वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २३
'विवर्तवाद' और 'परिणामवाद'—
भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की टीका में लिखा है—
“विवर्तवादं वेदान्तिसंमत परिणामवादी तान्त्रिको दूषयति”—इन वाक्यों के आधार पर
कतिपय विद्वानों का कथन है कि भास्करराय शाङ्कर विवर्तवाद एवं शाङ्कर वेदान्त के
विरोधी थे । किन्तु यह निष्कर्ष सङ्गत नहीं है क्योंकि भास्कर कहते हैं इस वेदान्त
संमत विवर्तवाद को परिणामवादी तान्त्रिक दूषित मानते हैं और उसका खण्डन
करते हैं न कि मैं भास्करराय ।
वेदान्त के एक प्रख्यात ग्रन्थ 'वाक्य शुद्धि' (दृग्दृश्यविवेक) में कहा गया है
कि अस्तित्व (सत्) ज्ञान एवं आनन्द तथा नाम एवं रूप ये पाँच तत्त्व ही विश्व के
समस्त पदार्थों का निर्माण करते हैं । इनमें प्राथमिक तत्त्वत्रय ब्रह्म का एवं शेष
तत्त्व पदार्थों का निर्माण करते हैं । अर्थात् नाम एवं रूप ही भेद के विधायक
(कारक) हैं । इस भेद को प्रतिषिद्ध कर देने पर मात्र ब्रह्म ही शेष रह जाता है ।
यही बात तो भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' के तृतीय श्लोक की टीका के अन्त
में कहीं है कि—'पदार्थ' पदार्थ के रूप में तो क्षुण्य है किन्तु ब्रह्म के रूप में
नित्य है—‘‘घटादिरूपेण नित्यत्वं ब्रह्मरूपेण नित्यत्वम्’’ मृत्तिका एवं घट में अभेद
रहने पर भी मृत्तिका का घटरूप नाशवान् है । किन्तु घट का मृत्तिका रूप अनश्वर
है—'मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वम् ।।' इसे ही उन्होंने अपने
गुरु के ग्रन्थ 'शांभवानन्दकल्पलता' का सारांश स्वीकार करके अङ्गीकार किया है ।
'परिणामवाद' एवं 'विवर्तवाद' में कोई गंभीर विरोध भी दृष्टिगत नहीं होता ।
शङ्कराचार्य जी ने ब्र०सू० (वे०द०) १।१।१४ के भाष्य के अन्त में कहा है
कि—‘‘कार्यों के संसार को मिथ्या मानकर उसका परित्याग करने के स्थान में
सूत्रकार ने 'परिणामवाद' की ओर प्रत्यावर्तित होने का मार्ग इसलिए अङ्गीकृत किया
क्योंकि यह सगुण ब्रह्म के ध्यान के लिए उपयोगी है ।।’’
सर्वज्ञात्मन (शङ्कराचार्य के शिष्य) ने 'संक्षेपशारीरक' में कहा है कि वेदान्त में
'परिणामवाद' का सिद्धान्त अत्यावश्यक है और यह प्रथम सोपान है । यही व्यक्ति
को विवर्तवाद के केन्द्रीय सिद्धान्त तक ले जाता है ।
परिणामवाद और भास्करराय—
दार्शनिक परम्परा में मुख्यतः निम्नवादों या सिद्धान्तों का आश्रय लिया जाता
है—१. विवर्तवाद २. परिणामवाद ३. प्रतिबिम्बवाद या आभासवाद ४. आरम्भवाद
५. सत्कार्यवाद ६. अवच्छेदवाद ७. दृष्टिसृष्टिवाद एवं गौड़पाद का अजातिवाद
आदि ।।
प्राचीनकाल में दार्शनिकों का इन विशिष्ट वादों के प्रति इतना आग्रह नहीं था
जितना कि परवर्ती काल में हो गया । वे विवर्त एवं परिणाम तथा आभास एवं
प्रतिबिम्ब को समानार्थी मानकर उन्हें व्यवहृत करते थे । किसी भी पदार्थ के एक