वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २५
है । भेद मात्र मिथ्या है अतः भेदाश्रित आधाराधेयभाव भी मिथ्या ही है— 'वस्तुतस्तु
जगतो ब्रह्मपरिणामकत्वं स्वीकुर्वतां तान्त्रिकाणां मते जगतः सत्यत्वमेव मृद्घटयोरिव
ब्रह्मजगतोरत्यन्ताभेदेन ब्रह्मणः सत्यत्वेन जगतोऽपि सत्यत्वावश्यंभावात् भेदमात्रस्य
मिथ्यात्वस्वीकारेणाद्वैतश्रुतीनामखिलानां निर्वाहः । भेदस्य मिथ्यात्वादेव भेदघटिताधारा-
धेयभाव संबंधोऽपि मिथ्यैव ।।'१
आचार्य रामानुज, वल्लभाचार्य२, निम्बकाचार्य३, श्रीपति४, श्रीकण्ठ५ आदि सभी
आचार्यों ने भी 'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन किया है । विवर्तवादी शङ्कराचार्य भी
'सौन्दर्यलहरी' में परिणामवाद की ही पुष्टि करते हैं—
“मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसिमरुत्सारथिरसि ।
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा ।
चिदानन्दाकारं शिवयुवतिभावेन बिभृषे ।।”
'वामकेश्वरतन्त्र' में भी जगत् को शक्ति का 'परिणाम' माना गया है ।६
भास्कराचार्य ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की व्याख्या में 'वाचारंभणं
विकारः ।।' (छा०उप० ६।१।४)—'आत्मकृतेः परिणामात्' (ब्र०सू० १।४।२६)
इत्यादि वाक्यों एवं सूत्रों को उद्धृत करके श्रुति एवं ब्रह्मसूत्रकार को भी
'परिणामवाद' का प्रतिपादक घोषित किया है और कहा है कि इन सभी का
'अभिप्रेत' एवं 'स्वाभिमत' 'परिणामवाद' ही है— 'परिणामवाद एवाभिप्रेतः'
'स्वाभिमतः परिणामवाद एव स्फुटीकृतः ।'७ भास्करराय के मत में— 'तान्त्रिक'
परिणामवादी ही सुनिश्चित होते हैं ।
काश्मीरी 'शिवाद्वयवादी' आभासवादी एवं प्रतिबिम्बवादी हैं तो अभिनवगुप्त
पादाचार्य 'स्वातन्त्र्यवादी' हैं ।
शिवाद्वय शासन में 'आभासवाद' एवं दर्पणविधि का सिद्धान्त बाह्यवाद का
प्रतिरोधी बनकर एवं 'स्वातंत्र्यवाद' इसका मूल सिद्धान्त बनकर स्वीकृत हुआ ।
भास्कराचार्य ने 'अविकृत परिणामवाद' की तान्त्रिकी दृष्टि को अङ्गीकार किया ।
आचार्य भास्कर 'कुण्डलिनीयोग' 'षट्चक्रोपासना' का प्रतिपादन करने एवं
शाक्ताद्वैतवाद का प्रतिदिन पूजा-विधान में भी प्रयोग करने “अहं देवी न चान्योऽस्मि
ब्रह्मैवास्मि न शोकभाक् । सच्चिदानन्दरूपोऽहं नित्यमुक्तस्वभाववान्” में विश्वास
१. सौभाग्यभास्कर (पृ० १५१) २. अणुभाष्य (१।४।२७)
३. वेदान्त पारिजात (१।४।२६) ४. श्रीकर भाष्य (१।४।२७)
५. श्रीकण्ठ भाष्य (१।४।२७)
६. 'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् इष्यते ।' 'तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव तस्यां
परिणतायां' इति वामकेश्वरतन्त्रात् ।। (वरिवस्यारहस्यम्)
७. वरिवस्यारहस्यम्