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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

१९२ वात्स्यायन-कामसूत्र
धन वसूलने की रीति—अथवा प्रच्छन्न रूप से उन युवकों से मिलाकर उनके प्रेम को
राजकीय अधिकारियों तक पहुँचा दे और फिर उन रसिकों के विरुद्ध न्यायाधिकरण में पहुँच
जाये ॥ १९ ॥
सख्यैव तु दास्या वा 'नोचितकन्याभावां सुगृहीतकामसूत्रामाभ्यासिकेषु
योगेषु प्रतिष्ठितां प्रतिष्ठिते वयसि सौभाग्ये च दुहितरमवसृजन्ति गणिका इति
प्राच्योपचाराः ॥ २० ॥
प्राच्य देश की वेश्याओं की रीति—पूर्व प्रदेशों की वेश्याएँ सखी या दासी से लड़की
का कौमार्यहरण कराकर काम के रहस्यों और योगों का अभ्यास कराती हैं। उन योगों और
कामकलाओं में दक्षता प्राप्त कर लेने पर यौवन के साथ ही उनका भाग्य भी चमक उठता है और
तत्पश्चात् युवती को वेश्याचरित के लिये स्वतन्त्र कर देती हैं ॥ २० ॥
पाणिग्रहश्च संवत्सरमव्यभिचार्यस्ततो यथा कामिनी स्यात् ॥ २१ ॥
एक वर्ष तक पत्नीव्रत का निर्वाह—जिस युवक ने वेश्यापुत्री का पाणिग्रहण किया हो
उसके साथ वह एक वर्ष सदाचारिणी बनकर रहे। तत्पश्चात् जहाँ वह चाहे या जो उसे चाहे वहाँ
स्वच्छन्दतापूर्वक भोग करे ॥ २१ ॥
ऊर्ध्वमपि संवत्सरात् परिणीतेन निमन्त्र्यमाणा लाभमप्युत्सृज्य तां रात्रिं तस्या-
गच्छेदिति वेश्यायाः पाणिग्रहणविधिः सौभाग्यवर्धनं च ॥ २२ ॥
निमन्त्रण पर उपस्थिति आवश्यक—एक वर्ष बाद भी जब पति बुलाये तब भी
वेश्यापुत्री अर्थलाभ को छोड़कर उस रात उसके साथ समागम के लिये अवश्य आये। वेश्या के
विवाह और सौभाग्यवर्धन का विषय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
एतेन रङ्गोपजीविनां कन्या व्याख्याताः ॥ २३ ॥
अभिनेत्री कन्याओं की विवाह की रीति—इससे ही रङ्गमञ्च पर अभिनय करने वाली
कन्याओं की बात भी कह दी गयी है अर्थात् रङ्गमञ्च पर नृत्य और अभिनय करने वाली
कन्याओं की विवाह की भी यही रीति है ॥ २३ ॥
तस्मै तु तां दद्युर्य एषां तूर्ये विशिष्टमुपकुर्यात्। इति सुभगङ्करणम् ॥ २४ ॥
वैशिष्ट्यकथन—नट, नर्तक आदि अपनी पुत्री का विवाह उसी पुरुष से करें, जो उसके
नृत्य-गान आदि को उन्नत बनाने में सहायक हो। सुभगङ्करण प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
धत्तूरकमरिचपिप्पलीचूर्णैर्मधुमिश्रैर्लिप्तलिङ्गस्य सम्प्रयोगो वशीकरणम् ॥ २५ ॥
वशीकरण प्रकरण : वशीकरण लेप—धतूरा, काली मिर्च और छोटी पीपल के चूर्ण
में शहद मिलाकर शिश्न पर लेप करके जिस स्त्री से समागम किया जाये वह वशीभूत हो जाती
है ॥ २५ ॥
वातोद्भ्रान्तपत्रं मृतकनिर्माल्यं मयूरास्थिचूर्णावचूर्णं वशीकरणम् ॥ २६ ॥
वशीकरण चूर्ण—हवा से उड़ा हुआ पत्ता, शव पर चढ़ाया गया फूल और मोर की हड्डी
के चूर्ण का अवचूर्ण (सूक्ष्म चूर्ण) उत्तम वशीकरण है ॥ २६ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १९३
स्वयं मृताया मण्डलकारिकायाश्चूर्णं मधुसंयुक्तं सहामलकैः स्नानं वशी-
करणम् ॥ २७ ॥
वशीकरण स्नान—स्वयं मरे हुए गिद्ध (मादा) के चूर्ण में शहद मिलाकर और आँवले
के रस के साथ उबटन की तरह लगाकर स्नान करने से भी स्त्री वशीभूत हो जाती है ॥ २७ ॥
वज्रस्नुहीगण्डकानि खण्डशः कृतानि मनःशिलागन्धपाषाणचूर्णेनाभ्यज्य
सप्तकृत्वः शोषितानि चूर्णयित्वा मधुना लिप्तलिङ्गस्य सम्प्रयोगो वशी-
करणम् ॥ २८ ॥
शिश्नलेप—थूहर की गाँठें टुकड़े-टुकड़े करके उनमें मैनशिल और गन्धक को
लपेटकर सात बार सुखाये, फिर उसका चूर्ण बनाकर शिश्न पर लेप करके जिस स्त्री से समागम
किया जाये वह वशीभूत हो जाती है ॥ २८ ॥
एतेनैव रात्रौ धूमं कृत्वा तद्धूमतिरस्कृतं सौवर्णं चन्द्रमसं दर्शयति ॥ २९ ॥
उपर्युक्त वस्तुओं के चूर्ण का रात्रि में धुआँ करने पर धुएँ से ढका चन्द्र सोने का-सा
