वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
१७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
स चेदवसितार्थो वित्तवान् सानुरागश्च ततः सन्धेयः ॥ २ ॥
मिलने का कारण—यदि वह धनवान् हो, और धन देगा—यह भी निश्चित हो तथा
अनुराग भी रखता हो तभी मिलना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ २ ॥
अन्यत्र गतस्तर्कयितव्यः। स कार्ययुक्त्या षड्विधः ॥ ३ ॥
यदि वह दूसरी वेश्या के पास गया है, तो मिलाने से पूर्व विचार कर लेना चाहिये। अपने
कार्य की योजना के अनुसार वह छह प्रकार का हो सकता है ॥ ३ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततोऽपि स्वयमेवापसृतः ॥ ४ ॥
प्रथम : दोनों ओर से स्वयं हटने वाला—जो से स्वयं हटा हो और दूसरी वेश्या के पास
से भी स्वयं ही हटा हो ॥ ४ ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः ॥ ५ ॥
द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया—जो यहाँ से और वहाँ से (दोनों
स्थानों से ही) धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ५ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतः ॥ ६ ॥
तृतीय : यहाँ से स्वयं निकला और वहाँ से निकाला गया—जो यहाँ से तो स्वयं हटा
हो किन्तु वहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ६ ॥
इतः स्वयमपसृतस्तत्र स्थितः ॥ ७ ॥
चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ स्थित हो गया
हो अर्थात् दूसरी के पास जाकर जम गया हो ॥ ७ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृतः ॥ ८ ॥
पञ्चम : जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो और वहाँ से स्वयं हट गया हो ॥ ८ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्तत्र स्थितः ॥ ९ ॥
षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा—जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो
और वहाँ जाकर जम गया हो ॥ ९ ॥
इतस्ततश्च स्वयमेवापसृत्योपजपति चेदुभयोर्गुणानपेक्षी चलबुद्धिर-
सन्धेयः ॥ १० ॥
प्रथम : न मिलाने योग्य नायक—जो नायक यहाँ और वहाँ, दोनों स्थानों से, स्वयं ही
हटकर, पुनः मिलने को कहे, दोनों नायिकाओं के गुणों की अपेक्षा न करने वाला वह चञ्चल
बुद्धि वाला पुरुष है, अतएव मिलाने योग्य नहीं है ॥ १० ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः स्थिरबुद्धिः। स चेदन्यतो बहु लभमानया
निष्कासितः स्यात्ससारोऽपि तया रोषितो ममामर्षार्द् बहु दास्यतीति संधेयः ॥ ११ ॥
द्वितीय : अधिक लाभ पर स्वीकार्य—जो यहाँ और वहाँ दोनों स्थानों पर, नायिका
द्वारा ही निकाला गया हो, तभी हटा हो, वह स्थिरबुद्धि पुरुष है। यदि दूसरी ने उसे अन्यों की
अपेक्षा अधिक लाभ उठाकर भी निकाला हो, धनवान् होने पर भी वेश्या द्वारा क्रुद्ध कर दिया
गया हो, 'मुझे इस क्रोधवश अधिक देगा'—यह निश्चित हो, तभी उसके साथ सन्धि करनी
चाहिये अर्थात् उसे तभी सम्भोग का अवसर देना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ ११ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७३
निःसारतया कदर्यतया वा त्यक्तो न श्रेयान् ॥ १२ ॥
निर्धन या दुष्ट संसर्ग के योग्य नहीं—यदि नायक निर्धनता या दुष्टता के कारण
निकाला गया हो तो उसके साथ संसर्ग करना श्रेयस्कर नहीं होता ॥ १२ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतो यद्यतिरिक्तमादौ च दद्यात्ततः
प्रतिग्राह्यः ॥ १३ ॥
तृतीय : अधिक धन पर स्वीकार्य—जो नायक यहाँ से स्वयं हटा हो और वहाँ से
नायिका द्वारा निकाला गया हो, ऐसा नायक यदि पहले ही अतिरिक्त धन देता है, तो उसे स्वीकार
कर लेना चाहिये अर्थात् उसे अग्रिम अतिरिक्त धन लेकर समागम का अवसर दे देना
चाहिये ॥ १३ ॥
इतः स्वयमपसृत्य तत्र स्थित उपजपंस्तर्कयितव्यः ॥ १४ ॥
चतुर्थ : विचारणीय—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जम गया हो, ऐसा नायक यदि बात
चलाये तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १४ ॥
विशेषार्थी चागतस्ततो विशेषमपश्यन्नागन्तुकामो मयि मां जिज्ञासितुकामः स
आगत्य सानुरागत्वाद्दास्यति। तस्यां वा दोषान् दृष्ट्वा मयि भूयिष्ठान् गुणानधुना
पश्यति स गुणदर्शी भूयिष्ठं दास्यति ॥ १५ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—यह विशेषता से प्रेम करता है, इसीलिये वहाँ गया था। वहाँ कुछ भी
विशेषता न दिखने से अब वापस आना चाहता है और यहाँ आकर मुझे जानना चाहता है। प्रेमी
होने के कारण यहाँ आकर कुछ अधिक ही धन देगा अथवा उसमें दोष देखकर इस समय मुझमें
गुण देख रहा है। अतएव यह गुणग्राही नायक अधिक धन देगा ॥ १५ ॥
बालो वा नैकत्रदृष्टिरतिसन्धानप्रधानो वा हरिद्रारागो वा यत्किञ्चनकारी
वेत्यवेत्य सन्दध्यान्न वा ॥ १६ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—बालबुद्धि है, स्थिरचित्त वाला नहीं है, विचारशील नहीं है, हल्दी
की तरह अस्थायी राग (रंग या अनुराग) वाला है अथवा जो मन में आता है, कर बैठता है—
इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके ही नायिका देखे कि यदि वह संसर्ग करने योग्य
है तो करे, अन्यथा नहीं ॥ १६ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृत उपजपँस्तर्कयितव्यः ॥ १७ ॥
पंचम : विचारणीय—यहाँ से निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा नायक यदि अपनी
ओर से बात चलाये, तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १७ ॥
अनुरागादागन्तुकामः स बहु दास्यति। मम गुणैर्भावितो योऽन्यस्यां न
रमते ॥ १८ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—वह मेरे अनुरागवश आना चाहता है, इसलिये अधिक देगा। वह मेरे
गुणों से प्रभावित है, इसलिये दूसरी नायिका में उसका मन नहीं रम रहा है ॥ १८ ॥
पूर्वमयोगेन वा मया निष्कासितः स मां शीलयित्वा वैरं निर्यातयितुकामो
१७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
धनमभियोगाद्वा मयास्यापहृतं तद्विश्वास्य प्रतीपमादातुकामो निर्वेष्टुकामो वा मां
वर्तमानाद् भेदयित्वा त्यक्तुकाम इत्यकल्याणबुद्धिरसन्धेयः ॥ १९ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—पहले मैंने इसे अन्यायपूर्वक निकाला था, इसलिये अब यह मुझसे
मिलकर अपना वैर निकालना चाहता है अथवा उपायों द्वारा मैंने इसका सारा धन खींच लिया है,
इसलिये अब यह विश्वास दिखाकर उसे निकालना चाहता है; अथवा वर्तमान प्रेमी को मुझसे
तोड़कर फिर मुझे छोड़ देना चाहता है, इस प्रकार यह अकल्याण बुद्धि वाला है, अतः संसर्ग
नहीं करना चाहिये ॥ १९ ॥
अन्यथाबुद्धिः कालेन लम्भयितव्यः ॥ २० ॥
यदि वह अनुरागवश मिलना चाहता है तो उसे कुछ समय बाद ही अवसर देना
