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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 530 में से

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पृष्ठ 38

३० वरिवस्यारहस्ये
१. मन्त्रार्थ—भावार्थ आदि १५ अर्थ
२. आन्तरिक अङ्ग—(श्रीविद्या के आन्तरिक अङ्ग) : वर्णसंख्या, उद्धार,
मात्रा, उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि
३. श्रीविद्या के बाह्याङ्ग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति,
कीलक, न्यास, ध्यान एवं पूजा आदि ।। (वरिवस्यारहस्यम्)
४. गुरु-कृपा ५. मन्त्र-जप
कीलक - मन्त्राणां कीलकं ज्ञात्वा कुर्यान्मंत्रपुरष्क्रियाम् ।।
मंत्राङ्ग ज्ञान- मन्त्रस्य श्रोत्रास्यनेत्र प्राणाम् विज्ञाय यत्नत ।... कुर्यान्मन्त्र-
पुरष्क्रियाम् । (शाक्ता०)
१. देवता यस्य यस्य च मंत्रस्य उद्दिष्टा या च देवता । (देवतातत्त्व)
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जपमाचरेत् ।। (‘शाक्ता०’)
२. उच्चारण शनैः शनैरविस्पृष्टं न द्रुतं न विलम्बितम् । (उच्चारण)
क्रमेणोच्चारभेदृ वर्णानाद्यन्तक्रमयोगतः ।। (शाक्ता०)
अतिह्रस्वो व्याधिहेतु रतिदीर्घो वसुःक्षयः ।
अक्षराक्षरसंयुक्तं जपेन्मौलिकहारवत् ।। (भूतशुद्धि) (उच्चारण)
३. मंत्रार्थज्ञान कथं मन्त्राश्च सिध्यन्ति मंत्रार्थज्ञानिनः प्रिये ।। (रुद्रयामल)
४. ध्यान आदौ ध्यानं ततो मंत्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।।
ध्यानमंत्रसमायुक्तः शीघ्रं सिध्यति साधकः ।। (शाक्ता०)
५. जप देवतां चित्तगां कुर्यात् कुर्याच्च हृदयं स्थिरम् । ओष्ठौ सम्पुटौ
कृत्वा स्थिरचित्रः स्थिरेन्द्रियः । ध्यायेच्च मनसावर्णान् जिह्वौष्ठौ न
विचालयेत न कम्पेच्छिरोग्रीवां दन्तान्नैव प्रकाशयेत । मंत्रोद्धार
क्रमेणैव मंत्रं जपति साधकः । तदासिद्धिं विजानीत न
सिद्धिश्चान्यथा भवेत् ।। (शाक्तानन्द तरंगिणी) ।।
आचार्य भास्करराय ने यह भी देखा कि—श्रीविद्या के प्रथम कूट में जो
हल्लेखा है उसके अन्तर्गत जो कामकला स्थित है उसमें—‘सपरार्धकला’ या ‘वह्नि
कुण्डलिनी’ द्वितीय कूट में—‘सूर्य कुण्डलिनी’ एवं तृतीय कूट में ‘सोम
कुण्डलिनी’ स्थित है । ‘नेत्रतन्त्र’ (६।६) में ध्यान के तीन प्रकार बताए गए हैं—
१. स्थूल २. सूक्ष्म ३. पर । भास्कराचार्य ने इसी प्रकार देवता की तीन रूपों
की कल्पना करते हुए उनके स्वरूप की मीमांसा की है ।
आचार्य भास्कर ने मन्त्र-विज्ञान पर शोध करते हुए यह भी देखा कि देवता
के तीन रूप होते हैं—१. शरीराङ्गयुक्त (कर, चरण, आदि अवयवों से युक्त रूप)
२. मन्त्रात्मक रूप, ३. वासनात्मक रूप ।। सिद्धि प्राप्त करने पर साधक प्रथम
रूप को—चक्षुरेन्द्रिय पाणीन्द्रिय योग्य, द्वितीय रूप को—श्रवणेन्द्रिय, वागिन्द्रिय