दिखायी देता है ॥ २९ ॥
एतैरेव चूर्णैर्तानरपुरीषमिश्रितैर्यां कन्यामवकिरेत् साऽन्यस्मै न दीयते ॥ ३० ॥
वाञ्छित कन्या से विवाह की रीति—इन्हीं वस्तुओं के चूर्ण में बन्दर की विष्ठा
मिलाकर जिस कन्या पर छिड़क दी जाये, वह किसी अन्य को नहीं दी जा सकती अर्थात् वह
वशीभूत हो जाती है और प्रयोक्ता से ही विवाह करती है ॥ ३० ॥
वचागण्डकानि सहकारतैललिप्तानि शिंशपावृक्षस्कन्धमुत्कीर्य षण्मासं निद-
ध्यात् ततः षड्भिर्मासैरपनीतानि देवकान्तमनुलेपनं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३१ ॥
देवकान्त अनुलेप—वचा की गाँठें आम के तैल में भिगोकर शीशम के तने में खोदकर
रख दे। छह मास पश्चात् निकाले। यह देवकान्त अनुलेप उत्तम वशीकरण है—ऐसा कहा
जाता है ॥ ३१ ॥
तथा खदिरसारजानि शकलानि तनूनि यं वृक्षमत्कीर्य षण्मासं निदध्यात्
तत्पुष्पगन्धानि भवन्ति गन्धर्वकान्तमनुलेपनं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३२ ॥
गन्धर्वकान्त अनुलेप—इसी प्रकार खदिरसार (कत्था) के टुकड़ों को पतला करके
और आम के तैल में भिगोकर जिस वृक्ष के तने में छह मास के लिये रख देंगे, वे उसी के समान
सुगन्ध वाले हो जायेंगे। यह गन्धर्वकान्त अनुलेप उत्तम वशीकरण है—ऐसा कहा जाता
है ॥ ३२ ॥
प्रियङ्गवस्तगरमिश्राः सहकारतैलदिग्धा नागवृक्षमुत्कीर्य षण्मासं निहिता
नागकान्तमनुलेपनं वशीकरणमित्याचक्षते ॥ ३३ ॥
नागकान्त अनुलेप—तगर और काँगनी को मिलाकर और आम के तेल में भिगोकर
नागकेसर के तने में छह मास के लिये दबा दे। नागकान्त नामक यह अनुलेप उत्तम वशीकरण
है—ऐसा कहा जाता है ॥ ३३ ॥

१९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
उष्ट्रास्थि भृङ्गराजरसेन भावितं दग्धमञ्जनं नलिकायां निहितमुष्ट्रास्थि-
शलाकयैव स्रोतोऽञ्जनसहितं पुण्यं चक्षुष्यं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३४ ॥
पुण्य अंजन—ऊँट की हड्डियों में भृङ्गराज के रस की भावना देकर अंजन के समान
पुटपाक विधि से जलाकर काजल बना ले। इसे ऊँट की हड्डियों से बनी सुरमादानी में रखे और
ऊँट की हड्डी से बनी सलाई से आँखों में लगावे। यह नेत्रों के लिये हितकारी और उत्तम
वशीकरण है—ऐसा कहा जाता है ॥ ३४ ॥
एतेन श्येनभासमयूरास्थिमयान्यञ्जनानि व्याख्यातानि ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार श्येन, भास, मयूर आदि पक्षियों की हड्डियों का अंजन भी उपर्युक्त विधि से
बनाया जा सकता है ॥ ३५ ॥
उच्चटाकन्दश्चव्या यष्टीमधुकं च सशर्करेण पयसा पीत्वा वृषीभवति ॥ ३६ ॥
बल-वीर्यवर्धक (वृष्य) प्रकरण : उच्चटा और मुलहठी—उच्चटा (उटंगण) और
मुलहठी के चूर्ण को शक्कर मिले दूध के साथ पीने से पुरुष के बलवीर्य में वृद्धि होती है ॥ ३६ ॥
मेषवस्तमुष्कसिद्धस्य पयसः सशर्करस्य पानं वृषत्वयोगः ॥ ३७ ॥
मेढ़ा और बकरे का अण्डकोश—मेढ़ा या बकरे के अण्डकोशों को दूध में पकाकर
और शक्कर डालकर पीने से भी बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३७ ॥
तथा विदार्याः क्षीरिकायाः स्वयंगुप्तायाश्च क्षीरेण पानम् ॥ ३८ ॥
विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच—विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच के बीजों के
चूर्ण को दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३८ ॥
तथा प्रियालबीजानां मोरटाविदार्योश्च क्षीरेणैव ॥ ३९ ॥
चिरौंजी, मुहार और श्वेत विदारी—इसी प्रकार चिरौंजी, मुहार (मुरहरी) और श्वेत
विदारी—इनका चूर्ण दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३९ ॥
शृङ्गाटककसेरुकामधूलिकानि क्षीरकाकोल्या सह पिष्टानि सशर्करेण पयसा
घृतेन मन्दाग्निनोत्करिकां पक्त्वा यावदर्थं भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४० ॥