चाहिये ॥ २० ॥
इतो निष्कासितस्तत्र स्थित उपजपन्नेतेन व्याख्यातः ॥ २१ ॥
षष्ठ : नायक का विचार—जो अपने यहाँ से निकाला गया हो और वहाँ जाकर जम
गया हो, वह यदि अपनी ओर से बात चलाये तो संसर्ग के योग्य होने पर ही उसके संसर्ग करे,
अन्यथा नहीं ॥ २१ ॥
तेषूपजपन्त्वन्यत्र स्थितः स्वयमुपजपेत् ॥ २२ ॥
जो यहाँ से जाकर वहाँ जम गया और सन्देश भेजने पर भी जमा रहे, उससे स्वयं बातें
करनी चाहिये ॥ २२ ॥
व्यलीकार्थं निष्कासितो मयासावन्यत्र गतो यत्नादानेतव्यः ॥ २३ ॥
इस के कारण—मैंने इसे अपराध पर निकाला था और मेरे यहाँ से यह वहाँ जाकर जम
गया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक लाना चाहिये ॥ २३ ॥
इतः प्रवृत्तसम्भाषो वा ततो भेदमवाप्स्यति ॥ २४ ॥
अथवा यहाँ से बातें चलने पर वहाँ से अलग हो जायेगा ॥ २४ ॥
तदर्थाभिघातं करिष्यति ॥ २५ ॥
मुझसे अनुरक्त होकर वह दूसरी वेश्या को आर्थिक हानि पहुँचायेगा ॥ २५ ॥
अर्थागमकालो वास्य। स्थानवृद्धिरस्य जाता। लब्धमनेनाधिकरणम्।
दारैर्वियुक्तः। पारतन्त्र्याद् व्यावृत्तः। पित्रा भ्रात्रा वा विभक्तः ॥ २६ ॥
यह इसकी धनप्राप्ति का समय है। इसके व्यापार या नौकरी में उन्नति हुई है, इसे धन या
पद आदि का अधिकार मिल गया है, इस समय यह अपनी स्त्रियों से अलग रह रहा है, इसकी
परतन्त्रता समाप्त हो गयी है, यह अपने पिता या भाई से अलग हो गया है ॥ २६ ॥
अनेन वा प्रतिबद्धमनेन सन्धिं कृत्वा नायकं धनिनमवाप्स्यामि ॥ २७ ॥
नायक इसका मित्र है, मैं इससे मिलकर उस धनवान् नायक को प्राप्त कर लूँगी ॥ २७ ॥
विमानिता वा भार्यया तमेव तस्यां विक्रमयिष्यामि ॥ २८ ॥
इसने मेरा अपमान किया है, अथवा अपनी स्त्री से जाकर मिल गया है। मैं युक्तिपूर्वक
इसकी स्त्री को अलग करके इससे ही लड़ा दूँगी ॥ २८ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७५
अस्य वा मित्रं मद्द्वेषिणीं सपत्नीं कामयते तदमुना भेदयिष्यामि ॥ २९ ॥
अथवा इसका मित्र मुझसे वैर मानने वाली मेरी सपत्नी (सौत) को चाहता है। मैं इसके
द्वारा उससे लड़वा दूँगी ॥ २९ ॥
चलचित्ततया वा लाघवमेनमापादयिष्यामीति ॥ ३० ॥
अथवा इसे चञ्चल चित्तवाला सिद्ध करके अन्य वेश्याओं की दृष्टि में गिरा दूँगी ॥ ३० ॥
तस्य पीठमर्दादयो मातुर्दौःशील्येन नायिकायाः सत्यप्यनुरागे विवशयाः पूर्वं
निष्कासनं वर्णयेयुः ॥ ३१ ॥
नायिका के पीठमर्द आदि विश्वस्त सेवक नायक से जाकर कहें कि वह तो आज भी
आपकी अनुरक्त है, किन्तु माता की कुटिलता के कारण विवश होकर आपको निकालना
पड़ा था ॥ ३१ ॥
वर्तमानेन चाकामायाः संसर्गं विद्वेषं च ॥ ३२ ॥
वर्तमान नायक के साथ उसका संसर्ग विना अनुराग के है, दिल से तो वह उससे घृणा ही
करती है और आपकी कामना करती है ॥ ३२ ॥
तस्याश्च साभिज्ञानैः पूर्वानुरागैरैनं प्रत्यापयेयुः ॥ ३३ ॥
उस नायिका के पहले प्रेम को पहचानपूर्वक कहकर अपनी बात का विश्वास
दिलाये ॥ ३३ ॥
अभिज्ञानं च तत्कृतोपकारसम्बद्धं स्यादिति विशीर्णप्रतिसन्धानम् ॥ ३४ ॥
पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान—उसके प्रेम की पहचान तो उसके द्वारा किये
गये पहले के उपकारों से बँधी होनी चाहिये। इस प्रकार ‘विमुक्त नायक का मिलन’ नामक
प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
अपूर्वपूर्वसंसृष्टयोः पूर्वसंसृष्टः श्रेयान्। स हि विदितशीलो दृष्टरागश्च सूपचारो
भवतीत्याचार्याः ॥ ३५ ॥
पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता : पहले मिले हुए और कभी न मिले हुए पुरुषों में पहले मिला
हुआ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसका शील-स्वभाव परिचित रहता है, उसका प्रेम देखा हुआ रहता है
और उसका उपचार सुखपूर्वक किया जा सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत
है ॥ ३५ ॥
पूर्वसंसृष्टः सर्वतो निष्पीडितार्थत्वान्नात्यर्थमर्थदो दुःखं च पुनर्विश्वासयितुम्।
अपूर्वस्तु सुखेनानुरज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ३६ ॥
यदि पूर्व नायक का सारा धन लेकर ही उसे छोड़ा है, तो न तो वह अधिक धन ही दे
सकेगा और न उसे विश्वास दिलाना ही सरल है; जबकि नया नायक सरलता से अनुरक्त किया
जा सकता है—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३६ ॥
तथापि पुरुषप्रकृतितो विशेषः ॥ ३७ ॥
पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख—तथापि इसमें पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख होता है ॥ ३७ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
अन्यां भेदयितुं गम्यादन्यतो गम्यमेव वा।
१७६ वात्स्यायन-कामसूत्र
स्थितस्य चोपघातार्थं पुनः सन्धानमिष्यते ॥ ३८ ॥
प्रतिसन्धान के कारण : वियुक्तगत कारण—इस विषय में आनुवंश्य श्लोक उद्धृत
करते हैं—
गम्य नायक से अन्य वेश्या को अलग करने के लिये, अन्य वेश्या से मिलने वाले नायक
को अलग करने के लिये और उसको धन की हानि पहुँचाने के लिये वियुक्त नायक पुनः
मिलाया जाता है ॥ ३८ ॥
बिभेत्यन्यस्य संयोगाद् व्यलीकानि च नेक्षते ।
अतिसक्तः पुमान् यत्र भयाद् बहु ददाति च ॥ ३९ ॥
वर्तमानगत कारण—जो अत्यन्त आसक्त नायक, नायिका के साथ अन्य के संसर्ग से
डरता है और उसके अपराधों को भी नहीं देखता, ऐसा पुरुष डरते डरते बहुत धन दे
देता है ॥ ३९ ॥
असक्तमभिनन्देत सक्तं परिभवेत् तथा।
अन्यदूतानुपाते च यः स्यादतिविशारदः ॥ ४० ॥
नायक को परामर्श—जो नायक अत्यन्त निपुण हो, उसे चाहिये कि किसी अन्य के दूत
के आ जाने पर, उसके सामने असमर्थ की प्रशंसा और समर्थ की निन्दा करे ॥ ४० ॥
तत्रोपयायिनं पूर्वं नारी कालेन योजयेत्।
भवेच्चाच्छिन्नसन्धाना न च सक्तं परित्यजेत् ॥ ४१ ॥
नायिका को परामर्श—वेश्या को चाहिये कि यदि नया समर्थ और वियुक्त प्रेमी, दोनों
आ रहे हों तो दोनों को समय समय पर ही मिलाये अर्थात् पहले नये धनवान् को समागम का
अवसर दे और फिर वियुक्त प्रेमी को। न वियुक्त नायक के साथ ही मिलन में हिचकिचाहट करे
और न ही नये धनवान् नायक का ही परित्याग करे ॥ ४१ ॥
सक्तं तु वशिनं नारी सम्भाव्याप्यन्यतो व्रजेत्।
ततश्चार्थमुपादाय सक्तमेवानुरञ्जयेत् ॥ ४२ ॥
समर्थ और अनुरक्त को प्राथमिकता—वेश्या वशीभूत समर्थ पुरुष से कहकर अन्य के
पास चली जाये और वहाँ से धन लाकर समर्थ पुरुष को विधिवत् प्रसन्न करे ॥ ४२ ॥
आयतिं प्रसमीक्ष्यादौ लाभं प्रीतिं च पुष्कलाम्।
सौहृदं प्रतिसन्दध्याद्विशीर्णं स्त्री विचक्षणा ॥ ४३ ॥
वियुक्त को मिलाते समय ध्यातव्य बातें—चतुर वेश्या को चाहिये कि सर्वप्रथम
प्रभाव, लाभ, अत्यधिक प्रेम और सौहार्द को देख ले, तभी वियुक्त नायक को मिलाये ॥ ४३ ॥
अर्थागमोपाय प्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
