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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 530 में से

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प्रथमोऽंशः १३
३. यह शिव की वह स्फुरणात्मिका एवं नैसर्गिक शक्ति है जिसकी सहायता
से भगवान् शिव जगत् की उत्पत्ति करते हैं, उसका पालन करते हैं एवं उसका
संहार करते हैं—
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपास्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो जगदुत्पादयति पाति संहरति ॥१
४. भगवान् परमशिव ‘प्रकाश’ ही का अपना स्वेच्छा, विभक्तरूप ही विमर्श
है—‘इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्ति परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य ।’२
५. ‘विमर्श’ दीपकरूप प्रकाशात्मा शिव की विमर्शाख्या नामक प्रभा है—
‘शिवस्य प्रकाशात्मनो दीपस्य शक्तिर्विमर्शाख्यैव प्रभा ।’३
६. परमात्मा का आनन्दरूपांश ही ‘स्फुरत्ता’ ‘परा’ ‘अहंता’ पराललिता
भट्टारिका, त्रिपुर सुन्दरी, एवं विमर्श है ।४
७. सृष्टि अवस्था में विश्वाकार होने से, स्थिति की अवस्था में विश्व का
प्रकाशन करने से एवं संहार की अवस्था में समस्त प्रपञ्च को आत्मसात करने से
शिव में जो अकृत्रिम अहंभाव है उसे ही ‘विमर्श शक्ति’ कहते हैं५—
‘विमर्शो नाम विश्वाकारेण विश्वाप्रकाशेन विश्वसंहारेण च अकृत्रिमाहम इति
विस्फुरणम् ।।' (पराप्रावेशिका)
८. विमर्श एक दर्पण है जिसमें पर शिवरूप प्रतिबिम्बित हुआ करता है 'पर
शिव रविकरनिकरे प्रतिफलति विमर्शदर्पणे विशदे ॥६
९. अवभासों का स्वभाव ही ‘विमर्श’ है—
‘स्वभावमवभासस्य विमर्श विदुरन्यथा’
१०. जो ‘सोऽहं’ इत्याकारक आत्मस्वरूपविश्रान्ति है वही ‘विमर्श’ है—‘या
स्वस्वरूपेविमर्शः सोऽहमित्ययम्’ (अजड०२२ । प्रत्यभिज्ञाकारिका) ॥ ‘विमर्श’
परमशिव का पूर्ण अहं (पूर्णाहन्ता) है ।
११. परमात्मा परमशिव की स्वनिगूढा, स्वातंत्र्यस्वरूपा, कामेश्वरीरूपा,
त्रिपुरसुन्दरीस्वरूपा, ललिताख्या पराशक्ति है वही विमर्श कहलाती है ।
१२. ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ परस्पर सर्वथा अभिन्न है । एक के अभाव में भी
दूसरे की कल्पना असंभव है । इनमें अभिन्नभाव सम्बन्ध है—‘प्रकाशमानं न पृथक्
प्रकाशात् । स च प्रकाशो न पृथक् विमर्शात् ।।'७
१. वरिवस्यारहस्यम् २. दीपिका (अमृतानन्द)
३. अमृतानन्द—‘दीपिका’ ४. वरिवस्यारहस्यम्
५. कामकलाविलास ६. प्र०का० (१।४२)
७. विज्ञान भैरव विवृति (पृ० १२२)