वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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२८ वरिवस्यारहस्ये
तापत्रय से त्राण ।
'देहमास्थाय भक्तानां वरदानाच्च पार्वति ।
तापत्रयादिशमनाद्देवता परिकीर्तिता ।।'२
इसी ध्येय तत्त्व को ध्यान एवं साधना का विषय बनाया जाता है । 'मन्त्र'
को इसलिए विशेष महत्व दिया जाता है क्योंकि यह यम, भूत आदि सभी
भयकारक शक्तियों से साधक का त्राण करता है—
'यमभूतादिसर्वेभ्यो भयेभ्योऽपि कुलेश्वरि ।
त्रायते सततञ्चैव तस्मान्मन्त्र इतीरितः ।।'३
भास्कराचार्य ने 'मन्त्र' एवं 'देवता' के अतिरिक्त 'यंत्र' के रहस्यात्मक पक्ष पर
भी प्रकाश डाला है ।४ उन्होंने यंत्र को ग्रहरूप, नक्षत्ररूप एवं योगिनीरूप भी
स्वीकार किया है—
१. सप्तभिरितैरैश्चक्रैश्चक्रे नक्षत्ररूपत्वम् ।। ९३ ।।
२. एवं षड्भिर्योगोच्छ्रीचक्रं योगिनीरूपम् ।। ९४ ।।
३. त्रैलोक्यमोहनाद्यैर्नवभिश्चक्रैर्ग्रहत्वं च ।। ९२ ।।
४. इसके अतिरिक्त भास्कर ने 'श्रीयन्त्र' को राशिरूप भी माना है—'एवं
द्वादशसंख्यैर्घटनाच्चक्रस्य राशित्वम् ।। ९५ ।।'
आचार्य भास्कर यह मानते हैं कि श्रीचक्ररूप यंत्र केवल ज्यामितीय रचना
मात्र नहीं हैं—प्रत्युत् यह पञ्चदशी मन्त्र का भी प्रतीक है क्योंकि यह इससे भी
अभिन्न है—
“चक्रं विद्याक्षरैरेव जननात् तदभेदवत् ।।”५
आचार्य भास्कर की मान्यता है कि—
१. दीक्षा-गुरु एवं परमशिव में अभिन्नता है । ┐ यही 'निगर्भार्थ' भी
२. साधक एवं परमशिव में अभिन्नता है । ┘ है (श्लोक ८२)
३. ब्रह्म एवं जगत् में अभिन्नता है । ┐ यही 'संप्रदायार्थ' भी
४. जगत् एवं विद्या (पञ्चदशी मन्त्र) में अभिन्नता है । ┘ है (श्लोक ८१)
५. पञ्चदशी मन्त्र एवं गायत्री में भी अभिन्नता है ।६
६. साधक की परमाराध्या देवी एवं मन्त्र में भी अभिन्नता है एवं देवी की
मातृका एवं पीठ के साथ भी अभिन्नता है—
१-३. कुलार्णव तन्त्र ४. वरिवस्यारहस्यम् (९२-९४)
५. कुलार्णव तन्त्र ६. वरिवस्यारहस्यम् (६०-८०)