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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

लोहाधिकरण ] [ ३६
तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दुशक्तिस्सोमकाख्या नवोत्तरशतात्मिका ॥ १११ ॥
सूर्यकिरणवर्ग में मार्तण्ड और भूतों से उत्पन्न शक्तियों में ७१वीं शक्ति मार्तण्ड की अम्बरा है,
रुचिका नामक भूतशक्ति १६०वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केतरूप से 'ओ' अक्षर में दिखलाई हैं, तथा
अदितिगर्भ में स्थित सूर्यनक्षत्रों में सुन्दारूय नौवीं शक्ति आदित्य की वैसी ही नक्षत्र की शक्ति भौमाख्य
१०१ कही, ये दोनों शक्तियां यहां 'म' अक्षर से वर्णित करी हैं। वैसे ही ध्रुव वर्ग में स्थित सोमवाडब
शक्तियों में इन्दु-चन्द्रमा की शक्ति सोमनाम १०९वीं कही है ॥ १०७-१११ ॥
तथैव वाडवाशक्तिमेलनारूया चतुर्दशी ।
इमो साङ्केतिकादत्र विसर्गै सन्निरूपिते ॥ ११२ ॥
एव चत्वारि वर्गस्थशक्तयस्ता परस्परम् ।
खनिजाना गर्भकोशे मिलित्वा कालपाकतः ॥ ११३ ॥
सोमजातीयलोहत्व प्राप्नोत्येव† न सशय ।
आह्वत्याष्टौ शक्तयोस्मिन् विचारे सम्प्रदृश्यन्ते ॥ ११४ ॥
एवमुक्त्वा सोमलोहशक्तिसङ्केतनिर्णयम् (य ?)
अथ सोण्डाललोहस्य शक्तिसङ्केतमुच्यते ॥ ११५ ॥
कूर्मस्थधनदा नाम शक्तिरेकादशात्मिका ।
क्रमात् साङ्केतिकादत्र सकारेणाभिवर्णिता ॥ ११६ ॥
वैसे ही वाडवाशक्तिमेलन नामक १४वीं है, ये दोनों शक्तियां सङ्केत से यहां विसर्ग ' : ' से
निरूपित की हैं । इस प्रकार चार वर्गों में स्थित शक्तियां परस्पर खनिजों गर्भकोशों में मिलकर कालपाक
से सोम जाति के लोहपन को प्राप्त हो जाती हैं इसमें संशय नहीं । आठों शक्तियां मिलकर इस विचार
में दिखलाई पड़ती हैं । इस प्रकार सोम लोहशक्तियों के सङ्केत का निर्णय कहकर अब सोण्डाल लोह
की शक्तियों का सङ्केत निर्णय कहा जाता है। कूर्मस्थ धनदा-कुबेरों की शक्ति ११वीं है (११ रूपों में
है ) सङ्केत से यहां 'स' अक्षर से कही है ॥ ११२-११६ ॥
ऋङ्नामा काश्यपी शक्तिर्दशोत्तरशतात्मिका ।
पूर्ववत्सङ्केतिता स्यादौकारेण यथाक्रमम् ॥ ११७ ॥
शक्तिर्द्रवमुखी नाम मार्तण्डस्य शतात्मिका ।
आण्वी नाम तथा भूतशक्तिस्सप्तशतात्मिका ॥ ११८ ॥
द्वाविमौ साङ्केतिते चात्रानुस्वारेण शाश्वत. ।
सूर्यस्यैकोनपञ्चाशच्छक्ति. कान्ताभिधा तथा ॥ ११९ ॥
नक्षत्राणा पञ्चविंशच्छक्तिर्वर्चोभिधानका ।
उभो साङ्केतिते चात्र डकारेण यथाक्रमम् ॥ १२० ॥
† प्राप्नोति—एकवचनं' वचनव्यत्ययेन बहुवचने ।

४० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तथैव ध्रुववर्गस्थसोमवाडवशक्तितु ।
इन्दोश्चतुष्षष्ट्युत्तरत्रिशता शक्तिरुज्ज्वला ॥ १२१ ॥
साङ्केतिका डकारोपर्य्याकारेणात्र शाश्वत ।
वाडवाया पञ्चशतशक्ति कालाभिधा तथा ॥ १२२ ॥
ऋक् नाम वाली काश्यपी शक्ति ११० प्रकार की पूर्व की भांति संकेतित कर दी है 'औ' अक्षर
से यथाक्रम । मार्तण्ड की द्रवमुखी शक्ति १०० रूपों वाली, आश्वीनामक भूतशक्ति १०५ रूपोंवाली है इस
प्रकार ये दोनों शक्तियां यहां अनुस्वार ‘ ’ से संकेतित की हैं, सूर्य को ४६ शक्तियां कान्ता नाम की है,
नक्षत्रों की २५ शक्तियां वर्चानामवाली हैं दोनों सांकेतित हैं 'ड' अक्षर से यथाक्रम । वैसे ही ध्रुववर्ग में
स्थित सोमवाडव शक्तियों में चन्द्रमा की ३६४ उज्ज्वल हैं, डकार के ऊपर 'आ' अक्षर सांकेतित किया
है, वाडवा की ५०० शक्तियां कालनामक—॥ ११७–१२२ ॥
साङ्केतिता लकारेण वर्णसङ्केतनिर्णये ।
एवमुक्त्वा सोण्डालसकेतशक्ती यथाविधि ॥ १२३ ॥
इदानी मौर्त्विकलोहशक्तिसङ्केतमुच्यते ।
त्रिशतोत्तरसहस्रसख्याका पार्थिवाभिधा ॥ १२४ ॥
कूर्मशक्तिर्मकारेण पुनस्साङ्केतिता तथा ।
एकोत्तरद्विसहस्रसंख्याका कालाभिधा ॥ १२५ ॥
सङ्केतिता काश्यपस्य शक्तिरोकारतस्तथा ।
षष्ट्युत्तरद्विशतसख्याका लाघवाभिधा ॥ १२६ ॥
'ल' अक्षर से वर्णसंकेतनिर्णय में साङ्केतित करदी है। इस प्रकार मौण्डाल शक्तियों को
यथाविधि कहकर अब मौर्त्विक लोहशक्तियों का संकेत कहा जाता है। १३०० शक्तिया पार्थिव नामवाली
कूर्मशक्ति 'म' अक्षर से संकेतित की है पुनः २००१ कालनामक काश्यप की शक्ति संकेत की है 'ओ' अक्षर'
से, तथा २६० लाघवनाम की—॥ १२३–१२६ ॥
मार्तण्डशक्तिस्सङ्केताद्वयर्णेन निरूपिता ।
सप्तत्रिंशतिसख्याका वर्चुलीनामिका तथा ॥ १२७ ॥
भूतशक्तिस्तकारेण सङ्केतात् सन्निरूपिता ।
त्रिषष्ट्युत्तरसहस्रसंख्याका रुक्मकाभिधा ॥ १२८ ॥
नक्षत्रशक्तिस्सङ्केताद् वकारेणात्र वर्णिता ।
त्रयोदशोत्तरशतसंख्याका वरुणाभिधा ॥ १२६ ॥
अर्कशक्तिरिफारेण सङ्केतान्निरूपिता तथा ।
नवोत्तराष्टसहस्रसंख्याका रुजकाभिधा ॥ १३० ॥
निरूपितात्र सङ्केतादिन्द्रशक्ति ककारत ।
द्वादशोत्तरसहस्रसंख्याका पूर्णिकाभिधा ॥ १३१ ॥

