सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

or १? It has a vertical stem and a loop at the top, but wait, look at line 16:
It is ॥ followed by a space and then a raised १ or a quote?
Wait, in line 15: ॥ followed by ’ and another ’? Wait, or is line 15: ॥' and line 16: ॥१?
Wait, look at line 16 again: after मेनिरे ॥, there is a character: it has a vertical line, a curve... wait, is that '१?
Wait, look at line 15 again:
भास्कराः ॥' -> wait! In line 15, after भास्कराः, there is ॥ then ’? No, wait, look at line 15:
भास्कराः ॥ then double prime ''?
Wait, could line 15 end with ॥' and line 16 end with ॥१?
Wait, let's look at the quotes:
The quote started where?
Line 13 ends with a dash: पुरुषत्व-हीनता का सारा रोग दूर हो गया—
There is NO opening quote before दशमे!
Wait, is there an opening quote? No.
Then why would there be closing quotes at line 15?
Wait, look

२२ वरिवस्यारहस्ये
अपने भाष्य—'सौभाग्यभास्कर' के प्रारंभ में अष्टादशविद्या, त्रिपुरादेवी, त्रयी
(वेदत्रयी) अग्नित्रय आदि में अटूट विश्वास व्यक्त किया है। चूँकि पवित्र अग्नित्रय
ही समस्त वैदिक कर्मकाण्ड के आधारभूत माध्यम हैं, वेदों में त्रिपुरादेवी की
उपासना प्रतिपादित की गई है और वेदत्रय ही वैदिक सनातन धर्म के प्राणभूत
पवित्र ग्रन्थ है—अतः उनमें विश्वास रखने के कारण आचार्य भास्कर सनातन वैदिक
धर्म के निष्ठावान् अनुयायी थे। वे ऋग्वेदीय शाखा के थे और ब्राह्मणों की भाँति
सोमयागी भी थे। हाँ यह बात अवश्य है कि उन्होंने परात्पर सत्ता के रूप में
परब्रह्म के रूप में—भगवान के रूप में महात्रिपुरसुन्दरी की ही आद्योपान्त उपासना
की और श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी मन्त्र की ही साधना की। उन्हें श्रीदेवी एवं
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र की दीक्षा नृसिंहानन्दनाथ से प्राप्त हुई। उनका दीक्षा-नाम
'भासुरानन्दनाथ' हुआ। 'नित्योत्सव' के प्रणेता उमानन्दनाथ उनके शिष्यों में से
एक शिष्य थे।
कृष्णास्वामी शास्त्री के मतानुसार भास्करराय का धार्मिक दर्शन अप्पय दीक्षित
के 'रत्नत्रयपरीक्षा' पर आधृत था। इसके अनुसार एक ही निर्गुण ब्रह्म ने अपनी
मायाशक्ति द्वारा एक साथ दो रूप ग्रहण किये—१. धर्म २. धर्मी ॥ 'धर्म' ने
अपने को दो रूपों में विभक्त किया—१. 'पुरुष' और २. 'नारी' । जहाँ तक
'धर्मी' तत्त्व की बात है—'धर्मी' स्वयं 'शिव' हैं। 'नारी' स्वयं शिव की अर्द्धांगिनी
हैं। 'पुरुष' रूप विष्णु समस्त सृष्टि-रचना का उपादान कारण बना। इन तीन
रूपों का ही एकीभाव जब व्यक्त हुआ तो वह देशकालातीत, निरपेक्ष, परमाद्वैत
सत्ता कहलायी। अध्यात्मविज्ञान (Metaphysics) की दृष्टि से तो आचार्य भास्कर
ने शङ्कराचार्य के केवलाद्वैतवाद का प्रतिपादन एवं अनुवर्तन किया है और इसीलिए
उन्होंने 'दुर्गासप्तशती' की अपनी टीका 'गुप्तवती' के प्रारंभ में शङ्कराचार्य के प्रति
अपनी प्रगाढ़ भक्ति अभिव्यक्त की है। उन्होंने 'वार्तिक' विवरण' आदि शाङ्कर
अद्वैत के मूर्धन्य ग्रन्थों के उद्धरण तो दिये ही हैं साथ ही साथ उन्होंने
'सौभाग्यभास्कर' में असंख्य बार शाङ्कर अद्वैतवाद के प्रति निष्ठा, आस्था एवं
विश्वास व्यक्त किया है। यद्यपि यह सत्य है कि वे शाक्ताद्वैतवाद के पोषक होने
के कारण द्वयात्मक अद्वैतवाद के अनुवर्ती थे किन्तु चिन्तन की दृष्टि से वे शाङ्कर
अद्वैतवाद के ऋणी भी थे। उनके गुरु श्रीविद्या के उपासक थे। उन्होंने
'शांभवानन्दकल्पलता' एवं "परिभाषा श्लोक" जैसे ग्रन्थों का प्रणयन किया था।
शाक्त दार्शनिक उमानन्दनाथ उनके शिष्य थे। वे मुख्यतः शाक्त और त्रिपुरभैरवी
(भगवती ललिता), (त्रिपुरसुन्दरी) के भक्त एवं उपासक थे।
भास्कर शिव के प्रति भी अटूट श्रद्धा-भक्ति रखते थे इसीलिए वे कहते हैं
कि कमल में कमल की उत्पत्ति तो कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती किन्तु मैंने तो
शम्भु के चरणकमलों में विष्णु के नयन कमल खिलते देखें हैं—
"कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न च दृश्यते ।
दृष्टं शंभोः पदाम्भोजे विष्णुलोचन पङ्कजम् ॥"

भूमिका २३
'विवर्तवाद' और 'परिणामवाद'—
भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की टीका में लिखा है—
“विवर्तवादं वेदान्तिसंमत परिणामवादी तान्त्रिको दूषयति”—इन वाक्यों के आधार पर
कतिपय विद्वानों का कथन है कि भास्करराय शाङ्कर विवर्तवाद एवं शाङ्कर वेदान्त के
विरोधी थे । किन्तु यह निष्कर्ष सङ्गत नहीं है क्योंकि भास्कर कहते हैं इस वेदान्त
संमत विवर्तवाद को परिणामवादी तान्त्रिक दूषित मानते हैं और उसका खण्डन
करते हैं न कि मैं भास्करराय ।
वेदान्त के एक प्रख्यात ग्रन्थ 'वाक्य शुद्धि' (दृग्दृश्यविवेक) में कहा गया है
कि अस्तित्व (सत्) ज्ञान एवं आनन्द तथा नाम एवं रूप ये पाँच तत्त्व ही विश्व के
समस्त पदार्थों का निर्माण करते हैं । इनमें प्राथमिक तत्त्वत्रय ब्रह्म का एवं शेष
तत्त्व पदार्थों का निर्माण करते हैं । अर्थात् नाम एवं रूप ही भेद के विधायक
(कारक) हैं । इस भेद को प्रतिषिद्ध कर देने पर मात्र ब्रह्म ही शेष रह जाता है ।
यही बात तो भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की टीका के अन्त
में कहीं है कि—'पदार्थ' पदार्थ के रूप में तो क्षुण्य है किन्तु ब्रह्म के रूप में
नित्य है—‘‘घटादिरूपेण नित्यत्वं ब्रह्मरूपेण नित्यत्वम्’’ मृत्तिका एवं घट में अभेद
रहने पर भी मृत्तिका का घटरूप नाशवान् है । किन्तु घट का मृत्तिका रूप अनश्वर
है—'मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वम् ।।' इसे ही उन्होंने अपने
गुरु के ग्रन्थ 'शांभवानन्दकल्पलता' का सारांश स्वीकार करके अङ्गीकार किया है ।
'परिणामवाद' एवं 'विवर्तवाद' में कोई गंभीर विरोध भी दृष्टिगत नहीं होता ।
शङ्कराचार्य जी ने ब्र०सू० (वे०द०) १।१।१४ के भाष्य के अन्त में कहा है
कि—‘‘कार्यों के संसार को मिथ्या मानकर उसका परित्याग करने के स्थान में
सूत्रकार ने 'परिणामवाद' की ओर प्रत्यावर्तित होने का मार्ग इसलिए अङ्गीकृत किया
क्योंकि यह सगुण ब्रह्म के ध्यान के लिए उपयोगी है ।।’’
सर्वज्ञात्मन (शङ्कराचार्य के शिष्य) ने 'संक्षेपशारीरक' में कहा है कि वेदान्त में
'परिणामवाद' का सिद्धान्त अत्यावश्यक है और यह प्रथम सोपान है । यही व्यक्ति
को विवर्तवाद के केन्द्रीय सिद्धान्त तक ले जाता है ।
परिणामवाद और भास्करराय—
दार्शनिक परम्परा में मुख्यतः निम्नवादों या सिद्धान्तों का आश्रय लिया जाता
है—१. विवर्तवाद २. परिणामवाद ३. प्रतिबिम्बवाद या आभासवाद ४. आरम्भवाद
५. सत्कार्यवाद ६. अवच्छेदवाद ७. दृष्टिसृष्टिवाद एवं गौड़पाद का अजातिवाद
आदि ।।
प्राचीनकाल में दार्शनिकों का इन विशिष्ट वादों के प्रति इतना आग्रह नहीं था
जितना कि परवर्ती काल में हो गया । वे विवर्त एवं परिणाम तथा आभास एवं
प्रतिबिम्ब को समानार्थी मानकर उन्हें व्यवहृत करते थे । किसी भी पदार्थ के एक