क्षीरकाकोली, सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ—सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ के फूलों
को क्षीरकाकोली के कन्द के साथ पीसकर शक्करमिश्रित दूध के साथ मिलाकर, घी में मन्द
मन्द अग्नि पर हलुआ बनाकर नित्य खाने से इतना बलवीर्य बढ़ता है कि पुरुष अनन्त रमणियों
के साथ रमण कर सकता है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४० ॥
माषकमलिनीं पयसा धौतामुष्णेन घृतेन मृदुकृत्योद्धृतां वृद्धवत्सायाः गोः
पयःसिद्धं पायसं मधुसर्पिर्भ्यामशित्वाऽनन्ताः स्त्रियो गच्छतीति आचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
उड़द की दाल की खीर—उड़द की धुली दाल को रात में दूध में भिगो दे और प्रातः
पीसकर घी में लाल होने तक भूने। फिर बाखरी गाय या बकरी का दूध डालकर खीर बना लें।
विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की
शक्ति आ जाती है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४१ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १९५
विदारी स्वयंगुप्ता शर्करा मधुसर्पिभ्यां गोधूमचूर्णेन पोलिकां कृत्वा यावदर्थं
भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४२ ॥
विदारीकन्द और क्रौंच की पूड़ियाँ—विदारीकन्द और क्रौंच के बीजों के चूर्ण में गेहूँ
का आटा, शहद और शक्कर मिलाकर घी में पूड़ियाँ सेंक लें। इन्हें नित्य खाने से पुरुष में इतना
बलवीर्य बढ़ता है कि वह अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग कर सकता है—ऐसा आचार्य
कहते हैं ॥ ४२ ॥
चटकाण्डरसभावितैस्तण्डुलैः पायसं सिद्धं मधुसर्पिभ्यां प्लावितं
यावदर्थमिति समानं पूर्वेण ॥ ४३ ॥
गौरैया के अण्डों से भावित खीर—चिड़िया के अण्डों के रस की भावना देकर तैयार
किये गये चावलों की खीर बनाये। उसे विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में
अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की शक्ति आ जाती है ॥ ४३ ॥
चटकाण्डरसभावितानपगतत्वचस्तिलाञ् शृङ्गाटककसेरुकस्वयंगुप्ता-
फलानि गोधूममाषचूर्णं सशर्करेण पयसा सर्पिषा च पक्वं संयावं यावदर्थं
प्राशित्वा—इति समानं पूर्वेण ॥ ४४ ॥
उक्त रीति से भावित तिलों की खीर—काले तिलों को भिगोकर उनका छिलका अलग
कर लिया जाये और फिर गौरैया के अण्डों के रस की भावना दे। तत्पश्चात् सिंघाड़ा, कसेरू और
क्रौंच के बीजों का चूर्ण तैयार करे। गेहूँ का आटा और उड़द की दाल की पिट्ठी मिलाकर तथा
शक्कर, घी से जल के स्थान पर दूध डालकर लप्सी तैयार कर ले। इसे नित्य खाने से
रतिमल्लता बढ़ती है ॥ ४४ ॥
सर्पिणो मधूनः शर्कराया मधुकस्य च द्वे द्वे पले मधुरसायाः कर्षः प्रस्थं पयस
इति षडङ्गममृतं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
मुलहठी आदि का षडङ्ग अमृत—घी, शहद, शक्कर और मुलहठी दो-दो पल, एक
कर्ष मधुरसा और एक प्रस्थ दूध—यह छह अंगों वाला अमृतमेध्य है, वाजीकरण है, आयुर्वर्धक
हैं। इसे युक्तरस कहते हैं ॥ ४५ ॥
शतावरीश्वदंष्ट्रागुडकषाये पिप्पलीमधुकल्के गोक्षीरच्छागघृते पक्वे तस्य
पुष्यारम्भेणान्वहं प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४६ ॥
शतावरी और गोखरू—शतावरी और पहाड़ी गोखरू—इन दोनों वस्तुओं के कषाय में
पीपल और शहद का कल्क मिलाकर गाय के घी में भूनकर दूध में पका लें। इसे पुष्य नक्षत्र में
नित्य चाटना बलबुद्धिवर्धक है, वाजीकारक है, आयुर्वर्धक है। इसे आचार्य 'युक्तरस'
कहते हैं ॥ ४६ ॥
शतावर्याः श्वदंष्ट्रायाः श्रीपर्णीफलानां च क्षुण्णानां चतुर्गुणितजलेन पाक
आप्रकृत्यवस्थानात् तस्य पुष्यारम्भेण प्रातः प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरस-
