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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

न (ndhena) -> सम्बन्धेन
ब्र (bra)
ह्म (hma)
णो (ṇo)
ऽ (avagraha)
पि (pi) -> ब्रह्मणोऽपि
भे (bhe)
द (da)
व (va)
त्त्व (ttva)
स्य (sya) -> भेदवत्त्वस्य
स (sa)
त्त्वा (ttvaa)
त् (t) -> सत्त्वात्
Now the next word:
स (sa)
द (da)
स (sa) ? Wait, look at that character!
Is it 'स'?
Wait, look at:
स - द् - द... no!
Wait, could it be:
सं (saṁ)
ब (ba)
न्धि (ndhi)
भ्या (bhyaa)
म् (m)???
LOOK AT IT!
स with anusvara? No, there is a letter:
First letter: स (sa) or सं?
Second letter: ब (ba) or द?
Third letter: न्धि (ndhi) with i-matra! LOOK AT THE I-MATRA!
Fourth: भ्यां (bhyaaṁ)!
Wait: "संबन्धिभ्यामभावो निरूप्यत इति"?!?!
YES! "सम्बन्धिभ्यामभावो निरूप्यते"!
An absence (abhāva) is defined by its relations / relata (sambandhibhyām - prati

प्रथमोऽंशः ५
नित्यत्वम्, मृद्घटयोरभेदेऽपि घटरूपेण ध्वस्तत्वं मृद्रूपेणाध्वस्तत्वं चेत्यादिवद्विरुद्ध-
धर्मनिरासादिकमूह्यमित्यादिकः शाम्भवानन्दकल्पलतायां विस्तरः ॥ ३ ॥

  • सरोजिनी *
    स = वह । समस्त प्राणियों की आत्मा के रूप में विद्यमान तथा निखिल
    विश्व की अन्तरात्मा के रूप में परिज्ञात तथा प्रख्यात वे भगवान् परमशिव । जयति
    = जय हो । सर्वोत्कर्षपूर्वक विद्यमान है (सर्वोत्कर्षेण वर्तते) । महान = महनीय ।
    महिमामय । ‘विशङ्कटं पृथु बृहद्विशालं पृथुलं महत्’ (अमर कोश) । महपूजायाम्
    (भ्वा०प०से०) । मह उत्सव तेजसोः (मेदिनी कोश) । प्रकाश = प्रकाश स्वरूप,
    स्वप्रकाश, पराप्रकाशय । सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योति—‘स्वरूपज्योतिरे वान्तः’
    (आगम) ‘न तत्र सूर्यो भाति’ आदि (उपनिषद्) । यस्मिन् = जिस अधिष्ठान में ।
    दृष्टे = दृष्टिगत होने पर । निर्विकल्पात्मक चरमवृत्ति के विषय बनने पर । न
    दृश्यते किमपि = कुछ भी दिखाई नहीं देता । द्रष्टा के लिए कोई दृश्य रह ही
    नहीं जाता । ‘कथमिव उच्यते वेदे ?’—फिर वेद में ऐसा क्यों कहा जाता है?
    ‘एक के जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है’—ऐसा वेदों में क्यों कहा
    गया है ? इस आत्मविरोधी कथन की सङ्गति कैसे बैठेगी ?
    आचार्य भास्करराय का कथन है कि इस ‘कथमिव उच्यते?’ वाक्यांश को
    प्रस्तुत करने का उद्देश्य शाङ्कर विवर्तवाद का खण्डन करके परिणामवाद की
    स्थापना करना है—‘विवर्तवादं वेदान्तिसम्मतं परिणामवादी दूषयति ।।’
    आचार्य भास्कर कहते हैं¹—‘इच्छा करता हूँ’, ‘जानता हूँ’, इत्यादि वाक्यों में
    उत्तम पुरुषान्तर्भासमान स्फुरणान्वयि ज्ञान ही ‘प्रकाश’ नामक ब्रह्म है । वह सर्वज्ञत्व,
    सर्वेश्वरत्व, सर्वकर्तृत्व, पूर्णत्व, व्यापकत्व आदि शक्तियों से संवलित है । उसका
    आनन्दरूपांश स्फुरण ही ‘परा अहंता’ ‘विमर्श’, पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी
    आदि कहा जाता है । विरूपाक्षपञ्चाशिका के विश्वशरीर स्कन्ध में कहा गया है कि
    ‘ईश्वरता कर्तृत्वं स्वतन्त्रता चित्स्वरूपता चेति ।’
    ‘एतेऽहंतायाः किल पर्यायः सद्भिरुच्यन्ते ।।’—अर्थात् पराहंता के ये
    पर्यायवाची शब्द हैं ।
    पराहंता के मध्य इदन्ता अस्फुरित है । ‘अहं’ एवं ‘इदम्’ के मध्य स्थित जो
    पारस्परिक सम्बन्ध है उसमें अहं जनक है और ‘इदम्’ जन्य है—अहं द्रष्टा है और
    इदं दृश्य है—अहं स्रष्टा है और इदं सृष्टि है ।² अहंता रूपशक्ति से विशिष्ट ब्रह्म
    ही इस ‘इदं’ का सृजन करता है । यह दृश्य विवर्त, नहीं परिणाम है ।³
    यह दृश्य उसी परासत्ता का परिणाम है—‘तच्च दृश्यं तत्परिणाम एव’
    १-२. ‘प्रकाश’ नामक टीका
    ३. प्रकाश । ‘शिवादिक्षित्यन्तरूपेण परिणामत इत्यर्थः । यथा क्षीरं दध्याकारेण
    परिणामते तथा चिच्छक्तिरेव सर्वाकारेण परिणामते ।’ (‘दीपिका’ अमृतानन्द)

६ वरिवस्यारहस्ये
क्योंकि शास्त्रों में इसकी पुष्टि भी की गई है—'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते ।।'१ श्रुतियों के साथ भी इस कथन का स्वारस्य है—'वाचारंभणं विकारः ।।'
शक्ति एवं शक्तिमान् या उपादान एवं उपादेय दोनों में अत्यन्त अभेद है । यहाँ
उपनिषदादि की भाँति भेदाभेद नहीं है । अतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' वाक्य में
सामानाधिकरण्य दिखाकर 'इदं' एवं 'ब्रह्म' में अभेद प्रतिपादित किया गया है ।
'इदं' को 'विवर्त', नहीं कहा गया है । समस्त अद्वैतपरक श्रुतियाँ इसी दृष्टि की
अभिप्रायिका हैं । समस्त मूर्धन्य श्रुतियों एवं तन्त्रों द्वारा अद्वैत का ही प्रतिपादन
किया गया है । जो द्वैतभाव भासमान होता है वह यथार्थ नहीं है, क्योंकि उन
स्थलों में कार्यकारण में भेदांश की कल्पना की गई है ।
'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य की उक्ति में भी केवल भेदांश का निषेध किया
गया है न कि प्रपञ्च का । 'एकमेवाद्वितीयम्' वाक्य में जिस 'द्वितीय' का निषेध
किया गया है वहाँ भी भेदवत्प्रपञ्चाभाव भी विशेषणाभाव प्रयुक्त मात्र ही है, इसीलिए
'भामती' में, 'हाटकमकुट' ग्रन्थ में भेद का ही हाटकन्यूनसत्ताकत्वं कहा गया है न
कि मकुट का, क्योंकि परिणाम में परिणामी का समानसत्ताकत्व विद्यमान है ।
'मायामात्रमिदं द्वैतम्' कहकर उपनिषदों में द्वैत या भेद का मिथ्यात्व प्रतिपादित
किया गया है । न कि अभेदवान का । इस प्रकार की अनेक युक्तियों द्वारा आचार्य
भास्करराय 'परिणामवाद' की स्थापना करते हैं और कहते हैं कि स्वयं वेद भी
'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन करता है 'ततश्च श्रुतेरपि परिणामवाद एव संमतः
सिध्यति ।।'२
भास्करराय कहते हैं कि भगवान् व्यासदेव ने भी 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता-
नुपरोधात्' सूत्र में तथा 'आत्मकृते परिणामात्' सूत्रों में भी परिणामवाद का ही
प्रतिपादन किया है ।३ वेदान्तभाष्यकार भगवान् शङ्कराचार्य ने भी अपने शारीरक
भाष्य एवं उपनिषद-गीता-भाष्यों में विवर्तवाद का समर्थन करते हुए भी
'सौन्दर्यलहरी' में 'परिणामवाद' का ही समर्थन किया है—'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' श्लोक
में 'त्वयि परिणतायाम्' कथन द्वारा आचार्य शङ्कर ने स्वाभिमत के रूप में
'परिणामवाद' की ही स्थापना की है 'परिणामवाद एवं स्फुटीकृतः ।।'४
रहस्यनामसहस्र में 'मिथ्याजगदधिष्ठाना' वाक्य द्वारा जो जगन्मिथ्यात्व का
प्रतिपादन किया हुआ दिखाई पड़ता है वह मिथ्यात्व-प्रतिपादन नहीं है प्रत्युत वह
स्वानतिरिक्तरूपत्व का कथन मात्र है । 'जगत'—घटादिरूपेण अनित्य है किन्तु
ब्रह्मरूपेण नित्य है । मृत्तिका एवं घट में अभेद तो है किन्तु मृत्तिका में घटरूपेण
ध्वस्तत्व है किन्तु घट की मृत्तिका के रूप में अपनी सत्ता अध्वस्त है ।५
प्रकाश—'परमशिव' प्रकाश है और 'विमर्श' उसका स्वस्वभाव है । वह
प्रकाशात्म है इसीलिए 'प्रकाश' है । अनावृत्तात्मस्वरूप ज्योति ही 'प्रकाश' है ।
१. वामकेश्वर तन्त्र २-४. प्रकाश
५. शाम्भवानन्दकल्पलता (प्रकाश में उद्धृत)