लोहाधिकरण ] [ ४१
मार्तण्डशक्ति संकेत से 'र' अक्षर से निरूपित की है, ३७ वचुंली नामक भूतशक्ति 'त' अक्षर
संकेत से निरूपित की है। १०६३ ऋक्षमका नामक नक्षत्र शक्ति संकेत से 'व' अक्षर से यहाँ वर्णित है ।
११३ वरुण नामक अर्क शक्ति 'इ' अक्षर संकेत से रुजका नामक निरूपित की है, इन्दु-चन्द्रशक्ति 'क'
अक्षर से १०१२ पूषिण्का नाम वाली कही है ॥ १२७-१३१ ॥
संकेतितानुसारेण तथैवात्र यथाक्रमम् ।
एव त्रिलोहशक्तीना वर्णांसंकेतनिर्णयम् ॥ १३२ ॥
निरूप्य तल्लोहशुद्धिक्रममत्र तत परम् ।
प्रसङ्गानुप्रसङ्गत्या किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ १३३ ॥ इति
संकेतों के अनुसार वैसे ही यहां यथाक्रम इस प्रकार तीन लोहों की शक्तियों के अक्षर संकेत-
निर्णय निरूपित करके उससे आगे उन लोहों की शुद्धि यहां प्रसङ्गानुप्रसङ्ग से कुछ निरूपित की
जाती है ॥ १३२-१३३ ॥
तच्छुद्धिर्र्यथाशोधनाधिकारे ॥ अ० १ सू० १४ ॥
बो० वृ०
तल्लोहशुद्धिं निर्णेतुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
पदानि त्रीणि सूत्रेऽस्मिन् कथितानि यथाक्रमम् ॥ १३४ ॥
तेष्वादिमपदाल्लोहत्रयशुद्धिनिरूपिता ।
तच्छोधनप्रकारस्तु द्वितीयपदत स्फुटम् ॥ १३५ ॥
तत्प्रबोधकशास्त्र तु तृतीयेनात्र सूचितम् ।
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ १३६ ॥
सस्कारदर्पणविधिमनुसृत्य यथामति ।
सोमसोण्डालमौक्तिकलोहाना शुद्धिनिर्णयं ॥ १३७ ॥
उन लोहों की शुद्धि के निर्णय को यह सूत्र कहा गया है, इस सूत्र में तीन पद यथाक्रम कहे
हैं उनमें आदिम पद से तीन लोहों की शुद्धि निरूपित की है उनका शोधन प्रकार तो दूसरे पद से
स्फुट किया है उनका प्रबोधक शास्त्र तो तीसरे पद से यहां सूचित किया है । पदों का अर्थ इस प्रकार
कहा है विशेष अर्थ अथ कहा जाता है । सस्कार दर्पणविधि का अनुसरण करके यथामति सौम सोण्डाल
मौक्तिक लोहों की शुद्धि का निर्णय करते हैं ॥ १३४-१३७ ॥
पृथक् पृथग्विधानेन सग्रहात् सन्निरूप्यते ।
तत्रादौ सोमलोहस्य शोधनाक्रममुच्यते ॥ १३८ ॥
सोमलोह समाहृत्य पाचके सम्प्रपूरयेत् ।
सप्तविंशतिकक्ष्योष्णवेगात् सम्पाचयेद् द्रवात् ॥ १३६ ॥
जम्बीरलिकुचव्याघ्रिचाङ्गेरीजम्बूरसैस्तथा ।
विवृतास्येन नालयन्त्रे पाचयेद् दिवसावधि ॥ १४० ॥

४२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तत् सङ्गृह्याथ विधिवत् क्षालयित्वा तत परम् ।
पञ्चतैलेश्चतुर्द्रवै काषायैस्सप्तभिस्तथा ॥ १४१ ॥
पृथक् पृथग् गालयित्वा लोहं पश्चात् समाहरेत् ।
जो कि पृथक् पृथक् विधान से संक्षेप से निरूपित किया जाता है । उनमें प्रथम सोम लोहे
के शोधन क्रम को कहा जाता है, सोम लोहे को लेकर पाचक यन्त्र में भर दे २७ दर्जे के उष्ण वेग से
पकावे द्रव से जम्बीरी निम्बू, लिकुचलटलथडल, व्याघ्र—करञ्जवा या लाल एरण्ड, चिञ्चा—इमली,
जम्बू—जामुन के रसों से विस्तृत मुख वाले नांलयन्त्र से दिन भर पकावे उसे विधिवत् लेकर धोकर पांच
तैल्रों में चार द्राव—टङ्कण द्राव आदि से सात काढ़ों से पृथक् पृथक् लोहे को गलाकर लेले ॥१३८-१४१॥
तदुक्तं दर्पणप्रकरणे—वह कहा है दर्पण प्रकरण में—
गुञ्जा कञ्जलचञ्चुकुञ्जरकरञ्जादितैलेस्तथा ।
प्राणक्षारविरञ्चिकञ्चुकिखुरद्रावैश्च शुद्धे क्रमात् ॥
हिङ्गूपर्पटिघोटिकावरजटामासी विदाराराङ्गिणी ।
मत्स्याक्षीरवररक्तकण्टकुवररीकाषायतश्शोधयेत् ॥
गुञ्जा—घूंघची, कञ्जल ?—कञ्जर—आंवला, चञ्चु—एरण्ड, कुञ्जर—पीपल या कण्टकुचई ?,
करञ्ज—करञ्जवा आदि के तैलों से प्राणक्षार–नौसादर†, विरञ्चि ?–सज्जी क्षार ? कञ्चुकि-यव—यवक्षार,
खुरक्षारसे शुद्ध हुए । हींग, पर्पटि–पर्पटी पद्मावती सुगन्धद्रव्य, घोटिका–सुपारीफल, जटामांसी—बालछड़,
विदाराराङ्गिणी ?—विदारण—कनिगर गन्ध वृत्त या बिदारीकन्द ?, मत्स्याक्षी—मछेली, रक्तकण्ठकुवरी—
लाल रंग का थूहर के काढ़ों से शोधे ॥
एवमुक्त्वा सोमलोहशुद्धिक्रममत परम् ।
सोण्डालारुख्यलोहस्य शोधनक्रममुच्यते ॥ १४२ ॥
पाचनादिक्रियास्सर्वनालयन्त्रान्तमादरात् ।
सोण्डालस्य यथाशास्त्रं कर्तव्यं सोमलोहवत् ॥ १४३ ॥
द्रवकाषायतैलादिसंस्कारो भिद्यते क्रमात् ।
षड्द्रावैस्सप्ततैलेश्च काषायै पञ्चभिस्तथा ॥ १४४ ॥
प्रत्येकं गालयेत् तै. पश्चात्ल्लोहं समाहरेत् ।
इस प्रकार सोम लोह के शुद्धिक्रम को कह कर उससे आगे सोण्डाल लोहे का शोधन कहा
जाता है । सोण्डाल की पाचन आदि क्रिया सब नांलयन्त्र तक की ठीक सोम लोहे की भांति यथाशास्त्र
कहनी चाहिये । द्रव काषाय तैल आदि संस्कार ही भिन्न होता है, ६ द्रवों ७ तैल्रों ५ कषायों से प्रत्येक
को गलावे फिर लोहे को ले ले ॥ १४२-१४४ ॥
उक्तं हि संस्कारदर्पणे—कहा ही है संस्कारदर्पण में—
इ गालगौरीसुवराटिकास्तथा मुद्रीरताप्योल्वणशुद्धतैले. ।
तथैव चाङ्कोलसुमुष्टिषल्ल भल्लातकाकोलविरञ्चकद्रवैः ॥
† नूसार या नरसार प्राण है, प्राणनामक क्षार या प्राणो का क्षार है मूत्र, अत प्राण क्षार मूत्र क्षार—
"नूसार, नरसारः, (नोसादर) लोहद्रावकस्तथा" (रसरत्नारङ्गिणी) ।

