सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

२२ वरिवस्यारहस्ये
अपने भाष्य—'सौभाग्यभास्कर' के प्रारंभ में अष्टादशविद्या, त्रिपुरादेवी, त्रयी
(वेदत्रयी) अग्नित्रय आदि में अटूट विश्वास व्यक्त किया है। चूँकि पवित्र अग्नित्रय
ही समस्त वैदिक कर्मकाण्ड के आधारभूत माध्यम हैं, वेदों में त्रिपुरादेवी की
उपासना प्रतिपादित की गई है और वेदत्रय ही वैदिक सनातन धर्म के प्राणभूत
पवित्र ग्रन्थ है—अतः उनमें विश्वास रखने के कारण आचार्य भास्कर सनातन वैदिक
धर्म के निष्ठावान् अनुयायी थे। वे ऋग्वेदीय शाखा के थे और ब्राह्मणों की भाँति
सोमयागी भी थे। हाँ यह बात अवश्य है कि उन्होंने परात्पर सत्ता के रूप में
परब्रह्म के रूप में—भगवान के रूप में महात्रिपुरसुन्दरी की ही आद्योपान्त उपासना
की और श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी मन्त्र की ही साधना की। उन्हें श्रीदेवी एवं
पञ्चदशाक्षरी मन्त्र की दीक्षा नृसिंहानन्दनाथ से प्राप्त हुई। उनका दीक्षा-नाम
'भासुरानन्दनाथ' हुआ। 'नित्योत्सव' के प्रणेता उमानन्दनाथ उनके शिष्यों में से
एक शिष्य थे।
कृष्णास्वामी शास्त्री के मतानुसार भास्करराय का धार्मिक दर्शन अप्पय दीक्षित
के 'रत्नत्रयपरीक्षा' पर आधृत था। इसके अनुसार एक ही निर्गुण ब्रह्म ने अपनी
मायाशक्ति द्वारा एक साथ दो रूप ग्रहण किये—१. धर्म २. धर्मी ॥ 'धर्म' ने
अपने को दो रूपों में विभक्त किया—१. 'पुरुष' और २. 'नारी' । जहाँ तक
'धर्मी' तत्त्व की बात है—'धर्मी' स्वयं 'शिव' हैं। 'नारी' स्वयं शिव की अर्द्धांगिनी
हैं। 'पुरुष' रूप विष्णु समस्त सृष्टि-रचना का उपादान कारण बना। इन तीन
रूपों का ही एकीभाव जब व्यक्त हुआ तो वह देशकालातीत, निरपेक्ष, परमाद्वैत
सत्ता कहलायी। अध्यात्मविज्ञान (Metaphysics) की दृष्टि से तो आचार्य भास्कर
ने शङ्कराचार्य के केवलाद्वैतवाद का प्रतिपादन एवं अनुवर्तन किया है और इसीलिए
उन्होंने 'दुर्गासप्तशती' की अपनी टीका 'गुप्तवती' के प्रारंभ में शङ्कराचार्य के प्रति
अपनी प्रगाढ़ भक्ति अभिव्यक्त की है। उन्होंने 'वार्तिक' विवरण' आदि शाङ्कर
अद्वैत के मूर्धन्य ग्रन्थों के उद्धरण तो दिये ही हैं साथ ही साथ उन्होंने
'सौभाग्यभास्कर' में असंख्य बार शाङ्कर अद्वैतवाद के प्रति निष्ठा, आस्था एवं
विश्वास व्यक्त किया है। यद्यपि यह सत्य है कि वे शाक्ताद्वैतवाद के पोषक होने
के कारण द्वयात्मक अद्वैतवाद के अनुवर्ती थे किन्तु चिन्तन की दृष्टि से वे शाङ्कर
अद्वैतवाद के ऋणी भी थे। उनके गुरु श्रीविद्या के उपासक थे। उन्होंने
'शांभवानन्दकल्पलता' एवं "परिभाषा श्लोक" जैसे ग्रन्थों का प्रणयन किया था।
शाक्त दार्शनिक उमानन्दनाथ उनके शिष्य थे। वे मुख्यतः शाक्त और त्रिपुरभैरवी
(भगवती ललिता), (त्रिपुरसुन्दरी) के भक्त एवं उपासक थे।
भास्कर शिव के प्रति भी अटूट श्रद्धा-भक्ति रखते थे इसीलिए वे कहते हैं
कि कमल में कमल की उत्पत्ति तो कहीं भी नहीं दिखाई पड़ती किन्तु मैंने तो
शम्भु के चरणकमलों में विष्णु के नयन कमल खिलते देखें हैं—
"कमले कमलोत्पत्तिः श्रूयते न च दृश्यते ।
दृष्टं शंभोः पदाम्भोजे विष्णुलोचन पङ्कजम् ॥"