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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 530 में से

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पृष्ठ 108

६ वरिवस्यारहस्ये
क्योंकि शास्त्रों में इसकी पुष्टि भी की गई है—'तस्यां परिणतायां तु न कश्चित् पर
इष्यते ।।'१ श्रुतियों के साथ भी इस कथन का स्वारस्य है—'वाचारंभणं विकारः ।।'
शक्ति एवं शक्तिमान् या उपादान एवं उपादेय दोनों में अत्यन्त अभेद है । यहाँ
उपनिषदादि की भाँति भेदाभेद नहीं है । अतः 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' वाक्य में
सामानाधिकरण्य दिखाकर 'इदं' एवं 'ब्रह्म' में अभेद प्रतिपादित किया गया है ।
'इदं' को 'विवर्त', नहीं कहा गया है । समस्त अद्वैतपरक श्रुतियाँ इसी दृष्टि की
अभिप्रायिका हैं । समस्त मूर्धन्य श्रुतियों एवं तन्त्रों द्वारा अद्वैत का ही प्रतिपादन
किया गया है । जो द्वैतभाव भासमान होता है वह यथार्थ नहीं है, क्योंकि उन
स्थलों में कार्यकारण में भेदांश की कल्पना की गई है ।
'नेह नानास्ति किञ्चन' वाक्य की उक्ति में भी केवल भेदांश का निषेध किया
गया है न कि प्रपञ्च का । 'एकमेवाद्वितीयम्' वाक्य में जिस 'द्वितीय' का निषेध
किया गया है वहाँ भी भेदवत्प्रपञ्चाभाव भी विशेषणाभाव प्रयुक्त मात्र ही है, इसीलिए
'भामती' में, 'हाटकमकुट' ग्रन्थ में भेद का ही हाटकन्यूनसत्ताकत्वं कहा गया है न
कि मकुट का, क्योंकि परिणाम में परिणामी का समानसत्ताकत्व विद्यमान है ।
'मायामात्रमिदं द्वैतम्' कहकर उपनिषदों में द्वैत या भेद का मिथ्यात्व प्रतिपादित
किया गया है । न कि अभेदवान का । इस प्रकार की अनेक युक्तियों द्वारा आचार्य
भास्करराय 'परिणामवाद' की स्थापना करते हैं और कहते हैं कि स्वयं वेद भी
'परिणामवाद' का ही प्रतिपादन करता है 'ततश्च श्रुतेरपि परिणामवाद एव संमतः
सिध्यति ।।'२
भास्करराय कहते हैं कि भगवान् व्यासदेव ने भी 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता-
नुपरोधात्' सूत्र में तथा 'आत्मकृते परिणामात्' सूत्रों में भी परिणामवाद का ही
प्रतिपादन किया है ।३ वेदान्तभाष्यकार भगवान् शङ्कराचार्य ने भी अपने शारीरक
भाष्य एवं उपनिषद-गीता-भाष्यों में विवर्तवाद का समर्थन करते हुए भी
'सौन्दर्यलहरी' में 'परिणामवाद' का ही समर्थन किया है—'मनस्त्वं व्योमस्त्वं' श्लोक
में 'त्वयि परिणतायाम्' कथन द्वारा आचार्य शङ्कर ने स्वाभिमत के रूप में
'परिणामवाद' की ही स्थापना की है 'परिणामवाद एवं स्फुटीकृतः ।।'४
रहस्यनामसहस्र में 'मिथ्याजगदधिष्ठाना' वाक्य द्वारा जो जगन्मिथ्यात्व का
प्रतिपादन किया हुआ दिखाई पड़ता है वह मिथ्यात्व-प्रतिपादन नहीं है प्रत्युत वह
स्वानतिरिक्तरूपत्व का कथन मात्र है । 'जगत'—घटादिरूपेण अनित्य है किन्तु
ब्रह्मरूपेण नित्य है । मृत्तिका एवं घट में अभेद तो है किन्तु मृत्तिका में घटरूपेण
ध्वस्तत्व है किन्तु घट की मृत्तिका के रूप में अपनी सत्ता अध्वस्त है ।५
प्रकाश—'परमशिव' प्रकाश है और 'विमर्श' उसका स्वस्वभाव है । वह
प्रकाशात्म है इसीलिए 'प्रकाश' है । अनावृत्तात्मस्वरूप ज्योति ही 'प्रकाश' है ।
१. वामकेश्वर तन्त्र २-४. प्रकाश
५. शाम्भवानन्दकल्पलता (प्रकाश में उद्धृत)