वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रमृष्टकुण्डलाश्रापि युवानः परिचारकाः ।
केषाञ्चिदेव कुर्वन्ति नराणामौपरिष्टकम् ॥ ३५ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
विशिष्ट औपरिष्टक—कानों में कुण्डल धारणकर और साज-सज्जा से रहने वाले कुछ
युवक और परिचारक भी औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३५ ॥
तथा नागरकाः केचिदन्योन्यस्य हितैषिणः ।
कुर्वन्ति रूढविश्वासाः परस्परपरिग्रहम् ॥ ३६ ॥
इसी प्रकार कुछ कामुक नागरक भी परस्पर हितैषी एवं विश्वस्त सहचर बनकर एक-
दूसरे के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं ॥ ३६ ॥
पुरुषाश्च तथा स्त्रीसु कर्मैतत्किल कुर्वते ।
व्यासस्तस्य च विज्ञेयो मुखचुम्बनवद्विधिः ॥ ३७ ॥
कोई-कोई पुरुष भी स्त्री के साथ औपरिष्टक कर्म करते हैं। स्त्री के साथ पुरुष की
औपरिष्टक की विधि तो यही हो सकती है कि पुरुष मुख से स्त्री की योनि का चुम्बन
करे ॥ ३७ ॥
परिवर्तितदेहौ तु स्त्रीपुंसौ यत् परस्परम् ।
युगपत् सम्प्रयुज्येते स कामः काकिलः स्मृतः ॥ ३८ ॥
स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं में मुख करके लेट जायें, और स्त्री, पुरुष
के शिश्न का मुख से चुम्बन करे और पुरुष उसके मदनमन्दिर का। एक साथ सम्पन्न होने वाले
इस औपरिष्टक को काकिल कहते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् गुणर्बतस्त्यक्त्वा चतुराँस्त्यागिनो नरान् ।
वेश्याः खलेषु रज्यन्ते दासहस्तिपकादिषु ॥ ३९ ॥
इसी कारण वेश्याएँ गुणवान् चतुर और त्यागी पुरुषों को छोड़कर दास, महावत आदि
खल पुरुषों में अधिक अनुरक्त होती हैं ॥ ३९ ॥
न त्वेतद् ब्राह्मणो विद्वान्मन्त्री वा राजधूर्धरः ।
गृहीतप्रत्ययो वापि कारयेदौपरिष्टकम् ॥ ४० ॥
इस औपरिष्टक कर्म को विद्वान् ब्राह्मण या राज्यकार्य के निर्वाहक मन्त्री (राजम-त्री)
अथवा लोक में सम्मान्य व्यक्ति को कदापि नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
न शास्त्रमस्तीत्येतावत् प्रयोगे कारणं भवेत् ।
शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगाँस्त्वेकदेशिकान् ॥ ४१ ॥
शास्त्र की व्यापकता और प्रयोगों की एकदेशीयता—'इस बात को शास्त्र कहता
है'—यही प्रयोगों का कारण नहीं होना चाहिये; क्योंकि शास्त्र का विषय तो व्यापक हुआ करता
है, उसमें शुभ अशुभ सभी विषय वर्णित होते हैं, लेकिन प्रयोग सीमित और एकदेशीय ही हुआ
करते हैं ॥ ४१ ॥
रसवीर्यविपाका हि श्वमांसस्यापि वैद्यके ।