वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ वात्स्यायन-कामसूत्र
धनमभियोगाद्वा मयास्यापहृतं तद्विश्वास्य प्रतीपमादातुकामो निर्वेष्टुकामो वा मां
वर्तमानाद् भेदयित्वा त्यक्तुकाम इत्यकल्याणबुद्धिरसन्धेयः ॥ १९ ॥
असंसर्गयोग्य पक्ष—पहले मैंने इसे अन्यायपूर्वक निकाला था, इसलिये अब यह मुझसे
मिलकर अपना वैर निकालना चाहता है अथवा उपायों द्वारा मैंने इसका सारा धन खींच लिया है,
इसलिये अब यह विश्वास दिखाकर उसे निकालना चाहता है; अथवा वर्तमान प्रेमी को मुझसे
तोड़कर फिर मुझे छोड़ देना चाहता है, इस प्रकार यह अकल्याण बुद्धि वाला है, अतः संसर्ग
नहीं करना चाहिये ॥ १९ ॥
अन्यथाबुद्धिः कालेन लम्भयितव्यः ॥ २० ॥
यदि वह अनुरागवश मिलना चाहता है तो उसे कुछ समय बाद ही अवसर देना
चाहिये ॥ २० ॥
इतो निष्कासितस्तत्र स्थित उपजपन्नेतेन व्याख्यातः ॥ २१ ॥
षष्ठ : नायक का विचार—जो अपने यहाँ से निकाला गया हो और वहाँ जाकर जम
गया हो, वह यदि अपनी ओर से बात चलाये तो संसर्ग के योग्य होने पर ही उसके संसर्ग करे,
अन्यथा नहीं ॥ २१ ॥
तेषूपजपन्त्वन्यत्र स्थितः स्वयमुपजपेत् ॥ २२ ॥
जो यहाँ से जाकर वहाँ जम गया और सन्देश भेजने पर भी जमा रहे, उससे स्वयं बातें
करनी चाहिये ॥ २२ ॥
व्यलीकार्थं निष्कासितो मयासावन्यत्र गतो यत्नादानेतव्यः ॥ २३ ॥
इस के कारण—मैंने इसे अपराध पर निकाला था और मेरे यहाँ से यह वहाँ जाकर जम
गया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक लाना चाहिये ॥ २३ ॥
इतः प्रवृत्तसम्भाषो वा ततो भेदमवाप्स्यति ॥ २४ ॥
अथवा यहाँ से बातें चलने पर वहाँ से अलग हो जायेगा ॥ २४ ॥
तदर्थाभिघातं करिष्यति ॥ २५ ॥
मुझसे अनुरक्त होकर वह दूसरी वेश्या को आर्थिक हानि पहुँचायेगा ॥ २५ ॥
अर्थागमकालो वास्य। स्थानवृद्धिरस्य जाता। लब्धमनेनाधिकरणम्।
दारैर्वियुक्तः। पारतन्त्र्याद् व्यावृत्तः। पित्रा भ्रात्रा वा विभक्तः ॥ २६ ॥
यह इसकी धनप्राप्ति का समय है। इसके व्यापार या नौकरी में उन्नति हुई है, इसे धन या
पद आदि का अधिकार मिल गया है, इस समय यह अपनी स्त्रियों से अलग रह रहा है, इसकी
परतन्त्रता समाप्त हो गयी है, यह अपने पिता या भाई से अलग हो गया है ॥ २६ ॥
अनेन वा प्रतिबद्धमनेन सन्धिं कृत्वा नायकं धनिनमवाप्स्यामि ॥ २७ ॥
नायक इसका मित्र है, मैं इससे मिलकर उस धनवान् नायक को प्राप्त कर लूँगी ॥ २७ ॥
विमानिता वा भार्यया तमेव तस्यां विक्रमयिष्यामि ॥ २८ ॥
इसने मेरा अपमान किया है, अथवा अपनी स्त्री से जाकर मिल गया है। मैं युक्तिपूर्वक
इसकी स्त्री को अलग करके इससे ही लड़ा दूँगी ॥ २८ ॥