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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 530 में से

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२६ वरिवस्यारहस्ये
रखने के कारण तथा—'इत्थं माता विद्याचक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति । पञ्चानामपि
भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ।।' (माता, विद्या, गुरु, चक्र, एवं भक्त—इन
पाँचों अभिन्नता की अनुभूति रूप 'कौलिकार्थ') (गुरु-देह एवं देवी के देह में
अभिन्नता एवं उन दोनों से शिष्य की अभिन्नता—'देव्या देहो यथा प्रोक्तो
गुरुदेहस्तथैव च । तत्प्रसादाच्च शिष्योऽपि तद्रूपः सन् प्रकाशते, का प्रतिपादन
करने, 'ब्रह्मणि जगतो जगति च विद्याभेदस्तु संप्रदायर्थः' की पुष्टि करने एवं इसी
प्रकार १५ प्रकार के अर्थों की विभावना द्वारा अद्वैतवाद की प्रबल स्थापना करने
के कारण (भास्करराय) के अद्वैतवादी ज्ञानी और योगी तो अवश्य सिद्ध होते हैं
किन्तु भावना के धरातल पर वे भक्त भी हैं । उनकी भक्ति है—भगवती त्रिपुरा के
प्रति ।। वे 'ब्रह्मपरिणामवादी' हैं—'इयं सृष्टिः परब्रह्मपरिणाम इति पूर्वमुक्तम् ।'१
५. 'वरिवस्यारहस्यम्'—एक विहङ्गमावलोकन
'वरिवस्यारहस्यम्' श्रीविद्या पर प्रकाश डालने वाला एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है ।
सके प्रणेता भास्कराचार्य हैं । ग्रन्थकार ने प्रारंभिक श्लोकों में 'प्रकाश' एवं
वेमर्श' के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए अर्थमयी, शब्दमयी, चक्रमयी एवं
देहमयी सृष्टि के ज्ञान हेतु चौदह विद्याओं के सारभूत वेदों के सारतम गायत्री मन्त्र
पर प्रकाश डालते हुए उसे पञ्चदशी मन्त्र से अभिन्न प्रतिपादित किया है । अगले
श्लोकों में 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्तिकूट' एवं उनके सङ्घटक वर्णों पर प्रकाश
डाला गया है । इसके बाद—हृल्लेखा के स्वरूप के अन्तर्गत आने वाले—व्योम,
अग्नि, वामलोचना, बिन्दु, अर्द्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका,
समना, उन्मनी के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है । अगले श्लोकों में त्रिकूटों के
वर्णों में अवस्थापञ्चक की स्थिति पञ्चविषुव, जप के स्वरूप, गायत्री के पंद्रह अर्थ,
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में अभिन्नता आदि की मीमांसा की गई है । इसके
बाद कूटत्रय के प्रतीकार्थ पर प्रकाश डाला गया है । इसके बाद श्रीविद्या के
आन्तरिक एवं बाह्य अङ्गों पर प्रकाश डाला गया है । अन्त में गुरु के महत्व पर
प्रकाश डाला गया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' पर अद्वैत का प्रभाव है ।
भास्करराय ने आजीवन त्रिपुरा की उपासना की और अपने धार्मिक दर्शन की
नींव अप्पय दीक्षित के “रत्नत्रयपरीक्षा” पर रक्खा । उन्हें शङ्कराचार्य के अद्वैतवाद
पर पूर्ण विश्वास था । उन्होंने 'पञ्चपादिका', 'वार्तिक', 'विवरण', 'भामती'
'पञ्चदशी' एवं 'शारीरक भाष्य' आदि वेदान्त-ग्रन्थों का उल्लेख करते हुए उनके
श्लोकों को उद्धृत भी किया है । इन सबके बाद भी भास्करराय ने अद्वैतवाद का
त्याग करके तान्त्रिक दर्शन का अनुवर्तन किया ।
चूँकि भास्करराय सरस्वतीदेवी के भी एकनिष्ठ उपासक थे अतः उन्होंने शाक्त
दर्शन का प्रतिपादन किया और शाङ्कर वेदान्त के 'विवर्तवाद' का खण्डन भी
किया । इसी दृष्टि से उन्होंने 'वरिवस्यारहस्यम्' के प्रारंभ में ही (तीसरे श्लोक
में)—'स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि । कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते
सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे” कहकर 'विवर्तवाद' का खण्डन करते हुए 'परिणामवाद' की