मित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४७ ॥
शतावरी, गोखरू और श्रीपर्णी—शतावरी, पहाड़ी गोखरू और श्रीपर्णी (कसेरू) के

१९६ वात्स्यायन-कामसूत्र
फूल कूटकर चार गुने जल में अग्नि पर चढ़ा दें। जब पानी जल जाये तो उतार लें। इसे पुष्य
नक्षत्र से प्रातःकाल चाटना प्रारम्भ कर दे। यह बलबुद्धिवर्धक, वाजीकरण और आयुर्वर्धक है।
इसे आचार्य युक्तरस कहते हैं॥ ४७॥
श्वदंष्ट्राचूर्णसमन्वितं तत्सममेव यवचूर्णं प्रातरुत्थाय द्विपलकमनुदिनं प्राश्नी-
यान्मेध्यं वृष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते॥ ४८॥
गोखरू और जौ—पहाड़ी गोखरू का चूर्ण और जौ का आटा सममात्रा में लेकर प्रातः
दो पल प्रतिदिन खाये। यह बलबुद्धिवर्धक, वाजीकरण और आयुर्वर्धक है। इसे आचार्यों ने
'युक्तरस' कहा है॥ ४८॥
आयुर्वेदाच्च वेदाच्च विद्यातन्त्रेभ्य एव च।
आप्तेभ्यश्चावबोद्धव्या योगा ये प्रीतिकारकाः॥ ४९॥
उपसंहार—पूर्वोक्त वाजीकारक योगों के अतिरिक्त अन्य भी रागरतिवर्धक योग हैं। उन्हें
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७. औपनिषदिक अधिकरण १९७
मदनमन्दिर में अंगुली डालकर उसे भली भाँति रससिक्त कर ले, तत्पश्चात् समागम प्रारम्भ करे।
इससे वह स्त्री को पहले स्खलित करके उसका नष्ट राग पुनः प्राप्त कर सकता है ॥ २ ॥
औपरिष्टकं मन्दवेगस्य गतवयसो व्यायतस्य रतश्रान्तस्य च रागप्रत्या-
नयनम् ॥ ३ ॥
जो पुरुष मन्दवेग है, जिसका यौवन ढल गया हो, जो बहुत मोटा हो और जो समागम में
थक गया हो, उसे चाहिये कि साम्प्रयोगिक अधिकरण में कही गयी औपरिष्टक (मुखमैथुन)
विधि से अपने में उत्तेजना प्राप्त कर ले ॥ ३ ॥
अपद्रव्याणि वा योजयेत् ॥ ४ ॥
अपद्रव्यों का प्रयोग—अथवा अपद्रव्यों का प्रयोग करे अर्थात् कृत्रिम साधनों से काम
चलाये ॥ ४ ॥
तानि सुवर्णरजतताम्रकालायसगजदन्तगवलद्रव्यमयानि ॥ ५ ॥
अपद्रव्य—इस प्रकार के कृत्रिम साधन सोना, चाँदी, ताबाँ, लोहा, हाथीदाँत और सींग
से बनाये जाते हैं ॥ ५ ॥
त्रापुषाणि सैसकानि च मृदूनि शीतवीर्याणि कर्मणि च धृष्णूनि भवन्तीति
बाभ्रवीया योगाः ॥ ६ ॥
क्योंकि राँगे और सीसे से बने कृत्रिम साधन कोमल, शीतल और घर्षणशील होते हैं—
ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के शिष्यों का मत है ॥ ६ ॥
दारुमयानि साम्यतश्चेति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
यदि अनुकूल पड़े तो लकड़ी का कृत्रिम साधन भी प्रयोग किया जा सकता है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ७ ॥
लिङ्गप्रमाणान्तरं बिन्दुभिः कर्कशपर्यन्तं बहुलं स्यात् ॥ ८ ॥
कृत्रिम साधन पुरुष के शिश्न की माप का ही होना चाहिये और इसके अग्रभाग पर बहुत
से विन्दु होने चाहिये जिससे स्त्री की खाज मिट सके ॥ ८ ॥
एते एव द्वे सङ्घाटौ ॥ ९ ॥
कृत्रिम साधन में कम से कम दो जोड़ या उतार चढ़ाव अवश्य होने चाहिये ॥ ९ ॥
त्रिप्रभृति यावत्प्रमाणं वा चूडकः ॥ १० ॥
चूडक—शश से लेकर अश्व तक पुरुष के शिश्न के जो प्रमाण बताये गये हैं, उतने
प्रमाण वाला कृत्रिम साधन चूडक कहलाता है ॥ १० ॥
एकामेव लतिकां प्रमाणवशेन वेष्टयेदित्येकचूडकः ॥ ११ ॥
एकचूडक—जो अपने प्रमाण से एक ही लता को लपेट सके, ऐसा कृत्रिम साधन
एकचूडक कहलाता है ॥ ११ ॥
उभयतोमुखच्छिद्रः स्थूलकर्कशवृषणगुटिकायुक्तः प्रमाणवशयोगी कट्यां
बद्धः कञ्चुको जालकं वा ॥ १२ ॥
कञ्चुक या जालक—जिसके दोनों ओर छेद किये गये हों, जो स्थूल और कर्कश हो,

१९८ वात्स्यायन-कामसूत्र
जिसमें अण्डकोश भी लगाये गये हों, जो शिश्न के समान आकार का हो और जिसे कमर में
पहना जा सके—ऐसा कृत्रिम साधन कञ्चुक या जालक कहलाता है ॥ १२ ॥
तदभावेऽलाबूनालकं वेणुश्च तैलकषायैः सुभावितः सूत्रेण कट्यां बद्धः
