितक कहलाता
है॥ २२॥
पुरुषाभिप्रायादेव गिरेत् पीडयेच्चापरिसमाप्तेः। इति सङ्गरः॥ २३॥
सङ्गर—नायक की इच्छानुसार शिश्न को मुख में लेकर स्खलनपर्यन्त दबाने को सङ्गर
कहते हैं॥ २३॥
यथार्थं चात्र स्तननप्रहणनयोः प्रयोगः। इत्यौपरिष्टकम्॥ २४॥
औपरिष्टक के सीत्कार और प्रहणन—औपरिष्टक की क्रियाओं में नपुंसक को राग के
अनुरूप ही सीत्कार और प्रहणन का प्रयोग भी करना चाहिये। औपरिष्टक का विधान पूर्ण
हुआ॥ २४॥
कुलटाः स्वैरिण्यः परिचारिकाः संवाहिकाश्चाप्येतत् प्रयोजयन्ति॥ २५॥
नपुंसक के अतिरिक्त औपरिष्टक के विषय—कुलटा, स्वैरिणी (व्यभिचारिणी),
परिचारिका और संवाहिका स्त्रियाँ भी औपरिष्टक कर्म कराती हैं॥ २५॥
तदेतत्तु न कार्यम्; समयविरोधादसभ्यत्वाच्च। पुनरपि ह्यासां वदनसंसर्गे
स्वयमेवार्तिं प्रपद्येत। इत्याचार्याः॥ २६॥
आचार्यों का अभिमत—इस औपरिष्टक कर्म को कदापि नहीं करना चाहिये, क्योंकि
शास्त्र भी इसका निषेध करता है और यह कर्म शिष्टजन-सम्मत भी नहीं है। कुलटा आदि
नायिकाओं के साथ मुखमैथुन कर, पुनः रागवश मुखचुम्बन करने पर स्वयं भी दुःख होता है—
ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है॥ २६॥
वेश्याकामिनोऽयमदोषः। अन्यतोऽपि परिहार्यः स्यात्। इति
वात्स्यायनः॥ २७॥
वात्स्यायन की व्यवस्था—वेश्यागामियों के लिये यह दोषपूर्ण नहीं है, इसके अतिरिक्त
जो अन्य दोष कहे गये हैं, उनका भी परिहार सम्भव है—यह महर्षि वात्स्यायन का मत
है॥ २७॥