२४ वरिवस्यारहस्ये
रूप का तिरोभाव होना एवं दूसरे रूप का प्रकट होना (रूपान्तर उत्पन्न होना) ही
'परिणाम' है । 'परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति । रूपान्तरं च प्रादुर्भवति ।।' (ई०
प्रत्यभिज्ञाविवृति वि०अ० १। वि०) किसी भी पदार्थ का असत्य रूप में निर्भास
होना ही 'विवर्त' है— 'विवर्तो हि असत्यरूप निर्भासम' (अभिनवगुप्त : ई०प्र०
वि०वि०) उपादान की समसत्ताक कार्यापत्ति 'परिणाम' है एवं उसकी विषमसत्ताक
कार्यापत्ति 'विवर्त' है । “परिणामो नामोपादान समसत्ताक कार्यापत्तिः । विवर्तो
नामोपादान विषमसत्ताक कार्यापत्तिः ॥”१ दोनों ही अन्यथा प्रथाएँ हैं । एक है
सद्वस्तु की एवं दूसरी है असद्वस्तु की— “सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथाविकार इत्युदीरितः ।
अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथाविवर्त इत्युदीरितः ।”२ घृत दही का 'परिणाम' है तो रज्जु में
सर्पाभास रज्जु का 'विवर्त' है।
वेदान्ती नैयायिकों की भाँति न तो उत्पत्ति से पूर्व कार्य को असत् कहते हैं
और न तो सांख्यों की भाँति सत् कहते हैं । न तो वे न्याय का असत्कार्यवाद
स्वीकार करते हैं और न तो वे सांख्य का 'सत्कार्यवाद' ही स्वीकार करते हैं । वे
'कार्य' को 'अनिर्वचनीयतावाद' की स्थापना करते हैं ।३ प्रत्यभिज्ञादर्शन के अनुयायी
'स्वातंत्र्यवाद' को स्थापित करते हैं ।
भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में 'परिणाम' एवं 'विवर्त' दोनों शब्दों को समानार्थी
मानकर प्रयुक्त किया है । वे कहते हैं कि 'यह विश्व शब्द का ही “परिणाम” है—
ऐसी आम्नायवेत्ताओं की दृष्टि है । यह जगत् सर्वप्रथम छन्दों से विवृत हुआ—
“शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नाय विदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥”
स्पष्ट है कि भर्तृहरि जगत् को “परिणाम” एवं “विवर्त” दोनों मानते हुए
दोनों शब्दों को समानार्थी स्वीकार करते हैं । आचार्य शान्तरक्षित ने भी—
“विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः” की व्याख्या में 'विवर्त' का अनुवाद
'परिणाम' करके विवर्त एवं परिणाम में अभेद स्वीकार किया है । भवभूति भी
'आवर्तबुद्बुदतरङ्ग' को जल का विकार एवं विवर्त दोनों कहकर दोनों शब्दों की
समानार्थकता इंगित करते हैं ।
योगिराज भास्करराय मखिन भी इसी 'परिणामवाद' (अविकृत परिणामवाद) को
कार्य-कारण सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करते हैं । उन्हें आचार्य रामानुज का
विकृत परिणामवाद स्वीकार नहीं है प्रत्युत् उन्होंने 'अविकृत परिणामवाद' स्वीकार
किया है । जिस प्रकार मृत्तिका एवं उसके परिणाम घट में कोई भेद नहीं है उसी
प्रकार ब्रह्म एवं जगत् में भी कोई भेद नहीं है । ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य


१. वेदान्त परिभाषा २. वेदान्तसार
३. कार्यकारण भाव से चतुर्धा विप्रतिपत्तियाँ हैं— (क) असत् से सत् उत्पन्न होता
है (ख) सत् से असत् उत्पन्न होता है (ग) सत् से विवर्त उत्पन्न होता है (घ) सत् से
सत् उत्पन्न होता है ।

भूमिका २५
है । भेद मात्र मिथ्या है अतः भेदाश्रित आधाराधेयभाव भी मिथ्या ही है— 'वस्तुतस्तु
जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तान्त्रिकाणां मते जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव
ब्रह्मजगतोरत्यन्ताभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि सत्यत्वावश्यंभावात् भेदमात्रस्य
मिथ्यात्वस्वीकारेणाद्वैतश्रुतीनामखिलानां निर्वाहः । भेदस्य मिथ्यात्वादेव भेदघटिताधारा-
धेयभाव संबंधोऽपि मिथ्यैव ।।'१
आचार्य रामानुज, वल्लभाचार्य२, निम्बकाचार्य३, श्रीपति४, श्रीकण्ठ५ आदि सभी
आचार्यों ने भी 'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन किया है । विवर्तवादी शङ्कराचार्य भी
'सौन्दर्यलहरी' में परिणामवाद की ही पुष्टि करते हैं—
“मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसिमरुत्सारथिरसि ।
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा ।
चिदानन्दाकारं शिवयुवतिभावेन बिभृषे ।।”
'वामकेश्वरतन्त्र' में भी जगत् को शक्ति का 'परिणाम' माना गया है ।६
भास्कराचार्य ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की व्याख्या में 'वाचारंभणं
विकारः ।।' (छा०उप० ६।१।४)—'आत्मकृतेः परिणामात्' (ब्र०सू० १।४।२६)
इत्यादि वाक्यों एवं सूत्रों को उद्धृत करके श्रुति एवं ब्रह्मसूत्रकार को भी
'परिणामवाद' का प्रतिपादक घोषित किया है और कहा है कि इन सभी का
'अभिप्रेत' एवं 'स्वाभिमत' 'परिणामवाद' ही है— 'परिणामवाद एवाभिप्रेतः'
'स्वाभिमतः परिणामवाद एव स्फुटीकृतः ।'७ भास्करराय के मत में— 'तान्त्रिक'
परिणामवादी ही सुनिश्चित होते हैं ।
काश्मीरी 'शिवाद्वयवादी' आभासवादी एवं प्रतिबिम्बवादी हैं तो अभिनवगुप्त
पादाचार्य 'स्वातन्त्र्यवादी' हैं ।
शिवाद्वय शासन में 'आभासवाद' एवं दर्पणविधि का सिद्धान्त बाह्यवाद का
प्रतिरोधी बनकर एवं 'स्वातंत्र्यवाद' इसका मूल सिद्धान्त बनकर स्वीकृत हुआ ।
भास्कराचार्य ने 'अविकृत परिणामवाद' की तान्त्रिकी दृष्टि को अङ्गीकार किया ।
आचार्य भास्कर 'कुण्डलिनीयोग' 'षट्चक्रोपासना' का प्रतिपादन करने एवं
शाक्ताद्वैतवाद का प्रतिदिन पूजा-विधान में भी प्रयोग करने “अहं देवी न चान्योऽस्मि
ब्रह्मैवास्मि न शोकभाक् । सच्चिदानन्दरूपोऽहं नित्यमुक्तस्वभाववान्” में विश्वास
१. सौभाग्यभास्कर (पृ० १५१) २. अणुभाष्य (१।४।२७)
३. वेदान्त पारिजात (१।४।२६) ४. श्रीकर भाष्य (१।४।२७)
५. श्रीकण्ठ भाष्य (१।४।२७)
६. 'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् इष्यते ।' 'तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव तस्यां
परिणतायां' इति वामकेश्वरतन्त्रात् ।। (वरिवस्यारहस्यम्)
७. वरिवस्यारहस्यम्