प्रथमोऽंशः ७
'प्रकाशः सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योतिः' स्वभावरूप चिदात्मा महेश्वर ही
'प्रकाश' कहे गये हैं ।१
'प्रकाश' शब्द का प्रयोग अन्तस्थ सत्ता के उस स्वरूप के लिए किया जाता
है जो इसके आभास-जाल के अधिष्ठाता का कार्य करता है । 'ठीक उसी
प्रकार यथा बुद्धि किसी व्यक्ति के कल्पना-काल में उसकी कल्पनाओं का आधार
बनती है ।
वस्तुतः अखण्ड आत्मज्ञान ही 'प्रकाश' है जो कि स्वरूपतः ब्रह्म है—
'ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म ।।'२ अमृतानन्द ने ठीक ही कहा है कि—भूमि से लेकर
शिवपर्यन्त स्थित विश्व के अस्फुट आमर्शन का स्फुटीकार 'प्रकाश' है—तथा उस
विश्व का 'इदं' के रूप में अङ्गीभाव रूप आमर्शन 'विमर्श' है—"विश्वस्य
शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने अस्फुटस्य स्फुटीकारः 'प्रकाशः' इदन्तया हृदयङ्गमी-
भावो विमर्श एवामर्शनम् ।।" (दीपिका) ॥
यह प्रकाशस्वरूप 'परमशिव' विमर्शाख्य अनन्योन्मुख स्वातंत्र्य स्वभाव से
अपनी 'पूर्णहन्ता' के आनन्द में अहर्निश स्पन्दमान रहता है । उसके आनन्दस्वभाव
की अभिव्यक्ति ही उसकी शक्ति का स्फार है—
'सर्व एवायं विश्वप्रपञ्च आनन्द शक्ति स्फारः ।।' (तन्त्रालोक) ।।
वही परमेश्वर अपनी माया शक्तिरूपिणी 'स्वातंत्र्यशक्ति' के द्वारा अपने को
अपने द्वारा सङ्कुचित सा अवभासित करता हुआ—१. 'विज्ञानाकल' २. 'प्रलयाकल'
एवं ३. 'सकल' बन जाता है (तदेवम् असौ भगवान् स्वमाया शक्त्याख्येन
अव्यभिचरित स्वातंत्र्य शक्तिमहिम्ना स्वात्मनैव आत्मानं सङ्कुचितमिव अवभासयन्
विज्ञानाकलः प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ।)३ परमशिव ही प्रकाश है—
'तस्मात् प्रकाश एवासौ गीतो यः परमः शिवः ।।' (मा०वि०)
उसकी प्रकाशरूपता ही 'चिच्छक्ति' है; उसका स्वातन्त्र्य ही 'आनन्दशक्ति' है,
उसका चमत्कार ही 'इच्छाशक्ति' है, उसकी आमर्शत्मिकता ही 'ज्ञानशक्ति' है, और
उसका सर्वाकारयोगित्व ही क्रियाशक्ति है । १. तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । २.
स्वातंत्र्यं आनन्दशक्तिः । ३. तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः ४. आमर्शत्मिकता ज्ञानशक्तिः।
५. सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः इति ।४
प्रकाशरूप परमेश्वर समस्त जगत् की आत्मा है । वह एक ओर तो सर्वमय
है तो दूसरी ओर सर्वोत्तीर्ण भी है । वह अनवच्छिन्न चिदानन्द विश्रान्त,
सर्वशक्तिखचित महेश्वर संविदात्मा है—"इह खलु निखिल जगदात्मा सर्वोत्तीर्णाश्च
सर्वमयश्च विकल्पा सङ्कुचित संवित्प्रकाशरूपः अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्तः प्रसरद-

१. (क) परात्रिंशिका तत्वसंदोह, (ख) प्र०हृदय, (ग) तन्त्रालोक, (घ) वरिवस्या०
२. वरिवस्यारहस्यम् ३-४. 'जन्ममरणविचार'

८ वरिवस्यारहस्ये
विरलविचित्रपञ्चवाहवाहिनीमहोदधिः, निरतिशय स्वातंत्र्य सीमनि प्रगल्भमानः
सर्वशक्तिखचित एक एव आस्ति संविदात्मामहेश्वरः ।१
प्रकाश एवं विमर्श—शैवशाक्तागम में शिव को प्रकाश एवं शक्ति को विमर्श
की आख्या प्रदान की गई है—उत्पलदेवाचार्यः (सम्बन्धसिद्धि)
१. 'भावभेदादि सम्बन्धमयेन वपुषोन्मिषन् ।
जयत्येकोऽपि विश्वत्मा प्रकाशः परमेश्वरः ।।'२
२. “स एव विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।
'विमर्श' एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ।।'' (प्र०का०१।८८)
३. 'आत्मविमर्शरूपा अनादिनिधना प्रभोः स्वभावभूता ।' (प्र०का०२।२)
४. 'स परमात्मा चिद्रूपो विमर्शाख्येनैव मुख्यस्वभावेन ।' (प्र०का०१।८८)
५. 'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ।। (प्र०का०१।४२)
६. प्रकाशात्मा प्रकाश्योऽर्थो ना प्रकाशश्च सिद्ध्यति । (प्र०का०१।३४)
७. न च प्रकाशोभिन्नः स्यादात्यार्थस्य प्रकाशताः । (प्र०का०१।३३)
८. प्रकाशास्यात्म विश्रान्तिरहंभावोहि कीर्तितः । (अजड०२२)
९. इदमित्यस्य विच्छिन्न विमर्शस्य कृतार्थता ।
या स्वस्वरूपे विश्रान्ति विमर्शः सोऽहमित्ययम् ।। (अजड०१५)
१०. मुक्त्वान्यस्य प्रकाशस्य विमर्शरहितात्मनः । (अजड०१४)
११. एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी ।
जडाः प्रकाश एवास्ति स्वात्मनः स्वपरात्मभिः ।। (अजड० १३)
१२. इत्थं स संविदघन एक एव शिवः स विश्वस्य परप्रकाशः । (पू०प्रत्य०)
१३. अकारः सर्ववर्णाग्र्यः 'प्रकाशः परमेश्वरः ।३
१४. सकल भुवनोदय स्थिति लय मय लीला विनोदनो द्युक्तः ।
अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ।।४
१५. परशिवरविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ।५
१. ज०म०वि०(भट्ट वामदेवाचार्य)
२. 'स्फुरणान्वयि ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म ।' तस्य चानन्दरूपांश एवस्फुरणां
पराहन्ता विमर्शः पराललिताभट्टारिका त्रिपुरसुन्दरीत्यादिपदैः व्यवह्रियते ।
(वरिवस्यारहस्य—भास्कराचार्य)
३. नान्दिकेश्वर काशिका ४-५. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ)