श्लक्ष्णा काष्ठमाला वा ग्रथिता बहुभिरामलकास्थिभिः संयुक्तेत्यपविद्ध-
योगाः ॥ १३ ॥
यदि इस प्रकार के कृत्रिम साधन सम्भव न हों तो अपने शिश्न के प्रमाण के अनुरूप तूम्बी
या बाँस का साधन (लिङ्ग) बनाकर तेल और उबटन से चिकना करके कमर में बाँध ले अथवा
आँवले के समान चिकनी काष्ठ गोलियों की माला शिश्न में पहन लेनी चाहिये—ये अपविद्ध
(त्यक्त) योग हैं ॥ १३ ॥
न त्वविद्धस्य कस्यचिद्द्व्यवहृतिरस्तीति ॥ १४ ॥
क्योंकि इन कृत्रिम साधनों का सम्बन्ध समागम से नहीं है। ये तो केवल असमर्थों के योग
हैं ॥ १४ ॥
दाक्षिणात्यानां लिङ्गस्य कर्णयोरिव व्यधनं बालस्य ॥ १५ ॥
छेदनकर्म—दक्षिण भारत में बच्चों के कर्णछेदन के समान शिश्न का छेदन भी
होता है ॥ १५ ॥
युवा तु शस्त्रेण छेदयित्वा यावद्रुधिरस्यागमनं तावदुदके तिष्ठेत् ॥ १६ ॥
छेदनविधि—यदि युवा पुरुष अपना छेदन कराये तो सुपारी की चमड़ी सरकाकर, नसों
को बचाकर, तीक्ष्ण शस्त्र से कुशलतापूर्वक तिरछा छेदे और जब तक रक्त बहता रहे तब तक
उसे पानी में डुबोये रखे ॥ १६ ॥
वैशद्यार्थं च तस्यां रात्रौ निर्बन्धाद्व्यवायः ॥ १७ ॥
और उस छिद्र को बड़ा करने के लिये, उसी रात को कई बार स्त्री के साथ समागम
करे ॥ १७ ॥
ततः कषायैरेकदिनान्तरितं शोधनम् ॥ १८ ॥
फिर पञ्चकषायों (अमलतास, ब्राह्मी, कनेर, मालती और शङ्खपुष्पी) से एक एक दिन के
अन्तर से धोना चाहिये ॥ १८ ॥
वेतसकुटजशङ्कुभिः क्रमेण वर्धमानस्य वर्धनैर्बन्धनम् ॥ १९ ॥
छिद्रवर्धन—बेंत और कुटज के शंकुओं (कीलों) से उस छिद्र को धीरे-धीरे बढ़ाना
चाहिये ॥ १९ ॥
यष्टीमधुकेन मधुयुक्तेन शोधनम् ॥ २० ॥
व्रणशोधन—मुलहठी और शहद मिलाकर घाव में लगाना चाहिये ॥ २० ॥
ततः सीसकपत्रकर्णिकया वर्धयेत् ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् शीशम के पत्तों की कर्णिका से इसे बढ़ाना चाहिये ॥ २१ ॥
म्रक्षयेद्भल्लातकतैलेनेति व्यधनयोगाः ॥ २२ ॥
इसके बाद भिलावे के तेल से इसे भिगोते रहना चाहिये। व्यधनयोग समाप्त हुए ॥ २२ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १९९
तस्मिन्नेकाकृतिविकल्पान्यपद्रव्याणि योजयेत् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् उसमें अपद्रव्यों को पहना देना चाहिये ॥ २३ ॥
वृत्तमेकतो वृत्तमुदूखलकं कुसुमकं कण्टकितं कङ्कास्थि गजकर-
कमष्टमण्डलकं भ्रमरकं शृङ्गाटकमन्यानि वोपायतः कर्मतश्च बहुकर्मसहता चैषां
मृदुकर्कशता यथासात्म्यमिति नष्टरागप्रत्यानयनं द्विषष्टितमं प्रकरणम् ॥ २४ ॥
अपद्रव्य का प्रयोग — जिस प्रकार का अपद्रव्य स्त्री के अनुकूल पड़े, उसके साथ
समागम में वैसा ही अपद्रव्य प्रयुक्त करना चाहिये। गोल, एक ओर से गोल, ऊखल (ओखली)
जैसा गोल, कमल जैसा, करेले जैसा काँटेदार, कंक की हड्डी जैसा, हाथीदांत के समान,
अष्टकोण, चक्करदार, सिंघाड़े की आकृति का, कोमल या कठोर, जैसा स्त्री चाहे या जैसा
उसके अनुकूल पड़े, वैसा ही बनाया जा सकता है। ‘नष्टप्रेम के पुनः प्राप्ति की विधि’ नामक
बासठवाँ प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
एवं वृक्षजानां जन्तूनां शूकैरुपहितं लिङ्गं दशरात्रं तैलेन मृदितं पुनरुपबृंहितं
पुनः प्रमृदितमिति जातशोफं खट्वायामधोमुखस्तदन्तरे लम्बयेत् ॥ २५ ॥
शिश्नवर्धक उपाय — इसी प्रकार वृक्ष में उत्पन्न होने वाले रोमदार जन्तुओं
(कन्दलिका) के रोमों का शिश्न पर लेप करे और तेल मले। यह क्रिया दस रात तक निरन्तर
करने पर जब शिश्न में सूजन आ जाये तो चारपाई के छेद से उसे नीचे लटका दे और फिर औंधे
मुँह सो जाये ॥ २५ ॥
तत्र शीतैः कषायैः कृतवेदनानिग्रहं सोपक्रमेण निष्पादयेत् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् शीतल लेप लगाकर इसकी वेदना मिटानी चाहिये ॥ २६ ॥
स यावज्जीवं शूकजो नाम शोफो विटानाम् ॥ २७ ॥