२६ वरिवस्यारहस्ये
रखने के कारण तथा—'इत्थं माता विद्याचक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति । पञ्चानामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ।।' (माता, विद्या, गुरु, चक्र, एवं भक्त—इन
पाँचों अभिन्नता की अनुभूति रूप 'कौलिकार्थ') (गुरु-देह एवं देवी के देह में
अभिन्नता एवं उन दोनों से शिष्य की अभिन्नता—'देव्या देहो यथा प्रोक्तो
गुरुदेहस्तथैव च । तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते, का प्रतिपादन
करने, 'ब्रह्माणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायार्थः' की पुष्टि करने एवं इसी
प्रकार १५ प्रकार के अर्थों की विभावना द्वारा अद्वैतवाद की प्रबल स्थापना करने
के कारण (भास्करराय) के अद्वैतवादी ज्ञानी और योगी तो अवश्य सिद्ध होते हैं
किन्तु भावना के धरातल पर वे भक्त भी हैं । उनकी भक्ति है—भगवती त्रिपुरा के
प्रति ।। वे 'ब्रह्मपरिणामवादी' हैं—'इयं सृष्टिः परब्रह्मपरिणाम इति पूर्वमुक्तम् ।'१
५. 'वरिवस्यारहस्यम्'—एक विहङ्गमावलोकन
'वरिवस्यारहस्यम्' श्रीविद्या पर प्रकाश डालने वाला एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है ।
इसके प्रणेता भास्कराचार्य हैं । ग्रन्थकार ने प्रारंभिक श्लोकों में 'प्रकाश' एवं
'विमर्श' के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं
देहमयी सृष्टि के ज्ञान हेतु चौदह विद्याओं के सारभूत वेदों के सारतम गायत्री मन्त्र
पर प्रकाश डालते हुए उसे पञ्चदशी मन्त्र से अभिन्न प्रतिपादित किया है । अगले
श्लोकों में 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्तिकूट' एवं उनके सङ्घटक वर्णों पर प्रकाश
डाला गया है । इसके बाद—ह्रल्लेखा के स्वरूप के अन्तर्गत आने वाले—व्योम,
अग्नि, वामलोचना, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका,
समना, उन्मनी के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । अगले श्लोकों में त्रिकूटों के
वर्णों में अवस्थापञ्चक की स्थिति पञ्चविषुव, जप के स्वरूप, गायत्री के पंद्रह अर्थ,
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में अभिन्नता आदि की मीमांसा की गई है । इसके
बाद कूटत्रय के प्रतीकार्थ पर प्रकाश डाला गया है । इसके बाद श्रीविद्या के
आन्तरिक एवं बाह्य अङ्गों पर प्रकाश डाला गया है । अन्त में गुरु के महत्व पर
प्रकाश डाला गया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' पर अद्वैत का प्रभाव है ।
भास्करराय ने आजीवन त्रिपुरा की उपासना की और अपने धार्मिक दर्शन की
नींव अप्पय दीक्षित के "रत्नत्रयपरीक्षा" पर रखा । उन्हें शङ्कराचार्य के अद्वैतवाद
पर पूर्ण विश्वास था । उन्होंने 'पञ्चपादिका', 'वार्तिक', 'विवरण', 'भामती'
'पञ्चदशी' एवं 'शारीरक भाष्य' आदि वेदान्त-ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए उनके
श्लोकों को उद्धृत भी किया है । इन सबके बाद भी भास्करराय ने अद्वैतवाद का
त्याग करके तान्त्रिक दर्शन का अनुवर्तन किया ।
चूँकि भास्करराय सरस्वतीदेवी के भी एकनिष्ठ उपासक थे अतः उन्होंने शाक्त
दर्शन का प्रतिपादन किया और शाङ्कर वेदान्त के 'विवर्तवाद' का खण्डन भी
किया । इसी दृष्टि से उन्होंने 'वरिवस्यारहस्यम्' के प्रारंभ में ही (तीसरे श्लोक
में)—'स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि । कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते
सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे" कहकर 'विवर्तवाद' का खण्डन करते हुए 'परिणामवाद' की

भूमिका २७
पुष्टि की है—“'विवर्तवादं वेदान्तिसंमतं परिणामवादी तान्त्रिको दूषयति ॥' उन्होंने
अपने तर्क की पुष्टि में 'प्रकाश' में 'वामकेश्वरतन्त्र' के इस परिणामवादी सिद्धान्त
की पुष्टि की है जिसमें कहा गया है—“तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते।" वे यह भी कहते हैं कि—'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य में भेदांश मात्र
का निषेध किया गया है न कि प्रपञ्च का । वे यह भी कहते हैं कि आचार्य शङ्कर
जैसे अद्वैतवादी दार्शनिक ने भी 'सौन्दर्यलहरी' में 'त्वयिपरिणातायाम्' कहकर
(“परिणामवाद एवाभिप्रेतः, परिणामवाद एव स्फुटीकृतः ॥") परिणामवाद का
प्रतिपादन किया ।
तान्त्रिकों की मान्यता है कि—गायत्री के दो स्वरूप हैं—१. सामान्य अनुत्कृष्ट
रूप—चौबीस वर्णों की गायत्री २. श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ॥ श्रीविद्या के इस मन्त्र के
प्रत्येक वर्ण का अपना देवता है । और इन सबकी विशिष्ट अर्थवत्ता है ।
भास्कराचार्य का कथन है कि पञ्चदशाक्षरी विद्या उपनिषदों के 'तत्त्वमसि', 'अहं
ब्रह्मास्मि' एवं 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' द्वारा व्यक्त जीव-ब्रह्मैक्य के अद्वैतवाद का
प्रतिपादन करती है ।
भास्करराय ने अद्वैतवाद के उस स्वरूप को स्वीकार किया है जो कि
शाक्त-दर्शन में स्वीकृत है । उन्होंने 'प्रकाश' में वेदान्त दर्शन के—'आत्मकृतेः
परिणामात' सूत्र का उल्लेख करके 'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' को उद्धृत करके एवं अन्य
तर्क प्रस्तुत करके 'परिणामवाद' की पुष्टि की है । वे यह भी कहते हैं कि—
'वाचारंभणं विकारो नामधेयं' जैसे आदि वैदिक वाक्यों एवं वामकेश्वरतन्त्र के—'तस्यां
परिणतायां तु न कश्चित् पर इष्यते'—वाक्य में भी अर्थ एवं भाव की दृष्टि से
परस्पर विरोध नहीं प्रत्युत् स्वारस्य है ।
उन्होंने इस ग्रन्थ में विभिन्न प्रकार के ऐ क्यों, ऐ कात्म्यों एवं अभिन्न बीजों
का भी प्रतिपादन किया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' मन्त्र शास्त्र का ग्रन्थ है ।
'मन्त्र-साधना' साधना की एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसको अनुष्ठित किए
जाने पर साधक अपने अति तेजस्वी एवं तत्त्वस्वरूप इष्टदेवता का मनन करने से
समस्त भय से मुक्त हो जाता है—
'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः ।
त्रायते सर्वभयतस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥'१
मन्त्रशास्त्र तो साधन है—'मन्त्र' साधना का उपकरण है और 'देवता' इस
साधना का लक्ष्य या उपलब्धि है । 'देवता' के तात्त्विक स्वरूप पर भी
'वरिवस्यारहस्यम्' में प्रकाश डाला गया है । देवता, त्राण करने वाली एक अचिन्त्य
शक्ति है। जो आध्यात्मिक अचिन्त्य शक्ति उपासक के शरीर में स्थित होकर अपने
वरदान के द्वारा उपासक के तापत्रय का शमन कर देता है वही देवता है ।
“'दे'” का अर्थ है = भक्तो का देह । 'व' = देवता का वरदान । 'ता' =
१. भास्कराचार्य—वरि० 'प्रकाश'