प्रथमोऽंशः ९
१६. भावि चराचर बीजं शिवरूपविमर्शनिर्मलादर्शः ।१
१७. तस्यादि ददौ स्वशक्त्यै कामेश्वर्यै विमर्शरूपिण्य ।२
१८. स्वाभाविकी स्फुरत्ता विमर्शविपुरस्य विद्यते शक्तिः ।३
१९. इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य४
देवः प्रकाशकः महादेवो महाऽप्रकाशात्मा ।५ शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य
शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।६
२०. तस्य देवातिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः ।
विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञ ज्ञानशालिनी ॥७
२१. स जयति महान् प्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।८
२२. नैसर्गिकस्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः । तद्योगादेव शिवो
जगदुत्पादयति पाति संहरति ।९
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥ ४ ॥
सावश्यं विज्ञेया यत्परिणामाद्भूदेषा ।
अर्थमयी शब्दमयी चक्रमयी देहमथ्यापि च सृष्टिः ॥ ५ ॥ (वरिवस्या०)


[चित्र: प्रकाश एवं विमर्श शक्ति वृत्त]

— प्रकाश
— विमर्श शक्ति
(बाह्य से आन्तरिक वृत्त:)
क्रिया शक्ति
ज्ञान शक्ति
इच्छा शक्ति
आनन्द शक्ति
चित् शक्ति
(केन्द्र 'चित् शक्ति' से बाहर की ओर अधोमुखी बाण / तीर)


१-२. कामकला०
३. सौभाग्यसुधोदय (अमृतानन्द योगी)
४-६. दीपिका (अमृतानन्द योगी)
७. 'कालिकाक्रम'
८-९. वरिवस्यारहस्य

१० वरिवस्यारहस्ये
'प्रकाश' द्वारा
आत्मनिष्ठ 'विमर्श' का
दर्शन
शब्दमयी सृष्टि
चक्रमयी सृष्टि
देहमयी सृष्टि
अर्थमयी सृष्टि
क्रिया शक्ति
ज्ञान शक्ति
इच्छा शक्ति
आनन्द शक्ति
चित् शक्ति
परमशिव
क्रियाशक्ति
ज्ञानशक्ति
इच्छाशक्ति
आनन्दशक्ति
चित्शक्ति
अव्यक्तजगत

प्रथमोऽंशः ११
इममेवार्थं श्लोकद्वयेनाह—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥ ४ ॥
(विमर्श शक्ति और उसकी महत्ता)
इसकी (परमशिव रूप 'प्रकाश' की) शक्ति स्वाभाविक, स्फुरणात्मिका एवं
विमर्शरूपा है । उसके योग से ही शिव जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार किया
करता है ॥ ४ ॥

  • प्रकाश *
    इहोत्पादनादि त्रयं तिरोधानानुग्रहयोरुपलक्षणम् ॥ ४ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘नैसर्गिकी’ = स्वाभाविक, निसर्गजन्य, अकृत्रिम, सहज शक्ति के दो प्रमुख
    भेद हैं—(१) नैसर्गिक (२) अनैसर्गिक । दाहकता अग्नि का, गन्ध पृथ्वी का रस
    जल का, शब्द आकाश का, स्पर्श वायु का नैसर्गिक गुण है किन्तु अग्नि-संपर्क
    से, प्रज्वलित लौहखण्ड में जलाने की शक्ति, मुखावयवों से निकलती ध्वनि या
    शब्द की शक्ति उनके अपने गुण या अपनी शक्तियाँ नहीं हैं, प्रत्युत् दूसरों से
    उधार ली हुई शक्तियाँ हैं अतः परिस्थितिजन्य हैं, क्षणिक हैं, संयोगज हैं, अतः
    कृत्रिम हैं । इन्हें ही अनैसर्गिक शक्तियाँ कहेंगे । शिव में निहित शक्ति नैसर्गिक
    शक्ति है क्योंकि वह परमशिव से अभिन्न है और उससे अविच्छेद्य है । सांख्यदर्शन
    की मान्यता है कि ‘प्रकृति’ (शक्ति) पुरुष से भिन्न है । यद्यपि सृष्टि का कार्य
    ‘प्रकृति’ ही करती है और वह बिना पुरुष की सहायता के कर भी नहीं सकती
    क्योंकि प्रकृति तथा पुरुष के संयोग से ही सृष्टि हो पाना संभव है अन्यथा नहीं—
    ‘पंग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः’ तथापि सांख्य की ‘प्रकृति’ प्रकाश के
    ‘विमर्श’ के समरूप नहीं हैं क्योंकि ‘प्रकृति’ पुरुष से अविच्छेद्य नहीं है—प्रत्युत्
    विच्छेद्य है—
    ‘रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
    पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य निवर्तते प्रकृतिः ।।' (सां०का०५९)
    ‘विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत् पाके ।' (सां०सू०)
    जबकि ‘प्रकाश’ की शक्ति (प्रकाश’ की नैसर्गिक शक्ति होने के कारण) उससे
    ‘चन्द्रचन्द्रिकयोरिव’ अभिन्न है अतः उसका निसर्ग है—प्रकाश का स्वभाव है और
    उसकी अन्तःशक्ति है—‘विचित्रजगन्निर्माणादि सामर्थ्यरूपा शक्तिः । न भिन्ना... ।
    कल्पित भेदाभेदनिर्वचनीयतादात्म्यसम्बन्धः । १ सा हि ब्रह्माभिन्ना शक्तिः ।।
    १. हयग्रीव—‘शाक्तदर्शनम्’ (प्र०अ०। प्र०१।२)