लोहाधिकरण ] [ ४३
कुलित्थनिष्पावकसर्षपाढकगोधूमकाषायकाञ्जिकैश्च ।
सशोषयेत् सौण्डालिकलोहदोष शास्त्रोक्तमार्गेण शनैश्शनै क्रमात् ।। इति
इङ्गल—इंगुदी, गौरो—मजीठ, सुराटिका—वराटिका—कौड़ी, मृद्वी—मुनक्का
से पूर्ण तेलों से तथा अङ्कोल—अङ्कोलवृक्ष--ढेरा, मुष्टि घण्टा—पाटलावृक्ष, शङ्ख, भिलावा, काकोल—
काकोली, विरञ्चक ? द्रवों से कुलित्थ—लालकुलथी, निष्पावक—श्वेतान्नफली, सरसों, अरहर, गेहूँ के
कषायों और काञ्जियों से शास्त्रोक्त मार्ग से सौण्डाल लोहे के दोषों को धीरे धीरे क्रम से शोधे ॥
उक्त्वा सौण्डालशुद्धिरेव शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी मौर्त्विकाख्यलोहशुद्धिक्रमोच्यते ॥ १४५ ॥
तैलद्रावककाषायत्रयैस्सम्यक् सुशोधयेत् ।
सौण्डालवत् पाचनादिक्रियाश्चास्यापि वर्णिता ॥१४६॥
सौण्डालशुद्धि इस प्रकार शास्त्रानुसार कह कर अब मौर्विक लोहे की शुद्धि का क्रम तैलद्रावक
काषायों से सम्यक् सौण्डाल की भाँति शोधन पाचन आदि क्रिया भी उसकी कही हैं ॥ १४५-१४६ ॥
तदुक्तं संस्कारदर्पणे--यह कहा है संस्कारदर्पण में—
शिवारितैलात् कुडुपस्य द्रावकाद् विषम्भरीचर्मकषाायतस्तथा सशोषये-
न्मौर्त्विकलोहज मल शास्त्रोक्तमार्गक्रमतो विशेषत ॥ इत्यादि ॥
एव सशोध्य मौर्त्विकलोह पश्चात् समाहरेत् ।
सस्कार बीजलोहानामेवमुक्त्वा यथाविधि ॥ १४७ ॥
अथेदानीमूष्मपानामुत्पत्तिक्रममुच्यते ॥
शिवारि तैल ? से, कुडुप ? के द्रावक से, विषम्भरी चर्म—विषम्भरी छाल ? के काषाय से
सशोचन करे मौर्तिक लोहज मल को शास्त्रोक्त मार्गक्रम से शोध कर लें । बीज लोहों का संस्कार इस
प्रकार यथाविधि कहकर अब ऊष्म लोहों का उत्पत्तिक्रम कहा जाता है ॥ १४७ ॥

फोटो कापी ( पूना ) संख्या १ वस्तुतः कापी सख्या ३—
अथोष्मपोत्पत्तिनिर्णयः —अब ऊष्मप लोहों की उत्पत्ति का निर्णय देते हैं—
ऊष्मपास्त्रिलोहमयाः ॥ अ० २ । सू० १ ॥
बो० वृ०
ऊष्मपा इति ये प्रोक्ता पूर्वं*यानक्रियाविधौ ।
तेषा स्वरूपं निर्णेतुं सूत्रेऽद्य परिकीर्तित ॥ १ ॥
पदद्वय भवेदस्मिन्नूष्मलोहप्रबोधकम् ।
तत्रादिमपदाद् यानलोहास्सूचिता क्रमात् ॥ २ ॥
द्वितीयपदतस्तेषा स्वरूपार्थास्तथैव हि ।
ऊष्मनामोष्णमित्याहुरादित्यकिरणोद्भवम् ॥ ३ ॥
ये पिबन्ति स्वभावेन ते प्रोक्ता ऊष्मपा इति ।
सोमतौण्डालमौर्त्विकास्त्रिलोहेत्यत्र‡ वर्णिता ॥ ४ ॥
तेषा लोहत्रयाणा तु समाहारोत्र वर्णित ।
तल्लोहयोगजन्यत्वाद् विकारार्थे मयट् स्मृत ॥ ५ ॥
ऊष्मप जो पूर्व विमान यान क्रियाविधि में कहे हैं उनका स्वरूप निर्णय करने को यह सूत्र
कहा है । इसमें ऊष्म लोहे के प्रबोधक दो पद हैं, उनमें आदिम पद से विमान यान के लोहे सूचित
किये हैं द्वितीय पद से उनके स्वरूप आदि कहे हैं । ऊष्म नाम सूर्य किरणों से उत्पन्न उष्ण—उष्णत्व
को कहते हैं उसे जो स्वभाव से पीते हैं ऊष्मपा कहे गये हैं । सोम, सौण्डाल, मौर्त्विक ये तीन लोहे
यहां कहे हैं । उन तीनों लोहों का यहां समाहार वर्णित किया है, उन लोहों से उत्पन्न होने वाला - बनने
वाला होने से विकारार्थ में मयट् प्रत्यय कहा गया है ॥ १-५ ॥
यस्मात् त्रिलोहवर्गीयलोहसयोगत क्रमात् ।
प्रभवन्त्यूष्मपास्तस्मात् तन्मया इति कीर्तिता ॥ ६ ॥

  • 'पूर्वं' शब्दः प्रथमाध्याय मपेक्ष्यात्र द्वितीयाध्याय सूचयति ।
    ‡ लोहा इत्यत्र=लोहेत्यत्र एकादेश आर्षः ।

लोहाधिकरण ] [ ४५
पदार्थमेव कथित विशेषाथोऽधुनोच्यते ।
सोमसौण्डालमौक्तिकवर्गजाश्शास्त्रतः क्रमात् ॥ ७ ॥
ऊष्मपाणा(ना ?) बीजलोहास्त्रयस्त्रिंशदितीरिता ।
जिससे त्रिवर्गीय लोहों के संयोग से क्रमश ऊष्मप तैयार होते हैं अतः तन्मय—त्रिलोहमय
कहे गये हैं। पदों का अर्थ कह दिया विशेषार्थ कहा जाता है सोम, सौण्डाल, मौक्तिक वर्ग में होने
वाले लोहे शास्त्र से क्रमश ऊष्म लोहों के बीज लोहे ३३ कहे हैं ॥ ६-७ ॥
उक्तं हि लोहरत्नाकरे—कहा ही है लोहरत्नाकर पुस्तक में—
ऊष्मपाना बीजलोहास्त्रयस्त्रिंशदितीरिता ॥ ८ ॥
सोमसौण्डालमौक्तिकवर्गभेदाद् यथाक्रमम् ।
एकैकवर्गसङ्क्लृप्तलोहा एकादश क्रमात् ॥ ६ ॥
तेषा नामानि नामार्थकल्पोक्तानि यथाक्रमम् ।
सङ्गृह्यात्र प्रवक्ष्यामि सग्रहेण यथामति ॥ १० ॥
ऊष्मप लोहों के बीज लोहे ३३ कहे हैं, सोम; सौण्डाल, मौलिक वर्ग भेद से यथाक्रम एक
एक वर्ग से सम्बन्धित लोहे क्रम से ११ हैं। उनके नाम नामार्थकल्प ग्रन्थ में कहे यथाक्रम ( वहा से )
लेकर संक्षेप से यहा यथामति कहूँगा ॥ ८-१० ॥
सोमस्सौम्यक्सुन्दास्यस्सोम पञ्चाननोष्मप ।
शक्तिगर्भो जाङ्गलिक प्राणनश्शङ्खलाघव ॥ ११ ॥
इत्येकादशनामानि शक्तिसंकेतवर्णाके ।
सोमवर्गीयलोहाना प्रोक्तान्यत्र यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
विरञ्चिसौर्यपश्शङ्कुरुष्णसूरणशिञ्जिका ।
कङ्कुरञ्जिकसौण्डीरमुग्धघुण्डरकस्तथा ॥ १३ ॥
इत्येकादशनामानि शास्त्रोक्तान्यत्र पूर्ववत् ।
मोण्डीरवर्गलोहाना सम्प्रोक्तानि यथाक्रमम् ॥ १४ ॥
अणुकश्च द्व्यणुक कङ्कुश्चत्र्यणुकश्श्वेताम्बर ।
मुदम्बरो बालगर्भंकुवचं कण्टकास्तथा ॥ १५ ॥
सोम, सौम्यक, सुन्दास्य, सोम, पञ्चानन, ऊष्मप, शक्तिगर्भ, जाङ्गलिक, प्राणन, शङ्खलाघव ये
११ नाम शक्ति संकेत के रंगों से युक्त सोम वर्ग बाले लोहों के यथाक्रम कहे है । विरञ्चि, सौर्यप, शंकु,
उष्ण, सूरण, शिञ्जिक, कंकु, रञ्जिक, सौण्डीर, मुग्ध, घुण्डारक, ये ११ नाम यथाक्रम सौण्डीर (सौण्डाल)
वर्ग वाले लोहों के हैं। अणुक, द्व्यणुक, कङ्कु, त्र्यणुक, श्वेताम्बर, मुदम्बर, बालगर्भ, कुवर्च,
कण्टक ॥ ११-१५ ॥
दिव्यङ्गलधिक इत्येकादशनामानि पूर्ववत् ।
मौक्तिकवर्गलोहानामुक्तान्यत्र यथाक्रमम् ॥ १६ ॥