२६ वरिवस्यारहस्ये
रखने के कारण तथा—'इत्थं माता विद्याचक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति । पञ्चानामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ।।' (माता, विद्या, गुरु, चक्र, एवं भक्त—इन
पाँचों अभिन्नता की अनुभूति रूप 'कौलिकार्थ') (गुरु-देह एवं देवी के देह में
अभिन्नता एवं उन दोनों से शिष्य की अभिन्नता—'देव्या देहो यथा प्रोक्तो
गुरुदेहस्तथैव च । तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते, का प्रतिपादन
करने, 'ब्रह्मणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायर्थः' की पुष्टि करने एवं इसी
प्रकार १५ प्रकार के अर्थों की विभावना द्वारा अद्वैतवाद की प्रबल स्थापना करने
के कारण (भास्करराय) के अद्वैतवादी ज्ञानी और योगी तो अवश्य सिद्ध होते हैं
किन्तु भावना के धरातल पर वे भक्त भी हैं । उनकी भक्ति है—भगवती त्रिपुरा के
प्रति ।। वे 'ब्रह्मपरिणामवादी' हैं—'इयं सृष्टिः परब्रह्मपरिणाम इति पूर्वमुक्तम् ।'१
५. 'वरिवस्यारहस्यम्'—एक विहङ्गमावलोकन
'वरिवस्यारहस्यम्' श्रीविद्या पर प्रकाश डालने वाला एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है ।
सके प्रणेता भास्कराचार्य हैं । ग्रन्थकार ने प्रारंभिक श्लोकों में 'प्रकाश' एवं
वेमर्श' के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं
देहमयी सृष्टि के ज्ञान हेतु चौदह विद्याओं के सारभूत वेदों के सारतम गायत्री मन्त्र
पर प्रकाश डालते हुए उसे पञ्चदशी मन्त्र से अभिन्न प्रतिपादित किया है । अगले
श्लोकों में 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्तिकूट' एवं उनके सङ्घटक वर्णों पर प्रकाश
डाला गया है । इसके बाद—हृल्लेखा के स्वरूप के अन्तर्गत आने वाले—व्योम,
अग्नि, वामलोचना, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका,
समना, उन्मनी के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । अगले श्लोकों में त्रिकूटों के
वर्णों में अवस्थापञ्चक की स्थिति पञ्चविषुव, जप के स्वरूप, गायत्री के पंद्रह अर्थ,
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में अभिन्नता आदि की मीमांसा की गई है । इसके
बाद कूटत्रय के प्रतीकार्थ पर प्रकाश डाला गया है । इसके बाद श्रीविद्या के
आन्तरिक एवं बाह्य अङ्गों पर प्रकाश डाला गया है । अन्त में गुरु के महत्व पर
प्रकाश डाला गया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' पर अद्वैत का प्रभाव है ।
भास्करराय ने आजीवन त्रिपुरा की उपासना की और अपने धार्मिक दर्शन की
नींव अप्पय दीक्षित के “रत्नत्रयपरीक्षा” पर रक्खा । उन्हें शङ्कराचार्य के अद्वैतवाद
पर पूर्ण विश्वास था । उन्होंने 'पञ्चपादिका', 'वार्तिक', 'विवरण', 'भामती'
'पञ्चदशी' एवं 'शारीरक भाष्य' आदि वेदान्त-ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए उनके
श्लोकों को उद्धृत भी किया है । इन सबके बाद भी भास्करराय ने अद्वैतवाद का
त्याग करके तान्त्रिक दर्शन का अनुवर्तन किया ।
चूँकि भास्करराय सरस्वतीदेवी के भी एकनिष्ठ उपासक थे अतः उन्होंने शाक्त
दर्शन का प्रतिपादन किया और शाङ्कर वेदान्त के 'विवर्तवाद' का खण्डन भी
किया । इसी दृष्टि से उन्होंने 'वरिवस्यारहस्यम्' के प्रारंभ में ही (तीसरे श्लोक
में)—'स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि । कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते
सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे” कहकर 'विवर्तवाद' का खण्डन करते हुए 'परिणामवाद' की

भूमिका २७
पुष्टि की है—"विवर्तवादं वेदान्तिसंमतं परिणामवादी तान्त्रिको दूषयति ॥' उन्होंने
अपने तर्क की पुष्टि में 'प्रकाश' में 'वामकेश्वरतन्त्र' के इस परिणामवादी सिद्धान्त
की पुष्टि की है जिसमें कहा गया है—"तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते ।" वे यह भी कहते हैं कि—'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य में भेदांश मात्र
का निषेध किया गया है न कि प्रपञ्च का । वे यह भी कहते हैं कि आचार्य शङ्कर
जैसे अद्वैतवादी दार्शनिक ने भी 'सौन्दर्यलहरी' में 'त्वयिपरिणातायाम्' कहकर
(“परिणामवाद एवाभिप्रेतः, परिणामवाद एव स्फुटीकृतः ॥") परिणामवाद का
प्रतिपादन किया ।
तान्त्रिकों की मान्यता है कि—गायत्री के दो स्वरूप हैं—१. सामान्य अनुत्कृष्ट
रूप—चौबीस वर्णों की गायत्री २. श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ॥ श्रीविद्या के इस मन्त्र के
प्रत्येक वर्ण का अपना देवता है । और इन सबकी विशिष्ट अर्थवत्ता है ।
भास्कराचार्य का कथन है कि पञ्चदशाक्षरी विद्या उपनिषदों के 'तत्त्वमसि', 'अहं
ब्रह्मास्मि' एवं 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' द्वारा व्यक्त जीव-ब्रह्मैक्य के अद्वैतवाद का
प्रतिपादन करती है ।
भास्करराय ने अद्वैतवाद के उस स्वरूप को स्वीकार किया है जो कि
शाक्त-दर्शन में स्वीकृत है । उन्होंने 'प्रकाश' में वेदान्त दर्शन के—'आत्मकृतेः
परिणामात' सूत्र का उल्लेख करके 'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' को उद्धृत करके एवं अन्य
तर्क प्रस्तुत करके 'परिणामवाद' की पुष्टि की है । वे यह भी कहते हैं कि—
'वाचारंभणं विकारो नामधेयं' जैसे आदि वैदिक वाक्यों एवं वामकेश्वरतन्त्र के—'तस्यां
परिणतायां तु न कश्चित् पर इष्यते'—वाक्य में भी अर्थ एवं भाव की दृष्टि से
परस्पर विरोध नहीं प्रत्युत् स्वारस्य है ।
उन्होंने इस ग्रन्थ में विभिन्न प्रकार के ऐ क्यों, ऐ कात्म्यों एवं अभिन्न बीजों
का भी प्रतिपादन किया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' मन्त्र शास्त्र का ग्रन्थ है ।
'मन्त्र-साधना' साधना की एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसको अनुष्ठित किए
जाने पर साधक अपने अति तेजस्वी एवं तत्त्वस्वरूप इष्टदेवता का मनन करने से
समस्त भय से मुक्त हो जाता है—
'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः ।
त्रायते सर्वभयतस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥'१
मन्त्रशास्त्र तो साधन है—'मन्त्र' साधना का उपकरण है और 'देवता' इस
साधना का लक्ष्य या उपलब्धि है । 'देवता' के तात्त्विक स्वरूप पर भी
'वरिवस्यारहस्यम्' में प्रकाश डाला गया है । देवता, त्राण करने वाली एक अचिन्त्य
शक्ति है। जो आध्यात्मिक अचिन्त्य शक्ति उपासक के शरीर में स्थित होकर अपने
वरदान के द्वारा उपासक के तापत्रय का शमन कर देता है वही देवता है ।
“दे” का अर्थ है = भक्तो का देह । 'व' = देवता का वरदान । 'ता' =
१. भास्कराचार्य—वरि० 'प्रकाश'

२८ वरिवस्यारहस्ये
तापत्रय से त्राण ।
'देहमास्थाय भक्तानां वरदानाच्च पार्वति ।
तापत्रयादिशमनाद्देवता परिकीर्तिता ।।'२
इसी ध्येय तत्त्व को ध्यान एवं साधना का विषय बनाया जाता है । 'मन्त्र'
को इसलिए विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि यह यम, भूत आदि सभी
भयकारक शक्तियों से साधक का त्राण करता है—
'यमभूतादिसर्वेभ्यो भयेभ्योऽपि कुलेश्वरि ।
त्रायते सततञ्चैव तस्मान्मन्त्र इतीरितः ।।'३
भास्कराचार्य ने 'मन्त्र' एवं 'देवता' के अतिरिक्त 'यंत्र' के रहस्यात्मक पक्ष पर
भी प्रकाश डाला है ।४ उन्होंने यंत्र को ग्रहरूप, नक्षत्ररूप एवं योगिनीरूप भी
स्वीकार किया है—
१. सप्तभिरितैरैश्चक्रैश्चक्रे नक्षत्ररूपत्वम् ।। ९३ ।।
२. एवं षड्भिर्योगोच्छ्रीचक्रं योगिनीरूपम् ।। ९४ ।।
३. त्रैलोक्यमोहनाद्यैर्नवभिश्चक्रैर्ग्रहत्वं च ।। ९२ ।।
४. इसके अतिरिक्त भास्कर ने 'श्रीयन्त्र' को राशिरूप भी माना है—'एवं
द्वादशसंख्यैर्घटनाच्चक्रस्य राशित्वम् ।। ९५ ।।'
आचार्य भास्कर यह मानते हैं कि श्रीचक्ररूप यंत्र केवल ज्यामितीय रचना
मात्र नहीं हैं—प्रत्युत् यह पञ्चदशी मन्त्र का भी प्रतीक है क्योंकि यह इससे भी
अभिन्न है—
“चक्रं विद्याक्षरैरेव जननात् तदभेदवत् ।।”५
आचार्य भास्कर की मान्यता है कि—
१. दीक्षा-गुरु एवं परमशिव में अभिन्नता है । ┐ यही 'निगर्भार्थ' भी
२. साधक एवं परमशिव में अभिन्नता है । ┘ है (श्लोक ८२)
३. ब्रह्म एवं जगत् में अभिन्नता है । ┐ यही 'संप्रदायार्थ' भी
४. जगत् एवं विद्या (पञ्चदशी मन्त्र) में अभिन्नता है । ┘ है (श्लोक ८१)
५. पञ्चदशी मन्त्र एवं गायत्री में भी अभिन्नता है ।६
६. साधक की परमाराध्या देवी एवं मन्त्र में भी अभिन्नता है एवं देवी की
मातृका एवं पीठ के साथ भी अभिन्नता है—

१-३. कुलार्णव तन्त्र ४. वरिवस्यारहस्यम् (९२-९४)
५. कुलार्णव तन्त्र ६. वरिवस्यारहस्यम् (६०-८०)