१२ वरिवस्यारहस्ये
(८।३।१५)¹ यह स्वाभाविकी है—‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान
बलक्रिया च ॥’
‘स्फुरत्ता’ = स्फुरणात्मिका । स्फुरणरूपा । शक्ति स्फुरणात्मिका है । ‘यदा
सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥’²
‘स्फुरत्ता’ का क्या अर्थ है? शक्ति सृष्टिरूपा है अतः पराशक्ति का विश्वसर्जन
व्यापार ही ‘स्फुरत्ता’ कहलाता है—‘विश्वसर्जनमेव पराशक्तिः स्फुरत्ता, तस्याः
सृष्टिरूपत्वात् ॥’³ ‘सेयं स्फुरतारूपा सृष्टिरेव क्रिया कृतिः यत्नः ।’⁴ शक्ति में यह
स्फुरता भी नैसर्गिक होती है क्योंकि वह स्वनिष्ठा होती है—‘आत्मनिष्ठां
स्फुरत्ताम्’⁵, ‘सा देवी स्वेच्छयास्वनिष्ठां स्फुरतां यदा पश्यति ।’⁶ स्फुरता भगवती का
अभिधान भी है—‘चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता । स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं
तदैश्वर्यं परमात्मनः । सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ॥’⁷
‘विमर्श’— स एव विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।
विमर्श एव देवस्य शुद्धेज्ञान क्रिये यतः ॥ (प्र०का०१।८८)
‘पूर्णता प्रत्यभिज्ञा’ में परमशिव की स्वातन्त्र्यलक्षणा, नैसर्गिकी, स्फुरत्तात्मा
पराशक्ति को ही ‘विमर्श’ कहा गया है—
‘नैसर्गिकी स्फुरत्तात्मा विमर्शाख्या परा प्रभोः ।
अक्रमा क्रमरूपेण शक्तिः स्वातन्त्र्यलक्षणा ॥’⁸
विमर्शमयी होने के कारण ही पराशक्ति को विमर्श भी कहा जाता है,
इसीलिए आचार्य क्षेमराज ने ‘प्रत्यभिज्ञाहृदयम्’ में चिति शक्ति को भगवती स्वतन्त्रा,
पराशक्ति, शिवभट्टारिका के साथ ही साथ उन्हें ‘अनुत्तरविमर्शमयी’ भी कहा है—
पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा, अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारिका-
भिन्ना ॥’⁹ परास्वात्मसंवित्ति में ही विमर्शत्व निहित है । ‘परायाः
स्वात्मसंवित्तेर्विमर्शत्वं न्यरूपयत् ॥’¹⁰
१. ‘विमर्श’ भगवान् का मुख्य स्वभाव है—
‘स परमात्मा चिद्रूपो विमर्शाख्ये नैव मुख्यस्वभावेन ।’¹¹
२. ‘विमर्श’ प्रकाश की अन्तर्लीन, वह अनुत्तरा अभिन्न शक्ति है जो कि
समस्त संसार की सृष्टि, स्थिति एवं संहार का मूलाधार है—सकलभुवनोदय
स्थितिलयमयलीला विनोदनोद्युक्तः। अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥¹²
१. शाक्तदर्शनम् (८।३।१५) २. योगिनीहृदय (९)
३. दीपिका (अमृतानन्दनाथ) ४-६. सेतुबन्ध (भास्करराय मखिन्)
७. प्रत्यभिज्ञाकारिका ८. पूर्णता प्रत्यभिज्ञा
९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (क्षेमराज) १०. परात्रिंशिका तात्पर्य दीपिका
११. प्र०का० (१।८८) १२. कामकलाविलास

प्रथमोऽंशः १३
३. यह शिव की वह स्फुरणात्मिका एवं नैसर्गिक शक्ति है जिसकी सहायता
से भगवान् शिव जगत् की उत्पत्ति करते हैं, उसका पालन करते हैं एवं उसका
संहार करते हैं—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥१
४. भगवान् परमशिव ‘प्रकाश’ ही का अपना स्वेच्छा, विभक्तरूप ही विमर्श
है—‘इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्ति परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य ।’२
५. ‘विमर्श’ दीपकरूप प्रकाशात्मा शिव की विमर्शाख्या नामक प्रभा है—
‘शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।’३
६. परमात्मा का आनन्दरूपांश ही ‘स्फुरत्ता’ ‘परा’ ‘अहंता’ पराललिता
भट्टारिका, त्रिपुर सुन्दरी, एवं विमर्श है ।४
७. सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से, स्थिति की अवस्था में विश्व का
प्रकाशन करने से एवं संहार की अवस्था में समस्त प्रपञ्च को आत्मसात करने से
शिव में जो अकृत्रिम अहंभाव है उसे ही ‘विमर्श शक्ति’ कहते हैं५—
‘विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वाप्रकाशेन विश्वसंहारेण च अकृत्रिमाहम इति
विस्फुरणम् ।।' (पराप्रावेशिका)
८. विमर्श एक दर्पण है जिसमें पर शिवरूप प्रतिबिम्बित हुआ करता है 'पर
शिव रविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ॥६
९. अवभासों का स्वभाव ही ‘विमर्श’ है—
‘स्वभावमवभासस्य विमर्श विदुरन्यथा’
१०. जो ‘सोऽहं’ इत्याकारक आत्मस्वरूपविश्रान्ति है वही ‘विमर्श’ है—‘या
स्वस्वरूपेविमर्शः सोऽहमित्ययम्’ (अजड०२२ । प्रत्यभिज्ञाकारिका) ॥ ‘विमर्श’
परमशिव का पूर्ण अहं (पूर्णाहन्ता) है ।
११. परमात्मा परमशिव की स्वनिगूढा, स्वातंत्र्यस्वरूपा, कामेश्वरीरूपा,
त्रिपुरसुन्दरीस्वरूपा, ललिताख्या पराशक्ति है वही विमर्श कहलाती है ।
१२. ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ परस्पर सर्वथा अभिन्न है । एक के अभाव में भी
दूसरे की कल्पना असंभव है । इनमें अभिन्नभाव सम्बन्ध है—‘प्रकाशमानं न पृथक्
प्रकाशात् । स च प्रकाशो न पृथक् विमर्शात् ।।'७
१. वरिवस्यारहस्यम् २. दीपिका (अमृतानन्द)
३. अमृतानन्द—‘दीपिका’ ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. कामकलाविलास ६. प्र०का० (१।४२)
७. विज्ञान भैरव विवृति (पृ० १२२)

१४ वरिवस्यारहस्ये
१३. यह 'विमर्श' ही उसकी अपने महेश्वरता की पूर्ण प्रतीति है—'स एव
विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।।'१
१४. प्रकाश एवं विमर्श अभिन्न होते हुए भी 'प्रकाश' शिवरूप है एवं 'विमर्श'
शक्तिरूपा है । शिव एवं शक्ति का यह नित्य सामरस्य ही 'परमशिव' है ।
१५. शिव के बिना शक्ति का अपना कोई अस्तित्व नहीं और शक्ति के बिना
शिव स्कटिक आदि की भाँति जड़ हो जाएगा क्योंकि स्फटिक एवं मणि आदि
प्रकाशरूप होते हुए भी अपनी सत्ता का विमर्शन (प्रतीति) नहीं कर सकते ।
इसीलिए कहा गया है—
'न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी । शिवशक्तस्तथाभावानिच्छया
कर्तुमीहते । शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ।।'२ शक्तिस्वभाव से शक्त होने
पर ही शिव कर्ता बन पाता है अन्यथा नहीं ।
१६. शक्ति ही आत्मारूप परमशिव का 'विमर्श' है । इसी 'विमर्श' के बल पर
शिव 'कर्तुं' 'अकर्तुं' एवं अन्यथाकर्तुं में समर्थ हैं क्योंकि 'विमर्शोहि सर्वसहः परमपि
आत्मीकरोति, आत्मानं च परीकरोति, उभयम् एकीकरोति एकीकृतं द्वयमपि
न्यग्भावयति इत्येवं स्वभावः ।।'३
१७. शिव से लेकर पृथिवीपर्यन्त ३६ तत्त्वों में अभेदरूप से स्फुरित आत्मा का
इच्छाप्रसार ही उस विश्वोत्तीर्ण परम शिव का विश्वात्मक रूप है । इसे, शैव तन्त्रों
में 'विमर्श' कहा गया है । 'विमर्श' विश्वात्मक है । विमर्श परमशिव की शक्ति है।
विमर्शा (शक्ति) का स्फार ही यह समस्त प्रपञ्च है—क्रियाशक्तिरेऽव (स्वातंत्र्या!मर्श-
रूपायाः) अयं सर्वोविस्फारः ।।'४
१८. 'विमर्श' चिदात्मा के प्रकाश स्वरूप की प्रतीति है । यह 'विमर्श' ही
उसका 'स्वातंत्र्य' है । इसके द्वारा परमशिव परनिरपेक्ष होकर स्वात्ममात्र की पूर्णता
में विश्रान्त रहता है उसकी पर-निरपेक्ष आत्मपूर्णता की प्रतीति ही उसका आनन्द
है.... 'स एव परानपेक्षः पूर्णत्वादानन्दरूपो' क्योंकि 'अन्यनिरपेक्षतैव परमार्थतः
आनन्दः'५ चित्अंश शिवभाव है और आनन्दांश शक्तिभाव है अतः परमशिव का
जो आनन्द है उसका भी अधिष्ठान 'विमर्श' है । एक ही शिव प्रकाशस्वरूप के
प्राधान्य की दृष्टि से 'विश्वोत्तीर्ण' है और विमर्शस्वरूप के प्राधान्य से विश्वमय है
अतः परमशिव की विश्वमयता का आधार भी 'विमर्श' ही है । विमर्श ही उसकी
स्वातंत्र्य शक्ति है ।
१९. परमेश्वर प्रकाशात्मा है और प्रकाश विमर्शस्वभाव है—'परमेश्वरः
प्रकाशात्मा प्रकाशश्च विमर्शस्वभावः ।।'६
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (१-१।८।११) २. शिवदृष्टि (३।२-३)
३-४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-२, पृ० ५, ४२)
५. ई०विम० (भाग-१, पृ० २०७) ६. पराप्रावेशिका