४६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
त्रयस्त्रिंशद्बीजलोहा एवं वर्गत्रयास्स्मृता ।
पूर्वोक्तलोहत्रयशक्तय एव स्वभावत' ॥ १७ ॥
तन्मयत्वात् त्रयस्त्रिंशद्बीजलोहेष्वपीरिता ।
एवमुक्त्वा बीजलोहस्वरूप शास्त्रत स्फुटम् ॥ १८ ॥
अथ तेषा गालनार्थ मेलनक्रममुच्यते ।
श्च्विङ्क, लध्विक, ये ११ नाम पूर्ववत् मौर्विक वर्ग लोहों के यथाक्रम यहा कहे हैं । ३३ बीज
लोहे के हैं इस प्रकार तीन वर्ग कहे गए । पूर्वोक्त तीन लोहों की शक्तिया स्वभावत तन्मय—त्रिलोह-
मय होने से ३३ बीज लोहों में भी कही गई है । इस प्रकार बीज लोहों का स्वरूप शास्त्र से स्फुट है,
अब उनके गलाने के लिए मेल का क्रम कहते हैं ॥ १६–१८ ॥
मेलनात् ॥ अ० २ सू० २ ॥
बो० वृ०
पूर्वोक्तबीजलोहाना तत्तद्भागाशत क्रमात् ॥ १९ ॥
संयोजनक्रम वक्तुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
त्रिवर्गेष्वेकैकलीह तत्तत्संख्यानुसारत ॥ २० ॥
ऊष्मलोहोत्पत्तिविधौ मूषाया योजयेदिति ।
सङ्कीर्त्यतॆत्र तत्तद्भागसंख्याविधिनिर्णयं ॥ २१ ॥
पूर्वोक्त बीज लोहों के उस उम भागाश से क्रम से सयोग कम - मेलक्रम कहने को यह सूत्र
कहा है । तीन वर्गों मे से एक एक लोहे को उस उसकी संख्या के अनुमार ऊष्म लोहे की उत्पत्तिविधि
के अर्थ उसे मूषा-कृत्रिमविशेष बोतल में डालदे इस विषय में उस उस भाग की सख्याविधि का निर्णय
यहा कहा जाता है ॥ १६–२१ ।
तदुक्त लोहतन्त्रे—वह कहा है लोहतन्त्र में—
अथेदानोमूष्मपानामुत्पत्तिक्रमनिर्णये ।
सर्वेषा बीजलोहाना शास्त्रोक्तविधानात् ॥ २२ ॥
लोहानुसारतस्तेषा भागसंख्या विधीयते ।
ऊष्मपेष्मम्भराख्यलोहोत्पत्तिक्रियाविधौ ॥ २३ ॥
सौमसौण्डालमौर्विकलोहवर्गत्रये क्रमात् ।
एकत्रिसप्तलोहाशान् त्रद्य षट्चूर्णमिश्रितान् ॥ २४ ॥
मूषाया योजयेत् सम्यग् दशपञ्चाष्टसख्यकान् ।
ऊष्मपेष्मोत्पत्तिविधाने शास्त्रत क्रमात् ॥ २५ ॥
चतुरैकाष्टलोहाशान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ।
त्रिपञ्चसप्तसख्याकान् मूषाया मेलयेत् सुधी. ॥ २६ ॥

लोहाधिकरण ] [ ४७
तथैवोष्णहनोत्पत्तौ त्रिवर्गेषु यथाक्रमम् ।
द्विपञ्चनवलोहभागान् षट्त्रिसप्तकन् ॥२७॥
अब ऊष्मप लोहों के उत्पत्तिक्रम निर्णय में सब बीज लोहों का शास्त्रोक्त विधान
से लोहानुसार उनकी भागसंख्या विधान की जाती है। ऊष्मपों में ऊष्मम्भरनामक लोहे की उत्पत्ति-
क्रियाविधि के निमित्त सौम सौडाल मौक्तिक तीनों लोहवर्गों में क्रम से १, ३, ७ लोहांशों को ३ अंश-
टङ्कण-सुहागा मिले हुओं को मूषा-मिट्टी आदि से बनी बोतल में युक्त करके १०, ५, ८ संख्यावालों को
ऊष्मपों के उत्पत्ति विधान में शास्त्र से क्रम से ४, १, ८ लोहांशों को तीन वर्गों में सुहागा कम से
३, ५, ७ भाग संख्या वालों को मूषा-बोतल में बुद्धिमान् मिलादे इसी प्रकार उष्णघातक की उत्पत्ति
में तीन वर्गों में यथाक्रम २, ५, ६ लोहांशों को तथा ६, ३, ७ भागों में- ॥ २२-२७ ॥
टङ्कणेन सुसंयोज्य मूषायां मेलयेत् ततः ।
राजाख्योष्मपलोहोत्पत्त्यर्थं शास्त्रविधानतः ॥ २८ ॥
त्र्यष्टद्विलोहभागान् टङ्कणेन समन्वितान् ।
मूषायां पूरयेत् पश्चात् त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ॥ २९ ॥
तथैवाम्लूट्टुत्पत्तावूष्मपेषु यथाक्रमम् ।
नवमसर्जकलोहान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ॥ ३० ॥
दशसप्तष्टसंख्याकान् मूषायां सन्नियोजयेत् ।
तथैव वीरहाख्योष्मपलोहोत्पत्तिनिर्णये ॥ ३१ ॥
षट्चतुःपञ्चलोहान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ।
तारबाणार्कसंख्याकान् मूषायां सम्प्रपूरयेत् ॥ ३२ ॥
-टङ्कण-सुहागे से युक्त कर मूषा-बनी बोतल में मिलादे, राजाख्योष्मप लोहे की उत्पत्ति के अर्थ
शास्त्रविधान से सुहागे सहित ३, ८, २ लोहे भागों को मूषा में भर दे पश्चात् तीनों वर्गों में भी
पूर्व की भांति तथैव अम्लूट्टु ? -घोलद्राव को पी लेने वाली शक्ति की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथा-
क्रम ६, ७, १ लोहांशों को तीन वर्गों में तथा सुहागा १०, ७, ८ संख्या में मूषा में डाल दे, तथा वीरहा-
नामक ऊष्म लोहे की उत्पत्ति के निर्णय में ६, ४, ५ लोहांशों को तीन वर्गों में ५, ५, १२ भाग संख्या
सुहागे को मूषा में भर दे ॥ २८-३२ ॥
पञ्चघ्नाख्योष्मपोत्पत्तौ त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ।
अष्टषट्चत्वारिलोहभागान् टङ्कणान्वितान् ॥ ३३ ॥
विशाष्टादशषड्विंशन्मूषायां सन्नियोजयेत् ।
ऊष्मपेष्वग्निकृद् सृष्ट्या त्रिवर्गेषु यथाक्रमम् ॥ ३४ ॥
पञ्चद्विदशलोहाशान् त्रिंशद्दिशदशान्वितान् ।
मूषायां मेलयत् सम्यक् टङ्कणेन समाकुलान् ॥ ३५ ॥
एव भारहनोत्पत्तौ चोष्मपेषु यथाक्रमम् ।
सप्तैकादशषड्लोहभागान् टङ्कणान्वितान् ॥३६॥