६. वैशिक अधिकरण १७७
पञ्चम अध्याय
लाभविशेषप्रकरण
गम्यबाहुल्ये बहु प्रतिदिनं च लभमाना नैकं प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
अपरिग्रह का कारण—मिलने वाले पुरुषों की अधिकता होने पर प्रतिदिन बहुत मिलें,
तो एक को ही न स्वीकारे अर्थात् नित्य नये नये पुरुषों को सम्भोग का अवसर प्रदान करें ॥ १ ॥
देशं कालं स्थितिमात्मनो गुणान् सौभाग्यं चान्याभ्यो न्यूनातिरिक्ततां चावेक्ष्य
रजन्यामर्थं स्थापयेत् ॥ २ ॥
एक रात की फीस (शुल्क)—देश, काल, अपनी स्थिति, गुण, सौभाग्य और दूसरी
वेश्याओं से अपने रूप, सौन्दर्य, गुण आदि की अधिकता या न्यूनता देखकर ही अपनी एक रात
का शुल्क नियत करे ॥ २ ॥
गम्ये दूताँश्च प्रयोजयेत् । तत्प्रतिबद्धाँश्च स्वयं प्रहिणुयात् ॥ ३ ॥
दूत भेजने की रीति—समागम योग्य पुरुषों का अभिप्राय जानने के लिये अपने दूत लगा
दे और नायक के सम्पर्क वाले व्यक्तियों से स्वयं कहे ॥ ३ ॥
द्वित्रिश्चतुरिति लाभातिशयग्रहार्थमेकस्यापि गच्छेत् । परिग्रहं च चरेत् ॥ ४ ॥
अधिक लाभ की रीति—एक से अधिक लाभ पाने की इच्छा से दो, तीन चार रात एक
नियत शुल्क पर ही समागम करे ओर पत्नी की तरह उसकी सेवा करता रहे ॥ ४ ॥
गम्ययौगपद्ये तु लाभसाम्ये यद्द्रव्यार्थिनी स्यात्तद्दायिनि विशेषः प्रत्यक्ष
इत्याचार्याः ॥ ५ ॥
एक साथ आने वालों से अधिक लाभ—मिलने योग्य पुरुषों के एक साथ आने पर
और समान लाभ (फीस) होने पर भी वेश्या जिसका धन ले लेगी, वह दूसरों से अधिक ही
देगा, यह स्पष्ट है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत है ॥ ५ ॥
अप्रत्यादेयत्वात् सर्वकार्याणां तन्मूलत्वाद्विरणयद इति वात्स्यायनः ॥ ६ ॥
क्योंकि सिक्का (धन) अविश्वास की अवस्था में भी नहीं लौटाया जा सकता और वही
सारे कार्य सम्पन्न करने का साधन है, इसलिये सिक्का देने वाला ही गम्य है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ ६ ॥
सुवर्णरजतताम्रकांस्यलोहभाण्डोपस्करास्तरणप्रावरणवासोविशेषगन्धद्रव्य-
कटुकभाण्डघृततैलधान्यपशुजातीनां पूर्वपूर्वतो विशेषः ॥ ७ ॥
फीस का स्वरूप—सोना, चाँदी, ताँबा, कांसा, लोहा, बर्तन, सामान, बिस्तर, लिहाफ,
अन्य वस्त्र, द्रव्य, काली मिर्च, घड़ा (कलश), घी, तेल, अन्न, पशु—इन वस्तुओं में उत्तरोत्तर
की अपेक्षा पूर्व पूर्व उत्तम हैं ॥ ७ ॥
यत्तत्र साम्याद्वा द्रव्यसाम्ये मित्रवाक्यादतिपातित्वादायतितो गम्यगुणतः
प्रीतितश्च विशेषः ॥ ८ ॥
समानता में प्राथमिकता—यदि दो समान प्रेमी हों या समान धन देने वाले हों तो मित्र
१७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोग जिसे अभीष्ट समझें अथवा जिस नायक को अधिक गुणी, सुन्दर और प्रभावशाली समझें,
उसी की दी हुई वस्तु ग्रहण करे ॥ ८ ॥
रागित्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ ९ ॥
रागी से त्यागी की श्रेष्ठता—अनुरक्त नायक की अपेक्षा दानशील त्यागी से अधिक लाभ
प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ९ ॥
शक्यो हि रागिणि त्याग आधातुम् ॥ १० ॥
उपायों द्वारा रागी की त्यागशीलता भी सम्भव—अनुरक्त नायक को उपायों द्वारा
त्यागशील बनाया जा सकता है ॥ १० ॥
लुब्धोऽपि हि रक्तस्त्यजति न तु त्यागी निर्बन्धाद्रज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ११ ॥
अनुरक्त होने पर तो लोभी पुरुष भी धन दे सकता है, किन्तु त्यागशील को उपायों द्वारा
अनुरक्त नहीं किया जा सकता—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ११ ॥
तत्रापि धनवदधनवतोर्धनवति विशेषः । त्यागप्रयोजनकर्त्रोः प्रयोजनकर्तरि
विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १२ ॥
निर्धन से धनवान् और त्यागशील से कार्यसाधक श्रेष्ठ—इसमें भी निर्धन की अपेक्षा
धनवान् श्रेष्ठ है और त्यागशील की अपेक्षा वेश्या का स्वार्थसाधक श्रेष्ठ है—ऐसा कामशास्त्र के
पूर्व आचार्यों का मत है ॥ १२ ॥
प्रयोजनकर्ता सकृत्कृत्वा कृतिनमात्मानं मन्यते त्यागी पुनरतीतं नापेक्षत इति
वात्स्यायनः ॥ १३ ॥
वेश्या का कार्य सिद्ध करने वाला तो एक बार कार्य सिद्ध करके अपने को कृती मान लेता
है, किन्तु त्यागशील तो अतीत में दिये गये धन के विषय में सोचता ही नहीं है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ १३ ॥
तत्राप्यात्ययिकतो विशेषः ॥ १४ ॥
आवश्यकतानुसार विशिष्ट—आवश्यकतानुसार इन दोनों में भी विशेषता होती
है ॥ १४ ॥
कृतज्ञत्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १५ ॥
कृतज्ञ और त्यागी—कृतज्ञ और त्यागी—दोनों में त्यागी से विशेष लाभ प्राप्त किया जा
सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १५ ॥
चिरमाराधितोऽपि त्यागी व्यलीकमेकमुपलभ्य प्रतिगणिकया वा
मिथ्यादूषितः श्रममतीतं नापेक्षते ॥ १६ ॥
त्यागी की न्यूनता—बहुत समय तक उपायों द्वारा सिद्ध किया गया त्यागी, वेश्या के एक
ही अपराध को देखकर अथवा प्रतिगणिका (स्पर्धी वेश्या) द्वारा बहकाये जाने पर वेश्या द्वारा
उठाये गये कष्टों को नहीं देखता ॥ १६ ॥
प्रायेण हि तेजस्विन ऋजवोजनादृताश्च त्यागिनो भवन्ति ॥ १७ ॥
६. वैशिक अधिकरण १७९
त्यागियों का स्वभाव—प्रायः त्यागी तेजस्वी, सरल (निष्कपट) और अनादर को न
सह पाने वाले होते हैं ॥ १७ ॥
कृतज्ञस्तु पूर्वश्रमापेक्षी न सहसा विरज्यते। परीक्षितशीलत्वाच्च न मिथ्या
दूष्यत इति वात्स्यायनः ॥ १८ ॥
कृतज्ञ—कृतज्ञ नायिका के परिश्रम को समझता है इसलिये अकस्मात् विरक्त नहीं होता।
क्योंकि वह नायिका के शील की परीक्षा किये रहता है इसलिये स्पर्धी वेश्या के बहकावे में नहीं
आता—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ १८ ॥
तत्राप्यायतितो विशेषः ॥ १९ ॥
रागी, त्यागी, कृतज्ञ—तीनों में विशेष—रागी, त्यागी और कृतज्ञ—इन तीनों में से
भविष्य के प्रभाव को देखकर ही लाभ उठाना चाहिये ॥ १९ ॥
मित्रवचनार्थगमयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २० ॥
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता—मित्रों के परामर्श और अर्थप्राप्ति—इन
दोनों में अर्थप्राप्ति में विशेष लाभ तो प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत
है ॥ २० ॥
सोऽपि ह्यर्थागमो भविता। मित्रं तु सकृद्वाक्ये प्रतिहते कलुषितं स्यादिति
वात्स्यायनः ॥ २१ ॥
मित्रों का परामर्श न मानने पर धन तो मिलेगा ही, पर अपनी बात न मानने पर वे अप्रसन्न
हो जायेंगे—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २१ ॥
तत्राप्यतिपाततो विशेषः ॥ २२ ॥
इस अर्थसञ्चय में भी फिर न मिलने वाले को प्राप्त कर लेना चाहिये। उस समय की
अपेक्षा से जो अर्थ फिर हाथ न आये, उसे प्राप्त कर लेना चाहिये, यह विशेष लाभ है ॥ २२ ॥