प्रथमोऽंशः १५
'विमर्श'—प्रकाशात्म शिवरूपी दीपक की प्रभा ही 'विमर्श शक्ति' कही गई
है—'शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।'१
'विमर्श' उस नित्य शक्ति को कहते हैं जो शिव के भीतर पूर्वस्थित पदार्थों के
अवभासन में सहायता करती है । परमात्मा का आनन्दरूपांश ही 'स्फुरत्ता'
'पराअहंता', 'पराललिता भट्टारिका' 'त्रिपुरसुन्दरी' एवं 'विमर्श' आदि पदों द्वारा
अभिहित किया जाता है—'तस्य चानन्दरूपांश एवं स्फुरणं परा अहंता, विमर्शः,
पराललिता भट्टारिका, त्रिपुरसुन्दरी, इत्यादि पदैः व्यवह्रियते ।'२ 'विमर्श' शिव का
स्वभाव है । तत्त्व प्रकाशात्मा है और विमर्श ही उसका स्वभाव है । 'सृष्टि' अवस्था
में विश्वाकार होने से, 'स्थिति' अवस्था में विश्व को प्रकाशन द्वारा तथा 'संहार'
अवस्था में आत्मसात् करने से शिव में पूर्ण जो अकृत्रिम अह॑भाव है उसी को
'विमर्श' शक्ति कहते हैं ।३ यदि शिव में 'विमर्श' शक्ति न होती तो वे अनीश्वर
एवं जड़ हो जाएंगे । चित, चैतन्य, परावाक, परमात्मा का ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता
आदि 'विमर्श' के ही पर्यायवाची शब्द हैं ।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'विमर्श' शब्द 'वि' उपसर्ग सहित 'मृश' धातु से घञ्
प्रत्यय लगाकर निष्पन्न हुआ है और उसका अर्थ है—किसी तथ्य का अनुसंधान,
किसी विषय का विवेचन या समीक्षा । दार्शनिक दृष्टि से 'विमर्शतत्त्व' इस अर्थ से
पृथक् एक पारिभाषिक पद के रूप में व्यवहृत होकर परम शिव की समवायिनी
पराशक्ति के अर्थ में व्यवहृत होता है ।
परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षा उत्पन्न होते ही उनके जो दो रूप हो जाते हैं
उनमें से शिवरूप 'प्रकाश' है एवं शक्तिरूप 'विमर्श' है । 'विमर्श' का अर्थ है
अकृत्रिम एवं पूर्णतम अहं की स्फूर्ति । विमर्शस्वरूपा स्फूर्ति सृष्टिकाल में विश्वाकार
में रूपायित होने एवं प्रलयकाल में विश्वसंहरण (विश्व को अन्तर्विलीन करने) के
रूप में प्रस्तुत होती है । 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन विश्वसंहरेण च
अकृत्रिमाहमिति स्फुरणम्' ।।४ विमर्श के द्वारा प्रकाश का अनुभव होता है और
प्रकाश की स्थिति में विमर्श की कल्पना सङ्गत होती है । जिस प्रकार दर्पण के
बिना मुख का प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश
का स्वरूप पूर्ण नहीं हो पाता । जिस प्रकार शर्करा में माधुर्य एवं सुरा में मादकता
होते हुए भी उन्हें इनका ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार शक्ति के बिना शिव को
अपने प्रकाशस्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता। शिव में अपने चैतन्य का ज्ञान 'शक्ति'
के माध्यम से होता है । यदि शक्ति नहीं तो शिव मात्र शव रह जाता है—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।।'५
१. दीपिका (अमृतानन्द) २. भास्करराय (व०र०)
३-४. पराप्रावेशिका (पृ० १-२)
५. शङ्कराचार्य 'सौन्दर्यलहरी' । 'तस्य देवादिदेवस्य परबोध स्वरूपिणः । विमर्शः
परमा शक्तिः सर्वज्ञा ज्ञानशालिनी' ।। (श्री कालीकुल)

१६ वरिवस्यारहस्ये
'पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा अनुत्तर विमर्शमयी शिव
भट्टारिकाभिन्ना ॥'१
शिवस्य प्रकाशमयस्य प्रथा विमर्शशक्तिः ॥ (अमृतानन्द योगी) शिवस्य
प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा, सा निर्विकल्पात्मना विश्वाकारा
मेयमातृप्रमाप्रमाणभेदैः सङ्कुचरूपा ॥'२ विश्वाकारप्रथा षट्त्रिंशत्तत्वात्मना परिणता
विमर्शशक्तिः ॥३
'विश्वस्य शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने प्रस्फुटस्य स्फुटीकारः प्रकाशः ।
इदन्तया हृदयङ्गमीभावो विमर्श एवामर्शनम् ॥'४ 'प्रकाश' परमशिव एवं 'विमर्श'
पराशक्ति का वाचक है—'दिव्यं प्रकाशविमर्शात्मक परमशिवपराशक्तिप्रतिपादनं ।'५
अमृतानन्द योगी ने कहा है कि विश्वगुरु की शक्ति का नाम 'विमर्श' है जो
कि एक होते हुए भी अनेक भावार्थ रूप में व्यक्त होती है—'विमर्शरूपिणी
शक्तिरस्य विश्वगुरोः सदा । परिस्फुरति सैकापि नाना भावार्थरूपिणी ॥'
प्रकाशात्मक परशिव 'अहमेव' के अनुसंधान के साथ परापश्यन्ती
मध्यमा-वैखरी के क्रम से विमर्शाश के द्वारा प्रकट हुआ करते हैं—'प्रकाशात्मकः
परशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शाशेन
प्रकटो भूत्वा प्रकाशेन प्रतिवचनदातापि सन् तन्त्रं समवतारयामि ।'६
'परम तत्व' क्या है? 'प्रकाश' उसका रूप है—उसका स्वभाव है अर्थात् वह
महाप्रकाशस्वरूप है । वह निराकाङ्क्ष है । स्फटिक मणि, दर्पण आदि पदार्थ
निराकाङ्क्ष होने पर भी जड़ हैं किन्तु परमतत्व निराकाङ्क्ष होकर भी महाचेतन है और
स्वात्मविश्रान्ति के कारण 'महानन्द' कहा गया है । स्वात्मा (स्वभाव) अखण्ड
अहंता चमत्कार के रस में विश्राम करने के कारण परमशिव परमनिर्वृति एवं
महानन्दस्वरूप है । स्फटिकादिक प्रकाश ग्रहण करने में समर्थ तो हैं किन्तु केवल
प्रकाश्य है किन्तु परमात्मा स्वप्रकाश है—प्रकाशात्म—प्रकाशक एवं प्रकाशस्वरूप
है । 'अहं' विमर्श में 'अ' प्रकाशात्मक परमशिव रूप परमतत्व है तथा 'ह'
पराशक्ति विमर्श ।७
प्रकाशस्वरूप परमेश्वर का स्वभाव ही 'विमर्श' है । जो विश्वाकार,
विश्वप्रकाश, विश्वसंहार रूप से अकृत्रिम अहमाकार का स्फुरण है वही 'विमर्श' है ।
यदि वह प्रकाश निर्विमर्श हो जाय तो वह अनीश्वर और जड़ हो जाएगा । वह
विमर्श विश्वाकार से सृष्टि में और विश्व प्रकाश से स्थिति में और स्वात्मसाक्षात्कार
रूप के द्वारा संहरण से संहार में पूर्णाहन्ता चमत्कारस्वरूप है । इसी 'विमर्श' को
चित, चैतन्य, स्वाभाविक रूप से प्रकाशित होने वाली 'परावाक्', स्वातन्त्र्य,
१. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् २-५. दीपिका (अमृतानन्दनाथ)
६. अमृतानन्द
७. 'अ' प्रकाशस्वरूप परमशिव है तथा 'ह' शक्तिस्वरूप 'विमर्श' ।