४८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
तारभाम्बोधिसंख्याकान् त्रिवर्गेषु यथाविधि ।
मूषाया मेलयेत् सम्यग्गालनार्थमत परम् ॥३७॥
तथा शीतहनोत्पत्तावूष्मपेषु यथाक्रमम् ।
दशनवत्रिलोहाशान् त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ॥३८॥
मूषाया मेलयेत् सम्यग् द्वाविंशाष्टदश क्रमात् ।
एकादशदशैकादशलोहाशान् यथाक्रमम् ॥३६॥
गरलहनोष्मपोत्पत्तौ त्रिवर्गेष्वपि पूर्ववत् ।
विशत्ित्रशाष्टसंख्याकान् मूषाया मेलयेत् सुधी ॥४०॥
पक्षघ्न नामक ऊष्मप की उत्पत्ति में तीन वर्गों में पूर्व की भांति ८, ६, ४ लोहभागांशों को
२०, १८, ६ भाग सुहागे सहित मूषा में डाल दे । ऊष्मप लोहों में अग्नितूट् सृष्टि-उत्पत्ति में तीन वर्गों
में यथाक्रम ५, २, १० लोहांशों को ३०, २०, १० भाग सुहागा से युक्त हुओं को मूषा में मिला दे । इसी
प्रकार भारहन की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथाक्रम ७, ११, ६ लोहे के भागांशों को ५, १२, ७ संख्या-
वाले सुहागे के भागों को तीन वर्गों में यथाविधि मूषा में गलाने के अर्थ मिलावे, तथा शीतहन लोहे
की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथाक्रम १०, ६, ३ लोहांगों को तीन वर्गों में पूर्व की भांति मूषा मे
मिलावे २२, ८, १० क्रम से (टङ्कण-सुहागा) मिलावे । ११, १०, ११ लोहांशों को यथाक्रम गरलघ्न
ऊष्मप की उत्पत्ति में तीनों वर्गों में पूर्व की भांति २०, ३०, ८ संख्यावालों को मूषा में बुद्धिमान
मिलावे ॥३३--४०॥
एवमाम्लहनोत्पत्त्यामूष्मपेषु यथाविधि ।
एकादशाष्टचत्वारिलोहभागान् सटङ्कणान् ॥४१॥
त्रिवर्गेष्वपि विंशाष्टादशषट्त्रिंशत्कान्तत ।
मूषाया पूरयेत् सम्यगिति शास्त्रविनिर्णय ॥४२॥
तथा विण्मभरोत्पत्त्यामूष्मपेषु तथैव हि ।
पञ्चसप्ताष्टलोहाशान् त्रिवर्गेषु सटङ्कणान् ॥४३॥
एकोनविशाष्टदशमूपाया मेलयेत् क्रमात् ।
विशल्यकृल्लोहसृष्ट्यामूष्मपेषु तथैव हि ॥४४॥
मूषया पूरयेत् सम्यग् विशद्द्वादशषट्क्रमात् ॥४५॥
द्विजमित्रोत्पत्तिविधावूष्मपेषु तथैव हि ।
अष्टत्रिनवलोहाशान् त्रिवर्गेषु यथाक्रमम् ॥४६॥
ताराष्टदशसंख्याकान् मूषाया मेलयेत् सुधी ।
तथैव वातमित्राल्योष्मपलोहक्रियाविधौ ॥४७॥
त्रिवर्गेष्वष्टषट्पञ्चलोहाशान् टङ्कणान्वितान् ।
मूषाया मेलयेत् सम्यग् द्वाविंशाष्टदशक्रमात् ॥४८॥

मूषाधिकरण ] [ ४६
एवमुक्त्वा बीजलोहमेलनादीन्यथाक्रमम् ।
अथेदानों गालनार्थं मूषालक्षणमुच्यते ॥४६॥
इस प्रकार आम्लहन लोह की उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में यथाविधि ११, ८, ४, लोहभागों
की तीन वर्गों में से सुहागा २०, १२, ३६ भागों को मूषा-बोतल में भली प्रकार भर दे यहां शास्त्रनिर्णय
है, तथा विश्वम्भर की उत्पत्ति में ५, ७, ८ ऊष्म लोहांशों को तीन वर्गों में सुहागा १६, ८, १० भाग
मिला दे । विशल्यकृत् लोह की सृष्टि-उत्पत्ति में ऊष्मप लोहों में ३, ५, ११ लोह भाग और २८, १२, ६
भाग सुहागासहित मूषा में भरे । द्विजमित्र की उत्पत्तिविधि में ऊष्मप लोहों में ८, ३, ६ लोहांशों को
तीन वर्गों में से यथाक्रम ५, ८, १० (सुहागा) मूषा में बुद्धिमान् मिलावे । तथा वातमित्र नामक
ऊष्मप लोहे की उत्पत्ति क्रियाविधिमें तीन वर्गों में ८, ६, ५ लोहांशों को २२, ८, १० भाग सुहागा मूषा-
बोतल में मिलावे। इस प्रकार बीज लोहों के मेल यथाक्रम कहकर अब गलाने के लिये मूषा-
बोतल का लक्षण करते हैं ॥४१-४६ ॥
अथ मूषाधिकरणम् ।
अथ मूषा का अधिकरण प्रस्तुत करते हैं।
पञ्चमाद् द्वितीये ॥ अ० २ सू० ३ ॥
बो० सू०
मूषास्वरूपं निर्णोतुं सूत्रोय परिकीर्तित ।
पदद्वय भवेदस्मिन् मूषानिर्णयबोधकम् ॥५०॥
तत्रादिमपदान्मूषा सङ्ख्या तस्सन्निरूपिता ।
तथैव तद्वर्गसंख्या द्वितीयपदनस्स्फुटम् ॥५१॥
पदार्थमेव कथित विशेषार्थोधुनोच्यते ।
षोडशोष्मलोहानामुत्पत्तौ गालनक्रम ॥५२॥
पूर्वोक्तबीजलोहानामेतस्यामेव दर्शितम् ।
मूषास्वरूप के निर्णय करने को यह सूत्र कहा है, इसमें दो पद मूषानिर्णय के बोधक हैं ।
उनमें आदि पद से मूषा को सख्या से निरूपित किया है, तथा द्वितीय पद से उसकी वर्गसंख्या को
स्पष्ट किया है । पदों का अर्थ इस प्रकार कह दिया अब विशेष अर्थ कहा जाता है । सोलह ऊष्मप लोहों
को उत्पत्ति में गलाने का क्रम पूर्वोक्त बीज लोहों का इसी में कहा गया है ॥ ५०-५३ ॥
तदुक्तं निर्णयाधिकारे—वह कहा है निर्णय अधिकार में—
उत्तमाधममध्यापञ्च शाना गालनविधौ ।
मूषास्सप्तोत्तरचतुश्शतभेदा इतीरिता. ॥५४॥
तासा द्वादशवर्गास्स्युर्जातिनिर्णायत क्रमात् ।
लोहेषु ये बीजलोहास्तेषा गालनकर्मणि ॥५५॥
द्वितीयवर्गोक्तमूषा एव श्रेष्ठा इतीरिता । इत्यादि

५० ] [ बृहद् विमानशास्त्र
उत्तम मध्यम अधम 'लोहादि' अपभ्रंशों के गलाने की विधि में ४०७ भेद से मूषाएं कही
गई हैं। उनके १२ वर्ग जाति निर्णय से हैं, लोहों में जो बीज लोहे हैं उनके गलाने कर्म में द्वितीय वर्ग
में कही मूषाएं श्रेष्ठ हैं ऐसा कहा है ॥ ४५-५५ ॥
लल्लोपि-लल्ल ने भी कहा है-
कृतकापभ्रंशकाश्च स्थलजा खनिजास्तया ।
जलजा धातुजास्तद्वदोषधीवर्गजापि* च ॥५६॥
क्रिमिमासक्षारबालाण्डजलोहा इति क्रमात् ।
उक्त द्वादशधा शास्त्रे लोहतत्त्वविदा वरे ॥५०॥
एतेषा गलने मूषा प्रत्येकं वर्गतस्स्मृताः ।
तेषु द्वितीयवर्गस्थमूषाभेदा महर्षिभि ॥५८॥
चत्वारिंशदिति प्रोक्ता मूषाकल्पा यथाक्रमम् ।
तासु या पञ्चमीत्युक्ता मूषान्तर्मुखनामिका ॥५९॥
गलने बीजलोहाना सुप्रशस्ता इतीरिता ॥६०॥ इत्यादि
कृतक, अपभ्रंशक, स्थलज, खनिज, जलज, धातुज, ओषधिवर्गज, कृमिज, मांसज, क्षारज,
बालज, अण्डज १२ लोहे क्रम से शास्त्र में लोहतत्त्व को जानने वालों ने कहे हैं। इनके गलाने के
निमित्त मूषाएं प्रत्येक वर्ग से कही हैं, उनमें द्वितीयवर्गस्थ मूषा के भेद मूषाकल्प के यथाक्रम से
महर्षियों ने ४० कहे हैं। उनमें जो पञ्चमी अन्तर्मुखनामवाली मूषा कही है वह बीज लोहों के गलाने में
सुप्रशस्त कही है ॥ ५६-६० ॥
तदुक्तं मूषाकल्पे-वह कहा है मूषाकल्प में-
पिष्टाष्टक किट्टचतुष्टय च लोहत्रय लाङ्गुलिकत्रय च ।
निर्याषषट्क रुरुद्वय च क्षारत्रयमोषधिपञ्चक तथा ॥६१॥
इङ्गालषट्क सूणिकाण्डपञ्चक शालीतुषाभस्मचतुष्टय च ।
शिलाद्वय नागमुखद्वय च वरोलिकाटङ्गणपञ्चक तथा ॥६२॥
बालद्वय पञ्चरस तथैव गुञ्जाद्वय फेनचतुष्टय क्रमात् ।
संयोज्य चैतानथ पेषणीमुले कुर्यात् सुसूक्ष्म मृदुशुद्धपिष्टम् ॥ ६३ ॥
निर्यासमृत्पञ्चकधूसर ततस्तस्मिन् समाश सुनियोज्य पश्चात् ।
नियम्य तत्पाचकयन्त्रत क्रमाच्छिद्वारितैलात्प्रहरत्रय पचेत् ॥६४॥
सवीक्ष्य पाक विधिवत् सुपक्व मूषामुले नालमुखात् प्रपूरयेत् ।
एव कृतेन्तर्मुखनाममूषा दृढातिशुद्धा भवति स्वभावत ॥६५॥ इत्यादि ।
पिष्ट-तिल की खल या उडद् की दाल की पिट्ठी ? ८ भाग, किट्ट-लोहमल-मण्डूर ४
भाग, लोह ३ भाग, लाङ्गुलिक-जाङ्गुल-शालिचावल ? या लाङ्गुलिक-कौंच के बीज ३ भाग,

