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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 530 में से

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पृष्ठ 114

१२ वरिवस्यारहस्ये
(८।३।१५)¹ यह स्वाभाविकी है—‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान
बलक्रिया च ॥’
‘स्फुरत्ता’ = स्फुरणात्मिका । स्फुरणरूपा । शक्ति स्फुरणात्मिका है । ‘यदा
सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी । स्फुरत्तात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥’²
‘स्फुरत्ता’ का क्या अर्थ है? शक्ति सृष्टिरूपा है अतः पराशक्ति का विश्वसर्जन
व्यापार ही ‘स्फुरत्ता’ कहलाता है—‘विश्वसर्जनमेव पराशक्तिः स्फुरत्ता, तस्याः
सृष्टिरूपत्वात् ॥’³ ‘सेयं स्फुरतारूपा सृष्टिरेव क्रिया कृतिः यत्नः ।’⁴ शक्ति में यह
स्फुरता भी नैसर्गिक होती है क्योंकि वह स्वनिष्ठा होती है—‘आत्मनिष्ठां
स्फुरत्ताम्’⁵, ‘सा देवी स्वेच्छयास्वनिष्ठां स्फुरतां यदा पश्यति ।’⁶ स्फुरता भगवती का
अभिधान भी है—‘चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता । स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यं
तदैश्वर्यं परमात्मनः । सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी ॥’⁷
‘विमर्श’— स एव विमृशत्वेन नियतेन महेश्वरः ।
विमर्श एव देवस्य शुद्धेज्ञान क्रिये यतः ॥ (प्र०का०१।८८)
‘पूर्णता प्रत्यभिज्ञा’ में परमशिव की स्वातन्त्र्यलक्षणा, नैसर्गिकी, स्फुरत्तात्मा
पराशक्ति को ही ‘विमर्श’ कहा गया है—
‘नैसर्गिकी स्फुरत्तात्मा विमर्शाख्या परा प्रभोः ।
अक्रमा क्रमरूपेण शक्तिः स्वातन्त्र्यलक्षणा ॥’⁸
विमर्शमयी होने के कारण ही पराशक्ति को विमर्श भी कहा जाता है,
इसीलिए आचार्य क्षेमराज ने ‘प्रत्यभिज्ञाहृदयम्’ में चिति शक्ति को भगवती स्वतन्त्रा,
पराशक्ति, शिवभट्टारिका के साथ ही साथ उन्हें ‘अनुत्तरविमर्शमयी’ भी कहा है—
पराशक्तिरूपा चितिः एव भगवती स्वतन्त्रा, अनुत्तरविमर्शमयी शिवभट्टारिका-
भिन्ना ॥’⁹ परास्वात्मसंवित्ति में ही विमर्शत्व निहित है । ‘परायाः
स्वात्मसंवित्तेर्विमर्शत्वं न्यरूपयत् ॥’¹⁰
१. ‘विमर्श’ भगवान् का मुख्य स्वभाव है—
‘स परमात्मा चिद्रूपो विमर्शाख्ये नैव मुख्यस्वभावेन ।’¹¹
२. ‘विमर्श’ प्रकाश की अन्तर्लीन, वह अनुत्तरा अभिन्न शक्ति है जो कि
समस्त संसार की सृष्टि, स्थिति एवं संहार का मूलाधार है—सकलभुवनोदय
स्थितिलयमयलीला विनोदनोद्युक्तः। अन्तर्लीन विमर्शः पातु महेशः प्रकाशमात्रतनुः ॥¹²
१. शाक्तदर्शनम् (८।३।१५) २. योगिनीहृदय (९)
३. दीपिका (अमृतानन्दनाथ) ४-६. सेतुबन्ध (भास्करराय मखिन्)
७. प्रत्यभिज्ञाकारिका ८. पूर्णता प्रत्यभिज्ञा
९. प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (क्षेमराज) १०. परात्रिंशिका तात्पर्य दीपिका
११. प्र०का० (१।८८) १२. कामकलाविलास