वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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प्रथमोऽंशः ११
इममेवार्थं श्लोकद्वयेनाह—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥ ४ ॥
(विमर्श शक्ति और उसकी महत्ता)
इसकी (परमशिव रूप 'प्रकाश' की) शक्ति स्वाभाविक, स्फुरणात्मिका एवं
विमर्शरूपा है । उसके योग से ही शिव जगत् की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार किया
करता है ॥ ४ ॥
- प्रकाश *
इहोत्पादनादि त्रयं तिरोधानानुग्रहयोरुपलक्षणम् ॥ ४ ॥ - सरोजिनी *
‘नैसर्गिकी’ = स्वाभाविक, निसर्गजन्य, अकृत्रिम, सहज शक्ति के दो प्रमुख
भेद हैं—(१) नैसर्गिक (२) अनैसर्गिक । दाहकता अग्नि का, गन्ध पृथ्वी का रस
जल का, शब्द आकाश का, स्पर्श वायु का नैसर्गिक गुण है किन्तु अग्नि-संपर्क
से, प्रज्वलित लौहखण्ड में जलाने की शक्ति, मुखावयवों से निकलती ध्वनि या
शब्द की शक्ति उनके अपने गुण या अपनी शक्तियाँ नहीं हैं, प्रत्युत् दूसरों से
उधार ली हुई शक्तियाँ हैं अतः परिस्थितिजन्य हैं, क्षणिक हैं, संयोगज हैं, अतः
कृत्रिम हैं । इन्हें ही अनैसर्गिक शक्तियाँ कहेंगे । शिव में निहित शक्ति नैसर्गिक
शक्ति है क्योंकि वह परमशिव से अभिन्न है और उससे अविच्छेद्य है । सांख्यदर्शन
की मान्यता है कि ‘प्रकृति’ (शक्ति) पुरुष से भिन्न है । यद्यपि सृष्टि का कार्य
‘प्रकृति’ ही करती है और वह बिना पुरुष की सहायता के कर भी नहीं सकती
क्योंकि प्रकृति तथा पुरुष के संयोग से ही सृष्टि हो पाना संभव है अन्यथा नहीं—
‘पंग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतः सर्गः’ तथापि सांख्य की ‘प्रकृति’ प्रकाश के
‘विमर्श’ के समरूप नहीं हैं क्योंकि ‘प्रकृति’ पुरुष से अविच्छेद्य नहीं है—प्रत्युत्
विच्छेद्य है—
‘रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य निवर्तते प्रकृतिः ।।' (सां०का०५९)
‘विविक्तबोधात् सृष्टिनिवृत्तिः प्रधानस्य सूदवत् पाके ।' (सां०सू०)
जबकि ‘प्रकाश’ की शक्ति (प्रकाश’ की नैसर्गिक शक्ति होने के कारण) उससे
‘चन्द्रचन्द्रिकयोरिव’ अभिन्न है अतः उसका निसर्ग है—प्रकाश का स्वभाव है और
उसकी अन्तःशक्ति है—‘विचित्रजगन्निर्माणादि सामर्थ्यरूपा शक्तिः । न भिन्ना... ।
कल्पित भेदाभेदनिर्वचनीयतादात्म्यसम्बन्धः । १ सा हि ब्रह्माभिन्ना शक्तिः ।।
१. हयग्रीव—‘शाक्तदर्शनम्’ (प्र०अ०। प्र०१।२)