भूमिका २९
'गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशिरूपिणीम् ।
देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीथरूमिणीम् ॥'१
७. मंत्र के कूटत्रय के साथ ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद की भी अभिन्नता
है । (वरि० श्लोक १३४-१३५) ।
८. पञ्चदशी मंत्र की उसके अक्षरार्थ से अभिन्नता है । (श्लोक ११०)
९. पञ्चदशाक्षरी मंत्र की देवी एवं कुण्डलिनी से भी अभिन्नता है और यही
पञ्चदशाक्षरी मंत्र का 'रहस्यार्थ' है—
“साक्षाद्विद्यैव सा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ॥''२ (श्लोक १०७)
वरिवस्यारहस्यम् के अनुसार श्रीविद्या की साधना के अङ्ग—


[चक्र-विवरण]

[केन्द्र:]
संविदुल्लास
मन्त्र-सिद्धि
मन्त्र-साक्षात्कार
आत्म-दर्शन

[श्रीविद्या के बाह्य अङ्ग]
ध्यान
न्यास
कीलक
शक्ति
बीज
विनियोग
देवता
छन्द
ऋषि
आकार
विभिन्न स्थितियाँ
रूप
प्रयत्न
स्थान
उच्चारण
काल (मात्रा)
उद्धार
विद्या के वर्णों की संख्या का ज्ञान

[श्रीविद्या के आन्तरिक अङ्ग]
महावाक्यार्थ
सगुणार्थ
समस्तार्थ
सामरस्यार्थ
शाक्तार्थ
मन्त्रार्थ
नामैकदेशार्थ
शब्दरूपार्थ
नामार्थ
महातत्त्वार्थ
रहस्यार्थ
कौलिकार्थ
निगर्भार्थ
संप्रदायार्थ
भावार्थ
प्रतिपाद्यार्थ
सद्गुरु कृपा
जप
पूजा
नियम


१. तन्त्रराज तन्त्र
२. वरिवस्यारहस्यम् (१०७)

३० वरिवस्यारहस्ये
१. मन्त्रार्थ—भावार्थ आदि १५ अर्थ
२. आन्तरिक अङ्ग—(श्रीविद्या के आन्तरिक अङ्ग) : वर्णसंख्या, उद्धार,
मात्रा, उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि
३. श्रीविद्या के बाह्याङ्ग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति,
कीलक, न्यास, ध्यान एवं पूजा आदि ।। (वरिवस्यारहस्यम्)
४. गुरु-कृपा ५. मन्त्र-जप
कीलक - मन्त्राणां कीलकं ज्ञात्वा कुर्यान्मंत्रपुरष्क्रियाम् ।।
मंत्राङ्ग ज्ञान- मन्त्रस्य श्रोत्रास्यनेत्र प्राणाम् विज्ञाय यत्नत ।... कुर्यान्मन्त्र-
पुरष्क्रियाम् । (शाक्ता०)
१. देवता यस्य यस्य च मंत्रस्य उद्दिष्टा या च देवता । (देवतातत्त्व)
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जपमाचरेत् ।। (‘शाक्ता०’)
२. उच्चारण शनैः शनैरविस्पृष्टं न द्रुतं न विलम्बितम् । (उच्चारण)
क्रमेणोच्चारभेदृ वर्णानाद्यन्तक्रमयोगतः ।। (शाक्ता०)
अतिह्रस्वो व्याधिहेतु रतिदीर्घो वसुःक्षयः ।
अक्षराक्षरसंयुक्तं जपेन्मौलिकहारवत् ।। (भूतशुद्धि) (उच्चारण)
३. मंत्रार्थज्ञान कथं मन्त्राश्च सिध्यन्ति मंत्रार्थज्ञानिनः प्रिये ।। (रुद्रयामल)
४. ध्यान आदौ ध्यानं ततो मंत्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।।
ध्यानमंत्रसमायुक्तः शीघ्रं सिध्यति साधकः ।। (शाक्ता०)
५. जप देवतां चित्तगां कुर्यात् कुर्याच्च हृदयं स्थिरम् । ओष्ठौ सम्पुटौ
कृत्वा स्थिरचित्रः स्थिरेन्द्रियः । ध्यायेच्च मनसावर्णान् जिह्वौष्ठौ न
विचालयेत न कम्पेच्छिरोग्रीवां दन्तान्नैव प्रकाशयेत । मंत्रोद्धार
क्रमेणैव मंत्रं जपति साधकः । तदासिद्धिं विजानीत न
सिद्धिश्चान्यथा भवेत् ।। (शाक्तानन्द तरंगिणी) ।।
आचार्य भास्करराय ने यह भी देखा कि—श्रीविद्या के प्रथम कूट में जो
हल्लेखा है उसके अन्तर्गत जो कामकला स्थित है उसमें—‘सपरार्धकला’ या ‘वह्नि
कुण्डलिनी’ द्वितीय कूट में—‘सूर्य कुण्डलिनी’ एवं तृतीय कूट में ‘सोम
कुण्डलिनी’ स्थित है । ‘नेत्रतन्त्र’ (६।६) में ध्यान के तीन प्रकार बताए गए हैं—
१. स्थूल २. सूक्ष्म ३. पर । भास्कराचार्य ने इसी प्रकार देवता की तीन रूपों
की कल्पना करते हुए उनके स्वरूप की मीमांसा की है ।
आचार्य भास्कर ने मन्त्र-विज्ञान पर शोध करते हुए यह भी देखा कि देवता
के तीन रूप होते हैं—१. शरीराङ्गयुक्त (कर, चरण, आदि अवयवों से युक्त रूप)
२. मन्त्रात्मक रूप, ३. वासनात्मक रूप ।। सिद्धि प्राप्त करने पर साधक प्रथम
रूप को—चक्षुरेन्द्रिय पाणीन्द्रिय योग्य, द्वितीय रूप को—श्रवणेन्द्रिय, वागिन्द्रिय

भूमिका ३१
योग्य एवं तृतीय रूप को—मन के योग्य देखता है । इसी रूप त्रैविध्य के कारण
देवी की भावना भी द्विविधात्मिका है—१. सरूपा २. अरूपा ।। प्रथम स्थूल-
रूपानुसंधानात्मिका है एवं द्वितीय पररूपानुसंधानात्मिका (चरमा) है । प्रथम स्वरूप
बहिर्याग द्वारा एवं दूसरा अन्तर्याग द्वारा साधित है ।
आचार्य भास्करराय ने मन्त्र-विज्ञान पर शोध करते हुए इस निष्पत्ति की
स्थापना की कि वेदमात्रा गायत्री के भी दो रूप हैं—१. सामान्य (Exotenic) एवं
२. गुप्त (Esotenic) ।। गायत्री का जो समान्य स्वरूप है वह उसका
चतुर्विशत्यात्मक वर्णमाला से एवं पादत्रय से निर्मित है किन्तु उसका एक रहस्यमय
या गुप्त स्वरूप भी है और वह है—विद्या पञ्चदशाक्षरी के रूप में स्थित है ।
श्रीविद्या का प्रत्येक अक्षर किसी न किसी एक स्वतंत्र शक्ति से अधिष्ठित है और
प्रत्येक अक्षर का स्वतन्त्र अर्थ है । भास्करराय यह भी स्थापित करते हैं कि
श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ऐसी विद्या है जो कि ‘तत्वमसि’ का साक्षात्कार कराती है एवं
जीवात्मा तथा परमात्मा में स्थित औपनिषदिक सत्य की परमानुभूति का द्वार
उद्घाटित करती है ।
आचार्य भास्कर साधक-समाज की बाह्योपासना एवं उसकी निष्फलता या
स्वल्प निष्पत्ति से चिरपरिचित थे इसीलिए उन्होंने मन्त्र एवं मन्त्र के देवता के
अन्तर्संबंध का अनुसंधान किया और यह स्थापित किया कि वाच्य एवं चावक में
अभेद है । चूँकि वाचक मन्त्र है और वाच्य देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में भी
अभेद है—‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते
वाच्य एव प्रसीदति ।।' (यामल) इसीलिए उन्होंने ‘प्रकाश’ एवं ‘वरिवस्यारहस्यम्’ के
दोनों अंशों में वरिवस्या के समस्त अङ्गों, तत्त्वों एवं उपादानों में तथा मन्त्र-मांत्रिक,
गुरु, देवता, यन्त्र, पूजाङ्ग, ग्रह, नक्षत्र, राशि, कूटत्रय, भाव, आचार, स्वात्मा,
भगवान एवं विश्व सभी में एकात्मता, तद्रूपता एकान्विति एवं अभेद की स्थापना
की है । यही वरिवस्या का रहस्य भी है भास्कराचार्य ने श्रीविद्या पर यह प्रथम
ग्रन्थ लिखा । उन्होंने इस पर ‘प्रकाश’ नामक टीका भी लिखी । ‘सेतुबंध’ नामक
जो अन्य मन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थ लिखा गया वह भास्कर की परवर्ती रचना है ।
‘सौभाग्यभास्कर’, ‘सेतुबंध’, ‘वरिवस्यारहस्यम्’ आदि अधिकांश रचनाएँ श्रीविद्या एवं
शाक्त दर्शन से ही सम्बंधित हैं ।
आचार्य भासुरानन्दनाथ (भास्करराय) ने अपने ग्रन्थ का ‘वरिवस्यारहस्यम्’
नामकरण करके यह द्योतित करने का प्रयास किया है कि वरिवस्या-विधान में
कतिपय रहस्य तत्त्व हैं जिन्हें सामान्य जन तो नहीं जानते किन्तु वे रहस्य तत्त्व ही
वरिवस्या के प्राण हैं अतः ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ में अन्य तत्त्वों को छोड़कर रहस्य
तत्त्व पर प्रकाश डालने की ही आङ्काक्षा व्यक्त की है । ‘वरिवस्या’ का अर्थ है
पूजा, उपासना या सपर्या—
‘‘पूजा नमस्यापचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः ।
वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासना ।।’’ (अमरकोष)
३ वरि. भू.

