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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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भूमिका २९
'गणेश-ग्रह-नक्षत्र-योगिनी-राशिरूपिणीम् ।
देवीं मंत्रमयीं नौमि मातृकापीथरूमिणीम् ॥'१
७. मंत्र के कूटत्रय के साथ ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद की भी अभिन्नता
है । (वरि० श्लोक १३४-१३५) ।
८. पञ्चदशी मंत्र की उसके अक्षरार्थ से अभिन्नता है । (श्लोक ११०)
९. पञ्चदशाक्षरी मंत्र की देवी एवं कुण्डलिनी से भी अभिन्नता है और यही
पञ्चदशाक्षरी मंत्र का 'रहस्यार्थ' है—
“साक्षाद्विद्यैव सा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्याः स्वाभिन्नत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थः ॥''२ (श्लोक १०७)
वरिवस्यारहस्यम् के अनुसार श्रीविद्या की साधना के अङ्ग—


[चक्र-विवरण]

[केन्द्र:]
संविदुल्लास
मन्त्र-सिद्धि
मन्त्र-साक्षात्कार
आत्म-दर्शन

[श्रीविद्या के बाह्य अङ्ग]
ध्यान
न्यास
कीलक
शक्ति
बीज
विनियोग
देवता
छन्द
ऋषि
आकार
विभिन्न स्थितियाँ
रूप
प्रयत्न
स्थान
उच्चारण
काल (मात्रा)
उद्धार
विद्या के वर्णों की संख्या का ज्ञान

[श्रीविद्या के आन्तरिक अङ्ग]
महावाक्यार्थ
सगुणार्थ
समस्तार्थ
सामरस्यार्थ
शाक्तार्थ
मन्त्रार्थ
नामैकदेशार्थ
शब्दरूपार्थ
नामार्थ
महातत्त्वार्थ
रहस्यार्थ
कौलिकार्थ
निगर्भार्थ
संप्रदायार्थ
भावार्थ
प्रतिपाद्यार्थ
सद्गुरु कृपा
जप
पूजा
नियम


१. तन्त्रराज तन्त्र
२. वरिवस्यारहस्यम् (१०७)