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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 530 में से

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पृष्ठ 109

प्रथमोऽंशः ७
'प्रकाशः सर्वदा अनावृतात्मस्वरूप ज्योतिः' स्वभावरूप चिदात्मा महेश्वर ही
'प्रकाश' कहे गये हैं ।१
'प्रकाश' शब्द का प्रयोग अन्तस्थ सत्ता के उस स्वरूप के लिए किया जाता
है जो इसके आभास-जाल के अधिष्ठाता का कार्य करता है । 'ठीक उसी
प्रकार यथा बुद्धि किसी व्यक्ति के कल्पना-काल में उसकी कल्पनाओं का आधार
बनती है ।
वस्तुतः अखण्ड आत्मज्ञान ही 'प्रकाश' है जो कि स्वरूपतः ब्रह्म है—
'ज्ञानमेव प्रकाशाभिधं ब्रह्म ।।'२ अमृतानन्द ने ठीक ही कहा है कि—भूमि से लेकर
शिवपर्यन्त स्थित विश्व के अस्फुट आमर्शन का स्फुटीकार 'प्रकाश' है—तथा उस
विश्व का 'इदं' के रूप में अङ्गीभाव रूप आमर्शन 'विमर्श' है—"विश्वस्य
शिवादेर्भूभ्यन्तस्य प्रकाशामर्शने अस्फुटस्य स्फुटीकारः 'प्रकाशः' इदन्तया हृदयङ्गमी-
भावो विमर्श एवामर्शनम् ।।" (दीपिका) ॥
यह प्रकाशस्वरूप 'परमशिव' विमर्शाख्य अनन्योन्मुख स्वातंत्र्य स्वभाव से
अपनी 'पूर्णहन्ता' के आनन्द में अहर्निश स्पन्दमान रहता है । उसके आनन्दस्वभाव
की अभिव्यक्ति ही उसकी शक्ति का स्फार है—
'सर्व एवायं विश्वप्रपञ्च आनन्द शक्ति स्फारः ।।' (तन्त्रालोक) ।।
वही परमेश्वर अपनी माया शक्तिरूपिणी 'स्वातंत्र्यशक्ति' के द्वारा अपने को
अपने द्वारा सङ्कुचित सा अवभासित करता हुआ—१. 'विज्ञानाकल' २. 'प्रलयाकल'
एवं ३. 'सकल' बन जाता है (तदेवम् असौ भगवान् स्वमाया शक्त्याख्येन
अव्यभिचरित स्वातंत्र्य शक्तिमहिम्ना स्वात्मनैव आत्मानं सङ्कुचितमिव अवभासयन्
विज्ञानाकलः प्रलयाकलः सकलश्च संपद्यते ।)३ परमशिव ही प्रकाश है—
'तस्मात् प्रकाश एवासौ गीतो यः परमः शिवः ।।' (मा०वि०)
उसकी प्रकाशरूपता ही 'चिच्छक्ति' है; उसका स्वातन्त्र्य ही 'आनन्दशक्ति' है,
उसका चमत्कार ही 'इच्छाशक्ति' है, उसकी आमर्शत्मिकता ही 'ज्ञानशक्ति' है, और
उसका सर्वाकारयोगित्व ही क्रियाशक्ति है । १. तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । २.
स्वातंत्र्यं आनन्दशक्तिः । ३. तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः ४. आमर्शत्मिकता ज्ञानशक्तिः।
५. सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः इति ।४
प्रकाशरूप परमेश्वर समस्त जगत् की आत्मा है । वह एक ओर तो सर्वमय
है तो दूसरी ओर सर्वोत्तीर्ण भी है । वह अनवच्छिन्न चिदानन्द विश्रान्त,
सर्वशक्तिखचित महेश्वर संविदात्मा है—"इह खलु निखिल जगदात्मा सर्वोत्तीर्णाश्च
सर्वमयश्च विकल्पा सङ्कुचित संवित्प्रकाशरूपः अनवच्छिन्नचिदानन्दविश्रान्तः प्रसरद-

१. (क) परात्रिंशिका तत्वसंदोह, (ख) प्र०हृदय, (ग) तन्त्रालोक, (घ) वरिवस्या०
२. वरिवस्यारहस्यम् ३-४. 'जन्ममरणविचार'