३२ वरिवस्यारहस्ये
'नमोवरिवस' (३।१।१९) से क्यच् प्रत्यय जोड़ने पर 'वरिवस्या' शब्द निर्मित
होता है । 'वरिवस' शब्द पूजार्थक है । आचार्य भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' में
जिस रहस्य का उद्घाटन किया है उसका मूल केन्द्रीय स्वर अद्वैत-स्थापना है ।
यह ठीक भी है क्योंकि 'मन्त्रार्थ देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन
अभेदो मन्त्रदेवयोः ।' (शाक्तानन्द तरंगिणी) ॥ आचार्य भास्कर ने 'वरिवस्यारहस्यम्'
में विभिन्न प्रकार के ऐक्यों, अभेदों, ऐकात्म्यों एवं अभिन्नताओं का तर्कानुप्राणित
प्रतिपादन किया है जो निम्न हैं ।
शाक्ता द्वैतवाद का प्रायोगिक पक्ष—
१. मूलाधारादिक चक्रों एवं श्रीचक्र में एकात्मकता
सुषुम्ना के मूल में सस्थित अरुण सहस्रदल कमल में = त्रिपुराधिष्ठित
त्रैलोक्यमोहन चक्र, वह्नि के आधार चतुर्दल कमल में = त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरण चक्र, शाक्त स्वाधिष्ठानस्थित षडदल कमल में = त्रिपुरसुन्दर्य-
धिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र, नाभि में स्थित दशदल कमल में = त्रिपुरवासिनी से
अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र, अनाहत के द्वादशदल कमल में = त्रिपुरा-
श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र, विशुद्धचक्र के षोडशदलकमल में = त्रिपुरमालिनी
से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र, तालुमूल में स्थित लम्बिकाग्र के अष्टदल कमल में
= त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र, भ्रूमध्य में स्थित द्विदलकमल में =
त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रदचक्र, ललाट में स्थित इन्दु में—बिन्दु में—
महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिए ॥१
'योगिनीहृदय' में इसे इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है—
अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् ।
चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥२
२. चक्र एवं देवी में एकात्मता—
योगिनीहृदय में इस एकात्मता को इस प्रकार पुष्ट किया गया है—
'यदा सा परमाशक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ।
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥३
अर्थात् जब भगवती स्वेच्छावश स्वनिष्ठा स्फुरत्ता को देखती हैं तभी विश्वाभिन्न
त्रिकोणादिचक्रों की उत्पत्ति हो जाती है । ('सा देवी स्वेच्छया स्वनिष्ठां स्फुरत्तां यदा
पश्यति तदा चक्रस्य विश्वाभिन्नस्य त्रिकोणादिचक्रस्य संभव उत्पत्तिर्भवतीत्यर्थः ॥'४
३. पीठ एवं पञ्चभूतों में एकात्मता—
'पीठ'—क्रमशः सिति-पवन-जल-अग्नि मण्डल रूप है—
१-२. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' (मन्त्रसंकेत : श्लोक ८, ९)
३. योगिनीहृदय (चक्रसंकेत श्लो० ९) ४. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'

भूमिका ३३
१. भूतत्त्व, चतुरस्र, पीतवर्ण = 'कामरूपपीठ' ।
२. वायुतत्त्व, षड्बिन्दुलांछित, वर्तुल, धूम्रवर्ण = 'पूर्णगिरिपीठ' ।
३. जलतत्त्व, अर्धचन्द्राकार, श्वेत = 'जालन्धरपीठ' ।
४. अग्नितत्त्व, त्रिकोण, रक्त, = 'उड्डीयनपीठ' ।¹
“पीठाः कन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः । चतुरस्रं तथा बिन्दु
षट्कंयुक्तं च वृत्तकम् । अर्धचन्द्रं त्रिकोणं च रूपाण्येषां क्रमेण तु । पीतो धूम्रस्तथा
श्वेतो रक्तो रूपं च कीर्तितम् ।।'² चतुरस्रं कामरूपपीठः । षड्बिन्दुयुक्तवृत्तरूपः
पूर्णगिरिपीठः । जालंधरपीठः अप्तत्त्वमयः । त्रिकोणम् तेजस्तत्वमयः ओड्याणपीठः ।
४. चिदात्माशक्ति एवं विश्व में एकात्मता—
अमृतानन्द योगी ने ठीक ही कहा है—“विश्वाकार प्रथा षटत्रिंशत्तत्वात्मना
परिणता विमर्शशक्तिः”, ‘विश्वाकार प्रथाधार निजरूपशिवाश्रयम् ।'³ चिद्विमर्शशक्ति
आत्मभित्ति में जब आत्मप्रकाशन करती है तो वही प्रकाशन विश्व बन जाता है—
'चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाशामर्शने यदा । करोति स्वेच्छया पूर्णविचिकीर्षा-
समन्विता ।।'⁴
५. प्रकाश एवं विमर्श में एकात्मता—
प्रकाश (परमशिव) अपने को विमर्शांश द्वारा विभक्त कर लेता है और
पश्यन्ती आदि वाणीचतुष्टय क्रम से प्रश्न भी करता है—वही प्रकाश है वही विमर्श
है—“भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य पश्यन्त्यादि क्रमात्
पृच्छति ।।”⁵
६. गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में एकात्मता—
(क) गायत्रीमन्त्र—'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्'
(ख) पञ्चदशीमन्त्र—क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ॥
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी का 'वाग्भवकूट'—
(१) गायत्रीमन्त्र का 'तत्' = पञ्चदशीमन्त्र का 'क' = 'तत' = ब्रह्म ॥ ‘क'
= कामेश्वर भगवान् शिव (ब्रह्म, परमात्मा) ॥
(२) गायत्रीमन्त्र का = 'सवितुर्वरेण्यं' = प्रसवित्री, जगन्माता ॥ पञ्चदशीमन्त्र
का 'ए' = देवी कामेश्वरी । (सरस्वती देवी)
(३) गायत्रीमन्त्र का = 'भर्गो देवस्य धी' । पञ्चदशी मन्त्र का ‘ई' =
सर्वान्तर्यामी, सर्वपोषक ।
१. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध' २. योगिनीहृदय
३. दीपिका ४. योगिनीहृदय
५. अमृतानन्द—'योगिनी-दीपिका'

३४ वरिवस्यारहस्ये
(४) गायत्रीमन्त्र का 'महि' = पञ्चदशीमन्त्र का 'ल' (पृथ्वी) ।।
(५) गायत्रीमन्त्र का चौथा चरण = 'धियो यो नः प्रचोदयात् । पञ्चदशीमन्त्र
का = 'ह्रीं' (मायाबीज, लज्जाबीज) ।। गायत्रीमन्त्र एवं पञ्चदशी के
मन्त्राक्षर परस्पर के मन्त्राक्षरों के प्रतिनिधि है—प्रतीक है—प्रतिनिधि है—
तदर्थक हैं ।
गायत्रीमन्त्र और पञ्चदशी का 'कामराजकूट'—
जिस प्रकार गायत्रीमन्त्र एवं वाग्भवकूट के मन्त्राक्षर परस्पर प्रतीक हैं उसी
प्रकार गायत्रीमन्त्र के अक्षर पञ्चदशीमन्त्र के 'कामराजकूट' के अक्षरों के भी प्रतीक
हैं—दोनों मन्त्रों के अक्षर एक ही अर्थ सङ्केतित करते हैं—अतः दोनों में साम्य है ।