तत्र कार्यसन्दर्शनेन मित्रमनुनीय श्वोभूते वचनमस्त्विति ततोऽतिपातिनमर्थं
प्रतिगृह्णीयात् ॥ २३ ॥
मित्रों से अनुनय-विनय—कार्य के बहाने मित्र से अनुनय विनय कर तात्कालिक लाभ
प्राप्त कर ले और उनसे कहे कि कल आपकी बात अवश्य मानूँगी ॥ २३ ॥
अर्थगमानर्थप्रतीघातयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २४ ॥
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण—अर्थ की प्राप्ति और अनर्थ के निवारण में अर्थ की
प्राप्ति में ही विशेष लाभ है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥
अर्थः परिमितावच्छेदः, अनर्थः पुनः सकृत्प्रसृतो न ज्ञायते क्वावतिष्ठत इति
वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
अर्थ की प्राप्ति तो नियमित रूप से होती ही रहती है, किन्तु यदि अनर्थ एक बार प्रारम्भ
हो जाये तो पता नहीं कब तक चलता रहे, इसलिये पहले उस पर ही ध्यान देना चाहिये—ऐसा
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥
१८० वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्रापि गुरुलाघवकृतो विशेषः ॥ २६ ॥
व्यवस्थाविषयक विचार—यहाँ भी न्यूनाधिक समझकर ही विशेष को ग्रहण करना
चाहिये ॥ २६ ॥
एतेनार्थसंशयादनर्थप्रतीकारे विशेषो व्याख्यातः ॥ २७ ॥
सिद्धान्त का स्पष्टीकरण—इस कथन से यह बात भी कह दी गयी है कि अर्थ के संशय
से अनर्थ के निवारण में ही विशेष लाभ है ॥ २७ ॥
देवकुलतडागारामणां करणम्, स्थलीनामग्निचैत्यानां निबन्धनम्,
गोसहस्त्राणां पात्रान्तरितं ब्राह्मणेभ्यो दानम्, देवतानां पूजोपहारप्रवर्तनम्,
तद्व्ययसहिष्णोर्वा धनस्य परिग्रहणमित्युत्तमगणिकानां लाभातिशयः ॥ २८ ॥
उत्तम गणिकाओं के लाभ—देवमन्दिर बनवाना, कूआ-बावड़ी खुदवाना, बाग
लगवाना, आवागमन के लिये पुल बनवाना, निवासस्थान के बाहर मिट्टी का घर या मन्दिर
बनवाकर अग्निहोत्र कराना, किसी को माध्यम बनाकर ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान देना,
देवताओं के भोग एवं प्रसाद का प्रबन्ध करना—इन धार्मिक और लोकोपकारी कार्यों के व्यय
को सहन कर ले, इतना धन उत्तम गणिकाओं का अतिशय लाभ है ॥ २८ ॥
सार्वाङ्गिकोऽलङ्कारयोगो गृहस्योदारस्य करणम्। महार्हैर्भाण्डैः परिचारकैश्च
गृहपरिच्छदस्योज्ज्वलतेति रूपाजीवानां लाभातिशयः ॥ २९ ॥
रूपाजीवा के लाभ—सम्पूर्ण शरीर पर आभूषण धारण करना, निवासस्थान को
कलात्मक ढंग से सजाकर रखना और उसमें बहुमूल्य बर्तनों और नौकरों द्वारा गृह के भीतरी
भाग को साफ-सुथरा और सुसज्जित रखना—ये रूपाजीवा के विशेष लाभ हैं ॥ २९ ॥
नित्यं शुक्लमच्छादनमपक्षुधमन्नपानं नित्यं सौगन्धिकेन ताम्बूलेन च योगः
सहिरण्यभागमलङ्करणमिति कुम्भदासीनां लाभातिशयः ॥ ३० ॥
कुम्भदासी के लाभ—नित्य साफ सुथरे कपड़े पहनना, भरपेट स्वादिष्ट भोजन करना,
सुगन्धित तेल प्रयोग करना, सुवासित पान खाना, चाँदी के आभूषणों के साथ एकाध सोने का
आभूषण भी पहनना—ये कुम्भदासियों के अतिशय लाभ हैं ॥ ३० ॥
एतेन प्रदेशेन मध्यमाधमानामपि लाभातिशयान् सर्वासामेव योजयेदित्या-
चार्याः ॥ ३१ ॥
लाभ पर आचार्यों का मत—जो ऊपर गणिका, रूपाजीवा और कुम्भदासी के विशेष
लाभ बताये गये हैं, उनको इसी रीति से मध्यम और अधम के साथ भी समझ लेना चाहिये—
यह कामशास्त्र के पूर्वाचार्यों का मत है ॥ ३१ ॥
देशकालविभवसामर्थ्यानुरागलोकप्रवृत्तिवशादनियतलाभादियमवृत्तिरिति
वात्स्यायनः ॥ ३२ ॥
देश, काल, वैभव, सामर्थ्य, अनुराग और लोकप्रवृत्ति (लोकाचार) के कारण लाभ
निश्चित नहीं रहता, अतएव वेश्या की वृत्ति सदैव अनियत और अनियमित रहती है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३२ ॥
६. वैशिक अधिकरण १८१
गम्यमन्यतो निवारयितुकामा सक्तमन्यस्यामपहर्तुकामा वा अन्यां वा लाभतो
वियुयुक्षमाणागम्यसंसर्गादात्मनः स्थानं वृद्धिमायतिमभिगम्यतां च मन्यमाना
अनर्थप्रकारे वा साहाय्यमेनं कारयितुकामा सक्तस्य वान्यस्य व्यलीकार्थिनी
पूर्वोपकारमकृतमिव पश्यन्ती केवलप्रीत्यर्थिनी वा कल्याणबुद्धेरल्पमपि लाभं
प्रतिगृह्णीयात्॥ ३३॥
अल्प लाभ के स्थान—यदि वेश्या अपने नायक को किसी अन्य वेश्या के पास जाने से
रोकना चाहे, अन्य नायिका के धनवान् नायक को आकृष्ट करना चाहे, अन्य नायिका को
आर्थिक हानि पहुँचाना चाहे, नायक के साथ संसर्ग से उचित स्थान, वृद्धि, उज्ज्वल भविष्य और
नायकों की इच्छा की वस्तु बनवाना चाहे, अनर्थों के निवारण में उसकी सहायता की इच्छा रखे
अथवा पहले किये गये उपकारों को भूलकर निर्धन नायक को निकलवाना चाहे और किसी
शुभचिन्तक प्रेमी को अपना बनाना चाहे तो वेश्या अल्प लाभ भी ले सकती है॥ ३३॥
आयत्यर्थिनी तु तमाश्रित्य चानर्थं प्रतिचिकीर्षन्ती नैव प्रतिगृह्णीयात्॥ ३४॥
लाभ न लेने के स्थान—भविष्य में प्रभाव चाहने वाली वेश्या, जिसके बल पर अनर्थों
को रोकना चाहे, उससे कुछ न ले॥ ३४॥
त्यक्ष्याम्येनमन्यतः प्रतिसन्धास्यामि, गमिष्यति दारैर्योक्ष्यते नाशयिष्यत्य-
नर्थान्, अङ्कुशभूत उत्तराध्यक्षोऽस्यागमिष्यति स्वामी पिता वा, स्थानभ्रंशो वास्य
भविष्यति चलचित्तश्चेति मन्यमाना तदात्वे तस्माल्लाभमिच्छेत्॥ ३५॥
तत्काल लाभ के स्थान—इस नायक को छोड़कर अन्य से सम्बन्ध बनाऊँगी, यह
स्वयं चला जायेगा, अपनी स्त्रियों से मिल जायेगा, यह अनर्थों को नष्ट कर देगा, इसके ऊपर
स्वामी या पिता का अंकुश विद्यमान है अथवा इसका पद या अधिकार भ्रष्ट हो जायेगा, यह
चञ्चल चित्त का व्यक्ति है—यदि वेश्या ऐसा समझे तो तत्काल जो लाभ मिल सकता हो, प्राप्त
कर ले॥ ३५॥
प्रतिज्ञातमीश्वरेण प्रतिग्रहं लप्स्यते अधिकरणं स्थानं वा प्राप्स्यति वृत्ति-
कालोऽस्य वा आसन्नः वाहनमस्यागमिष्यति स्थलपत्रं वा सस्यमस्य पक्ष्यते कृतम-
स्मिन्न नश्यति नित्यमविसंवादको वेत्यायत्यामिच्छेत्। परिग्रहकल्पं वाचरेत्॥ ३६॥
भविष्य में लाभ के स्थान— राज्य या शासन से इसे धन की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी,
इसको महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त होगा या इसे किसी प्राधिकरण का प्रमुख बनाया जायेगा, इसकी
जीविकाप्राप्ति का समय निकट ही है, इसका वाहन व्यापारिक वस्तुएँ बेचकर शीघ्र ही आने
वाला है, इसकी भूमि उर्वर है, इसकी फसल पक रही है, यह कृतज्ञ है, इसलिये इसके साथ
संसर्ग हानिकारक नहीं है, यह कभी झूठ नहीं बोलता, इसलिये कहकर अवश्य देगा—यदि
ऐसी स्थिति हो तो भविष्य में लाभ की इच्छा रखे और पत्नी के समान उसकी सेवा करे॥ ३६॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
कृच्छाधिगतवित्तांश्च राजवल्लभनिष्ठुरान्।
आयत्यां च तदात्वे च दूरादेव विवर्जयेत्॥ ३७॥
१८२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अग्राह्य पुरुष—जिन्हें कठिनता से धन मिला हो, जो राजा को प्रसन्न करने के लिये क्रूर
