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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 248 में से

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६. वैशिक अधिकरण १७५
अस्य वा मित्रं मद्द्वेषिणीं सपत्नीं कामयते तदमुना भेदयिष्यामि ॥ २९ ॥
अथवा इसका मित्र मुझसे वैर मानने वाली मेरी सपत्नी (सौत) को चाहता है। मैं इसके
द्वारा उससे लड़वा दूँगी ॥ २९ ॥
चलचित्ततया वा लाघवमेनमापादयिष्यामीति ॥ ३० ॥
अथवा इसे चञ्चल चित्तवाला सिद्ध करके अन्य वेश्याओं की दृष्टि में गिरा दूँगी ॥ ३० ॥
तस्य पीठमर्दादयो मातुर्दौःशील्येन नायिकायाः सत्यप्यनुरागे विवशयाः पूर्वं
निष्कासनं वर्णयेयुः ॥ ३१ ॥
नायिका के पीठमर्द आदि विश्वस्त सेवक नायक से जाकर कहें कि वह तो आज भी
आपकी अनुरक्त है, किन्तु माता की कुटिलता के कारण विवश होकर आपको निकालना
पड़ा था ॥ ३१ ॥
वर्तमानेन चाकामायाः संसर्गं विद्वेषं च ॥ ३२ ॥
वर्तमान नायक के साथ उसका संसर्ग विना अनुराग के है, दिल से तो वह उससे घृणा ही
करती है और आपकी कामना करती है ॥ ३२ ॥
तस्याश्च साभिज्ञानैः पूर्वानुरागैरैनं प्रत्यापयेयुः ॥ ३३ ॥
उस नायिका के पहले प्रेम को पहचानपूर्वक कहकर अपनी बात का विश्वास
दिलाये ॥ ३३ ॥
अभिज्ञानं च तत्कृतोपकारसम्बद्धं स्यादिति विशीर्णप्रतिसन्धानम् ॥ ३४ ॥
पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान—उसके प्रेम की पहचान तो उसके द्वारा किये
गये पहले के उपकारों से बँधी होनी चाहिये। इस प्रकार ‘विमुक्त नायक का मिलन’ नामक
प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥
अपूर्वपूर्वसंसृष्टयोः पूर्वसंसृष्टः श्रेयान्। स हि विदितशीलो दृष्टरागश्च सूपचारो
भवतीत्याचार्याः ॥ ३५ ॥
पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता : पहले मिले हुए और कभी न मिले हुए पुरुषों में पहले मिला
हुआ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसका शील-स्वभाव परिचित रहता है, उसका प्रेम देखा हुआ रहता है
और उसका उपचार सुखपूर्वक किया जा सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत
है ॥ ३५ ॥
पूर्वसंसृष्टः सर्वतो निष्पीडितार्थत्वान्नात्यर्थमर्थदो दुःखं च पुनर्विश्वासयितुम्।
अपूर्वस्तु सुखेनानुरज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ३६ ॥
यदि पूर्व नायक का सारा धन लेकर ही उसे छोड़ा है, तो न तो वह अधिक धन ही दे
सकेगा और न उसे विश्वास दिलाना ही सरल है; जबकि नया नायक सरलता से अनुरक्त किया
जा सकता है—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३६ ॥
तथापि पुरुषप्रकृतितो विशेषः ॥ ३७ ॥
पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख—तथापि इसमें पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख होता है ॥ ३७ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
अन्यां भेदयितुं गम्यादन्यतो गम्यमेव वा।