  • वर्गजा अपि, बहुवचने सन्धिरैकादेश आर्षः ।

व्यासटिकाधिकरण ] [ ५१
निर्यास—गोन्द ६ भाग, रुरुक ? -वनरोहेडा २ भाग, क्षार—यवक्षार-जौखार ३ भाग या सज्जीखार
जौखार सुहागा मिश्रित ३ भाग, ओषधि ?—गेहूं ५ भाग, इङ्गाल—अङ्गारे बुझे कोयले या राख ६ भाग
सृणिकायड ? ५ भाग, शालीतुषाभस्म—शालीधान के तुषों की राख ४ भाग, शिला—दूब घास या
गेरू ? २ भाग, नागमुख ? —नागकेसर का मूल ? २ भाग, वरोलिका ?-कुन्दपुष्प सुहागा ५ भाग, बाल—
सुगन्धवाला २ भाग, रस ? सिन्दूर या शङ्करफ ५ भाग, गुञ्जा—घूंघची ( सफेद घूंघची ? ) २ भाग,
समुद्रफेन ४ भाग। इन्हें मिलाकर पेषणीयन्त्र-चक्की के अन्दर डाल वे अत्यन्त सूक्ष्म कोमल शुद्ध पीस
कर उसमें गोन्द और मृत्तिका ५ भाग, पोली मिट्टी बराबर अंश मिलाकर पाचक—पकानेवाले यन्त्र से
शिवारितैल ? से तीन पहर पकावे. पाक को देखकर अच्छे पके हुए को मूषा बोतल में नालमुख से भर
दे । ऐसा करने

५२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
५३२ कुण्ड क्रम से प्राय. शास्त्र में कुण्डखननकुशल जनों द्वारा कहे गए हैं । सब बीज लोहों
के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं ने उनमें कूर्मव्यासटिका को अच्छा कहा है ॥ ७१–७२ ॥
तदुक्त कुण्डकल्पे—वह कहा है कुण्डकल्प में—
सर्वेषां बीजलोहानां गालनार्थं यथाविधि ॥ ७३ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतव्यासटिकास्स्मृता ।
तासां वर्गविभागस्तु सप्तधा वर्णितो (त ?) बुधै ॥७४॥
तेष्वेकेकवर्गस्थितकुण्डाऽष्टसप्तति स्मृता ।
तेषु सप्तमवर्गीयकुण्डेषु यथाक्रमम् ॥ ७५ ॥
नवमी कुण्डिका या स्यात् कूर्मव्यासटिकति हि ।
संबोच्यते बीजलोहगालने शस्त्रवित्तमै ॥ ७६ ॥ इति
सब बीजलोहों के गलाने के लिये यथाविधि ५३२ व्यासटिकाएं-कुण्डिया-भट्टिया कही हैं उनमें वर्ग-
विभाग तो ७ प्रकार का विद्वानों ने कहा है। उनमें एक एक वर्ग में स्थित ७६ कही हैं उनमें ७वें वर्ग के
कुण्डों में यथाक्रम नौवीं कुण्डिका-भट्टी जो है वह कूर्म व्यासटिका बीज लोहों के गलाने में शास्त्रवेत्ताओं
ने कही है ॥ ७४-७६ ॥
नारायणोपि--नारायण ने भी कहा है--
उक्तेषु सर्वकुण्डेषु कूर्मव्यासटिका विना ।
सर्वेषां बीजलोहाना गालनं न कदाचन ॥ ७७ ॥
कूर्मव्यासटिकामेवमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
तत्स्वरूपपरिज्ञानार्थमाकार सम्प्रचक्षते ॥ ७८ ॥
उक्त सब कुण्डों में कूर्मव्यासटिका के बिना सब बीज लोहों का गलाना कभी नहीं होता।
शास्त्रानुसार इस प्रकार कूर्मव्यासटिका कहकर उसके स्वरूप ज्ञानार्थ आकार को कहते हैं ॥ ७७-७८ ॥
उक्तं हि कुण्डनिर्णये—कुण्डनिर्णय में कहा है—
चतुरस्रं वर्त्तुलं वा कूर्माकारं यथाविधि ।
वित्तिस्तदशकं कुण्ड कारयेद् भुवि शोभनम् ॥ ७९ ॥
भस्त्रिकास्थापनाय तत्पुरोभागतस्स्फुटम् ।
कूर्माङ्गवत्पञ्चमुखं पीठमेकं प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥
तत्कुण्डस्यान्तराले तु मूषाकुण्डं च वर्त्तुलम् ।
कल्पयित्वा बहिर्भागे कुण्डस्यावरणद्वयम् ॥ ८१ ॥
इङ्गालपूरणार्थाय यथाशास्त्रं प्रकारयेत् ।
पार्श्वयोरुभयोस्तस्य यन्त्रस्थापनं प्रकल्पयेत् ॥ ८२ ॥
सम्यग्गालितलोहाद्वा रससम्पूर्णे सुधीः ।
रचनां कूर्मकुण्डस्य उक्तमेवं महर्षिभिः ॥ ८३ ॥

भस्त्रिकाधिकरण ] [ ५३
एवमुक्त्वा व्यासटिका यथाशास्त्र समासतः ।
अथेदानीं तद्भस्त्रिकाजातिनिर्णयमुच्यते ॥ ८४ ॥
चौरस या गोल कूर्माकार—कछुवे के आकार वाला यथाविधि भूमि में १० बालिश्त सुन्दर
कुण्ड बनावे भस्त्रिकास्थापन के लिये, उसके सामने वाले भाग में कूर्माङ्गी पांच मुख वाला एक पीठ
बनावे, उस कुण्ड के भीतरी भाग में गोलमूषा कुण्ड बना कर कुण्ड के बाहिरी भाग में दो आवरण
बना कर अङ्गारे भरने को यथाशास्त्र करे, उसके दोनों पाश्र्वों में गलाये हुए लोहे के पिघले रस को
भरने के लिए यन्त्रस्थान बनावे । इस प्रकार महर्षियों ने कूर्मकुण्ड की रचना विधि कही । इस प्रकार
यथाशास्त्र संक्षेप से व्यासटिका को कह कर अब उसकी भस्त्रिका जाति का निर्णय कहा जाता
है ॥ ७६—८४ ॥
अथ भस्त्रिकाधिकरणम्
अब भस्त्रिका का अधिकरण कहते हैं ।
स्याद् भस्त्रिकाष्टमे षोडशी ॥ अ० २ सू० ५ (अ० १ । सू० १२ ॥?)
बो० वृ०
कूर्मव्यासटिकामुक्त्वा पूर्वसूत्रे यथाविधि ।
भस्त्रिकानिर्णयार्थं सूत्रोय प्रकीर्तित ॥ ८५ ॥
भस्त्राप्रबोधकपदान्यस्मिन् सूत्रे चतु *क्रमात् ।
तेष्वादिमपदात् तत्र क्रियार्थस्सन्निरूपित ॥ ८६ ॥
द्वितीयपदनो भस्त्रालक्षण सूचित भवेत् ।
तथैव तद्वर्गमख्या तृतीयपदतस्स्मृता ॥ ८७ ॥
एव भस्त्रिकसख्या च चतुर्थपदत क्रमात् ।
पदार्थमेव कथित विशेषाथोधुनोच्यते ॥ ८८ ॥
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा प्रकीर्तिता ।
कूर्मभस्त्रा तेषु मुख्या बीजलोहविगालने ॥ ८९ ॥
पूर्वसूत्र में कूर्म व्यासटिका को यथाविधि कहकर भस्त्रिका निर्णयार्थ यह सूत्र कहा है । इस
सूत्र मे भस्त्राप्रबोधक चार पद हैं, उनमें आदिम पद से क्रियार्थ का निरूपण किया है, दूसरे पद से
भस्त्रा का लक्षण सूचित किया, वैसे ही उसकी वर्गसंख्या तीसरे पद से कही है । इस प्रकार भस्त्रिका
संख्या चौथे पद से बतलाई । इस प्रकार पदों का अर्थ कह दिया, विशेष अर्थ अब कहा जाता है । ५३२
भस्त्रिकाएं कही हैं उनमें कूर्मभस्त्रा बीज लोहों के गलाने में मुख्य है—प्रमुख है ॥ ८५—८९ ॥
तदुक्तं भस्त्रिकानिबन्धने—वह कहा है भस्त्रिकानिबन्धन में—
यावन्त्य कुण्डिका प्रोक्तास्तावन्त्येव हि भस्त्रिका ।
कूर्मभस्त्रा तासु कूर्मकुण्डिकाया प्रकीर्तिता ॥ ९० ॥
जितनी कुण्डिकाएं —व्यासटिकाए कही हैं उतनी ही भस्त्रिकाएं भी हैं । उनमें कूर्म भस्त्रिका
कूर्मकुण्डिका—कूर्म व्यासटिका की कही है ॥ ९० ॥