गायत्रीमंत्र के अक्षरपञ्चदशी मंत्र के अक्षर
१. 'तत् सवितुः वरेण्यम्' (अक्षरत्रय)'ह' 'स' 'क'—अक्षरत्रय के बोधक
२. 'भर्गो देवस्य धी' (षडक्षर)'ह' (चौथा वर्ण)
३. 'भर्गो देवस्य धी''स' 'क' तृतीयकूट के दो वर्ण
(द्वितीय एवं तृतीय कूटों के शेष
वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से
करना चाहिए ।)
कूटत्रय एवं शक्तियों में तादात्म्य
ब्रह्मा-भारती, वामा-इच्छा ┐ १. वाग्भवकूट ┐
हरि-क्षिति, ज्येष्ठा-ज्ञाना ─┤ मिथुनत्रय = २. कामराजकूट │
शिव-अपर्णा, रौद्री-क्रिया ┘ ३. शक्तिकूट¹ ┘
तीन समष्टियाँ (पुरुष एवं नारी तत्त्व का सङ्घात) = शान्त एवं अम्बिका रूप
में तीन 'ईकार' ।। भारती, सकले एवं ब्रह्मा आदि से आरंभ होने वाले त्रिकत्रय =
माया (ह्रीं) से रहित कूटत्रय के बोधक ।। 'माया' (ह्रीङ्कार) का चौथा मिथुन है =
जो शिव-शक्ति का बोधक है ।
पञ्चदशीमन्त्र में पन्द्रह वर्ण हैं किन्तु अनेक वर्णों की पुनरुक्ति भी है अतः
पुनरुक्ति को छोड़कर गिने तो पञ्चदशी में मात्र सात ही अक्षर प्रयुक्त हुए हैं ।
पञ्चदशी के सात मूलाक्षर = वामा-इच्छा-ज्येष्ठा-ज्ञाना-रौद्री-क्रिया के प्रतीक ।।
'पञ्चदशीमन्त्र' में प्रयुक्त मूलाक्षर—७—(क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह, स)
────────────────────────────────────────────────────────
१. वरिवस्यारहस्यम् (६०-६५)

भूमिका ३५
| मन्त्र के वर्णों की | ३ | १ | १ | ३ | ३ | २ | २ = संख्या = १५ |
| पुनरुक्ति संख्या | | | | | | | |
| वर्ण | क | ए | ई | ल | ह्रीं | ह | स = मन्त्राक्षर = ७ |
| | | | | | | = मूलाक्षर |
परदेवता—वामादिक सप्तशक्तियों की समष्टि ॥
परदेवता—षट्त्रिंशत् तत्त्व ॥²
‘अहं’ = ‘अ’ = शिव । ‘ह’ = शक्ति । = ‘ई’ कामकला । वर्ण—गुण ।
कामकलात्रय—एवं ईकार—स्पर्श चतुष्टय । ३ लकार = लोकत्रय । मन्त्रगत—तीन
ककार = ‘सकल’, ‘प्रलयाकल’, विज्ञानाकल । पञ्चदशीमन्त्रगत हृल्लेखात्रय को
छोड़कर अवशिष्ट अक्षरों में स्थित अकार (क, ल; ह स क ह ल; स, क, ल में
स्थित दस अकार) = जीव । ग्यारहवाँ स्वर “एकार” = जीव का वाचक एवं
विद्या का प्राण । बिन्दुत्रय = रुद्र, ईश्वर एवं सदाशिव । नादत्रय = शान्ति, शक्ति,
शंभु । महाविद्या के सैंतिस पद = ३६ तत्त्व एवं सैंतिसहवाँ तत्त्वातीत सैंतिसहवाँ
तत्त्व । जन्य-जनक में अभेद = (वाच्य-वाचक में अभेद) = ब्रह्म एवं जगत् तथा
जगत् एवं विद्या में अभेद । परमशिव = जागतिक पदार्थ । दीक्षा गुरु एवं
परमशिव में अभेद । (श्लोक क्र० २।८२) भगवती पराम्बा = (इच्छा, ज्ञान, क्रिया

  • सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण+अग्नि-सोम-सूर्य इन नौ के संयोग से) त्रिनेत्री पराम्बा
    ग्रहरूपा भी है । (२।८४)
    ७. पराम्बा के साथ तादात्म्य—
    पराम्बा का अन्य तत्त्वों के साथ तादात्म्य—जगन्माता त्रिपुरा जगद्रूपिणी,
    तत्त्वरूपिणी, चक्ररूपिणी, शक्तिरूपिणी, वर्णरूपिणी, यन्त्ररूपिणी, मन्त्ररूपिणी, गुरु-
    रूपिणी तो हैं ही किन्तु वे साथ ही साथ ग्रहरूपिणी एवं नक्षत्ररूपिणी भी है । दस
    इन्द्रियों, चार अन्तःकरणों, दस इन्द्रिय-विषयों, प्रकृति, पुरुष एवं गुणतत्त्वों के योग
    से सत्ताईस अङ्गों से युक्त होने के कारण भगवती भी सत्ताईस नक्षत्रों के साथ
    तादात्म्य रखती है । भगवती का योगिनियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८६)
    भगवती का राशियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८७) क्योंकि नाग, कूर्म
    आदि पाँच प्राण, प्राणापानादि पाँच, जीवात्मा एवं परमात्मा दो के द्वादशाङ्गों से
    समन्वित होने के कारण जगदम्बा राशिस्वरूपा हैं । (२।८७) श्रीविद्या गणेशरूपिणी
    भी हैं । (२।८८) यह ‘श्रीविद्या’ बिन्दुत्रय, नादत्रय एवं कूटत्रय के शेषांशों द्वारा
    घटित होने के कारण ग्रहरूपिणी भी है एवं व्यञ्जनों द्वारा सत्ताईस अक्षरों वाली होने
    के कारण श्रीविद्या नक्षत्ररूपिणी भी है (२।८९) तीन ह्रीं हृल्लेखाओं (ह्री त्रय) एवं
    उससे भिन्न तीन कूटों के योग से श्रीविद्या योगिनीरूपा भी हैं । तीनों (ह वर्णों)
    २. वरिवस्यारहस्यम्

३६ वरिवस्यारहस्ये
हल्लेखाओं एवं 'ल' के योग से घटित होने के कारण श्रीविद्या राशिरूपिणी है
(२।९०)। विद्या एवं देवी में सारूप्य होने के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है ।
अतः श्रीविद्या गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशि सभी के साथ तादात्म्य रखती
है—देव्या रूपान्तरत्वेन विद्यायास्तदभेदतः । गणेशग्रहनक्षत्र योगिनीराशिपीठता ॥
(२।९१) विद्या एवं देवी के सारूप्य के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है । अतः
उसका गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशिरूप का समीचीन है । रेखाओं, 'दलों
एवं कोणों के गणों द्वारा घटित होने के कारण इसका गणेशत्व एवं त्रैलोक्यमोहन
आदि नवचक्रों द्वारा निर्मित होने से इसका ग्रहत्व स्पष्ट है । वृत्तत्रय, तीन
भूगृहरेखाओं एवं चौदह कोणों एवं सात अन्य चक्रों की पृथक्-पृथक् गणना द्वारा
इसका नक्षत्र रूप स्पष्ट है ।
श्रीचक्र के साथ तादात्म्य—
पालन एवं संहार नामक चक्रद्वय, पद्मद्वय एवं अन्य वृत्तद्वय एवं भूगृह आदि
के योग से—श्रीचक्र योगिनीरूप है । पाँच शक्ति, चार अग्नि, एक बिन्दु, एक वृत्त
एवं एक भूगृह आदि बारह के योग से श्रीचक्र राशिरूप है । विद्या के अक्षरों द्वारा
निर्मित होने के कारण चक्र इनसे अभिन्न हैं ।
मातृका वर्णों की संख्या = ५१ पीठ ॥ ओडयाण, जालंधर, पूर्णगिरि,
कामरूपपीठ, गणप, ग्रह, भ आदि एक, नौ, सत्ताईस, छः, बारह से घटित
पचपन पीठ हैं ।
८. अपने गुरु, देवता, विद्या एवं चक्र में तादात्म्यभाव—
देवी, विद्या चक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—इन पाँचों में भी तादात्म्यभाव है ।
९. कुण्डलिनी के साथ तादात्म्य—
कुण्डलिनी का श्रीविद्या एवं देवी के साथ तादात्म्य है । श्रीविद्या का अपने
घटक अक्षरों के साथ तादात्म्य है । कल्याणी, एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि
देवी के तीन सौ नाम मन्त्र के आद्यक्षरों का प्रतीक है । नाम का एकांश समस्त
नाम का प्रतीक है । वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूटों के साथ (देवी के)
किरीट से कण्ठ, कण्ठ से कटि एवं कटि से पादाग्र में तादात्म्य है । प्रथमकूट के
छः वर्गों एवं तीन मिथुनों (ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी एवं रुद्र-पार्वती) का तादात्म्य
है । देवताष्टक ईकार के प्रतीक है । अक्षरों के साथ वामा, इच्छा आदि शक्तियों
का तादात्म्य है । ब्रह्म ही शिव-शक्ति दोनों का प्रतीक है क्योंकि शिवशक्ति अभिन्न
हैं । 'वाग्भवकूट' सूक्ष्म की विराट व्याप्ति एवं 'कामराजकूट' शौर्य, धन, स्त्री एवं
कीर्ति के प्रतीक हैं । प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कूट के प्रतीक ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं
सामवेद हैं । 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक हैं । 'ह स क'—हँसते हुए मुख का, 'ह
स'—आनन्द का, 'क'—सूर्य का, 'ह'—चन्द्रमा का, क एव ह—सूर्य-चन्द्रमा का,
'ल'—नेत्र का, क ह ल—सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्रवालों का, एवं 'क'—ब्रह्म का प्रतीक
है ।

