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सर्वकोश
बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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५४ ] [ बृहद्विमानशास्त्र
नारायणोपि—नारायण ने भी कहा है—
सर्वेषां लोहवर्गाणां गालनार्थं विशेषतः ।
द्वात्रिंशदुत्तरपञ्चशतभस्त्रा इतीरिताः ॥ ६१ ॥
तासां वर्गभेदस्तु अष्टधा सम्प्रकीर्तितः ।
वर्गेष्वष्टमवर्गीयाम्भस्त्रिकासु यथाक्रमम् ॥ ६२ ॥
निर्णिता कूर्मकुण्डस्य षोडशी कूर्मभस्त्रिका । इति
सर्वेषां भस्त्रिकानां तु रचनाक्रमनिर्णयं. ॥ ६३ ॥
भस्त्रिकानिबन्धनाख्यग्रन्थे सम्यङ् निरूपितः ।
तत्सङ्गृह्य यथाकामं किञ्चिदत्र निरूप्यते ॥ ६४ ॥
सब लोहवर्गों के गलाने के अर्थ ५३२ भस्त्रिकाएं कही गई हैं, उनका वर्गभेद तो ८ प्रकार
का कहा है, वर्गों में आठवें वर्ग की भस्त्रिकाओं में यथाक्रम कूर्मकुण्ड—कूर्म व्यासटिका की १६ वीं
कूर्मभस्त्रिका उपयुक्त है। सब भस्त्रिकाओं का रचनाक्रम निर्णय भस्त्रिका निबन्धन नामक ग्रन्थ में
भली प्रकार कहा है वहां से लेकर यथाकाम—जितनी इच्छा है उतना—यहां निरूपित किया जाता
है ॥ ६१–६४ ॥
उक्तं हि भस्त्रिकानिबन्धने—भस्त्रिकानिबन्धन ग्रन्थ में कहा है—
सुवल्कलेश्चर्मपटप्रवर्ग्यैः क्षीरादित्वग्भिर्वरपूगवल्ककैः ।
त्रिनेत्रशुण्डीरसुरङ्गिशालमलीशेणीरमुञ्जाकरघुण्टिकाशणैः ॥६५॥
कृतैस्सुसस्कारजशक्तिमद्भिः पटैश्च पञ्चोत्तरषट्शतैः क्रमात् ।
तथैव लोहैर्वरदारुताम्रविकारकीलैस्सुदृढं यथाविधि ॥ ६६ ॥
प्रकल्पयेच्चित्रविचित्रवक्त्रामुखादिभिशोभितभस्त्रिका क्रमात् ॥ ६७ ॥ इत्यादि
अच्छी वृक्ष की छालों, चर्म—चमड़ों, वस्त्रों, वृक्ष के दूध की परतों, सुपारी वृक्ष की छालों से
त्रिनेत्र ? शुण्डीर ?—हाथीशुण्डी ?, सुरङ्गि—मरोरफली या श्वेत काकमाची ?, शालमली—सिम्बल,
शेणीर ?, मुञ्जाकर--मूंज की जड़, घुण्टिका—कंघी घास, शण से किए सुसंस्कार से उत्पन्न शक्ति वाले
६०५ पटों—वस्त्रों से क्रम से लोहों से अच्छे काष्ठों, ताम्बे के पत्रों कीलों—पेचों से सुदृढ़ चित्र विचित्र
रंग मुख आदि से सुन्दर भस्त्रिका बनावे ॥ ६५–६७ ॥
कूर्मभस्त्रिकालक्षणं तु तत्रैवोक्तम्—कूर्मभस्त्रिका लक्षण तो वहां ही कहा है—
पञ्चाङ्गपञ्चास्यसुपक्षपञ्चकोशैस्तथा कीलकपञ्चकैर्युता ।
विचित्रवर्णैस्सुविराजिता या साकूर्मभस्त्रा इति वर्णिता स्यात् ॥
पांच अङ्गों पाँच मुखों अच्छे पक्ष वाले पांच कोशों से तथा पांच कीलों से युक्त विचित्र वर्णों
से युक्त लोहे की कूर्मभस्त्रिका हो ॥