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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 248 में से

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पृष्ठ 198

१७२ वात्स्यायन-कामसूत्र
स चेदवसितार्थो वित्तवान् सानुरागश्च ततः सन्धेयः ॥ २ ॥
मिलने का कारण—यदि वह धनवान् हो, और धन देगा—यह भी निश्चित हो तथा
अनुराग भी रखता हो तभी मिलना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ २ ॥
अन्यत्र गतस्तर्कयितव्यः। स कार्ययुक्त्या षड्विधः ॥ ३ ॥
यदि वह दूसरी वेश्या के पास गया है, तो मिलाने से पूर्व विचार कर लेना चाहिये। अपने
कार्य की योजना के अनुसार वह छह प्रकार का हो सकता है ॥ ३ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततोऽपि स्वयमेवापसृतः ॥ ४ ॥
प्रथम : दोनों ओर से स्वयं हटने वाला—जो से स्वयं हटा हो और दूसरी वेश्या के पास
से भी स्वयं ही हटा हो ॥ ४ ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः ॥ ५ ॥
द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया—जो यहाँ से और वहाँ से (दोनों
स्थानों से ही) धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ५ ॥
इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतः ॥ ६ ॥
तृतीय : यहाँ से स्वयं निकला और वहाँ से निकाला गया—जो यहाँ से तो स्वयं हटा
हो किन्तु वहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो ॥ ६ ॥
इतः स्वयमपसृतस्तत्र स्थितः ॥ ७ ॥
चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा—जो यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ स्थित हो गया
हो अर्थात् दूसरी के पास जाकर जम गया हो ॥ ७ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृतः ॥ ८ ॥
पञ्चम : जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो और वहाँ से स्वयं हट गया हो ॥ ८ ॥
इतो निष्कासितापसृतस्तत्र स्थितः ॥ ९ ॥
षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा—जो यहाँ से धक्के देकर निकाला गया हो
और वहाँ जाकर जम गया हो ॥ ९ ॥
इतस्ततश्च स्वयमेवापसृत्योपजपति चेदुभयोर्गुणानपेक्षी चलबुद्धिर-
सन्धेयः ॥ १० ॥
प्रथम : न मिलाने योग्य नायक—जो नायक यहाँ और वहाँ, दोनों स्थानों से, स्वयं ही
हटकर, पुनः मिलने को कहे, दोनों नायिकाओं के गुणों की अपेक्षा न करने वाला वह चञ्चल
बुद्धि वाला पुरुष है, अतएव मिलाने योग्य नहीं है ॥ १० ॥
इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः स्थिरबुद्धिः। स चेदन्यतो बहु लभमानया
निष्कासितः स्यात्ससारोऽपि तया रोषितो ममामर्षार्द् बहु दास्यतीति संधेयः ॥ ११ ॥
द्वितीय : अधिक लाभ पर स्वीकार्य—जो यहाँ और वहाँ दोनों स्थानों पर, नायिका
द्वारा ही निकाला गया हो, तभी हटा हो, वह स्थिरबुद्धि पुरुष है। यदि दूसरी ने उसे अन्यों की
अपेक्षा अधिक लाभ उठाकर भी निकाला हो, धनवान् होने पर भी वेश्या द्वारा क्रुद्ध कर दिया
गया हो, 'मुझे इस क्रोधवश अधिक देगा'—यह निश्चित हो, तभी उसके साथ सन्धि करनी
चाहिये अर्थात् उसे तभी सम्भोग का अवसर देना चाहिये, अन्यथा नहीं ॥ ११ ॥