कर्म करते हों, उनसे तत्काल या भविष्य में अधिक लाभ की सम्भावना भी हो तब भी उनसे दूर
ही रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
अनर्थो वर्जने येषां गमनेऽभ्युदयस्तथा।
प्रयत्नेनापि तान् गृह्य सापदेशमुपक्रमेत् ॥ ३८ ॥
ग्राह्य पुरुष—जिनको ना करने पर अनर्थ की सम्भावना हो और मिलने पर अभ्युदय की
प्राप्ति निश्चित हो, ऐसे नायकों को प्रयत्नपूर्वक आकृष्ट करके समागम का अवसर देना
चाहिये ॥ ३८ ॥
प्रसन्ना ये प्रयच्छन्ति स्वल्पेऽप्यगणितं वसु।
स्थूललक्ष्यान्महोत्साहाँस्तान् गच्छेत् स्वैरपि व्ययैः ॥ ३९ ॥
अर्थप्रयोजन के पूरक नायक—जो अल्प प्रसन्नता पर भी असीमित धन दे देते हैं, ऐसे
स्थूल लक्ष्य वाले पुरुषों को अपना धन खर्च करके भी मिलाना चाहिये ॥ ३९ ॥
लाभविशेषप्रकरण नामक पञ्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥
●
षष्ठ अध्याय
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
अर्थानाचर्यमाणानर्था अप्यनूद्भवन्त्यनुबन्धाः संशयाश्च ॥ १ ॥
अर्थोपार्जन के लिये प्रयास करती हुई वेश्या के समक्ष अनेक प्रकार के अनर्थ, अनुबन्ध
और संशय उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १ ॥
ते बुद्धिदौर्बल्यादतिरागादत्यभिमानादतिदम्भादत्यार्जवादतिविश्वासादति-
क्रोधात् प्रमादात् साहसाद्दैवयोगाच्च स्युः ॥ २ ॥
अनर्थत्रिवर्ग की उत्पत्ति के कारण—अनर्थ, उनके अनुबन्ध और संशय इन कारणों
से उत्पन्न होते हैं—बुद्धि की दुर्बलता से, अधिक प्रेम से, अतिशय अभिमान से, अत्यधिक
सरलता से, अत्यन्त विश्वास करने से, अतिक्रोध से, प्रमाद (असावधानी) से, अविवेकपूर्ण कार्य
करने से और दैवयोग से ॥ २ ॥
तेषां फलम्—कृतस्य व्ययस्य निष्फलत्वमनायतिरागमिष्यतोऽर्थस्य निवर्तन-
प्राप्तस्य निष्क्रमणं पारुष्यस्य प्राप्तिर्गर्भ्यता शरीरस्य प्रघातः केशानां छेदनं
पातनमङ्गवैकल्यापत्तिः ॥ ३ ॥
दुष्परिणाम—इनके ये दुष्परिणाम हैं—किये गये खर्च का निष्फल हो जाना, प्रभाव और
अनुराग का मिट जाना, हाथ आते धन का न मिलना और प्राप्त धन का हाथ से निकल जाना,
६. वैशिक अधिकरण १८३
स्वभाव में कठोरता आना, अपनी गम्यता और शरीर का उपघात (विनाश), बालों का काट
लिया जाना, बन्धन एवं ताड़न तथा अङ्ग-भङ्ग कर देना ॥ ३ ॥
तस्मात्तानादित एव परिजिहीर्षेदर्थभूयिष्ठाँश्चोपेक्षेत ॥ ४ ॥
उपाय का समुचित समय—अतएव वेश्या को चाहिये कि बुद्धि की दुर्बलता आदि
अनर्थ के कारणों को प्रारम्भ से ही दूर कर दे और यदि उनसे अधिक धन भी मिलता हो तो भी
उनकी उपेक्षा कर दे ॥ ४ ॥
अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः ॥ ५ ॥
अर्थ, धर्म और काम—यह अर्थत्रिवर्ग कहलाता है ॥ ५ ॥
अनर्थोऽधर्मो द्वेष इत्यनर्थत्रिवर्गः ॥ ६ ॥
अनर्थत्रिवर्ग—अनर्थ, अधर्म और द्वेष—यह अनर्थत्रिवर्ग है ॥ ६ ॥
तेष्वाचर्यमाणेष्वन्यस्यापि निष्पत्तिरनुबन्धः ॥ ७ ॥
अनुबन्ध-स्वरूप—अर्थ आदि को सिद्ध करते हुए, उसके साथ जो दूसरा स्वतः सिद्ध
हो जाये, उसे 'अनुबन्ध' कहते हैं ॥ ७ ॥
सन्दिग्धायां तु फलप्राप्तौ स्याद्वा न वेति शुद्धसंशयः ॥ ८ ॥
शुद्धसंशय—'यह होगा या नहीं'? इस प्रकार फलप्राप्ति में सन्देह होना 'शुद्ध संशय'
कहलाता है ॥ ८ ॥
इदं वा स्यादिदं वेति सङ्कीर्णः ॥ ९ ॥
संकीर्णसंशय—'यह फल होगा या यह फल'?—यह सङ्कीर्णसंशय है ॥ ९ ॥
एकस्मिन् क्रियमाणे कार्ये कार्यद्वयस्योत्पत्तिरुभयतोयोगः ॥ १० ॥
उभयतोयोग—जब एक कार्य करने पर दूसरे कार्य की उत्पत्ति स्वतः हो जाये तो उसे
'उभयतो योग' कहते हैं ॥ १० ॥
समन्तादुत्पत्तिः समन्ततोयोग इति तानुदाहरिष्यामः ॥ ११ ॥
समन्ततोयोग—जब चारों ओर से उत्पत्ति हो तो उसे 'समन्ततो योग' कहते हैं। इसके
उदाहरण आगे देंगे ॥ ११ ॥
विचारितरूपोऽर्थत्रिवर्गः। तद्विपरीत एवानर्थत्रिवर्गः ॥ १२ ॥
दोनों त्रिवर्ग—जिसके स्वरूप पर विचार किया जा चुका है वह अर्थत्रिवर्ग है। इसके
विपरीत अनर्थत्रिवर्ग है ॥ १२ ॥
यस्योत्तमस्याभिगमने प्रत्यक्षतोऽर्थलाभो ग्रहणीयत्वमायतिरागमः प्रार्थनीयत्वं
चान्येषां स्यात्सोऽर्थोऽर्थानुबन्धः ॥ १३ ॥
अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—जिस उत्तम नायक के साथ समागम करने पर
नायिका को केवल अर्थलाभ ही न हो, अपितु उस का प्रभाव बढ़ जाये, वह अन्य नायकों के
लिये आकांक्षा की वस्तु बन जाये, वे समागम हेतु प्रार्थना करें और नायिका को अर्थ की प्राप्ति
हो तो यह अर्थ प्रथम या प्रधान अर्थ के साथ सम्बद्ध होने के कारण अर्थोऽर्थानुबन्धः (अर्थ का
अर्थ के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १३ ॥
१८४ वात्स्यायन-कामसूत्र
लाभमात्रे कस्यचिदन्यस्य गमनं सोऽर्थो निरनुबन्धः ॥ १४ ॥
अनुबन्धरहित अर्थ—केवल अर्थलाभ की दृष्टि से किसी से भी समागम कर लेना
अनुबन्धरहित अर्थ है ॥ १४ ॥
अन्यार्थपरिग्रहे सक्तादायतिच्छेदनमर्थस्य निष्क्रमणं लोकविद्विष्टस्य वा
नीचस्य गमनमायतिघ्नमर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १५ ॥
अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—नायक के हाथों पराया (चुराया हुआ) अर्थ लेने से
वेश्या का प्रभाव कम होता है और वह अर्थ भी निकल जाता है अथवा लोकद्रोही या अधम
पुरुष के साथ समागम करने से प्रभाव कम होता है और ऐसा अर्थ अनेक अनर्थों को उत्पन्न
करता है, अतएव इसे अर्थोऽनुर्थानुबन्धः (अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध) कहते हैं ॥ १५ ॥
स्वेन व्ययेन शूरस्य महामात्रस्य प्रभवतो वा लुब्धस्य गमनं निष्फलमपि
व्यसनप्रतीकारार्थं महतश्चार्थघ्नस्य निमित्तस्य प्रशमनमायतिजननं वा सोऽनर्थो-
ऽर्थानुबन्धः ॥ १६ ॥
अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—अपने व्यय पर किसी शूरवीर, प्रभावशाली पुरुष,
महामन्त्री या लोभी के साथ समागम निष्फल (तत्काल अर्थहीन) होने पर भी सङ्कट के निवारण
के लिये, महान् अर्थनाशक कारणों को शान्त करने के लिये और प्रभाव बढ़ाने के लिये तो है।
इस प्रकार अर्थप्राप्ति रूप एक प्रयोजन के सिद्ध न होने पर भी अनेक प्रयोजन सिद्ध करने वाला
है—इसे ही 'अनर्थोऽर्थानुबन्धः'—अनर्थ का अर्थ से अनुबन्ध कहा जाता है ॥ १६ ॥
कदर्यस्य सुभगमानिनः कृतघ्नस्य वातिसन्धानशीलस्य स्वैरपि व्ययैस्तथारा-
धनमन्ते निष्फलं सोऽनर्थो निरनुबन्धः ॥ १७ ॥
अनुबन्धरहित अनर्थ—अपने को सुन्दर समझने वाले, कृपण, कृतघ्न या अत्यधिक
चाटुकारिता चाहने वाले पुरुष के साथ जब वेश्या अपने व्यय पर समागम करती है तो उसका
धन और अनुराग, दोनों ही निष्फल हो जाते हैं। किसी के भी साथ सम्बद्ध न होने के कारण
ऐसा अनर्थ अनुबन्धरहित कहलाता है ॥ १७ ॥