  • 'चतु' अविभक्तिकनिर्देशश्छान्दस प्रार्षो वा ।

५४ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है—
सर्वेषां लोहवर्गाणां गालनार्थं विशेषतः ।
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा इतीरिताः ॥ ६१ ॥
तासां वर्गभेदस्तु अष्टधा सम्प्रकीर्तितः ।
वर्गेष्वष्टमवर्गीयाम्भस्त्रिकासु यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
निर्णिता कूर्मकुण्डस्य षोडशी कूर्मभस्त्रिका । इति
सर्वेषां भस्त्रिकानां तु रचनाक्रमनिर्णयं. ॥ ६३ ॥
भस्त्रिकानिबन्धनाख्यग्रन्थे सम्यङ् निरूपितः ।
तत्सङ्गृह्य यथाकामं किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ ६४ ॥
सब लोहवर्गों के गलाने के अर्थ ५३२ भस्त्रिकाएं कही गई हैं, उनका वर्गभेद तो ८ प्रकार
का कहा है, वर्गों में आठवें वर्ग की भस्त्रिकाओं में यथाक्रम कूर्मकुण्ड—कूर्म व्यासटिका की १६ वीं
कूर्मभस्त्रिका उपयुक्त है। सब भस्त्रिकाओं का रचनाक्रम निर्णय भस्त्रिका निबन्धन नामक ग्रन्थ में
भली प्रकार कहा है वहां से लेकर यथाकाम—जितनी इच्छा है उतना—यहां निरूपित किया जाता
है ॥ ६१–६४ ॥
उक्तं हि भस्त्रिकानिबन्धने—भस्त्रिकानिबन्धन ग्रन्थ में कहा है—
सुवल्कलेश्चर्मपटप्रवर्ग्यैः क्षीरादित्वग्भिर्वरपूगवल्ककैः ।
त्रिनेत्रशुण्डीरसुरङ्गिशालमलीशेणीरमुञ्जाकरघुण्टिकाशणैः ॥६५॥
कृतैस्सुसस्कारजशक्तिमद्भिः पटैश्च पञ्चोत्तरषट्शतैः क्रमात् ।
तथैव लोहैर्वरदारुताम्रविकारकीलैस्सुदृढं यथाविधि ॥ ६६ ॥
प्रकल्पयेच्चित्रविचित्रवक्त्रामुखादिभिशोभितभस्त्रिका क्रमात् ॥ ६७ ॥ इत्यादि
अच्छी वृक्ष की छालों, चर्म—चमड़ों, वस्त्रों, वृक्ष के दूध की परतों, सुपारी वृक्ष की छालों से
त्रिनेत्र ? शुण्डीर ?—हाथीशुण्डी ?, सुरङ्गि—मरोरफली या श्वेत काकमाची ?, शालमली—सिम्बल,
शेणीर ?, मुञ्जाकर--मूंज की जड़, घुण्टिका—कंघी घास, शण से किए सुसंस्कार से उत्पन्न शक्ति वाले
६०५ पटों—वस्त्रों से क्रम से लोहों से अच्छे काष्ठों, ताम्बे के पत्रों कीलों—पेचों से सुदृढ़ चित्र विचित्र
रंग मुख आदि से सुन्दर भस्त्रिका बनावे ॥ ६५–६७ ॥
कूर्मभस्त्रिकालक्षणं तु तत्रैवोक्तम्—कूर्मभस्त्रिका लक्षण तो वहां ही कहा है—
पञ्चाङ्गपञ्चास्यसुपक्षपञ्चकोशैस्तथा कीलकपञ्चकैर्युता ।
विचित्रवर्णैस्सुविराजिता या साकूर्मभस्त्रा इति वर्णिता स्यात् ॥
पांच अङ्गों पाँच मुखों अच्छे पक्ष वाले पांच कोशों से तथा पांच कीलों से युक्त विचित्र वर्णों
से युक्त लोहे की कूर्मभस्त्रिका हो ॥

भस्त्रिकाधिकरण ] [ ५५
लल्लोपि—लल्ल ने भी कहा है—
शास्त्र)क्ताष्टमवर्गीयभस्त्रिकासु यथाक्रमम् ।
या षोडशी भवेद् भस्त्रा कूर्मभस्त्रेति सा स्मृता ॥ ६८ ॥
कूर्मव्यासाटिकायास्तु सैव भस्त्रा न चान्यथा ॥ ६६ ॥ इत्यादि ॥
शास्त्र में कहे आठवें वर्ग वाली भस्त्रिकाओं में यथाक्रम जो १६वीं भस्त्रा है वह कूर्मभस्त्रा
कही है । कूर्मव्यासटिका—कूर्माकार कुण्डी की भस्त्रिका वह ही है अन्य नहीं ॥ ६६ ॥
इति महर्षिभरद्वाजप्रणीते वैमानिकप्रकरणे प्रथमोऽध्यायः ॥?
“इति महर्षि भरद्वाज प्रणीत वैमानिक प्रकरण में प्रथम अध्याय समाप्त हो गया” (यह
कापी करने वाले का वचन प्रामाणिक जचता है )

प्रथम रजिस्टर कापी संख्या २ वस्तुतः कापी संख्या ४—
तृतीयाध्यायप्रारम्भः†
दर्पणाधिकरणम्
दर्पणाधिकरण प्रस्तुत है ।
दर्पणाश्च ॥ अध्याय ३ । सूत्रम् १ ॥
बोधानन्दवृत्तिव्याख्याश्लोकाः ॥
पूर्वाध्याये भस्त्रिकान्तमुक्तंवा सूत्रैर्यथाक्रमम् ।
अथ तृ (द्वि?)तीयाध्यायेस्मिन्नुच्यन्ते यानदर्पणाः ॥ १ ॥
पदद्वयं भवेदस्मिन् सूत्रे दर्पणबोधकम् ।
तत्रादिमपदात् सम्यग्दर्पणास्सूचितास्तथा ॥ २ ॥
तद्विशेषप्रभेदाद्याश्चकारात् सन्निदर्शिताः ।
पदार्थमेवं कथितं विशेषार्थोधुनोच्यते ॥ ३ ॥
वैमानिकाङ्गमुकुरास्सप्तोक्ताश्शास्त्रत क्रमात् ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि लल्लोक्तानि यथाक्रमम् ॥ ४ ॥
पूर्वाध्याय में सूत्रों से भस्त्रिकापर्यन्त विषय कहकर अब इस द्वितीय अध्याय में विमान के
दर्पण कहे जाते हैं । इस सूत्र में दो पद दर्पण बोधक हैं । उनमें आदिम पद से सम्यक् दर्पण सूचित
किये हैं, उसके विशेष भेदादि 'च' से दिखलाये हैं । पदों का अर्थ इस प्रकार कह दिया, विशेष अर्थ
अब कहा जाता है । विमान के अङ्ग मुकुर—दर्पण शास्त्र से सात कहे हैं उनके नाम लल्ल के कहे हुए
यथाक्रम कहूंगा ॥ १–४ ॥
उक्तं हि मुकुरकल्पे—मुकुरकल्प में कहा है—
विश्वक्रियादर्पणोथ शक्त्याकर्षणदर्पणः ।
वैरुप्यदर्पणस्तद्वत्कुण्टिणीदर्पणस्तथा ॥ ५ ॥
† पूना फोटो के अनुसार यह कापी २ होने से द्वितीयाध्याय दिया है परन्तु पूर्व की दक्षिण कापी होने से
तृतीयाध्याय है ।

