वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६. वैशिक अधिकरण १७३
निःसारतया कदर्यतया वा त्यक्तो न श्रेयान् ॥ १२ ॥
निर्धन या दुष्ट संसर्ग के योग्य नहीं—यदि नायक निर्धनता या दुष्टता के कारण
निकाला गया हो तो उसके साथ संसर्ग करना श्रेयस्कर नहीं होता ॥ १२ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतो यद्यतिरिक्तमादौ च दद्यात्ततः
प्रतिग्राह्यः ॥ १३ ॥
तृतीय : अधिक धन पर स्वीकार्य—जो नायक यहाँ से स्वयं हटा हो और वहाँ से
नायिका द्वारा निकाला गया हो, ऐसा नायक यदि पहले ही अतिरिक्त धन देता है, तो उसे स्वीकार
कर लेना चाहिये अर्थात् उसे अग्रिम अतिरिक्त धन लेकर समागम का अवसर दे देना
चाहिये ॥ १३ ॥
इतः स्वयमपसृत्य तत्र स्थित उपजपंस्तर्कयितव्यः ॥ १४ ॥
चतुर्थ : विचारणीय—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जम गया हो, ऐसा नायक यदि बात
चलाये तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १४ ॥
विशेषार्थी चागतस्ततो विशेषमपश्यन्नागन्तुकामो मयि मां जिज्ञासितुकामः स
आगत्य सानुरागत्वाद्दास्यति। तस्यां वा दोषान् दृष्ट्वा मयि भूयिष्ठान् गुणानधुना
पश्यति स गुणदर्शी भूयिष्ठं दास्यति ॥ १५ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—यह विशेषता से प्रेम करता है, इसीलिये वहाँ गया था। वहाँ कुछ भी
विशेषता न दिखने से अब वापस आना चाहता है और यहाँ आकर मुझे जानना चाहता है। प्रेमी
होने के कारण यहाँ आकर कुछ अधिक ही धन देगा अथवा उसमें दोष देखकर इस समय मुझमें
गुण देख रहा है। अतएव यह गुणग्राही नायक अधिक धन देगा ॥ १५ ॥
बालो वा नैकत्रदृष्टिरतिसन्धानप्रधानो वा हरिद्रारागो वा यत्किञ्चनकारी
वेत्यवेत्य सन्दध्यान्न वा ॥ १६ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—बालबुद्धि है, स्थिरचित्त वाला नहीं है, विचारशील नहीं है, हल्दी
की तरह अस्थायी राग (रंग या अनुराग) वाला है अथवा जो मन में आता है, कर बैठता है—
इन सब बातों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके ही नायिका देखे कि यदि वह संसर्ग करने योग्य
है तो करे, अन्यथा नहीं ॥ १६ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृत उपजपँस्तर्कयितव्यः ॥ १७ ॥
पंचम : विचारणीय—यहाँ से निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा नायक यदि अपनी
ओर से बात चलाये, तो उस पर विचार करना चाहिये ॥ १७ ॥
अनुरागादागन्तुकामः स बहु दास्यति। मम गुणैर्भावितो योऽन्यस्यां न
रमते ॥ १८ ॥
संसर्गयोग्य पक्ष—वह मेरे अनुरागवश आना चाहता है, इसलिये अधिक देगा। वह मेरे
गुणों से प्रभावित है, इसलिये दूसरी नायिका में उसका मन नहीं रम रहा है ॥ १८ ॥
पूर्वमयोगेन वा मया निष्कासितः स मां शीलयित्वा वैरं निर्यातयितुकामो