इस प्रकार रसलम्पटों के शिश्न की मोटाई आजीवन बनी रहती है ॥ २७ ॥
अश्वगन्धाशबरकन्दजलशूकबृहतीफलमाहिषनवनीतहस्तिकर्णवज्रवल्ली -
रसैरेकैकेन परिमर्दनं मासिकं वर्धनम् ॥ २८ ॥
अश्वगन्धा, बड़े लोध की जड़, जलशंकु, बड़ी कटेरी के पके फल, भैंस का मक्खन,
ढाक के पत्ते और वज्रवल्ली (हड़जोड़) का रस — इनमें से किसी एक को लगाने से शिश्न एक
मास तक मोटा बना रहता है ॥ २८ ॥
एतैरेव कषायैः पक्वेन तैलेन परिमर्दनं षाण्मास्यम् ॥ २९ ॥
अश्वगन्धा आदि के कल्क द्वारा सिद्ध किये गये तेल की मालिश करने से शिश्नवृद्धि छह
मास तक बनी रहती है ॥ २९ ॥
दाडिमत्रापुषबीजानि बालुका बृहतीफलरसश्चेति मृद्वग्निना पक्वेन तैलेन
परिमर्दनं परिषको वा ॥ ३० ॥
अनार, बालमखीरा के बीज, एलुवा और कटेरी के फलों के रस — इन सबको मन्द मन्द
अग्नि पर बनाये गये तैल की मालिश करने से या इनकी पोटली बनाकर सेंकने से छह मास तक
शिश्नवृद्धि रहती है ॥ ३० ॥

२०० वात्स्यायन-कामसूत्र
ताँस्ताँश्च योगानाप्तेभ्यो बुध्येतेति वर्धनयोगाः ॥ ३१ ॥
अन्य भी वर्धनयोग हैं। उन्हें आप्त पुरुषों से जान लें। शिश्नवृद्धियोग पूर्ण हुए॥ ३१॥
अथ स्नुहीकण्टकचूर्णैः पुनर्नवावानरपुरीषलाङ्गलिकामूलमिश्रैर्यामवकिरेत्
सा नान्यं कामयेत ॥ ३२॥
चित्रयोगप्रकरण : कन्यामोहन—थूह के काँटों का चूर्ण, पुनर्नवा, लाल मुख वाले
बन्दर का विष्ठा और इन्द्रायन (कलिहारी) की जड़—इन सबको सममात्रा में पीसकर बनाया
गया चूर्ण जिसके सिर पर डाल दिया जाये वह कन्या किसी अन्य को नहीं चाहती ॥ ३२ ॥
तथा सोमलताऽवल्गुजाभृङ्गरलोहोपजिह्विकाचूर्णैर्व्याधिघातकजम्बूफलरस-
निर्यासेन घनीकृतेन च लिप्तसम्बाधां गच्छतो रागो नश्यति ॥ ३३ ॥
रागनाशनलेप—इसी प्रकार सोमलता, बाकुची के बीज, भाँगरा, लौहभस्म और
उपजिह्विका का चूर्ण तथा अमिलतास और जामुन के फल की गुठली को पीसकर मदनमन्दिर
में लेप करने से जो भी पुरुष उस स्त्री के साथ सम्भोग करता है उसका राग नष्ट हो जाता
है ॥ ३३ ॥
गोपालिकाबहुपादिकाजिह्विकाचूर्णैर्माहिषतक्रयुक्तैः स्नातां गच्छतो रागो
नश्यति ॥ ३४ ॥
गोपालिका, बहुपादिका (पोदीना) और जिह्विका (गोजिया) का चूर्ण भैंस के मट्ठे में
मिलाकर स्नान करने वाली स्त्री के साथ जो भी पुरुष सम्भोग करता है उसका राग नष्ट हो
जाता है ॥ ३४ ॥
नीपाम्रातकजम्बूकुसुमयुक्तमनुलेपनं दौर्भाग्यकरं स्रजश्च ॥ ३५ ॥
दौर्भाग्यकरण—कदम्ब, आँवड़ा और जामुन के फूलों को घिसकर चन्दन लगाना या
इनकी माला पहनना दौर्भाग्यवर्धक होता है ॥ ३५ ॥
कोकिलाक्षप्रलेपो हस्तिन्याः संहतमेकरात्रे करोति ॥ ३६ ॥
योनि-संकोचन—तालमखाने को पानी में पीसकर लेप करने से हस्तिनी नायिका की
योनि भी एक ही रात में सिकुड़ जाती है ॥ ३६ ॥
पद्मोत्पलकदम्बसर्जकसुगन्धचूर्णानि मधुना पिष्टानि लेपो मृग्या विशाली-
करणम् ॥ ३७ ॥
योनि-विस्तार—लाल कमल, नीलकमल, कदम्ब, विजयसार और नेत्रवाला—इनके
चूर्ण को शहद के साथ घोलकर लेप करने से मृगी नायिका की योनि भी गहरी और विशाल हो
जाती है ॥ ३७ ॥
स्नुहीसोमार्कक्षारैरवल्गुजाफलैर्भावितान्यामलकानि केशानां श्वेती-
करणम् ॥ ३८ ॥
बाल सफेद करना—थूहर, पुतली और आक के पत्तों को जलाकर राख बना ले और
फिर उसमें बाकुची के बीज और आँवले की भावना देकर बालों में लगाने से काले बाल भी
सफेद हो जाते हैं ॥ ३८ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण २०१
मदयन्तिकाकुटजकाञ्जनिकागिरिकर्णिकाश्लक्ष्णपर्णीमूलैः स्नानं केशानां
प्रत्यानयनम् ॥ ३९ ॥
बाल काले करना—मेंहदी, कुटज, अंजनिका, पहाड़ी चमेली और माषपर्णी की
जड़—इन पाँचों का चूर्ण सिर पर मलकर कुछ समय बाद स्नान करने से सफेद बाल भी काले
हो जाते हैं ॥ ३९ ॥
एतैरेव सुपक्वेन तैलेनाभ्यङ्गात् कृष्णीकरणात् क्रमेणास्य
प्रत्यानयनम् ॥ ४० ॥