भूमिका ३७
तृतीयकूट का प्रतीकार्थ है—
समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है । ककार, एकार एवं अकार
सृष्ट्यादि के वाचक हैं । ई एवं ड = तिरोधान एवं अनुग्रह के वाचक हैं । ह स
= आनन्द का, 'क' सत्य का, 'ह' अनन्त का एवं 'ल' ज्ञान का प्रतीक है ।
'सकल'—जीव का वाचक है । स क ल = जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति का वाचक
है । सकल का अर्थ है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ।
मांत्री-साधना के लिए मन्त्र, जप, दीक्षा, शक्तिपात, गुरु, यंत्र, माला,
महासेतु, सेतु, भावतत्त्व, साधनाधिकार, सूतकोद्धार, मन्त्र-चैतन्य, मन्त्रार्थभावना, गुरु
का ध्यान, मन्त्र, गुरु एवं मन्त्रेश्वर में एकता का विश्वास, मंत्रशिखा, कुल्लुका,
कवच, कीलक, अर्गला, न्यास, निर्वाण, योनिमुद्रा, प्राणायाम, मुखशुद्धि,
सूतकद्वय-मोक्षण, मुद्रा (यथा शांभवी मुद्रा), मौन, एकान्त, धैर्य, अटल विश्वास,
निर्भयता, गोपनीयता, जापक-जप्य एवं जप में अभेदभावना, अमित उत्साह, दृढ़
सङ्कल्प, प्राणयोग, मनोयोग, मन्त्रेश्वर, मन्त्र एवं गुरु की अचिन्त्य एवं अपार शक्ति
में पूर्ण विश्वास एवं मन्त्राधिकारित्व आदि तत्त्व आवश्यक है । भद्रगुप्ताचार्य ने
मन्त्र-साधना के लिए सर्वप्रथम मन्त्राधिकारी बनना आवश्यक बताया है ।
मन्त्राधिकारित्व—"दक्षो जितेन्द्रियो धीमान् कोपानल जलोपमः । सत्यवादी विलोभश्च
मायामद-विवर्जितः । मानत्यागी दयायुक्तः परनारी-सहोदरः । जितेन्द्री गुरुभक्तश्च
मन्त्रग्राही भवेन्नरः ॥"
इसके अतिरिक्त पञ्चविध देवपूजा भी आवश्यक है जो निम्न है—
१. 'अभिगमन'— देवस्थान को स्वच्छ करना, लीपना, निर्माल्य हटाना ।
२. 'उपादान'— गंधपुष्पादिक पूजाद्रव्यों का संग्रह ।
३. 'योग'— इष्टदेवता की अपनी आत्मा के रूप में भावना करना ।
४. 'स्वाध्याय'— मन्त्रार्थ का अनुसन्धान करते हुए जप, सूक्त-स्तोत्रपाठ,
गुणावली-पाठ, लीला एवं धाम का वर्णन एवं
वेदान्ताभ्यास ।
मन्त्र-पूजा—
मांत्री-साधना से मन्त्र-पूजा भी आवश्यक है । इस विधान में अभीष्ट मन्त्र को
ताम्र पत्र पर अष्टगंध से लिखकर उसे कादि-हादि मन्त्र लिखकर सम्पुटित करना
चाहिए । यथा—
(क) कादि विद्या क्रम—क ए ई ल ह्रीं, स क ह ल ह्रीं, ह्रीं सकल ह्रीं ।
(ख) हादि विद्या क्रम—ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल
ह्रीं—मन्त्र की षोडशोपचार से पूजा भी करनी चाहिए ।। मन्त्र में मन्त्रेश्वर
के विद्यमान रहने की भावना करनी चाहिए ।।

३८ वरिवस्यारहस्ये
प्रत्येक वर्ण का सर्वातिशायी महत्व—
१०. ऐसा कोई भी वर्ण नहीं है जो 'मन्त्र' नहीं है—भगवती जगन्माता
पचास वर्णों का मूर्तिमान रूप है । इसीलिए कहा गया है—"पञ्चाशन्मातृकां देवी
नानाविद्यामयी सदा । नानाविद्यामयीं देवीं महाविद्यामयीं तथा सर्ववर्णमयीं देवीं सर्व
सर्वदेवमयीं पराम् । सर्वदेवमयीं सौम्यां ब्रह्माण्डजननीं पराम् ॥"¹ इन्हीं वर्णों से
ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र सभी उत्पन्न होते हैं—'वर्णान्तु जायते ब्रह्मा तथा विष्णुः प्रजायते ।
रुद्रश्च जायते देवी । जगत्संहारकारकः ॥'² भगवती अकारादि सकारात सभी वर्णों
का विग्रह है । 'अकारादिक्षकारान्ता मातृकाबीजरूपिणी । विसर्गश्च बिन्दुश्च त्रिशक्ति
ब्रह्मविग्रहः ॥'³ वर्ण पञ्चदेवों से समन्वित है । वे शक्तित्रय समन्वित हैं । वे
त्रिगुणोपेत, कैवल्यस्वरूप, बिन्दुतत्त्वमय प्रकृतिस्वरूप है—'पञ्चदेवमयं वर्णा शक्तित्रय
समन्वितम् । निर्गुणं त्रिगुणोपेतं स्वयं कैवल्यमूर्तिमान । बिन्दुतत्वमयं वर्णं स्वयं
प्रकृतिरूपिणी ॥"⁴
(क) 'वर्ण' ब्रह्मा-विष्णु एवं रुद्र स्वरूप हैं—"ब्रह्मविष्णुमयं वर्ण तथा रुद्रः
वयं प्रिये ।"⁵
(ख) 'वर्ण' पञ्चप्राणमय हैं एवं परमकण्डलीस्वरूप हैं—"पञ्चप्राणमयं वर्ण
स्वयं परमकुण्डली ।"⁶
(ग) 'वर्ण' सदाशिवमय, हरिब्रह्मात्मक एवं परब्रह्मसमन्वित हैं—'सदाशिवमयं
वर्णं परब्रह्म समन्वितं । हरिब्रह्मात्मकं वर्णं गुणत्रय समन्वितं ॥'⁷
(घ) 'वर्ण' पञ्चदेवमय, पञ्चप्राणयुत एवं गुणत्रययुत है—'पञ्चप्राणमयं वर्णं वर्णं
पञ्चदेवमयं सदा । पञ्च प्राणयुतं वर्णं तथा त्रयगुणात्मकं मातृकाएँ
(मूलमन्त्र रूप सभी ५० वर्ण) युवतीरूपा एवं मन्त्रविग्रहरूपिणी हैं—
'मातृका युवतीरूपा मन्त्रविग्रहरूपिणी ॥'⁸
(ङ) 'वर्ण-युवतीरूप एवं शब्दब्रह्मस्वरूप हैं—'शब्दब्रह्म यदा याति मन्त्रं तन्त्रं
तदा भवेत् । पञ्चाशत् युवती सर्वशब्दब्रह्मस्वरूपिणी ।' मातृकादेवी
सनातनी वेदमाता है—"भजेऽहं मातृकादेवी९ वेदमातां सनातनीम् ॥"१०
जो भी वर्णरूपमयी कुण्डली परदेवता या परा महाकुण्डली है वह चूँकि
वर्णात्मिका है अतः इस शक्तिरूप वर्ण के ज्ञान के बिना किया गया 'जप'
व्यर्थ है—"वर्णरूपमयी देवी कुण्डली परदेवता । पञ्चाशद्वर्णतत्त्वं च विद्यामन्त्रं जपेत्तु
यः । सर्वं हि विफलं तस्य शववत् तज्जपं भवेत् । चैतन्यरहितं देवि तज्जपं शवमेव
तत् ॥"¹¹
समस्त वर्ण कुण्डलिनीस्वरूप हैं—"उकारं परमेशानि तारः कुण्डलिनी स्वयं ।
ऋकारं परमेशानि कुण्डली मूर्तिमान स्वयम् ॥" 'ककार परमेशानि कुण्डलीत्रय
संयुतम् ।'¹²
१-१२. कामधेनु तन्त्र