प्रथमोऽंशः १७
परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य, कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सार, हृदय, स्पन्द इत्यादि शब्दों द्वारा
आगमों में कहा गया है । संवित्प्रकाश रूप का विमर्श-प्राधान्य ही शैव शासन में
प्रतिपादित है । चैतन्य विमर्श ही आत्मा का मुख्य स्वभाव है ।¹ इस विमर्श शक्ति
के विभिन्न नामान्तर हैं—
'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता ।
स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ।।
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालविशेषिणी ।
सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ।।'
शक्तिः—'शक्ति' शब्द शक् धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाकर बनता है । शक्ति
का अर्थ है सामर्थ्य या क्षमता । शिव की विश्वसिसृक्षा शक्ति ही 'शक्तितत्त्व' के
नाम से प्रसिद्ध है—शिवस्य विश्वसिसृक्षा शक्तिः शक्तित्वमिति नाम्ना ख्याता ।।'²
रामेश्वर ने 'परशुरामकल्प सूत्रटीका' में कहा है कि निर्गुण शिव ही 'बहुस्यां
प्रजायेय'—इस इच्छाशक्ति से युक्त होकर तथा सृष्ट्युन्मुख हो कर 'शक्तितत्व'
कहलाने लगता है । शिव की सिसृक्षा ही 'शक्ति' है ।
त्रिकसिद्धान्त मत के अनुसार परमशिव परमेश्वर के हृदय में सिसृक्षाविर्भाव
मात्र से ही उनके दो रूप हो जाते हैं—(१) शिवरूप (२) शक्तिरूप । शिव
प्रकाशरूपी है और शक्ति विमर्शरूपिणी ।
प्रपञ्च-वासना की दृष्टि से शिव एवं शक्ति में निम्न भेद हैं—
'प्रपञ्चवासणारूपा शक्तिरित्यभिधीयते ।
निष्प्रपञ्चचिदेकात्मा शिवतत्त्वं समीरितम् ।।'³
'शक्ति' का 'श' अक्षर ऐश्वर्य का एवं 'क्ति' अक्षर पराक्रम का वाचक है
अतः 'शक्ति' शब्द ऐश्वर्य एवं पराक्रम प्रदान करने वाली देवी का वाचक है ।⁴
'या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता' कहकर दुर्गासप्तशती में भगवती के उस
स्वरूप को, जो समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित रहता है, नमस्कार
किया गया है और उसे शक्तिस्वरूप कहा गया है । 'शक्ति' शब्दकोशीय दृष्टि से
निम्न अर्थों का वाचक है—(१) कासूसामर्थ्ययोश्शक्तिः (२) शक्तिः पराक्रमः प्राणौ
(३) षड्गुणाश्शक्तयस्तिस्रः ।⁵
'शक्लृ शक्तौ' धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाने पर 'शक्ति' शब्द निष्पन्न होता
है । उत्साह, गौरी, बल एवं पराक्रम के अर्थ में ही 'शक्ति' शब्द व्यवहार में
अधिक प्रयुक्त होता है—
'शक्तिरस्तान्तरे गौर्यामुत्साहादौ बलेस्त्रियाम् ।।'⁶
१. 'षट्त्रिंशत् तत्व संदोह' २-३. शाक्तदर्शनम् (पृ० ९०)
४. देवीभागवत पुराण ५. अमरकोश
६. मेदिनीकोश
२ वरि.

१८ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति को प्रकार त्रयात्मक बताया गया है—शक्तयस्तिस्रः प्रभावोत्साह-
मन्त्रजाः ॥' (शक्यते जेतुमनया । 'स्त्रियां क्तिन्' ३।३।९४) हैमकोश के अनुसार
'शक्ति' शब्द का अर्थ निम्नानुसार है—'शक्तिरायुधभेदे स्यादादुत्साहादौ बले-
स्त्रियाम् ॥'१ विश्वकोश के अनुसार—'शक्ति' शब्द निम्न अर्थों का वाचक है—
'कासूर्विकलवाचि स्यात्कासूः शक्त्यायुधेऽपि च ॥'२
विमर्श शक्ति तत्त्व—शिव प्रकाशरूप है तो शक्ति विमर्शरूपिणी । 'विमर्श'
का अर्थ है—'मै पूर्ण हूँ, मै अकृत्रिम हूँ'—इसकी स्फूर्ति । यह स्फूर्ति (या
स्फुरत्ता) (१) सृष्टिकाल में—विश्वाकारा (२) स्थितिकाल में—विश्वप्रकाशा एवं (३)
प्रलयकाल में—विश्वसंहरणरूपा बन जाती है । अतः 'विमर्शो नाम विश्वाकारेण,
विश्वप्रकाशेन, विश्वसंहारेण चाकृत्रिममाहमिति स्फुरणम् ।'३ 'विमर्शशक्ति' के अन्य
पर्याय निम्न हैं—चित्, चैतन्य, संवित, स्वरमोदिता, परावाक्, स्वातन्त्र्यामुख्यैश्वर्या,
कर्तृत्व, स्फुरत्ता, सारा एवं स्पन्द आदि ।
'प्रभा' के दो रूप है—(१) 'अहमंश' (२) 'इदमंश' । अहमंशग्राहक, तो
शिव या 'प्रकाश' हैं, तथा इदमंशग्राहक शक्ति या 'विमर्श' है । 'विमर्श' के द्वारा
ही 'प्रकाश' का स्वानुभव हो पाता है । प्रकाश की सत्ता के बिना 'विमर्श' की
कल्पना भी नहीं की जा सकती । जिस प्रकार दर्पण के बिना मुखमण्डल का रूप
प्रत्यक्षीकृत नहीं हो पाता उसी प्रकार विमर्श के बिना प्रकाश के स्वरूप की
संभावना नहीं हो सकती । शक्ति की सहायता के बिना शिव को अपने स्वरूप की
प्रतीति नहीं हो सकती । इसीलिए कहा गया है—'शिवा' शिव का मुख है—
'शैवीमुखमिहोच्यते ।'
पुण्यानन्दनाथ ने 'कामकलाविलास' में कहा है कि जिस प्रकार कोई नृपति
निर्मल दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर अपने मुख की सुन्दरता को भलीभाँति
जान लेता है उसी प्रकार भगवान् शिव भी अपनी स्वाधीनभूतात्म शक्ति को देखकर
स्वीय परिपूर्णाहन्तामय स्वरूप को जान लेते हैं ।
'सा जयति शक्तिराद्या निजसुखमय नित्यनिरूपमाकारा ।
भाविचराचरबीजं शिवरूपविमर्शनिर्मलादर्शः ॥'४
यह विमर्श शक्ति परमशिव में नित्य अन्तर्लीन है—
'सकल भुवनोदयस्थितिलयमय लीलाविनोदनोद्युक्तः ।
अन्तर्लीनविमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥'५
'प्रकाश' विमर्शात्मक है और 'विमर्श' प्रकाशात्मक है । सांराश यह है कि—
'न शिवेन विना देवी न देव्या च विना शिवः ।
ना नयोरन्तरं किंचिच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥'
१. हैमकोश २. विश्वकोश
३. पराप्रवेशिका ४-५. पुण्यानन्दनाथ-कामकला विलास

