वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २७
पुष्टि की है—“'विवर्तवादं वेदान्तिसंमतं परिणामवादी तान्त्रिको दूषयति ॥' उन्होंने
अपने तर्क की पुष्टि में 'प्रकाश' में 'वामकेश्वरतन्त्र' के इस परिणामवादी सिद्धान्त
की पुष्टि की है जिसमें कहा गया है—“तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते।" वे यह भी कहते हैं कि—'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य में भेदांश मात्र
का निषेध किया गया है न कि प्रपञ्च का । वे यह भी कहते हैं कि आचार्य शङ्कर
जैसे अद्वैतवादी दार्शनिक ने भी 'सौन्दर्यलहरी' में 'त्वयिपरिणातायाम्' कहकर
(“परिणामवाद एवाभिप्रेतः, परिणामवाद एव स्फुटीकृतः ॥") परिणामवाद का
प्रतिपादन किया ।
तान्त्रिकों की मान्यता है कि—गायत्री के दो स्वरूप हैं—१. सामान्य अनुत्कृष्ट
रूप—चौबीस वर्णों की गायत्री २. श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ॥ श्रीविद्या के इस मन्त्र के
प्रत्येक वर्ण का अपना देवता है । और इन सबकी विशिष्ट अर्थवत्ता है ।
भास्कराचार्य का कथन है कि पञ्चदशाक्षरी विद्या उपनिषदों के 'तत्त्वमसि', 'अहं
ब्रह्मास्मि' एवं 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' द्वारा व्यक्त जीव-ब्रह्मैक्य के अद्वैतवाद का
प्रतिपादन करती है ।
भास्करराय ने अद्वैतवाद के उस स्वरूप को स्वीकार किया है जो कि
शाक्त-दर्शन में स्वीकृत है । उन्होंने 'प्रकाश' में वेदान्त दर्शन के—'आत्मकृतेः
परिणामात' सूत्र का उल्लेख करके 'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' को उद्धृत करके एवं अन्य
तर्क प्रस्तुत करके 'परिणामवाद' की पुष्टि की है । वे यह भी कहते हैं कि—
'वाचारंभणं विकारो नामधेयं' जैसे आदि वैदिक वाक्यों एवं वामकेश्वरतन्त्र के—'तस्यां
परिणतायां तु न कश्चित् पर इष्यते'—वाक्य में भी अर्थ एवं भाव की दृष्टि से
परस्पर विरोध नहीं प्रत्युत् स्वारस्य है ।
उन्होंने इस ग्रन्थ में विभिन्न प्रकार के ऐ क्यों, ऐ कात्म्यों एवं अभिन्न बीजों
का भी प्रतिपादन किया है । 'वरिवस्यारहस्यम्' मन्त्र शास्त्र का ग्रन्थ है ।
'मन्त्र-साधना' साधना की एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसको अनुष्ठित किए
जाने पर साधक अपने अति तेजस्वी एवं तत्त्वस्वरूप इष्टदेवता का मनन करने से
समस्त भय से मुक्त हो जाता है—
'मननात्तत्त्वरूपस्य देवस्यामिततेजसः ।
त्रायते सर्वभयतस्तस्मान्मन्त्र इतीरितः ॥'१
मन्त्रशास्त्र तो साधन है—'मन्त्र' साधना का उपकरण है और 'देवता' इस
साधना का लक्ष्य या उपलब्धि है । 'देवता' के तात्त्विक स्वरूप पर भी
'वरिवस्यारहस्यम्' में प्रकाश डाला गया है । देवता, त्राण करने वाली एक अचिन्त्य
शक्ति है। जो आध्यात्मिक अचिन्त्य शक्ति उपासक के शरीर में स्थित होकर अपने
वरदान के द्वारा उपासक के तापत्रय का शमन कर देता है वही देवता है ।
“'दे'” का अर्थ है = भक्तो का देह । 'व' = देवता का वरदान । 'ता' =
१. भास्कराचार्य—वरि० 'प्रकाश'