तस्यैव राजवल्लभस्य क्रौर्यप्रभावाधिकस्य तथैवाराधनमन्ते निष्फलं
निष्कासनं च दोषकरं सोऽनर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १८ ॥
अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—कृपण पुरुषों से केवल अनुबन्धरहित अनर्थ ही
उत्पन्न हो, ऐसा नहीं है; कभी-कभी अनर्थ से सम्बन्धित अनर्थ भी उत्पन्न हो जाते हैं। इसी
प्रकार किसी क्रूर राजपुरुष या प्रशासनिक अधिकारी के साथ समागम करना निष्फल होता है
और उसे निकाल देना अनेक अनर्थों को उत्पन्न करने वाला बन जाता है। इस प्रकार यह अनर्थ
अपने साथ अनेक अनर्थों का सम्बन्ध रखने के कारण ‘अनर्थोऽनर्थानुबन्धः' (अनर्थ का अनर्थ
के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १८ ॥
एवं धर्मकामयोरप्यनुबन्धान् योजयेत् ॥ १९ ॥
धर्म और काम की अनुबन्ध योजना—इसी प्रकार धर्म और काम के अनुबन्धों की भी
योजना कर लेनी चाहिये ॥ १९ ॥
६. वैशिक अधिकरण १८५
परस्परेण च युक्त्या सङ्किरेदित्यनुबन्धाः ॥ २० ॥
इनको परस्पर युक्तिपूर्वक मिलाये । इस प्रकार अनुबन्ध पूर्ण हुए ॥ २० ॥
परितोषितोऽपि दास्यति न वेत्यर्थसंशयः ॥ २१ ॥
शुद्धसंशय : अर्थसंशय—सन्तुष्ट होने पर भी देगा या नहीं ? यह अर्थसंशय है ॥ २१ ॥
निष्पीडितार्थमफलमुत्सृजन्त्या अर्थमलभमानाया धर्मः स्यान्न वेति धर्म-
संशयः ॥ २२ ॥
धर्मसंशय—जिसका समस्त धन निचोड़ लिया हो और उससे कुछ धन का मिल पाने
के कारण उसे छोड़ने को उद्यत हो, अर्थ न मिल पाने पर उसे छोड़ना वेश्या के लिये धर्म होगा
या नहीं ?—इस प्रकार का संशय धर्मसंशय है ॥ २२ ॥
अभिप्रेतमुपलभ्य परिचारकमन्यं वा क्षुद्रं गत्वा कामः स्यान्न वेति काम-
संशयः ॥ २३ ॥
कामसंशय—अभीष्ट नायक को पाकर भी किसी अन्य आत्मीय सेवक या क्षुद्रव्यक्ति के
निकट जाकर 'इसके साथ समागम करने पर काम होगा या नहीं' ? इस प्रकार का सन्देह करना
कामसंशय कहलाता है ॥ २३ ॥
प्रभाववान् क्षुद्रोऽनभिगतोऽनर्थं करिष्यति न वेत्यनर्थसंशयः ॥ २४ ॥
अनर्थसंशय—प्रभावशाली नीच पुरुष समागम का अवसर न मिलने पर अनर्थ करेगा या
नहीं ?—यह अनर्थसंशय है ॥ २४ ॥
अत्यन्तनिष्फलः सक्तः परित्यक्तः पितृलोकं यायात्तत्राधर्मः स्यान्न वेत्यधर्म-
संशयः ॥ २५ ॥
अधर्मसंशय—समागम के लिये उत्सुक निर्धन नायक को प्रयोजनहीन मानकर छोड़
दिया गया हो और फिर यह सोचा जाये कि यदि यह मर जाये तो अधर्म होगा या नहीं ?—ऐसा
सन्देह अधर्मसंशय कहलाता है ॥ २५ ॥
रागस्यापि विवक्षायामभिप्रेतमनुपलभ्य विरागः स्यान्न वेति द्वेषसंशयः । इति
शुद्धसंशयाः ॥ २६ ॥
द्वेषसंशय—कामव्यथा से पीड़ित वेश्या अभीष्ट नायक को न पाकर जब कामव्यथा के
शमन के लिये छटपटाती है, उस समय उसे बिना मिले विराग होगा या नहीं, यह सन्देह
द्वेषसंशय कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध संशयवर्णन पूर्ण हुआ । ॥ २६ ॥
अथ सङ्कीर्णाः ॥ २७ ॥
सङ्कीर्णसंशय—अब सङ्कीर्णसंशयों को कहते हैं ॥ २७ ॥
आगन्तोरविदितशीलस्य वल्लभसंश्रयस्य प्रभविष्णोर्वा समुपस्थितस्यारा-
धनमर्थोऽनर्थ इति संशयः ॥ २८ ॥
अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता—आश्रित या प्रभावशाली नायक की उपस्थिति में यदि
अपरिचित पुरुष समागम के लिये आ जाये तो उसका आराधन अर्थकर है या अनर्थकर ?—यह
सन्देह होना—यह अर्थ और अनर्थ का संशय है ॥ २८ ॥
१८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
श्रोत्रियस्य ब्रह्मचारिणो दीक्षितस्य व्रतिनो लिङ्गिनो वा मां दृष्ट्वा जातरागस्य
मुमूर्षोर्मित्रवाक्यादानृशंस्याच्च गमनं धर्मोऽधर्म इति संशयः ॥ २९ ॥
धर्म और अधर्म की संकीर्णता—अपने को देखकर अनुरक्त हुए वेदपाठी ब्राह्मण,
ब्रह्मचारी, दीक्षित, व्रती, साधु या मरने की इच्छा रखने वाले पुरुष के साथ मित्र के कथन पर
अथवा अपनी दयालुता के कारण वेश्या का समागम करना धर्म होगा या अधर्म?—यह
धर्माधर्मसंशय कहलाता है ॥ २९ ॥
लोकादेवाकृतप्रत्ययादगुणो गुणवान् वेत्यनवेक्ष्य गमनं कामो द्वेष इति
संशयः ॥ ३० ॥
काम और द्वेष की सङ्कीर्णता—'यह गुणवान् है अथवा गुणहीन है' इस बात का स्वयं
विचार करके केवल लोकप्रवाद (संसार के कहने पर) से नायक के साथ समागम करने पर
काम होगा या द्वेष?—इस प्रकार का सन्देह काम और द्वेष की सङ्कीर्णता कहलाता है ॥ ३० ॥
सङ्किरेच्च परस्परेणेति सङ्कीर्णसंशयाः ॥ ३१ ॥
जो परस्पर मिलने से संशय हो, वे सङ्कीर्णसंशय हैं। इस प्रकार सङ्कीर्णसंशय पूर्ण
हुए ॥ ३१ ॥
यत्र परस्याभिगमनेऽर्थः सक्ताच्च सङ्घर्षतः स उभयतोऽर्थः ॥ ३२ ॥
उभयतः अर्थयोग—दूसरे नायक से अर्थ लेकर समागम करने से वेश्या पर आसक्त
नायक भी दूसरे नायक से सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिये अर्थ देता है, तो दोनों ओर से अर्थ का
योग होने से यह 'उभयतो अर्थयोग' हुआ ॥ ३२ ॥
यत्र स्वेन व्ययेन निष्फलमभिगमनं सक्ताच्चामर्षिताद्वित्तप्रत्यादानं स उभ-
यतोऽनर्थः ॥ ३३ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जहाँ नायिका अपना धन व्यय करके नायक के साथ समागम
करती है और निष्फल रहता है तथा दूसरी ओर अप्रसन्न अनुरक्त नायक से उसके द्वारा दिये गये
अर्थ के छिन जाने का भय हो तो इसे 'उभयतः अनर्थयोग' कहते हैं ॥ ३३ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थो भविष्यति न वेत्याशङ्का सक्तोऽपि सङ्घर्षाद्दास्यति न वेति स
उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३४ ॥
उभयतः अर्थसंशय—जिस समागम में 'अर्थ प्राप्त होगा या नहीं'? यह शंका हो और
अनुरक्त नायक भी संघर्ष के कारण देगा या नहीं—यह संशय हो तो इसे 'उभयतः अर्थसंशय'
कहा जाता है ॥ ३४ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः क्रोधादपकारं करिष्यति न वेति सक्तो
वामर्षितो दत्तं प्रत्यादास्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः। इत्यौद्दालकेरुभयतो
योगाः ॥ ३५ ॥
उभयतो अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके अपूर्व नायक के साथ समागम करना
पड़े, इससे पूर्व नायक क्रोधवश अपकार कर देगा या नहीं?—यह संशय हो अथवा अनुरक्त
नायक भी अप्रसन्न होकर दिये गये धन को वापस न ले ले?—यह संशय हो। इस प्रकार दोनों
६. वैशिक अधिकरण १८७
ओर से अनर्थ का संशय होने पर 'उभयतः अनर्थसंशय' होता है। उद्दालक के पुत्र श्वेकेतु
द्वारा कहे गये उभयतो योग पूर्ण हुए॥ ३५ ॥
बाभ्रवीयास्तु ॥ ३६ ॥
इस विषय में आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायी यह बताते हैं ॥ ३६ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थोनभिगमने च सक्तादर्थः स उभयतोऽर्थः ॥ ३७॥
उभयतः अर्थयोग—जिस उभयतो योग में पूर्व नायक से समागम किये बिना ही दूसरे