इन पदार्थों से बने तैल से भी सफेद बाल काले हो जाते हैं ॥ ४० ॥
श्वेताश्वस्य मुष्कस्वेदैः सप्तकृत्वो भावितेनालक्तकेन रक्तोऽधरः श्वेतो
भवति ॥ ४१ ॥
ओष्ठ सफेद करना—पूर्वोक्त वस्तुओं में सफेद घोड़ों के अण्डकोश के पसीने की सात
भावनाएँ देने पर जो योग तैयार होता है वह लाल होठों को भी सफेद बना देता है ॥ ४१ ॥
मदयन्तिकादीन्येव प्रत्यानयनम् ॥ ४२ ॥
होंठ लाल करना—मेंहदी आदि को पीसकर लगाने से सफेद होंठ पुनः लाल हो
जाते हैं ॥ ४२ ॥
बहुपादिकाकुष्ठतगरतालीशदेवदारुवज्रकन्दकैरुपलिप्तं वंशं वादयतो या
शब्दं शृणोति सा वश्या भवति ॥ ४३ ॥
मोहक वंशी—बहुपादिका (पोदीना), कुछ, तगर, तालीशपत्र, देवदारू और
वज्रकन्द—इनका लेप करके वंशी बजाने वाले की ध्वनि जो भी स्त्री सुनेगी वही वशीभूत हो
जायेगी ॥ ४३ ॥
धत्तूरफलयुक्तोऽभ्यवहार उन्मादकः ॥ ४४ ॥
पागल बनाना—खाद्य या पेय पदार्थों में धतूरे के बीज मिलाकर खिला पिला देने से
व्यक्ति पागल हो जाता है ॥ ४४ ॥
गुडो जीर्णतश्च प्रत्यानयनम् ॥ ४५ ॥
उसको स्वस्थ करना—पुराना गुड़ खिला देने से धतूरे का विष उतर जाता है ॥ ४५ ॥
हरितालमनःशिलाभक्षिणो मयूरस्य पुरीषेण लिप्तहस्तो यद् द्रव्यं स्पृशति तन्न
दृश्यते ॥ ४६ ॥
अदृश्य करना—हरताल और मैनसिल खाने वाले मोर की विष्ठा को हाथ में लगाकर
जिस वस्तु को छू दोगे, वही अदृश्य हो जायेगी ॥ ४६ ॥
अङ्गारतृणभस्मना तैलेन विमिश्रमुदकं क्षीरवर्णं भवति ॥ ४७ ॥
पानी को दूध के समान सफेद करना—खस की भस्म को तैल में मिलाकर पानी में
डाल देने से पानी दूध के समान सफेद हो जाता है ॥ ४७ ॥
हरीतकाभ्रातकयोः स्रवणप्रियङ्गुकाभिश्च पिष्टाभिर्लिप्तानि लोहभाण्डानि
ताम्रीभवन्ति ॥ ४८ ॥

२०२ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोहे को ताँबे के समान करना—हरड़ और आँवले को मालकाँगनी के साथ पीसकर
लोहे के बर्तन पर लेप करने से वह ताँबे के रंग का हो जाता है ॥ ४८ ॥
श्रवणप्रियङ्गुकातैलेन दुकूलसर्पनिर्मोकेण वर्त्या दीपं प्रज्वाल्य पार्श्वे
दीर्घीकृतानि काष्ठानि सर्पवद् दृश्यन्ते ॥ ४९ ॥
लकड़ियों का सर्प दिखना—सर्प की केंचुली और कपड़े को लपेटकर, बत्ती बनाकर,
मालकाँगनी के तैल में भिगोकर दीपक की तरह जलाये तो आस पास में पड़ी लकड़ियाँ उसके
प्रकाश में सर्पों के समान दीखेंगीं ॥ ४९ ॥
श्वेतायाः श्वेतवत्साया गोः क्षीरस्य पानं यशस्यमायुष्यम् ॥ ५० ॥
यश और आयुवर्धक दूध—सफेद बछड़े वाली सफेद गाय का दूध पीने से यश और
आयु की वृद्धि होती है ॥ ५० ॥
ब्राह्मणानां प्रशस्तानामाशिषः ॥ ५१ ॥
ब्राह्मणों का आशीर्वाद सदैव हितकर—प्रशस्त ब्राह्मणों का आशीर्वाद भी यश और
आयु को बढ़ाता है ॥ ५१ ॥
पूर्वशास्त्राणि सन्दृश्य प्रयोगाननुसृत्य च।
कामसूत्रमिदं यत्नात् संक्षेपेण निवेदितम् ॥ ५२ ॥
उपसंहार—पूर्वाचार्यों के शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन कर और उनके प्रयोगों का
अनुसरण कर प्रयत्नपूर्वक संक्षेप में इस कामसूत्र को कहा गया है ॥ ५२ ॥
धर्ममर्थं च कामं च प्रत्ययं लोकमेव च।
पश्यत्येतस्य तत्त्वज्ञो न च रागात् प्रवर्तते ॥ ५३ ॥
शास्त्र का उद्देश्य रागोद्दीपन नहीं—इस कामशास्त्र के तत्त्व को जानने वाला व्यक्ति
धर्म, अर्थ, काम, विश्वास और लोकाचार को देखकर ही प्रवृत्त होता है, राग या कामुकतावश
नहीं ॥ ५३ ॥
अधिकारवशादुक्ता ये चित्रा रागवर्द्धनाः ।
तदनन्तरमत्रैव ते यत्नाद्विनिवारिताः ॥ ५४ ॥
अशिष्टसम्मत योगों का प्रयोग उचित नहीं—इस शास्त्र में प्रकरणवश राग को बढ़ाने
वाले विचित्र योग कहे गये हैं, लेकिन विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट कर दिया गया है कि कौन
कौन से प्रयोग किये जायें और कौन से नहीं ॥ ५४ ॥
न शास्त्रमस्तीत्येतेन प्रयोगो हि समीक्ष्यते ।