दर्पणाधिकरण ] [ ५७
पिञ्जलादर्पणश्चैव गुहागर्भव्यदर्पणः ।
रौद्रीदर्पण इत्येते(इत्येतत् ?)सप्तोक्ता यानदर्पणा ॥६॥
तेषु विश्वक्रियादर्श इति यत्सम्प्रकीर्तित ।
तद्यानपीठोर्ध्वमुखस्थाने आवर्तनक्रमात् ॥ ७ ॥
प्रपञ्चे प्राणिभिस्सर्वैर्यत्कर्म कृत भवेत् ।
तत्साक्षाद् वीक्षणार्थ यद् यन्त्रेणा स्थापितो भवेत् ॥८॥
विश्वक्रियादर्श इति तमेवाहुर्मनीषिण ।
विश्वक्रियादर्पण, शक्त्याकर्षणदर्पण, वैरुथ्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जलादर्पण, गुहागर्भदर्पण,
रौद्रीदर्पण ये सात विमान के दर्पण कहे हैं। उनमें विश्वक्रियादर्श जो कहा है उसे विमान के पीठस्थान
के उपस्थान में आवर्तन क्रम से मनुष्यों द्वारा प्रपञ्च—सहार के निमित्त जो जो कार्य किया गया हो उसे
साक्षात् देखने के लिए चालकों की ओर से स्थापित किया जाना चाहिए, इसे विश्वक्रियादर्श मनीषियों
ने कहा है ॥ १-८ ॥
तदुक्तं क्रियासारे—यह क्रियासार ग्रन्थ में कहा है—
सत्त्वद्वय शुण्डिलकद्वय च गृध्रास्थिमेक वरपारपञ्चकम् ।
सिङ्घोरणीपादनखद्वय तथा शुद्धाभ्रषट्क वरशोणपञ्चकम् ॥ ९ ॥
मुक्ताष्टक सौम्यमीननेत्रमष्टादशाङ्गारकसत्त्वमेकम् ।
सर्पत्वगञ्जनिकत्रयं तथा मातृणषट्क वरशर्करा दश ॥ १० ॥
क्षाराष्टक नागचतुष्टय च फेनद्वय गारुडवल्कलत्रयम् ।
वैणव्यक सप्त तथा सुशोधित वैराजश्वेतोदुम्बरपञ्चक च ॥ ११ ॥
एतानि संशोध्य यथाविधि क्रमात् सन्तोप्य चञ्चुपुटमूषिकायाम् ।
सम्पूर्य चण्डोदरकुण्डमध्ये विन्यस्य कव्याष्टशतोष्णवेगत ॥ १२ ॥
सङ्गालयित्वा करदर्पणास्ययन्त्रोर्ध्वनालस्य मुले प्रपूरयेत् ।
एव कृते विश्वक्रियारूपदर्पणो भवेत् सुशुद्धो दृढसूक्ष्मरूप ॥१३॥
सत्त्व ?—क्षार—सज्जीखार ? २ भाग, शुण्डिलक ?—हाथीशुण्डावृत्त २ भाग ?, गृध्रास्थि—
गिद्ध की हड्डी १ भाग, वरपार—शुद्धपारा ५ भाग, सिङ्घोरणी ? के पैर का नाखून २ भाग, शुद्ध अभ्रक
६ भाग, वरशोण—अच्छा सिन्दूर ५ भाग, मोती ८ भाग, सौम्यक मीन नेत्र ? १८ भाग, अङ्गार का
सत्त्व १ भाग, सर्पत्वक्—केंचुली ८ भाग, आञ्जनिक—सुरमा ३ भाग, मातृण ?—काणतृण ?—गन्ध-
तृण ? ६ भाग, अच्छा पाषाण चूरा १० भाग, क्षार—सुहागा ८ भाग, नाग—सीसा ४ भाग, फेन—
समुद्रफेन २ भाग, गरुड वल्कल ?—गरुड़शालि का वल्कल—छिलके ? ३ भाग, वैणव्यकं—वंशलोचन ७
भाग, शोधितवैराज श्वेत उदुम्बर का दूध या गोंद या क्षार ? ५ भाग, इन्हें क्रम से यथाविधि शोध कर
तोल कर चञ्चुपुट मूषिका—बोतल में भर कर चण्डोदर कुण्ड के मध्य रख कर ८ दर्जे की उष्णता के
वेग से गला कर बड़े दर्पण के मुख्ययन्त्र के उपरिनाल के मुख में भर दे। ऐसा करने पर विश्वक्रियादर्पण
सुशुद्ध दृढ़ सूक्ष्म हो जावे ॥ ६-१३ ॥

५८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणनिर्णयः—अथ शक्त्याकर्षण दर्पण का निर्णय देते हैं—
उक्त्वा विश्वक्रियादर्शस्वरूपं शास्त्रतःस्फुटम् ।
अथ शक्त्याकर्षणदर्पणस्सन्निरूप्यते ॥ १४ ॥
विश्वक्रियादर्श—विश्वक्रियादर्पण का स्वरूप शास्त्र से स्फुट कह कर अथ शक्त्याकर्षण दर्पण
निरूपित किया जाता है ॥ १४ ॥
तदुक्तं दर्पणकल्पे—वह कहा है दर्पणकल्प ग्रन्थ में—
आकाशपरिधिकेन्द्रस्थितयानपथि क्रमात् ।
देहनाशकरा या स्युस्त्रिवर्गविषशक्तयः ॥ १५ ॥
आकृष्य तास्स्वशक्त्या यन्नाशयति स्वभावतः ।
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति शास्त्रान्निरूपितः ॥ १६ ॥
आकाश परिधि के केन्द्र में स्थित विमान के मार्ग में क्रम से देह को नष्ट करने वाली जो
तीन विषशक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से स्वभावत खींच कर जो नष्ट करता है वह शक्त्याकर्षण-
दर्पण शास्त्र से निरूपित किया गया है ॥ १५-१६ ॥
धुण्ढिनाथोपि—धुण्ढिनाथ ने भी कहा है—
वातार्काश्वन्यशास्त्रे त्रिवर्गा इति वर्णिताः ।
प्रतिवर्गसमुद्भूता यन्तॄणां देहनाशकाः ॥ १७ ॥
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ।
तास्समाहृत्यनिशेषं स्वशक्त्या यत् पिवेत् क्रमात् ॥ १८॥
तच्छक्त्याकर्षणादर्श इति नाम्ना प्रकीर्तितः ॥ १६ ॥
वात सूर्यकिरण अग्नि ये तीन वर्ग शास्त्र में कहे हैं । प्रतिवर्ग में उठे हुए चालक यात्रियों के
देह के नाशक हैं । १२२ संख्या वाली विष शक्तियां हैं उन्हें अपनी शक्ति से लेकर सर्वथा क्रम से जिससे
पी लेता है इससे वह शक्त्याकर्षण दर्पण नाम से कहा गया है ॥ १७-१६ ॥
पराङ्कुशोपि—पराङ्कुश में भी कहा है—
आकाशपरिधिकेन्द्रे ऽप्वाताकीश्वग्निसम्भवाः ।
द्वाविंशदुत्तरशतसंख्याका विषशक्तयः ॥ २० ॥
विमानपथसन्मध्यन्तं प्रवहन्ति विशेषतः ।
विमानचारिणां देहमारका इति तास्स्मृताः ॥ २१ ॥
उक्तस्स्यात् तद्विनाशार्थं शक्त्याकर्षणदर्पण इति ।
एवमुक्त्वा तस्य नामनिर्णयंशास्त्रतस्स्फुटम् ॥ २२ ॥
मथैव तत्पाकविधिः किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ २३ ॥
† केन्द्रे ऽपु वातः=केन्द्रे ऽप्वातः—पुरातनसन्धिः ।