(अपूर्व) से अर्थ प्राप्त कर लिया जाये और बाद में अनुरक्त नायक को भी प्रसन्न कर अर्थ प्राप्त
किया जाये तो वह 'उभयतः अर्थयोग' कहलाता है ॥ ३७ ॥
यत्राभिगमने निष्फलो व्ययोऽनभिगमने च निष्प्रतीकारोऽनर्थः स उभयतोऽ-
नर्थः ॥ ३८ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जिस समागम में निष्फल व्यय हो और समागम न करने पर
अपरिहार्य संकट आने की आशंका हो, वह 'उभयतः अनर्थयोग' कहलाता है ॥ ३८ ॥
यत्राभिगमने निर्व्ययो दास्यति न वेति संशयोऽनभिगमने सक्तो दास्यति न वेति
स उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३९ ॥
उभयतो अर्थसंशय—जिस समागम में अपना तो कुछ खर्च न हो, लेकिन देगा या
नहीं? यह सन्देह बना हुआ हो और अनुरक्त नायक भी बिना समागम के देगा या नहीं? —यह
संशय हो तो यह 'उभयतः अर्थसंशय' कहलाता है ॥ ३९ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः प्रभाववान् प्राप्स्यते न वेति
संशयोऽनभिगमने च क्रोधादनर्थं करिष्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः ॥ ४० ॥
उभयतः अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके किये गये जिस समागम में यह संशय
हो कि पूर्व नायक जो प्रभावशाली पुरुष है, अब मिलेगा या नहीं और न करने पर यह संशय हो
कि क्रोध से वह अनर्थ करेगा या नहीं, दोनों ओर से अनर्थ का सन्देह होने के कारण यह
उभयतः अनर्थसंशय कहलाता है ॥ ४० ॥
एतेषामेव व्यतिकरेऽन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थः, अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽर्थसंशयः,
अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थसंशय इति षट्सङ्कीर्णयोगाः ॥ ४१ ॥
उभयतः संकीर्ण योग—इन्हीं के विषम प्रयोगों से एक-एक के छह-छह संकीर्ण योग
बनते हैं—एक से अर्थ एक से अनर्थ, एक से अर्थ एक से अर्थसंशय और एक से अर्थ एक से
अनर्थ-संशय—ये तीन श्वेतकेतु के मत से और तीन ही बाभ्रवीय मत से, दोनों मिलाकर छह
सङ्कीर्ण योग हुए। इस प्रकार छह सङ्कीर्ण योगों का विवेचन पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
तेषु सहायैः सह विमृश्य यतोऽर्थभूयिष्ठोऽर्थसंशयो गुरुरनर्थप्रशमो वा ततः
प्रवर्तेत ॥ ४२ ॥
विवेचन का प्रयोजन—इन संशयों के उपस्थित होने पर अपने सहायकों के साथ
विचार कर, जिससे अधिक अर्थवाला संशय हो अथवा जिसमें महान् अनर्थ की शान्ति हो, उसी
के साथ समागम में प्रवृत्त होना चाहिये ॥ ४२ ॥
काम० १४
१८८ वात्स्यायन-कामसूत्र
एवं धर्मकामावप्यनयैव युक्त्योदाहरेत्। सङ्कीरेच्च परस्परेण व्यतिषञ्-
येच्चेत्युभयतोयोगाः॥ ४३॥
अवशिष्टों के शुद्ध, सङ्कीर्ण और संश्लिष्ट—जिस युक्ति से अर्थ के शुद्ध उभयतो योग
बताये गये हैं उसी युक्ति से धर्म और काम के भी शुद्ध उभयतो योग बना लें, अर्थ के समान ही
इनके सङ्कीर्ण उभयतो योग भी बना लें, और फिर उनके विरोधी भाव हटाकर उन्हें परस्पर
संश्लिष्ट भी कर दें॥ ४३॥
सम्भूय च विटाः परिगृह्णन्त्येकामसौ गोष्ठीपरिग्रहः॥ ४४॥
गोष्ठीपरिग्रह—बहुत से विट (रसलम्पट) मिलकर एक वेश्या के साथ रतिक्रीड़ा करें
तो उसे ‘गोष्ठीपरिग्रह’ कहते हैं॥ ४४॥
सा तेषामितस्ततः संसृज्यमाना प्रत्येकं सङ्घर्षार्थं निर्वर्तयेत्॥ ४५॥
समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य—गोष्ठीपरिग्रह वाली वेश्या को चाहिये कि इधर
उधर मिलती हुई, नायकों से स्पर्धा कराकर उनसे धन प्राप्त कर ले॥ ४५॥
सुवसन्तकादिषु च योगे यो मे इमममुं च सम्पादयिष्यति तस्याद्य गमिष्यति मे
दुहितेति मात्रा वाचयेत्॥ ४६॥
स्पर्धा का कारण—वेश्या की माँ उसके नायकों से यह कहलवा दे कि सुवसन्तक
आदि उत्सव पर यह उसी के साथ प्रथम समागम करेगी, जो इन इन वस्तुओं को लाकर उसे
देगा॥ ४६॥
तेषां च सङ्घर्षजेऽभिगमने कार्याणि लक्षयेत्॥ ४७॥
उस समय जब नायक वेश्या से मिलने के लिये स्पर्धा करने लगे तो अपने लक्ष्य (लाभ)
पर ही ध्यान रखे॥ ४७॥
एकतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः, एकतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः, अर्धतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः,
अर्धतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः—इति समन्ततो योगाः॥ ४८॥
लाभनिर्देश—एक से अर्थ सबसे अर्थ, एक से अनर्थ सबसे अनर्थ, आधों से अर्थ सबसे
अर्थ, आधों से अनर्थ सबसे अनर्थ—ये समन्ततो योग हैं॥ ४८॥
अर्थसंशयमनर्थसंशयं च पूर्ववद्योजयेत्। सङ्कीरेच्च तथा धर्मकामावपि।
इत्यर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराः॥ ४९॥
पूर्ववत् अर्थसंशय और अनर्थसंशय की योजना कर लेनी चाहिये, साथ ही संकीर्ण को भी
समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार धर्म और काम के समन्ततो योग भी समझ लेने चाहिये। इस
प्रकार अनुबन्ध, अर्थ, अनर्थ और संशयों के विचार पूर्ण हुए॥ ४९॥
कुम्भदासी परिचारिका कुलटा स्वैरिणी नटी शिल्पकारिका प्रकाशविनष्टा
रूपाजीवा गणिका चेति वेश्याविशेषाः॥ ५०॥
कुम्भदासी, परिचारिका, कुलटा, स्वैरिणी, नटी, शिल्पकारिका, प्रकाशविनष्टा, रूपाजीवा
और गणिका—ये वेश्या के भेद हैं॥ ५०॥
७. औपनिषदिक अधिकरण १८९
सर्वासां चानुरूपेण गम्याः सहायास्तदुपराञ्जनमर्थागमोपाया निष्कासनं पुनः
सन्धानं लाभविशेषानुबन्धा अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराश्चेति वैशिकम् ॥ ५१ ॥
जितने प्रकार की वेश्याएँ बतायी गयी हैं, उतने ही प्रकार के उनके मिलने वाले भी होते
हैं। वेश्याएँ, उनके नायक, उनके सहायक, अनुरक्त करने के उपाय, अर्थप्राप्ति के उपाय, धनहीन
नायकों को निकालने की रीति, वियुक्त को मिलाने की रीति; लाभविशेष, अर्थ, अनर्थ, अनुबन्ध
और संशयों का विचार—यही इस अधिकरण के प्रमुख प्रतिपाद्य (विषय) हैं ॥ ५१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
रत्यर्थाः पुरुषा येन रत्यर्थाश्चैव योषितः।
शास्त्रस्यार्थप्रधानत्वात्तेन योगोऽत्र योषिताम् ॥ ५२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष और स्त्री, दोनों ही रतिसुख की कामना करते हैं, दोनों का प्रयोजन रतिसुख ही
होता है। क्योंकि रतिसुख का केन्द्र स्त्री है, इसलिये स्त्रियों के रति प्रयोजन पर यहाँ विस्तार से
विचार किया गया है ॥ ५२ ॥
सन्ति रागपरा नार्यः सन्ति चार्थपरा अपि।
प्राक्तत्र वर्णितो रागो वेश्यायोगाश्च वैशिके ॥ ५३ ॥
उपसंहार—कुछ स्त्रियाँ शुद्ध राग की ही कामना करती हैं और कुछ रति के साथ धन
की भी इच्छा करती हैं। रागिणी स्त्रियों का वर्णन तो पिछले अधिकरणों में कर दिया गया है और
जो रति (राग) के साथ धन की भी इच्छा करती हैं, उनका वर्णन इस अधिकरण में किया गया
है ॥ ५३ ॥
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
◉
७.
औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय
सुभगङ्करणादिप्रकरण
व्याख्यातं च कामसूत्रम् ॥ १ ॥
स्वयं शास्त्रकार महर्षि वात्स्यायन इस प्रकरण का सम्बन्ध बताते हुए कहते हैं—कामसूत्र
की व्याख्या समाप्त हुई ॥ १ ॥
तत्रोक्तेस्तु विधिभिरभिप्रेतमर्थमनधिगच्छन्नौपनिषदिकमाचरेत् ॥ २ ॥
१९० वात्स्यायन-कामसूत्र
यदि पूर्वोक्त विधियों (तन्त्र१ और आवाप२) से अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न हो सके तो इस
औपनिषदिक३ अधिकरण में बताये गये उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ २ ॥
रूपं गुणो वयस्त्याग इति सुभगङ्करणम् ॥ ३ ॥
सुभगङ्करण (सौन्दर्यवर्धक) योग—रूप, गुण, अवस्था और उदारता—ये चार बातें
मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाती हैं ॥ ३ ॥
तगरकुष्ठतालीसपत्रकानुलेपनं सुभगङ्करणम् ॥ ४ ॥
सौन्दर्यवर्धक योग—तगर, कूट और तालीशपत्र का लेप करना सौन्दर्य बढ़ाता है ॥ ४ ॥
एतैरेव सुपिष्टैर्वर्तिमालिम्याक्षतैलेन नरकपाले साधितमञ्जनं च ॥ ५ ॥
सुभगङ्करण काजल—उपर्युक्त वस्तुओं को पीसकर और रूई को बत्ती में लपेटकर
बहेड़े के तैल में जलाकर नरकपाल में अंजन बना ले ॥ ५ ॥
पुनर्नवासहदेवीसारिवाकुरण्टोत्पलपत्रैश्च सिद्धं तैलमभ्यञ्जनम् ॥ ६ ॥
सुभगङ्करण तैल—पुनर्नवा, सहदेवी, अनन्तमूल, कुरण्ट (पियाबाँसा) और उत्पल
(नीलकमल)—इन सबका तैल बनाकर लगाने से सौभाग्य-सौन्दर्य बढ़ता है ॥ ६ ॥
तद्युक्ता एव स्त्रजश्च ॥ ७ ॥
सुभगङ्कर माला—पुनर्नवा आदि वस्तुओं को माला में लगाकर पहने ॥ ७ ॥
पद्मोत्पलनागकेसराणां शोषितानां चूर्णं मधुघृताभ्यामवलिह्य सुभगो
भवति ॥ ८ ॥
सुभगङ्कर चटनी—पद्म (लाल कमल), उत्पल (नील कमल) और नागकेसर के चूर्ण
को शहद और घी के साथ मिलाकर चाटने से भी सौन्दर्य (सौभाग्य) बढ़ता है ॥ ८ ॥
तान्येव तगरतालीसतमालपत्रयुक्तान्यनुलिप्य ॥ ९ ॥
सुभगङ्कर लेप—इन वस्तुओं में तगर, तालीशपत्र और तमालपत्र मिलाकर सुभगङ्कर
लेप भी तैयार होता है ॥ ९ ॥
मयूरस्याक्षि तरक्षोर्वा सुवर्णेनावलिप्य दक्षिणहस्तेन धारयेदिति सुभग-
ङ्करणम् ॥ १० ॥
सुभगङ्कर यंत्रधारण—मोर और चीते की आँखें सोने के ताबीज में भरकर दाहिने हाथ
में बाँधें—ये सुभग बनाने के उपाय हैं ॥ १० ॥
तथा बादरमणिं शङ्खमणिं च तथैव तेषु चाथर्वणान्योगान् गमयेत् ॥ ११ ॥
इसी प्रकार बादरमणि और शङ्खमणि भी हैं। अथर्ववेद में लिखे ऐसे प्रयोगों को समझ
लेना चाहिये ॥ ११ ॥
विद्यात्तन्त्राच्च विद्यायोगात् प्राप्तयौवनां परिचारिकां स्वामी संवत्सर-
१. पूर्वोक्त रत्युत्पादक आलिङ्गन, चुम्बन आदि तन्त्र कहलाते हैं।
२. पूर्वोक्त स्त्री आदि की प्राप्ति आवाप कही जाती है।
३. गूढ या गोपनीय सिद्धान्त औपनिषदिक कहलाते हैं।
७. औपनिषदिक अधिकरण १९१
मात्रमन्यतो वारयेत्। ततो वारितां बालां वामत्वाल्लालसीभूतेषु गम्येषु योऽस्यै
संघर्षेण बहु दद्यात्तस्मै विसृजेदिति सौभाग्यवर्धनम्॥ १२॥
विद्यातन्त्र और विद्यायोग से यौवनावस्था को प्राप्त परिचारिका को स्वामी एक वर्ष तक
समागम से रक्षित रखे। इस प्रकार रक्षित परिचारिका को दूसरे पुरुष बाला मानकर समागम और
विवाह की इच्छा प्रकट करेंगे। इस प्रकार लालसा की स्पर्धा में जो अधिक धन दे, उसी को
परिचारिका सौंप दे, यह परिचारिका के सौभाग्यवर्धन की विधि है॥ १२॥
गणिका प्राप्तयौवनां स्वां दुहितरं तस्या विज्ञानशीलरूपानुरूप्येण तान-
भिनिमन्त्र्य सारेण योऽस्या इदमिदं च दद्यात् स पाणिं गृह्णीयादिति सम्भाष्य
रक्षयेदिति॥ १३॥
वेश्यापुत्री के विवाह की विधि—गणिका अपनी युवा पुत्री को समान शील, रूप, गुण
और यौवनसम्पन्न युवकों को आमन्त्रित कर उनकी गोष्ठी में यह घोषणा करे कि जो मेरी पुत्री
को ये ये वस्तुएँ देगा उसी के साथ उसका विवाह कर दिया जायेगा—इस प्रकार अपनी पुत्री का
विवाह कर उसके चरित्र की रक्षा करें॥ १३॥
सा च मातुरविदिता नाम नागरिकपुत्रैर्धनिभिरत्यर्थं प्रीयेत॥ १४॥
वेश्यापुत्री का कर्तव्य—और उस वेश्यापुत्री को चाहिये कि वह उन धनी नागरिक पुत्रों
के साथ इस प्रकार प्रेम प्रदर्शित करे मानो माँ को कुछ पता ही नहीं है॥ १४॥
तेषां कलाग्रहणे गन्धर्वशालायां भिक्षुकीभवने तत्र तत्र च सन्दर्शन-
योगाः॥ १५॥
रसिकों का दर्शन—जब वे युवक कलाज्ञान के लिये अपने घर आयें तो लड़की उनसे
मिले और तत्पश्चात् गन्धर्वशाला, भिक्षुकी के घर, सरस्वतीभवन, उद्यान आदि में मिलती
रहे॥ १५॥
तेषां यथोक्तदायिनां माता पाणिं ग्राहयेत्॥ १६॥
पाणिग्रहण—जो युवक कही हुई वस्तु लाकर दे दे, उसके साथ वेश्या अपनी पुत्री का
पाणिग्रहण करा दे॥ १६॥
तावदर्थमलभमाना तु स्वेनाप्येकदेशेन दुहित्र एतद्दत्तमनेनेति
ख्यापयेत्॥ १७॥
विना धन मिले भी प्रदर्शन—जो जो वस्तुएँ उससे पहले नियत हुई हों, यदि वे सब न
भी मिलें तो वेश्या अपनी ओर से दिखाकर यह कह दे कि यह भी इस युवक ने मेरी पुत्री को
दिया है॥ १७॥
ऊढाया वा कन्याभावं विमोचयेत्॥ १८॥
अथवा कन्या के युवा हो जाने पर उपर्युक्त रीति से युवकों को फँसाकर उसका
कौमार्यभङ्ग करा दे॥ १८॥
प्रच्छन्नं वा तैः संयोज्य स्वयमजानती भूत्वा ततो विदितेष्वेतं धर्मस्थेषु
निवेदयेत्॥ १९॥