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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 248 में से

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पृष्ठ 95

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६९
पुरुषेण च चोद्यमाना विवदेत्। कृच्छ्रेण चाभ्युपगच्छेत्॥ ११॥
यदि नायक पहले ही नपुंसक से मुखमैथुन के लिए कहे, तो नपुंसक को उससे विवाद
करना चाहिये और बहुत कठिनाई से मुखमैथुन कराये॥ ११॥
तत्र कर्माष्टविधं समुच्चयप्रयोज्यम्॥ १२॥
औपरिष्टक के भेद—क्रिया के भेद से औपरिष्टक के भी कई भेद हो जाते हैं। उन्हें
बताते हैं—यह औपरिष्टक कर्म आठ प्रकार का है। इनका क्रमशः प्रयोग करना चाहिये॥ १२॥
निमितं पार्श्वतोदष्टं बहिःसंदंशोऽन्तःसंदंशश्चुम्बितकं परिमृष्टकमाग्रचूषितकं
सङ्गर इति॥ १३॥
निमित, पार्श्वतोदष्ट, बहिसन्दंश, अन्तःसन्दंश, चुम्बितक, परिमृष्टक, चूषितक और
सङ्गर—औपरिष्टक की ये आठ क्रियाएँ हैं॥ १३॥
तेष्वेकैकमभ्युपगम्य विरामाभीप्सां दर्शयेत्॥ १४॥
नपुंसक इन आठ क्रियाओं में से क्रमशः एक एक को करता हुआ निवृत्त होने की इच्छा
करे, जिससे नायक चकित होकर अनुनय विनय करे॥ १४॥
इतरश्च पूर्वस्मिन्नभ्युपगते तदुत्तरमेवापरं निर्दिशेत्। तस्मिन्नपि सिद्धे
तदुत्तरमिति॥ १५॥
नायक को चाहिये कि एक क्रिया के पूर्ण होने पर दूसरी को करने के लिये कहे, और
उसके पूर्ण होने पर तीसरी को करने के लिए कहे॥ १५॥
करावलम्बितमोष्ठयोरुपरि विन्यस्तमपविध्य मुखं विधुनुयात्। तन्निमि-
तम्॥ १६॥
निमित—ओष्ठों को गोल-गोल बनाकर, हाथ में लिये हुए शिश्न को उस पर रख ले,
और मुख हिलाये—इसे निमित कहते हैं॥ १६॥
हस्तेनाग्रमवच्छाद्य पार्श्वतो निर्दशनमोष्ठाभ्यामवपीड्य भवत्वेतावदिति
सान्त्वयेत्। तत्पार्श्वतोदष्टम्॥ १७॥
पार्श्वतोदष्ट—शिश्न के अग्रभाग को हाथ से ढककर, पार्श्व में दाँत न लगाकर, केवल
ओष्ठों से दबाकर यह कह दे कि अब इतना ही करना है, तो उसे पार्श्वतोदष्ट कहते हैं॥ १७॥
भूयश्चोदिता सम्मीलितौष्ठी तस्याग्रं निष्पीड्य कर्षयन्तीव चुम्बेत्। इति
बहिःसंदंशः॥ १८॥
बहिःसन्दंश—यदि नायक फिर भी करने का आग्रह करे, तो उसके शिश्न के अग्रभाग
को मुख में लेकर, दोनों ओष्ठों से दबाकर खींचता हुआ सा चूमे—इसे बहिःसन्दंश कहते
हैं॥ १८॥
तस्मिन्नेवाभ्यर्थनया किञ्चिदधिकं प्रवेशयेत्। सापि चाग्रमोष्ठाभ्यां निष्पीड्य
निष्ठीवेत्। इत्यन्तःसंदंशः॥ १९॥
अन्तःसन्दंश—नायक के पुनः आग्रह करने पर शिश्न का कुछ अधिक भाग मुख में ले