प्रथमोऽंशः १९
यथा चन्द्रिका चन्द्रमा से पृथक् नहीं हो सकती और न तो चन्द्रमा चन्द्रिका
से उसी प्रकार शिव शिवा से एवं शिवा शिव से (प्रकाश विमर्श से एवं विमर्श
प्रकाश से) पृथक् नहीं हो सकते ।
'शक्ति' एवं शक्तिमान में अभेद—आचार्य सोमानन्दपाद ने 'शिवदृष्टि' में कहा
है कि भगवान् शिव तभी तक शक्तिमान कहलाते हैं जब तक कि शक्ति उनके
साथ है क्योंकि—
न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिर्व्यतिरेकिणी ।
शिवः शक्तस्तथा भगवानिच्छया कर्तुमीहते ॥१
इसीलिए कहा गया है कि शक्ति एवं शक्तिमान् में अभेद है—
'शक्तिशक्तिमतोर्भेदः शैवे जातु न वर्ण्यते ॥'२
'सौन्दर्यलहरी' में आचार्य शङ्कर कहते हैं कि—यदि 'शिव' शक्ति से समन्वित
न रहें तो वे हिल भी नहीं सकते—
'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं ।
नो चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ॥'३
'शक्ति' के विभिन्न रूप—'शक्ति' के अनन्त रूप हैं किन्तु उनमें से पाँच
रूप प्रधान हैं—(१) चितशक्ति (२) आनन्दशक्ति (३) इच्छाशक्ति (४) ज्ञानशक्ति
(५) क्रियाशक्ति ।
(क) 'चित शक्ति'—यह प्रकाशात्मक रूप है । इसीके द्वारा शिव अपने
को 'प्रकाश' (स्वप्रकाश) समझते हैं ।
(ख) 'आनन्द शक्ति'—इसके द्वारा शिव आनन्दमय हैं और इस शक्ति की
सहायता से ही वे अपने में 'आनन्द' का साक्षात्कार कर पाते हैं ।
(ग) 'इच्छा शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव प्रपञ्च का सृजन, पालन एवं
संहार करते हैं ।
(घ) 'ज्ञान शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव ज्ञानस्वरूप हैं ।
(ङ) 'क्रिया शक्ति'—इसके द्वारा ही शिव सभी स्वरूपों को धारण कर
पाते हैं ।
इन्हीं शक्तियों की सहायता से शिव अपने में 'अहं' का बोधकर पाते हैं, एवं
विश्व की अभिव्यक्ति कर पाते हैं, जगत् शिव की शक्ति का ही अपना विराट रूप
है । इसे परमशिव अपने में ('स्वभित्तौ' = अपने हृदय की दीवार में) स्वेच्छया
अभिव्यक्त करते हैं । शक्ति के बिना शिव जड़वत हैं ।
१. सोमानन्द 'शिवदृष्टि' २. शिवदृष्टि
३. सौन्दर्यलहरी

२० वरिवस्यारहस्ये
'विमर्श' शिव का स्वभाव है । सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से स्थिति में
विश्व को प्रकाशन के द्वारा, एवं संहार के समय विश्व को आत्मसात करने से
शिव में जो पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव है उसी को 'विमर्श शक्ति' कहते हैं ।१
पुण्यनन्द ने इसी आद्या शक्ति को 'शिवरूपविमर्श निर्मलादर्श:' कहा है ।२ शक्ति
विमर्शरूपिणी है । 'विमर्श' है—पूर्ण अकृत्रिम अहंभाव की स्फूर्ति । बिना शक्ति के
शिव को अपने प्रकाशरूप का ज्ञान नहीं होता । शक्ति के बिना शिव शव हैं—
विभिन्न विमर्शों का स्वरूप निम्नानुसार है—
(क) 'शिवतत्त्व' में— 'अहं' विमर्श होता है ।
(ख) 'सदाशिवतत्त्व' में— 'अहमिदं' विमर्श होता है ।
(ग) 'ईश्वरतत्त्व' में—'इदमहं' विमर्श होता है ।
शैव-शाक्त तन्त्रों में तत्त्वों को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है— (१)
शिवतत्त्व (२) विद्यातत्त्व (३) आत्मतत्त्व । इसी 'शिवतत्त्व' के दो रूप हैं— (क)
'शिवतत्त्व' (ख) 'शक्तितत्त्व' ।
'शक्ति' को प्रथम 'स्पन्द' भी कहा गया है । जगत् की रचना करने वाले
परमेश्वर की जो प्रथम स्पन्दरूप इच्छा है वही 'शक्ति' है ।३
'यदयमनुत्तरमूर्ति- र्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम ।
पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ।।४
शिव— 'शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।' स्पन्दसूत्रों में कहा गया है कि
जिसके उन्मेष एवं निमेष से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय होते हैं उस 'शक्तिचक्र
विभवप्रभव' शङ्कर की हम स्तुति करते हैं—
'यस्योन्मेष निमेषाभ्यां जगत्ः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्कर स्तुमः ।।'
अर्थात् शङ्कर या शिव उस परासत्ता का अभिधान है जो जगत् की सृष्टि एवं
प्रलय का सूत्रधार है । 'शिव' के अन्य पर्याय निम्नांकित हैं—
'शंभुरीशः पशुपतिः शिवः शूली महेश्वरः ।
ईश्वरः सर्व ईशानः शङ्करश्चन्द्रशेखरः ।।' आदि ।।५
'भगवान् शिव जगत् को उत्पन्न करते हैं, उसका पालन एवं संहार करते
हैं ।।' (शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ।।') 'शिव' शब्द अनेकार्थवाची है—
'शिवो मोक्षे महादेवे कीलकग्रहयोगयोः । बालके गुग्गुलौ वेदे पुण्डरीकद्रुमेऽपि च ।
सुखे क्षेमे जले क्लीबं ।।'६
१. पराप्रावेशिका (पृ० १-२) २. कामकलाविलास
३. पराप्रावेशिका ४. षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह
५-६. अमरकोश

