वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६. वैशिक अधिकरण १७७
पञ्चम अध्याय
लाभविशेषप्रकरण
गम्यबाहुल्ये बहु प्रतिदिनं च लभमाना नैकं प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
अपरिग्रह का कारण—मिलने वाले पुरुषों की अधिकता होने पर प्रतिदिन बहुत मिलें,
तो एक को ही न स्वीकारे अर्थात् नित्य नये नये पुरुषों को सम्भोग का अवसर प्रदान करें ॥ १ ॥
देशं कालं स्थितिमात्मनो गुणान् सौभाग्यं चान्याभ्यो न्यूनातिरिक्ततां चावेक्ष्य
रजन्यामर्थं स्थापयेत् ॥ २ ॥
एक रात की फीस (शुल्क)—देश, काल, अपनी स्थिति, गुण, सौभाग्य और दूसरी
वेश्याओं से अपने रूप, सौन्दर्य, गुण आदि की अधिकता या न्यूनता देखकर ही अपनी एक रात
का शुल्क नियत करे ॥ २ ॥
गम्ये दूताँश्च प्रयोजयेत् । तत्प्रतिबद्धाँश्च स्वयं प्रहिणुयात् ॥ ३ ॥
दूत भेजने की रीति—समागम योग्य पुरुषों का अभिप्राय जानने के लिये अपने दूत लगा
दे और नायक के सम्पर्क वाले व्यक्तियों से स्वयं कहे ॥ ३ ॥
द्वित्रिश्चतुरिति लाभातिशयग्रहार्थमेकस्यापि गच्छेत् । परिग्रहं च चरेत् ॥ ४ ॥
अधिक लाभ की रीति—एक से अधिक लाभ पाने की इच्छा से दो, तीन चार रात एक
नियत शुल्क पर ही समागम करे ओर पत्नी की तरह उसकी सेवा करता रहे ॥ ४ ॥
गम्ययौगपद्ये तु लाभसाम्ये यद्द्रव्यार्थिनी स्यात्तद्दायिनि विशेषः प्रत्यक्ष
इत्याचार्याः ॥ ५ ॥
एक साथ आने वालों से अधिक लाभ—मिलने योग्य पुरुषों के एक साथ आने पर
और समान लाभ (फीस) होने पर भी वेश्या जिसका धन ले लेगी, वह दूसरों से अधिक ही
देगा, यह स्पष्ट है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत है ॥ ५ ॥
अप्रत्यादेयत्वात् सर्वकार्याणां तन्मूलत्वाद्विरणयद इति वात्स्यायनः ॥ ६ ॥
क्योंकि सिक्का (धन) अविश्वास की अवस्था में भी नहीं लौटाया जा सकता और वही
सारे कार्य सम्पन्न करने का साधन है, इसलिये सिक्का देने वाला ही गम्य है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ ६ ॥
सुवर्णरजतताम्रकांस्यलोहभाण्डोपस्करास्तरणप्रावरणवासोविशेषगन्धद्रव्य-
कटुकभाण्डघृततैलधान्यपशुजातीनां पूर्वपूर्वतो विशेषः ॥ ७ ॥
फीस का स्वरूप—सोना, चाँदी, ताँबा, कांसा, लोहा, बर्तन, सामान, बिस्तर, लिहाफ,
अन्य वस्त्र, द्रव्य, काली मिर्च, घड़ा (कलश), घी, तेल, अन्न, पशु—इन वस्तुओं में उत्तरोत्तर
की अपेक्षा पूर्व पूर्व उत्तम हैं ॥ ७ ॥
यत्तत्र साम्याद्वा द्रव्यसाम्ये मित्रवाक्यादतिपातित्वादायतितो गम्यगुणतः
प्रीतितश्च विशेषः ॥ ८ ॥
समानता में प्राथमिकता—यदि दो समान प्रेमी हों या समान धन देने वाले हों तो मित्र