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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 530 में से

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पृष्ठ 30

२४ वरिवस्यारहस्ये
रूप का तिरोभाव होना एवं दूसरे रूप का प्रकट होना (रूपान्तर उत्पन्न होना) ही
'परिणाम' है । 'परिणामे तु रूपान्तरं तिरोभवति । रूपान्तरं च प्रादुर्भवति ।।' (ई०
प्रत्यभिज्ञाविवृति वि०अ० १। वि०) किसी भी पदार्थ का असत्य रूप में निर्भास
होना ही 'विवर्त' है— 'विवर्तो हि असत्यरूप निर्भासम' (अभिनवगुप्त : ई०प्र०
वि०वि०) उपादान की समसत्ताक कार्यापत्ति 'परिणाम' है एवं उसकी विषमसत्ताक
कार्यापत्ति 'विवर्त' है । “परिणामो नामोपादान समसत्ताक कार्यापत्तिः । विवर्तो
नामोपादान विषमसत्ताक कार्यापत्तिः ॥”१ दोनों ही अन्यथा प्रथाएँ हैं । एक है
सद्वस्तु की एवं दूसरी है असद्वस्तु की— “सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथाविकार इत्युदीरितः ।
अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथाविवर्त इत्युदीरितः ।”२ घृत दही का 'परिणाम' है तो रज्जु में
सर्पाभास रज्जु का 'विवर्त' है।
वेदान्ती नैयायिकों की भाँति न तो उत्पत्ति से पूर्व कार्य को असत् कहते हैं
और न तो सांख्यों की भाँति सत् कहते हैं । न तो वे न्याय का असत्कार्यवाद
स्वीकार करते हैं और न तो वे सांख्य का 'सत्कार्यवाद' ही स्वीकार करते हैं । वे
'कार्य' को 'अनिर्वचनीयतावाद' की स्थापना करते हैं ।३ प्रत्यभिज्ञादर्शन के अनुयायी
'स्वातंत्र्यवाद' को स्थापित करते हैं ।
भर्तृहरि ने 'वाक्यपदीय' में 'परिणाम' एवं 'विवर्त' दोनों शब्दों को समानार्थी
मानकर प्रयुक्त किया है । वे कहते हैं कि 'यह विश्व शब्द का ही “परिणाम” है—
ऐसी आम्नायवेत्ताओं की दृष्टि है । यह जगत् सर्वप्रथम छन्दों से विवृत हुआ—
“शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नाय विदो विदुः ।
छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥”
स्पष्ट है कि भर्तृहरि जगत् को “परिणाम” एवं “विवर्त” दोनों मानते हुए
दोनों शब्दों को समानार्थी स्वीकार करते हैं । आचार्य शान्तरक्षित ने भी—
“विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः” की व्याख्या में 'विवर्त' का अनुवाद
'परिणाम' करके विवर्त एवं परिणाम में अभेद स्वीकार किया है । भवभूति भी
'आवर्तबुद्बुदतरङ्ग' को जल का विकार एवं विवर्त दोनों कहकर दोनों शब्दों की
समानार्थकता इंगित करते हैं ।
योगिराज भास्करराय मखिन भी इसी 'परिणामवाद' (अविकृत परिणामवाद) को
कार्य-कारण सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करते हैं । उन्हें आचार्य रामानुज का
विकृत परिणामवाद स्वीकार नहीं है प्रत्युत् उन्होंने 'अविकृत परिणामवाद' स्वीकार
किया है । जिस प्रकार मृत्तिका एवं उसके परिणाम घट में कोई भेद नहीं है उसी
प्रकार ब्रह्म एवं जगत् में भी कोई भेद नहीं है । ब्रह्म सत्य है तो जगत् भी सत्य


१. वेदान्त परिभाषा २. वेदान्तसार
३. कार्यकारण भाव से चतुर्धा विप्रतिपत्तियाँ हैं— (क) असत् से सत् उत्पन्न होता
है (ख) सत् से असत् उत्पन्न होता है (ग) सत् से विवर्त उत्पन्न होता है (घ) सत् से
सत् उत्पन्न होता है ।