प्रथमोऽंशः २१
त्रिपुरासिद्धान्तर्गत 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की टीका में श्रीरामेश्वर ने ३६
तत्त्वों का विवरण दिया है और इसी प्रकार मृगेन्द्रसंहिता एवं 'षट्त्रिंशत्तत्व- संदोह'
में भी इसका सविस्तार विवरण दिया गया है। 'परशुरामकल्पसूत्र' (१।४) की
टीका में कहा गया है कि सृष्टि के आदि में स्वकीयस्वरूपमात्र में अवस्थित
परमशिव में जो 'एकोऽह बहुस्याम' के रूप में इच्छा उत्पन्न हुई वही 'इच्छाशक्ति'
है और उसी से 'ज्ञानशक्ति' एवं ज्ञानशक्ति से क्रियाशक्ति उत्पन्न हुई। इस शक्तित्रय
के सहयोग से शब्द सृष्टि एवं अर्थसृष्टि प्रारब्ध हुई। इस सृजनेच्छाशक्ति से विशिष्ट
परमशिव ही 'शिवतत्त्व' है। वैसे तो परमशिवं 'निर्गुण' हैं किन्तु सिसृक्षा के उदित
होते ही वे 'सगुण' एवं शक्तियुक्त हो जाते हैं।
'सौभाग्यभास्कर' में श्रीभास्करराय कहते हैं—प्रलयकाल में सूक्ष्मावस्थापन्न
जगत् को गर्भीकृत करके शक्ति शिव में विलीन हो जाती है। ऐसी स्थिति में
क्रियाशक्ति भी नहीं रहती। इस अवस्था में स्थित शिव ही निर्गुण ब्रह्मस्वरूप
'परमशिव' कहलाते हैं। सृष्टि की उन्मुखावस्था में परमशिव के 'ईक्षण', 'काम',
'तप', 'विचिकीर्षा' आदि के रूप में प्रथम स्पन्दन होता है। और इसी से शक्ति
का विकास होता है। इस शक्ति से युक्त परमशिव ही प्रथम तत्त्व 'शिव' कहलाते
हैं। इसी तथ्य को 'षट्त्रिंशत्तत्वसन्दोह' में इस प्रकार कहा गया है—
'यदयनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छयाऽखिलमिदं जगत्स्रष्टुम् ।
स्पन्दते स स्पन्दः प्रथमः शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥१
जब अनुत्तरमूर्ति परमशिव स्वेच्छावश जगत् की सृष्टि करने के लिए स्पन्दित
हुए तब सृष्टि की इस उन्मुखावस्था में उनका जो प्रथम स्पन्दन हुआ वही
'शिवतत्त्व' है।२
प्रत्येक जीव में स्थित शिवतत्त्व ही आत्मतत्त्व है। यह चैतन्यरूप है।
'चैतन्यमात्मा'३ इसे ही 'परासंवित्' परमेश्वर 'शिव' या 'परमशिव' कहते हैं। यह
जड़ाजड़ सभी सत्ताओं में व्यष्टि-समष्टि रूप में स्थित है। यह देशकालातीत होते
हुए भी सभी देशों एवं कालों में, एक होते हुए भी अनन्त रूपों में स्थित है।
अद्वैत होते हुए भी द्वैत रूप से भासमान है। यह विश्वरूप होते हुए भी
विश्वातीत है। समस्त जगत् इसी तत्त्व का अभिन्नरूप है। 'परमशिव' स्वयं ३६
तत्त्वों के रूप में जगत् में भासित होता है। इस विश्वोत्तीर्ण, विश्वात्मक,
परमानन्दरूप एवं प्रकाशैकघन 'शिव तत्त्व' का ही (अपने से लेकर पृथ्वीपर्यन्त)
३६ तत्त्व अपना अभिन्न स्फुरण है यही परमशिव भट्टारक नाना वैचित्र्यों के रूप में
स्वयं स्फुरित होते हैं।४ क्षेमराज कहते हैं—'अखिलम् अभेदेनैव स्फुरति ॥'
'श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवं
विधमेव शिवादिधरण्यन्तं अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत्
१. आचार्य क्षेमराज—ष०त्रिं०त०सं० २. शाक्तदर्शनम्
३. शिवसूत्र (१।१) ४. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० ३,८)

२२ वरिवस्यारहस्ये
किंचित ग्राह्यं ग्राहकं वा; अपितु श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः
स्फुरति ।।' 'एवं भगवान् विश्वशरीरः ।' 'चिदात्मा शिवभट्टारक एव एक आत्मा न
तु अन्यः किंचित् ।।'१ इसीलिए कहा गया है—'तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न
यः शिवः ।।'२
'परमशिव' और 'शिवतत्त्व'—'परमशिव' शुद्ध अद्वैत की तत्त्वातीत स्थिति
है। इसे न 'शिव' कहा जा सकता है और न तो 'शक्ति' न इसे विश्वोत्तीर्ण कहा
जा सकता है और न तो विश्वमय। उसकी भावना एवं उसका उपदेश दोनों संभव
नहीं है—
'अप्रमेयेऽपरिच्छिन्ने स्वतन्त्रे भाव्यता कुतः ।' (तन्त्रालोक)
शैव-शाक्त दर्शनो में छत्तीस तत्त्व स्वीकार किए गए हैं, 'परमशिव' इनमें से
कोई भी तत्त्व नहीं है क्योंकि वह 'तत्त्वातीत' है।
अप्रतिहतशक्ति परमशिव अपने स्वातन्त्र्यस्वभाव के कारण प्रमातृप्रमेयादि
अनन्तरूपों में आत्मावभासन करने की इच्छा से जगल्लीला के लिए नानारूप
धारण करने के कारण 'विश्वमय' हैं किन्तु स्वरूपतः 'विश्वोत्तीर्ण' हैं। इसी कारण
श्रीक्षेमराज इसे 'विश्वमय' एवं 'विश्वातीत' दोनों एक साथ कहते हैं—
'श्रीमत्परमशिवस्य' पुनः 'विश्वोत्तीर्णविश्वात्मकः'३ 'परमशिव' है तो विश्वोत्तीर्ण किन्तु
वह विश्वशरीरी भी है—'भगवान् विश्वशरीरः'४ विश्व उसकी आत्मा के साथ अभिन्न
रूप में स्थित है—'श्रीपरमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं'५ इसीलिए
'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में कहा गया है—चितिसङ्कोचात्मा चेतनोऽपि सङ्कुचित विश्वमयः'६
'चिदैकात्म्येन विश्वशरीरः शिवभट्टारक एव'७ श्रीपरमशिवभट्टारक एवं इत्थं
नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति'८ 'जगतः प्रकाशैकात्म्येन अवस्थानम् उक्तम्'९ 'ननु जगदपि
चितो भिन्नं नैव किञ्चित् ।'१०
'परमशिव' विश्वमय है या विश्वातीत ?—इस प्रश्न पर अपना मत प्रस्तुत
करते हुए आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि—
(१) विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वम् इति तांत्रिकाः ।
(२) विश्वमयम् इति कुलाद्याम्नायनिष्ठाः ।
(३) विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं च इति त्रिकादिदर्शनविदः ।
एक ही चिदात्मा भगवान् परमशिव स्वातन्त्र्यावभासित विभिन्न भूमिकाओं में
आत्मा के रूप में अवस्थित हैं तथापि वे मूलतः निष्क्रिय, निर्गुण एवं निराकार हैं।
चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वातन्त्र्यशक्ति के बल से अभेद व्याप्ति का विमज्जन
करके भेद-व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं—'चिदात्मा परमेश्वरः स्वातन्त्र्यात्
अभेदव्याप्तिं निमज्य भेदव्याप्तिं अवलम्बते ।।'११ सामरस्य एक ऐसी अवाङ्मन-
सगोचर परम स्थिति है जिसमें शक्ति एवं शक्तिमान् जैसे शब्दों की कल्पना करना
१-११. आचार्य क्षेमराज—प्रत्यभिज्ञाहृदयम्

प्रथमोऽंशः २३
भी संभव नहीं है । इसी तत्त्वातीत अवस्था को शैवागम में 'अकथ्या' एवं
'अन्तःस्वानन्दगोचरा' कहा गया है ।
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि यह न तो नवात्मा है, न तत्त्वरूप है, न
शब्दराशि है, न त्रिशिराभैरव है, न शक्तित्रयात्मक है, न नादबिन्दुम flag? नहीं: नादबिन्दुमय है, न
चन्द्रार्धनिरोधिका है, न वर्णचक्र में स्थित अहंस्वभाव या षट्चक्रात्मक ही है और न
तो शक्तिस्वरूप ही है प्रत्युत् वह दिक्कालकलनोन्मुक्त, अव्यपदेश्य, अकथ्य,
अन्तःस्वानुभवानन्द एवं विकल्पोन्मुक्तगोचर है—
'तत्त्वतो न नवात्माऽसौ शब्दराशिन भैरवः ।
न चासौ त्रिशिरा देवो न च शक्तित्रयात्मकः ।
नादबिन्दुमयो वापि न चन्द्रार्धनिरोधिकाः ।
न चक्रक्रमसंभिन्नो न च शक्तिस्वरूपकः ।
दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोदेशाविशेषिणी ।
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