शास्त्रार्थान् व्यापिनो विद्यात् प्रयोगांस्त्वेकदेशिकान् ॥ ५५ ॥
ये बातें शास्त्र में कही गयी हैं, इसीलिये उन्हें प्रयोग नहीं कर बैठना चाहिये, क्योंकि
शास्त्र का विषय तो सार्वभौम होता है, लेकिन उसके प्रयोग एकदेशीय ही होते हैं ॥ ५५ ॥
बाभ्रवीयांश्च सूत्रार्थानागमय्य विमृश्य च।
वात्स्यायनश्चकारेदं कामसूत्रं यथाविधि ॥ ५६ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण २०३
शास्त्रसम्मत ग्रन्थ—बाभ्रवीय सूत्रों को समझकर और कामशास्त्र का गुरुओं से
अध्ययन कर एवं स्वबुद्धि से चिन्तन मनन करके ही आचार्य वात्स्यायन ने इस 'कामसूत्र' को
शास्त्रीय विधि से लिखा है ॥ ५६ ॥
तदेतद् ब्रह्मचर्येण परेण च समाधिना।
विहितं लोकयात्रार्थं न रागार्थोऽस्य संविधिः ॥ ५७ ॥
निर्माण की अवस्था और प्रयोजन—इस 'कामसूत्र' की रचना अमोघ ब्रह्मचर्य और
निर्विकल्प समाधि द्वारा महर्षि वात्स्यायन ने लोकव्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिये की
है, इसका विधान राग के निमित्त नहीं किया गया ॥ ५७ ॥
रक्षन् धर्मार्थकामानां स्थितिं स्वां लोकवर्तिनीम्।
अस्य शास्त्रस्य तत्त्वज्ञो भवत्येव जितेन्द्रियः ॥ ५८ ॥
कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता—इस शास्त्र के तत्त्व को समझने वाला पुरुष धर्म, अर्थ
एवं काम तथा लोक में अपनी स्थिति की रक्षा करता हुआ निश्चय ही जितेन्द्रिय हो जाता
है ॥ ५८ ॥
तदेतत्कुशलो विद्वान् धर्मार्थाववलोकयन्।
नातिरागात्मकः कामी प्रयुञ्जानः प्रसिध्यति ॥ ५९ ॥
सिद्धि के लिये रागात्मकता का अभाव आवश्यक—जो कामी पुरुष रागात्मक भाव
से इस शास्त्र का अध्ययन एवं प्रयोग करता है, उसे कदापि सिद्धि नहीं मिलती; किन्तु जो
विवेकवान् पुरुष धर्म और अर्थ को दृष्टि में रखकर इसका प्रयोग करता है उसे पूर्ण सिद्धि
मिलती है ॥ ५९ ॥
नष्टरागप्रत्यानयन से चित्रयोग तक
व्याख्यानात्मक द्वितीय अध्याय पूर्ण ॥
॥ वात्स्यायनकृत कामसूत्र पूर्ण ॥
काम० १५

साम्प्रयोगिक आसनों के
कतिपय चित्र
[इस ग्रन्थ के द्वितीय साम्प्रयोगिक अधिकरण की षष्ठ, अष्टम एवं नवम अध्यायों
में नायक-नायिका द्वारा साम्प्रयोगिकावस्था (सम्भोगावस्था) में प्रयुक्त किये जाने वाले
सभी आसनों का विस्तृत वर्णन उपलब्ध है।
पाठकों को इन का सरलतापूर्वक ज्ञान हो जाय—इस आशा से यहाँ कुछ आसनों
के चित्र दिये जा रहे हैं।
प्रत्येक चित्र पर आसन का नाम तथा इस ग्रन्थ की पृष्ठ-संख्या दे दी गयी है।
तत्सम्बद्ध विस्तृत विवरण उस उस पृष्ठ पर देखना चाहिये।]

आसन-चित्र २०५
मृगी आसन
विवरण पृष्ठ ५२
हस्तिनी आसन
विवरण पृष्ठ ५२
इन्द्राणी आसन
विवरण पृष्ठ ५३
वाडवक आसन
विवरण पृष्ठ ५३, ५४

२०६ वात्स्यायन-कामसूत्र
उत्फुल्लक आसन
विवरण पृष्ठ ५३
उत्तानसम्पुटक आसन
विवरण पृष्ठ ५४
उत्तानसम्पुटक आसन
विवरण पृष्ठ ५४
पार्श्व सम्पुटक आसन
विवरण पृष्ठ ५४
पीडितक आसन
विवरण पृष्ठ ५४

आसन-चित्र २०७
अर्धपीडितक आसन
विवरण पृष्ठ ५४,५५
वेष्टितक आसन
विवरण पृष्ठ ५४
वेष्टितक आसन
विवरण पृष्ठ ५४

२०८ वात्स्यायन-कामसूत्र
भुग्नक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
भुग्नक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
कार्कटकासन
विवरण पृष्ठ ५५

आसन-चित्र
२०९
उत्पीड़ितक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
वेणुदारितक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
भुग्नक आसन
विवरण पृष्ठ ५५

२१० वात्स्यायन-कामसूत्र
वेणुदारितक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
पद्मासन
विवरण पृष्ठ ५५
परावृत्तक आसन
विवरण पृष्ठ ५५

आसन-चित्र २११
परावृत्तक आसन
विवरण पृष्ठ ५५
जलसम्भोगासन
विवरण पृष्ठ ५६
स्थितरत आसन
विवरण पृष्ठ ५६
धेनुक आसन
विवरण पृष्ठ ५६